गुलशन
आश मिलन की दिल में जगा डाला।
मुझे वो शमां की तरह जला डाला।
अरमाँ सिमट के रह गई दिल में,
इस कदर उसने मुझे सता डाला।
मंजिल ए शौक मुनासिब नहीं अब,
क़िस्सा दर्द का जमाने को बता डाला।
सिलसिला ए आरज़ू मुरझाने लगी,
हलक़ में इश्क़ का फंदा फंसा डाला।
निशानियाँ ही रह जायेगी उम्र भर,
ग़मगीन आँखों को भी हँसा डाला।
यूँ जुर्रत ए इज़हार हुई आँखों से,
ख़ुद को मुझको दिवाना बना डाला।
ऐसे ही आशिकी,दिवानगी रहे,
दिल के गुलशन को मैंने सज़ा डाला।
सर्वाधिकार सुरक्षित है
शब्द रचना डी पी लहरे
Dplahre86@gmail.com
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