छन्द गीत भाग 2
छन्द गीत भाग -2
सार छन्द गीत(१)
का बरनँव महतारी महिमा,शब्द कहाँ ले पावँव।
एको अक्षर ला नइ जानँव,कइसे कलम चलावँव।।
महतारी कस इहाँ बिधाता,नइ हे कोनों दूजा।
मोर बिधाता महतारी हे,करौं रातदिन पूजा।
करौं वंदना चरण कमल के,काया फूल चघावँव।।
का बरनँव महतारी महिमा,शब्द कहाँ ले पावँव।।
महतारी के पबरित कोरा,सरग बरोबर लागय।
अँचरा के सुख छँइहाँ ले सब,दुख बाधा हर भागय।।
कभू चुका नइ पावँव करजा,बस मँय गुन ला गावँव।
का बरनँव महतारी महिमा,शब्द कहाँ ले पावँव।।
महतारी ममता ले होवय,जिनगी हा उजियारी।
बड़ महकावय घर अँगना ला,बनके खुद फुलवारी।।
अमरित जइसे गोरस पी के,भाग अपन चमकावँव।।
का बरनँव महतारी महिमा,शब्द कहाँ ले पावँव।।
बरवै छन्द गीत(२)
सबले सुग्घर हावय,हमरो गाँव।
बर पीपर के पबरित,जुड़हा छाँव।।
नदिया नरवा बोहत,रहिथे धार।
हरियर हरियर दिखथे,खेती खार।।
जुरमिल जम्मो करथें,खेती काम।।
महिनत के बदला मा,पाथें दाम।
चिरई चहके कउँवा,करथे काँव।
सबले सुग्घर हावय,हमरो गाँव।।(१)
करथें सबो किसानी,पाथें धान।
मारय नइ जी कोनो,शेखी शान।।
संझा बेरा मनखे,सब सकलाँय।
गुरतुर गुरतुर बोली,मा बतियाँय।।
बिहना धरती के सब,परथें पाँव।
सबले सुग्घर हावय,हमरो गाँव।।(२)
मिलके रहिथें जम्मो,जी परिवार।
आपस मा रखथें गा,मया अपार।।
सरग बरोबर लगथे,सबके संग।
दया मया के देखे,मिलथे रंग।।
महमानी हे सब घर,ठाँवे-ठाँव।
सबले सुग्घर हावय,हमरो गाँव।।(३)
सरसी छंद गीत जगार(३)
उठव उठव गा अब तो भइया,जागव वीर जवान,
तुँहर बाँह मा जोश भरे बर,आगे नवा बिहान।।
जे सोवय सो खोवत रहिथे,जागव पावव मान।
धरती माँ के जतन करे बर,देवव छाती तान।।
जे जागय सो पावत रहिथे,धरलव अइसन ज्ञान
उठव उठव गा अब तो भइया,जागव वीर जवान।।(१)
कुकरा बासत सब जागत हें,जागँय इहाँ किसान।।
बइला नाँगर धरँय तुतारी,जाँय खेत खलिहान।।
देखव अन उपजइया ला जी,कइसे बोथे धान।।
उठव उठव गा अब तो भइया,जागव वीर जवान।।(२)
बिना करम के कुछ नइ होवय,बनहू कहाँ महान।
आलस मा कुछ नइ बन पाहू,धरौ बात ला ध्यान।।
करम इहाँ पूजा कहिलाथे,कहिथे वेद पुरान।
उठव उठव गा अब तो भइया,जागव वीर जवान।।(३)
सरसी छन्द गीत (४)
चलौ बसालव सब मनखे मन,अंतस मा सतनाम।
भटके नइयाँ पार लगाही,बनही बिगड़े काम।।
सार नाम सतनाम हवय जी,कर लव एखर जाप।
मन के अवगुण छिन मा टरही,दुरिहाही चुपचाप।।
सत परमाण हवय तुम जाके,देखव गिरौद धाम।
चलौ बसालव सब मनखे मन,अंतस मा सतनाम।।
सुख के छँइहाँ पाहू संतो,धर लव मन मा धीर।।
सत रद्दा मा चलके खाहू,सत के मेवा खीर।।
नाँव अमर हो जाही जग मा,मिलही सत के दाम।।
चलौ बसालव सब मनखे मन,अंतस मा सतनाम।।
मनखे मनखे एक बरोबर,कहिथे गुरू हमार।
ऊँच-नीच के भेद-भाव ला,मन ले देवव टार।।
हाड़ माँस के ए काया हा,सबके एक्के चाम।
चलौ बसालव सब मनखे मन,अंतस मा सतनाम।।
गीत(5) गीतमाला
तोर बोली मीठ मिसरी घोरथे ओ।
झार मोला तो मया मा बोरथे ओ।
रूप चंदा के बरोबर तोर लागे।
देख हिरदे ला मयारू मोर भागे।
कान मा तो झूमका हा लोरथे ओ।
तोर बोली मीठ मिसरी घोरथे ओ।
मोर मन ओ तोर कोती भागथे अब।
देख के तोला मया हा जागथे अब।
का मया के गाँठ नैना जोरथे ओ।
