ग़जल भाग 7

ग़ज़ल 7

ग़ज़ल1
वज़्न-121 22 121 22

कोई मदद के लिए तो आओ
हाँ बेटियों की अना बचाओ

लगी जो नफ़रत की आग दिल में
इसे मुहब्बत से तुम बुझाओ

जो नफ़रतों का है बीज बोता
हाँ मुल्क़ से अब उसे भगाओ

सदा सताते ही आ रहे हो
ग़रीब को और मत सताओ

अगर कमाने के तुम हो लायक
हमेशा तब तो कमा के खाओ

लिखा करो तुम सदा हक़ीक़त
चलो चलो अब कलम उठाओ

सज़ा मिलेगी कसम ख़ुदा की
कभी किसी का न दिल दुखाओ

किसान की जो करे भलाई
चुनाव में अब उसे जिताओ

न ओढ़ना ग़म की यूँ रिदा तुम
मिले जो ग़म फिर भी मुस्कुराओ

हमारे दिल में उतर के देखो
ऐ मौज ऐसे न आज़माओ

ग़ज़ल 2
वज़्न-212 212 212 2

बोतलों को भरी ढूँढते हैं
रात में मयकशी ढूढते हैं

कौन हैं यह बतायें मुक़म्मल
वो जो सबमें कमी ढूँढते हैं

सिर्फ़ चेहरे पे क्यूँ हम मरेंगे
दिल में भी सादगी ढूँढते हैं

मौत जब सामने दिख रही हो
लोग तब जिन्दगी ढूँढते हैं

ग़म भुला मुस्कुराके हमेशा
चार-सू हम ख़ुशी ढूँढते हैं

'मौज' दिल में उतर जाए सबके
ऐसी हम शायरी ढूँढते हैं

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल(3)
वज़्न-2122 1212 22(112)

हम शराफ़त से सादगी से मिले
जब किसी से मिले खुशी से मिले

हम  से  बर्दाश्त  हो  नहीं  पाया
आप जिस तौर अजनबी से मिले

ढूँढ लाए हैं ज़ख़्म का मरहम
ग़म भुलाने को मयकशी से मिले

तीरग़ी  छुप  गई थी  शर्मा कर
जिस घड़ी हम थे चाँदनी से मिले

काम  आए  नहीं  मुसीबत में
ऐसे कुछ लोग मतलबी से मिले

नींद  आती  नहीं  है  रातों में
जबसे हम एक अज़नबी से मिले

सच में दुनिया सँवार दी मेरी
'मौज' तुम हम को बंदगी से मिले

ग़ज़ल 4
वज़्न-2122 1212 22(112)

मैं तो प्यासा हूँ बस मुहब्बत का
क्या करूँगा किसी की दौलत का

दौर ऐसा मिटा तू नफ़रत का
ख़्वाब दिल में जगा मुहब्बत का

ये लड़ाता है भाई-भाई को
खेल ऐसा है इस सियासत का

हम भी रूठे नहीं कभी उनसे
और न मौका दिया शिक़ायत का

हौसला ही बढ़ा के रखना तुम
सामना हो अगर मुसीबत का

बद्दुआ लेना मत ग़रीबों से
याद रखना सबक नसीहत का

कायदे से लड़ाई लड़ना तुम
मसअला होगा जब अदालत का

'मौज'क्यूँ ज़िंदगी रुलाती है
खेल कैसा है आज किस्मत का

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल5
वज़्न- 121 22 121 22

सनम मिले तो बहार आए
हमारे दिल को क़रार आए

कभी नहीं हार मानना तुम
ग़मों का कितना ही भार आए

दवा का कोई असर नहीं जब
मुहब्बतों का बुखार आए

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की छाँव में हम
हसीन लम्हे गुज़ार आए