तोर बोली मीठ मिसरी घोरथे ओ।
हाथ के चूरी बने ओ खनखनाथे।
पाँव के पैरी मया के गीत गाथे।
तोर मुस्काई भरम ला टोरथे।
तोर बोली मीठ मिसरी घोरथे ओ।
प्रदीप छन्द गीत(6)
चरदिनिया ए जिनगानी हे,सबले सुघ्घर काम कर।
सत्य राह मा चलके संगी,जग मा ऊँचा नाम कर।
दीन-दुखी से मया बाँट ले,मानवता पहिचान ले।
दया-धरम ला मन म बसाके,छुट्टी पा अभिमान ले।।
पर नेकी के काम इहाँ जी,तँय हा आठो-याम कर।
चरदिनिया ए जिनगानी हे,सबले सुघ्घर काम कर।
गुरू,ददा-दाई के सेवा,कर परगट भगवान हे।
माथ नवा ले चरन कमल मा,इँखरे ले उत्थान हे।।
कहाँ भटकबे एती-ओती,मन ला चारोधाम कर।
चरदिनिया ए जिनगानी हे,सबले सुघ्घर काम कर।
लेख लिखा ले सत्य करम के,छोड़ बने जी छाप ला।
सत के करले लेनी-देनी,करले एखर जाप ला।।
जी ले जिनगानी ला हँस के,झन तँय एखर दाम कर।
चरदिनिया ए जिनगानी हे,सबले सुघ्घर काम कर।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ताटंक छन्द गीत(7)
मटकत कुलकत हाँसत गावत,
बरसा रानी आये हे।
प्यास बुझाये बर धरती के,
धरके पानी लाये हे।
नवा बहुरिया जइसे लागे,ये भुँइयाँ हरियाली मा।
मजा उड़ावे जीव चराचर,बरसा के खुशहाली मा।
सेज सहीं अब लागे भुँइयाँ,
माटी हा ममहाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,
बरसा रानी आये हे।(१)
मया-पिरित के डोर बँधागे,झुलवा बर अमराई मा।
सबो जहुँरिया मजा उड़ावें,फुरहुर ए पुरवाई मा।।
गीत कोइली गाके सुघ्घर,
तन-मन ला हर्षाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,
बरसा रानी आये हे।(२)
खेत-खार सुघराई होवय,आगे काम किसानी के।
नाँगर बख्खर जोरावय जी,बइला संग मितानी के।
अबड़ सुहावय सावन महिना,
सुख के बादर छाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,
बरसा रानी आये हे।(३)
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत (8)
(राखी)
रंग बिरंगी राखी धर के,बहिनी मइके आथे।
चंदन टीका माथ लगाके,राखी ला पहिराथे।।
भाई-बहिनी के नाता हा,जग मा होथे पावन।
सदा बरसथे दया मया हा,होथे सुख के सावन।।
रक्षा करके बहिनी मन के,भाई फरज निभाथे।
रंग-बिरंगी राखी धरके,बहिनी मइके आथे।
बँधे रहय ए मया डोर हा,बहिनी के ए आसा।
भाई के मन मा नइ देखय,बहिनी कभू निरासा।।
सुख होवय चाहे दुख होवय,भाई संग निभाथे।।
रंग-बिरंगी राखी धरके,बहिनी मइके आथे।।
अबड़ मयारू बहिनी होथे,जइसे सुख के सागर।
खुशी लुटाथे भाई मन बर,दया मया ला आगर।।
भाई के खुशहाली खातिर,निशदिन दुआ मनाथे।
रंग-बिरंगी राखी धरके,बहिनी मइके आथे।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीत(९७)
मात्रा भार-1212 1122 1212 22
*नायक*
मया के फूल गियाँ दिल मा ओ सजा लेबो।
नज़र मिला के मया गोठ गोठिया लेबो।
*अंतरा* (१)नायक
मया के डोर मयारू बने लमाना हे।
हँसी खुशी ले मया डोर मा बँधाना हे।
मया-पिरत ला बने आज हम निभा लेबो।
मया के फूल गियाँ दिल मा ओ सजा लेबो।
*अंतरा*(२)नायक
मया रही ए जमाना भले जरय चाही।
डरन नहीं ओ जरइया हा देख का पाही।
तभो खुशी ले बने ज़िंदगी पहा लेबो।
मया के फूल गियाँ दिल मा ओ सजा लेबो।
*अंतरा*(३) नायिका
पढ़े लिखे गा तहूँ अउ महूँ पढ़े हावँव।
अपन बना के मया पा महूँ मया पावँव।
ए जात-पात के बाधा ला हम भगा लेबो।
मया के फूल पिया दिल चल खिला लेबो।।
लावणी छन्द गीत(9)
गुरू चरन मा पहली वंदन,निसदिन माथ नवावँव मँय।
हाथ जोर के करँव आरती,काया फूल चघावँव मँय।।
गुरू रूप मा मिले देवता,जिनगी मोर सँवारे हें।
ज्ञान धरा के ए अंतस मा,जिनगी मोर निखारे हें।
तन के दीया मन के बाती,ज्योत अखण्ड जलावँय मँय।
हाथ जोर के करँव आरती,काया फूल चघावँव मँय।।
गुरू ज्ञान के बोहत हावय,परगट पावन गंगा जी।
जेखर ले मन आलस भागय,तन मन होवय चंगा जी।।
तन मन के ए गुरुद्वारा मा,गुरुवर ज्ञान बसावँव मँय।।
हाथ जोर के करँव आरती,काया फूल चघावँव मँय।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत(10)
हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।
जनम पाय हन ए माटी मा,भाग सबो के जागे।।
हमर राज के बोली भाखा,अंतस मा बड़ पोहय।
पंथी करमा सुवा ददरिया,सबके मन ला मोहय।।
छत्तीसगढ़ी संस्कृति हा,सउँहे जग मा छागे।
हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।।
चटनी बासी खाके संगी,जाँगर टोर कमाथन।
धान कटोरा तभे कहाथे,धान बिकट उपजाथन।।
बंपर उत्पादन ले अब तो,तन मन हा हरियागे।
हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।।
आनी-बानी इहाँ परब ला,जुरमिल बने मनाथन।
भेद-भाव मन मा नइ राखन,दया मया बरसाथन।।
आगर झलके दया-मया ले,बैर- भाव दुरिहागे।।
हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।।
जंगल झाड़ी नदी पहाड़ी,मन भावन फुलवारी।
किसम किसम के माल खजाना,उत्पादन हे भारी।
होवत हे बड़ इहाँ तरक्की,नवा सुरुज हा आगे।
हमर राज के भुँइयाँ संगी,सरग बरोबर लागे।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी छन्द(11)
ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।
संविधान ले मिले सबो ला,मानवता अधिकार।
सबो ग्रंथ ले पावन ऐमा ,भरे ज्ञान के खान।
झन बदलव तुम संविधान ला,राखव ऐखर मान।
सुघ्घर जिनगी ला जीये के,ऐही हे आधार।
ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।
संविधान ला पढ़के सबके,बने जागही भाग।
गावव मिलके नर-नारी मन,भीम राव के राग।।
संविधान के निरमाता ला,वंदन बारंबार।
ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।।
दलित मसीहा लिखे हवय जी,भारत के संविधान।
ए जग मा हे अलगे देखव,भारत के पहिचान।।
जानौ समझौ अपनावौ जी,अब तो झारा-झार।
ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।।
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
छन्द गीत भाग-2
सरसी छन्द गीत(12)
*मँय भारत हँव*
मँय भारत हँव मँय भारत हँव,करौ सदा जयकार।
भाग्य बिधाता मँय हँव सबके,करथौ जी उद्धार।
उत्तर मा ए खड़े हिमालय,मोरे उन्नत भाल।
तीन दिशा सागर ले घिरके,करथौं माला-माल।।
पाँव पखारे गंगा निशिदिन,बहथे पावन धार।
मँय भारत हँव मँय भारत हँव,करौ सदा जयकार।।
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,सब झन मोरे लाल।
इँखर एकता भाई-चारा,हे पूजा के थाल।।
देशभक्ति सबके रगरग मा,करथें अब्बड़ प्यार।।