बड़े बुजुर्गों की तुम दुआ लो
दुआ से दिल में निख़ार आए

कि याद तेरी ऐ मौज हमको
हर एक पल बार-बार आए

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल6
वज़्न-212 212 212 212

धीरे-धीरे से पर्दा उठाया गया
ख़ूबसूरत सा चेहरा दिखाया गया

उसको सच बोलने से डराया गया
झूठ का जाल ऐसा बिछाया गया

कोई फ़रियाद ही सुनने  वाला नहीं
हाल-ए-दिल पत्थरों को सुनाया गया

नफ़रतें बाँटते फिर रहे हो जो तुम
कौन सा पाठ तुमको पढ़ाया गया

चाहने वाले रो-रो परेशान हैं
कब्र में उसको जब से सुलाया गया

नेकियों का सिला यूँ मिला है हमें
ख़ुद-ग़रज़ कह के हम को बुलाया गया

भूख में बच्चा रोता बिलखता रहा
थपकियाँ देके उसको सुलाया गया

'मौज' कितना सहूँ मैं जहाँ के सितम
क्यों मुझे ही सदा आज़माया गया

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल7
वज़्न-1212 1122 1212 22

ये ज़िंदगी तू अकेले गुजार अच्छा है
यहाँ ज़माने के लोगों से आज ख़तरा है

गरीब के लिए रोटी नहीं मयस्सर  अब
जो मालामाल है उसका जहाँ में जलवा है

कई दवाई लगाई नहीं है राहत कुछ
निशान चोट का देखो अभी भी ताज़ा है

अजीब शौक है लोगों को इसमें आने का
सियासी लोगों से मिलता सदा ही धोखा है

ये चेहरे की सदाक़त सदा बयां करता
ये आइना ही लगे यार सबसे सच्चा है

गुलाम बन के हमेशा ही झूठ बोला तू
ऐ 'मौज'कह दे करेला भी आज मीठा है

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल 8
वज़्न- 221 1221 1221 122

हैं बर-सर-ए-पैकार मुझे काट रहे हैं
हैरत  है  मेरे  यार  मुझे काट रहे हैं

कोई तो मुझे इश्क़ के चंगुल से निकालो
इस इश्क़ के आज़ार मुझे काट रहे हैं

अब ज़ीस्त में ख़ुशियों का तसव्वुर भी नहीं है
और ग़म के ये अंबार मुझे काट रहे हैं

दो जून की रोटी भी कमा लें तो ग़नीमत
महँगे हुए बाज़ार मुझे काट रहे हैं

मैं पेड़ मुहब्बत का हूँ सदियों से खड़ा हूँ
नफ़रत के अलम-दार मुझे काट रहे हैं

सच से तो नहीं कोई सरोकार इन्हे 'मौज'
ये झूठ ये अख़बार मुझे काट रहे हैं

आज़ार=बीमारी
पैकार=लड़ाई के लिए तैयार
अलमदार=झंड़ा धारक
तसव्वुर=कल्पना, विचार,ख़याल
गनीमत=विकट परिस्थिति में मिली
             राहत

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल9
वज़्न-212 212 212 212

दिल ये चाहे हमारा नये साल में
हो ग़मों से किनारा नये साल में

बस बहे प्रेम धारा नये साल में
फिर नया हो नज़ारा नये साल में

नफ़रतों की कभी बात हो ही नहीं
बस बढ़े भाई-चारा नये साल में

ज़िंदगी तेरी गाड़ी में रफ़्तार हो
मत रहे तू ख़टारा नये साल में

लड़खड़ाती हुई ज़िंदगी के लिए
हो ख़ुदा का सहारा नये साल में

मेरे महबूब नज़दीक आओ ज़रा
'मौज'ने है पुकारा नये साल में

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल10
वज़्न-221 1221 1221 122

आशिक़ हैं ये दिल आपके ही  नाम करेंगे
हम इश्क़ो-मुहब्बत  को सर-ए-आम करेंगे

इक बार मेरे नाम की मेंहदी तो लगाना
हाथों की ये मेंहदी तुझे गुलफ़ाम करेंगे

मत करना कभी आज के लोगों पे भरोसा
खाकर वो सदा आपका बदनाम करेंगे

आओ तो मेरे मुल्क़ के सब वीर जवानों
हम दुश्मनों के काम को नाकाम करेंगे

दिनरात हमें काम से फुर्सत ही नहीं है
मज़दूर कहाँ देख लो आराम करेंगे

ऐ 'मौज' भले जान चली जाए बचाना
कुछ लोग मेरे मुल्क़ को नीलाम करेंगे

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल11
वज़्न — 122 | 122 | 122 | 122
भला कब किसी का बुरा चाहता हूँ
मैं हक़ में सभी के भला चाहता हूँ