विश्व गुरू मँय कहिलाथौं जी,देथँव सब ला ज्ञान।
इहें तिरंगा झंडा फहरे,जे मोरे पहिचान।।
जम्मू ले कश्मीर सबो हा,हे मोरे परिवार।
मँय भारत हँव मँय भारत हँव,करौ सदा जयकार।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
बरवै छन्द गीत(13)
हमर गुरू जी हावय,दया निधान।
क्षमा करय गलती के,करय निदान।।
अपन शीष्य ला सोझे,राह दिखाय।
घपटे अँधियारी ला,दूर भगाय।।
गुरू लगावय अटके,नइया पार।
गुरू हमर जी हावय,खेवन हार।
ज्ञान गुरू के पावन,हीरा खान।
हमर गुरू जी हावय,दया निधान।।
गुरू नाम हे सबले,बड़का नाम।
नाम लेत मा बनथे,बिगड़े काम।
झूठ-लबारी टारय,काटय पाप।
गुरू नाम के कर लौ,निशदिन जाप।।
सदा गुरू ला देवव,जी सम्मान।
हमर गुरू जी हावय,दया निधान।।
गुरू ज्ञान हा भरथे,सुख भंडार।
गुरू भगावय मन के,सबो विकार।
गुरू नाम ले चलथे,ए संसार।
गुरूदेव ला वंदन ,बारम्बार।।
करय गुरू हा जन-जन, के उत्थान।
हमर गुरू जी हावय,दया निधान।।
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छंद गीत(14)
बिन मौसम के बरसै पानी,करय अपन मनमानी।
बिजली चमकै बादर गरजै,बरसै बरखा रानी...ll
सनन-सनन बड़ गर्रा धूँका,
जाड़ा लागय भारी।
चिखला माते गली खोर मा,
डर लागै अँधियारी।।
काम बिगाड़े ये मौसम हा,हलाकान जिनगानी...
बिन मौसम के बरसै पानी,करय अपन मनमानी...ll1
अलकरहा हे ये मौसम हा,
चिटको जी नइ भावै।
सबो फसल ला चौपट करदिस,
ये हा कब ले जावै।।
ठुठरत हावँय चारो कोती,जम्मो जीव परानी...
बिन मौसम के बरसै पानी,करय अपन मनमानी...ll2
सावन महिना जइसे लागे,
ये मौसम के सेती।
तबियत सबके बिगड़े संगी,
बिगड़त हावय खेती।।
कभू सुहावै अब नइ मोला,बादर के शैतानी...
बिन मौसम के बरसै पानी,करय अपन मनमानी...ll3
#सरसी_छंद_गीत(बसंत ऋतु)15)
दिखय कहाँ अब कोनो कोती,अमरइया के छाँव।
इहाँ कोइली कूक नँदागे,अउ कउआँ के काँव।।
बिछगे चारो-कोती संगी,कंक्रिटिंग के जाल।
बिन आगी के जरगे जंगल,जीव-जंतु बेहाल।।
फुलवारी खोजे नइ पाबे,शहर बने हे गाँव।
दिखय कहाँ अब कोनो कोती,अमरइया के छाँव।।
महुरा घोरे जइसे होगे,पुरवाई तो आज।
कोन बिगाड़त हावय देखव,ए धरती के साज।।
एमा काखर हाथ हवय गा,काखर लेवँव नाँव।।
दिखय कहाँ अब कोनो कोती,अमरइया के छाँव।।
पहली जइसे ए धरती मा,आवय कहाँ बसंत।
बड़हर मन जी कर दे हावँय,अब तो एखर अंत।।
रितु बसंत करलावत हावय,का दुख ला बतियाँव।
दिखय कहाँ अब कोनो कोती,अमरइया के छाँव।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
05-02-22
सार छंद गीत (होली)... (16)
रंग मया के बरसावव जी,बोलव गुरतुर बोली।
बैर भाव ला सबो भुलाके,बने मनावव होली।।
दया मया हा बने रहय जी,राखव बड़ चिनहारी।
मिलके गावव फाग मया के,रंग भरव पिचकारी।।
रंग सबो बर लाल गुलाबी,धरके घर घर जावव।
बैरी मन बन जावव हितवा,दया मया बगरावव।।
उड़य गुलाली गाँव गली मा,कर लव हँसी ठिठोली.....
बैर भाव ला सबो भुलाके,बने मनालव होली.....ll1
धूम मचावव नंगाड़ा के,सबझन नाचव गावव।
मिलके छोटे बड़े सबो झन,फगुवा गीत सुनावव।।
चिक्कन चाँदन झन राहँय जी,रंगव झारा झारा।
तिलक लगाये सब ला संगी,जावव आरा पारा।।
जुर मिल के सब संगे खेलव,अपनबनावव टोली....
भैर भाव ला सबो भुलाके,बने मनालव होली.....ll2
एक बझर मा आय हवय जी,रंग मया के डारव।
आपस मा सब भाई भाई,राग द्वेष ला टारव।।
दया मया ला बाटे बर जी ,देखव होली आये।
गला मिलव आपस मा संगी,खुशी आज हे छाये।।
बाँट मया ला सबला भइया,भर भर के गा झोली....
बैर भाव ला सबो भुलाके,बने मनालव होली.....ll3
गीत डी.पी.लहरे
बायपास रोड़ कवर्धा
दिनाँक 07-02-19
(17) सार
आय हवय जी फागुन महिना,खुशी मनालव होली मा।
रंग मया के सबला डारव,मधुरस घोरव बोली मा।।1
मीत बनालव सबला भइया,जीयव जिनगी ला सादा।
उधम मचावव झन कोनों जी,राखव सबके मरजादा।।2
नशा भाँग के चस्का छोड़व,होली पावन बेला मा।
दया मया ला बाँटे सीखव,ये दुनिया के मेला मा।।3
चिखला माटी के झन खेलव,कभू तुमन ये होली जी।
भाई चारा बाढ़त राहय,अइसन बोलव बोली जी।।4
बचत करव पानी के भइया, लकड़ी ला झन बारौ जी।
सुमता ले सब परब मनावव, कुमता के मुँह टारौ जी।।5
पाँव परव गा सबो बड़े के,टीका माथ लगावौ जी।
गाँव गली मा बजे नँगारा,मिलके धूम मचावौ जी।।6
भेद भाव ला सबो भुलाके,सब ला गले लगावौ जी।
फाग मया के मिलके गावव,होली बने मनावौ जी।।7
झन छेदव अंतस ला कखरो,महुरा जइसन बोली मा।
बन जव भइया सब झन हितवा, ये आँसो के होली मा।।8
*गुरु वंदना दोहा गीत*(18)
पहली गुरुवर वंदना,पूजा बारंबार।
जे भरके सत ज्ञान ला,टारय मन अँधियार।।
दूजे मा दाई-ददा,के पूजा करजोर।
जे लाये संसार मा,ए काया ला मोर।।
गुरुवर चरनन मा करौं,फुलवा के बौछार।
पहली गुरुवर वंदना,पूजा बारंबार।।
तिसरा धरती वंदना,देथे सदा अनाज।
जीव-जंतु ला पालथे,करथे सबके साज।।
हवय प्रकृति देवता,भरथे सुख भंडार।
पहली गुरुवर वंदना,पूजा बारंबार।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
छन्द गीत *मँहगाई* प्रदीप छन्द(19)
दुखदाई मा जीना होगे,अब कइसन दिन आय हे।
मँहगाई मँहगाई संगी,चारो कोती छाय हे।।
जनता मन के आँसू झरथे,मँहगाई के मार मा।
लदकाये हें जनता मन हा,मँहगाई के भार मा।।
नेता मन के माल ख़जाना,सत्ता कुरसी भाय हे।
मँहगाई मँहगाई संगी,सबो जिनिस मा छाय हे।।
छप्पन भोग डकारँय भइया,नेता मालामाल जी।
मँहगाई बैरी के सेती,जनता मन बेहाल जी।।
कइसे चलही जिनगी सबके,अंतस हा करलाय हे।
मँहगाई मँहगाई संगी,चारो कोती छाय हे।।
कोन उबारय मँहगाई ले,कोन बने सरकार गा।
आज भरोसा काखर करबो,कोन करै उद्धार गा।
अच्छा दिन के आस लगा के,जनता ला भरमाय हे।
दुखदाई मा जीना होगे,अब कइसन दिन आय हे।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत(20)
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।
पावन अँचरा छाँव के,महिमा अब्बड़ भारी।।
नौं महिना ले कोख मा,राखे दाई मोला।
वंदन बारंबार हे,जग जननी माँ तोला।।
करथस मया दुलार ले,जिनगी ला उजियारी।।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(१)
नान्हे ला बड़का करे,सहिके कतको पीरा।
तन-मन ला हरसाय ओ,समझे मोला हीरा।।
तोर सहीं ओ कोन हे,जग मा पालनहारी।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(२)
दाई देवी ले घलो,पाये ऊँचा दर्जा।
कइसे दाई छूटहूँ,तोर दूध के कर्जा।।
तोर पाँव सुखधाम हे,हावस ममताधारी।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(३)