वफ़ाओं के बदले मैं क्या चाहता हूँ
वफ़ा चाहता हूँ, वफ़ा चाहता हूँ

मेरे चारागर, इल्तिजा है बस इतनी
मैं इस दर्द-ए-दिल की दवा चाहता हूँ

सनम, दरमियाँ फ़ासले मत बढ़ाओ
मुहब्बत का इक सिलसिला चाहता हूँ

कहूँ रोज़ जिस से ये दिल की ही बातें
मैं ऐसा कोई हमनवा चाहता हूँ

सदा जुगनुओं सा चमकता रहूँ मैं
बुज़ुर्गों की अब तो दुआ चाहता हूँ

सुनो ‘मौज’, राह-ए-मुहब्बत में अब मैं
फ़ना चाहता हूँ, फ़ना चाहता हूँ

— डी. पी. लहरे ‘मौज’
कवर्धा, छत्तीसगढ़

ग़ज़ल12
वज़्न-122 122 122 12

उसे अपने दिल तक रसाई न दे
रसाई  जो  दे  तो  दुहाई  न  दे

मुसीबत में जो साथ देता नहीं
ख़ुदा मुझको ऐसा तू भाई न दे

तेरी  जुल्फ़  की  क़ैद  में ही रहूँ
सनम मुझको अब तू रिहाई न दे

भलाई  करूँ  मैं  सभी  के लिए
ख़ुदा  मुझमें  कोई  बुराई  न  दे

सदाकत की बातें नहीं की कभी
फ़रेबी  कहीं  का  सफ़ाई  न  दे

ग़रीबों के जो ख़ून में हो सनी
ख़ुदा हमको ऐसी कमाई न दे

मुहब्बत का रोगी हूँ रोगी रहूँ
मुझे 'मौज'कोई  दवाई  न दे

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
🖋️
रसाई=पहुँच

ग़ज़ल 13
वज़्न-2122 2122 2122 212

तीर तो आख़िर जिगर के पार होना चाहिए
क़ल्ब की गहराइयों से प्यार होना चाहिए

दर-ब-दर कब तक भटकते हम रहेंगे ज़िंदगी
सर छुपाने के लिए घर-बार होना चाहिए

धीरे-धीरे रुख़ से अब पर्दा उठा दूँ आज मैं
चाँद से महबूब का दीदार होना चाहिए

मंज़िलें हम पा ही लेंगे मेहनतों की जोर पर
ख़्वाब देखा है तो फिर साकार होना चाहिए

बात दिल की तुम दबा के दिल में मत रखना कभी
गर मुहब्बत है तो अब इक़रार होना चाहिए

'मौज' मज़हब की लड़ाई में कभी मत कूदना
मुल्क़ मेरा हर तरफ़ गुलज़ार होना चाहिए

डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़

ग़ज़ल14
वज़्न-221 2121 1221 212

बेहतर है कोई ख़ुद से भी बेहतर तलाश कर
इन पत्थरों की भीड़ में गौहर तलाश कर

इक चाँद तेरी आँख में उतरेगा देखना
कुछ बंद खिड़कियों के भी बाहर तलाश कर

चारों तरफ़ है जलते मनाज़िर यहाँ-वहाँ
आँखों को दे सुकून वो मंज़र तलाश कर

दुशवारियों की ज़द में भी मिलता है रास्ता
लेकिन ये शर्त है कोई रहबर तलाश कर

ग़म को ख़ुशी में ढालना चाहे तो बात सुन
जाम-ओ-सुबू में आज समुन्दर तलाश कर

ऐ 'मौज' ज़िन्दगी में कभी हारना नहीं
दामन जो चाक है तो रफ़ू-गर तलाश कर

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