डी.पी.लहरे"मौज"
बायपास रोड़ कवर्धा
छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत(21)
गाड़ सकौ ता गाड़ लौ,मानवता के झंडा।
लगय नहीं एमा कभू,कोनो मुल्ला पंडा।।
मानवता सबले बड़े,धर्म हवय पहिचानौ।
मनखे हव मनखे सहीं,भाई-चारा लानौ।।
जात-धरम के भेद मा,झन भाँजवजी डंडा।
गाड़ सकौ ता गाड़ लौ,मानवता के झंडा।
ऊँच-नीच के भावना,अंतस ले तुम टारौ।
इरखा जम्मो छोड़ के,जोत मया के बारौ।।
दया मया हा सार हे,भर लव बटुवा हंड़ा।।
गाड़ सकौ ता गाड़ लौ,मानवता के झंडा।
मनखे मनखे एक हव,राखव भाई-चारा।
सत रद्दा मा रेंगलव,मिलके झारा-झारा।।
रहय एकता देश मा,जोश परै झन ठंडा।
गाड़ सकौ ता गाड़ लौ,मानवता के झंडा।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ताटंक छन्द गीत..(22)
जा रे जा परदेशी बाबू,तँय का मया निभाबे रे।
मोर मया ला छोड़े तँय हा,जिनगी भर पछताबे रे।।
अंतरा(१)
अब्बड़ मया जताये पहली,अब का होगे हे तोला।
करे रहे शादी के वादा,अब काबर छोड़े मोला।।
मोर मया ले नाता टोरे-जा तँय मजा उड़ाबे रे।
जारे जा परदेशी बाबू,तँय का मया निभाबे रे।।
अंतरा(२)
मोर गरीबी मा तँय हाँसे,दे डारे मोला धोखा।
कइसे बनगे रे निरमोही,अंतस ला कर दे खोखा।
धोखा देके तँय हा मोला-2जिनगी भर करलाबे रे।
जा रे जा परदेशी बाबू,तँय का मया निभाबे रे।।
गीतकार
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत(23)
*शीर्षक-सतनामी कोन?*
सत रद्दा जे रेंगथे,सतनामी कहलाथे।
ओही मनखे हा सदा,गुरू ज्ञान ला पाथे।।
झूठ-लबारी छोड़के,बोलय सत के बोली।
जम्मो मनखे ला सदा,मानय वो हमजोली।।
आड़म्बर के फाँस मा,फँसथे ते पछताथे।
सत रद्दा जे रेंगथे,सतनामी कहलाथे।।
सबो जीव ला मानथे,जे हर एक बरोबर।
मनखे ला मनखे सहीं,मानय सखा सहोदर।।
बैर-भाव ला छोड़के,दया-मया बरसाथे।
सत रद्दा जे रेंगथे,सतनामी कहलाथे।।
सादा चंदन माथ मा,सत के रहय पुजारी।
रहन-सहन सादा रखय,जेवन शाकाहारी।।
बैरी ला हितवा करय,जन-जन ला अपनाथे।
सत रद्दा जे रेंगथे,सतनामी कहलाथे।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीत मुक्तामणी छन्द(24)
*हरीतिमा के संग मा,जुरमिल पेड़ लगाबो।*
धरती दाई के चलौ,हम सब लाज बचाबो।
झन काटव तुम पेड़ ला,पेड़ गिराथे पानी।
आक्सीजन देथे सदा,पेड़ हमर जिनगानी।।
गढ़बो नवा भविष्य ला,धरती ला हरियाबो।
*हरीतिमा के संग मा,जुरमिल पेड़ लगाबो।*
भुँइयाँ सुन्ना पर जही,बिन रुखवा के भाई।
बनही रेगिस्तान जी,होही बड़ करलाई।।
शुद्ध रहय पर्यावरण,शुद्ध हवा हम पाबो।
*हरीतिमा के संग मा,जुरमिल पेड़ लगाबो।*
सौ सौ पूत समान हे,एक पेड़ हा भाई।
रक्षा करबो आज हम,ए ही मा सुखदाई।।
रोपिन पौधा मेड़ मा,नइ ते बड़ पछताबो।
*हरीतिमा के संग मा,जुरमिल पेड़ लगाबो।*
डी.पी.लहरे"मौज"
बायपास रोड़ कवर्धा
सरसी छन्द विरह गीत(25)
विषय-बरसात
मोर धनी कइसे नइ आये,आगे हे बरसात।
ए बिरहा मा कइसे जीयँव,तरसत हँव दिनरात।।
मन-मन सोंचत हावँव ओला,अंतस लागे ठेस।
कइसे होही मोर बिना वो,गे हावय परदेश।।
फोन घलो नइ करे सखी रे,करे नहीं कुछ बात।
मोर धनी कइसे नइ आये,आगे हे बरसात।।
कोन किसानी करही अब तो,परिया खेती खार।
नान-नान हे लइका छउवा,कोन लगाही पार।।
कइसे ए परिवार चलावँव,मँय नारी के जात।।
मोर धनी कइसे नइ आये,आगे हे बरसात।।
अँधियारी डर लगे सखी रे,बादर बरसे जाय।
बिजली चमके बादर गरजे,जिंवरा हा घबराय।।
चूहय छानी घर भर पानी,भुइयाँ गय हे मात।
मोर धनी कइसे नइ आये,आगे हे बरसात।।
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत..(26)
हम बेटा हन वीर सिपाही,भारत के रखवाला।
पहरा देथँन हम शरहद मा,धरके बन्दूक भाला।।
कभू झुकन नइ देवन संगी,पावन हमर तिरंगा।
शान बढ़ाथे हम सबके जी,तन मन करथे चंगा।।
बुरी नजर ले देखय तेखर,मुँह ला करथँन काला।
हम बेटा हन वीर सिपाही,भारत के रखवाला।।
रक्षा खातिर मात्रभूमि के,बनबो हम बलिदानी।
लगा जान के बाजी संगी,देबो हम कुर्बानी।।
कहाँ मेकरा कस बढ़ पाही,बैरी मन के जाला।
हम बेटा हन वीर सिपाही,भारत के रखवाला।।
का बरसा का जाड़ा गरमी,हमला कुछ नइ लागे।
हम सबके हिम्मत के आगू,आलस पल्ला भागे।।
इंकलाब जय भारत माता,मिलके जपथन माला।
हम बेटा हन वीर सिपाही,भारत के रखवाला।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी छन्द गीत..
*विषय-पितृ दिवस*(27)
मोर ददा के गावँव संगी,निशदिन मँय गुणगान।
जेखर कारन पाये हावँव,दुनिया मा पहिचान।।
सुख के छँइहाँ देथे संगी,दुख मा देथे धीर।
ददा लुटाथे सदा मया ला,जइसे मेवा खीर।।
तीन लोक मा ददा सहीं जी,कोन हवय भगवान।
मोर ददा के गावँव संगी,निशदिन मँय गुणगान।।
दुख सह के सुख देथे मोला,करथे माला-माल।
दुख के बादर कतको आवय,बन जाथे जी ढाल।।
असल-नकल पहिचान कराथे,देथे अब्बड़ ज्ञान।
मोर ददा के गावँव संगी,निशदिन मँय गुणगान।।
घर के मुखिया ददा कहाथे,ददा जीव आधार।
जोरे रखथे जिनगी भर जी ,हँसी-खुशी परिवार।।
ए सांसा के राहत ले जी,करहूँ बड़ सम्मान।
मोर ददा के गावँव संगी,निशदिन मँय गुणगान।।
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीत..(28)
रोवत हे माँ भारती,झर-झर आँसू ढारे।
अंतस हा करलाय हे,छुआछूत के मारे।।
जाति-पाति के रोग हा,अमरबेल कस छागे।
चगलत हावय रात-दिन,काया हा मुरझागे।।
बाढ़े अत्याचार ला,कोन इहाँ ले टारे।
रोवत हे माँ भारती,झर-झर आँसू ढारे।।
जाति-धरम के भेद मा,लड़थें भाई-भाई।
कोन बरोबर कर सके,ऊँच-नीच के खाई।।
नेता मिडिया मन इहाँ,देखत हें मुँह फारे।
रोवत हे माँ भारती,झर-झर आँसू ढारे।।
छुवाछूत जे मानथे,उही देश के द्रोही।
अपने के नइ होय ते,अउ काखर जी होही।।
ओला बड़ धिक्कार हे,जे हर शांति उजारे।
रोवत हे माँ भारती,झर-झर आँसू ढारे।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत..(29)
जपौं गुरू के नाँव ला,जे सबले हे प्यारा।
देवय नित आशीष जी,गुरुवर एक सहारा।।
चरण कमल बंदौं सदा,करौं गुरू के पूजा।
कहाँ इहाँ भगवान हे,गुरू सहीं जी दूजा।।
गुरू बहाथे ज्ञान के,अमरित जइसे धारा।
जपौं गुरू के नाँव ला,जे सबले हे प्यारा।।
जाने सकल जहान हा,गुरू ज्ञान के ज्ञाता।
देथे बड़ वरदान जी,सबके भाग्य विधाता।।
गुरू जाप ले हो जथे,दुख के सबो किनारा।
जपौं गुरू के नाँव ला,जे सबले हे प्यारा।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत(30)
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।
पावन अँचरा छाँव के,महिमा अब्बड़ भारी।।
नौं महिना ले कोख मा,राखे दाई मोला।
वंदन बारंबार हे,जग जननी माँ तोला।।
करथस मया दुलार ले,जिनगी ला उजियारी।।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(१)
नान्हे ला बड़का करे,सहिके कतको पीरा।
तन-मन ला हरसाय ओ,समझे मोला हीरा।।
तोर सहीं ओ कोन हे,जग मा पालनहारी।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(२)
दाई देवी ले घलो,पाये ऊँचा दर्जा।
कइसे दाई छूटहूँ,तोर दूध के कर्जा।।
तोर पाँव सुखधाम हे,हावस ममताधारी।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(३)
डी.पी.लहरे"मौज"
बायपास रोड़ कवर्धा
रोला छंद गीत..(31)
आवत हे बरसात,झमा-झम लाही पानी।
चुचवाही जी धार,पटापट बजही छानी।
भुँइयाँ के भगवान,सुधारय धनहा डोली।
माटी तारनहार,खुशी के भरही झोली।
उपजाये बर धान,करय जी महिनत भारी।
अपन लगाके जान,कमावय खेती-बारी।।
माटी पूत किसान,खेत ले रखय मितानी।
आवत हे बरसात,झमा-झम लाही पानी।।(१)
बादर आँसो साल,बने पानी बरसाही।
उलही डारा-पान,संग भुँइयाँ हरियाही।
भरही तरिया खेत,एक मन के जी आगर।
चलही नदिया धार,समाही जाके सागर।।
होही अब खुशहाल,सबो मनके जिनगानी।
आवत हे बरसात,झमा-झम लाही पानी।।(२)
छंदकार/गीतकार
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़(32)
गीतमाला छन्द गीत
2122 2122 2122
मोर हिरदे के मयारू जोगनी रे।
मोर आँखी के कसम से रोशनी रे।।
तोर गोरी रूप अब्बड़ भाय मोला।
खींच के ओ तोर कोती लाय मोला।।
मोंगरा के फूल जइसे होंठ लागे।
कोइली के तान जइसे गोठ लागे।।
मीठ बोली तोर जइसे चासनी रे।
मोर हिरदे के मयारू जोगनी रे।।
मोर दिल के ओ मयारू डायरी तैं।
सिर्फ़ एक्के ओ मया के शायरी तैं।।
रातदिन हावय मया के बंदगी ओ।
मानथौं तोला पिरोही जिंदगी ओ।।
मोर मन ला मोह डारे मोहनी रे।
मोर हिरदे के मयारू जोगनी रे।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
*रावन* ताटंक छन्द गीत (33)
जात-पात के ए रावन ला,जम्मो मिलके मारौ तो।
छुवाछूत अउ हीन भावना,अपने मन ले टारौ तो।।
कोन मारही वो रावन ला,कतको रावन जिंदा हें।
जेखर सेती बहिनी,बेटी,महतारी शरमिंदा हें।।
रावन ले बड़का पापी हें,इनला भुर्री बारौ तो।
जात-पात के ए रावन ला,जम्मो मिलके मारौ तो।
पुतरा के मारे ला कोनों,राम कभू बन पाये का?
मर्यादा पुरुषोत्तम बनके,नाँव अपन चमकाये का?
विजई दशमी के बेरा मा,मन के इरखा झारौ तो।
जात-पात के ए रावन ला,जम्मो मिलके मारौ तो।
रोजगार के कहाँ ठिकाना,छाये हे मँहगाई रे।
दिन-दिन बढ़ते जाय गरीबी,माते हे करलाई रे।
राम राज ला पाछू लाहू,जनता पहली तारौ तो।
जात-पात के ए रावन ला,जम्मो मिलके मारौ तो।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द(34)
आज मनावत हावँय कतको,मन हैप्पी न्यू ईयर।
डीजे-फीजे नाचा-वाचा,पीके दारू बीयर।।
चखना-वखना कुकरी मछरी,खावत मारँय फेशन।
पार्टी-सार्टी धूम मचाके,लेवँय फोटे शेसन।।
रंग जमावँय बइठे-ठइठे,मारत हावँय चीयर।
आज मनावत हावँय कतको,मन हैप्पी न्यू ईयर।।
नान्हे नान्हे लइका मनके,देखव कतका डेयर।
मनमाने दउड़ाथें गाड़ी,नइ हे इन मा गेयर।।
मजा उड़ाथें नवा साल मा,मिलके जम्मो डीयर।
आज मनाथें अइसे कतको,मन हैप्पी न्यू ईयर।।
नशा पान के चक्कर छोड़व,छोड़व अइसन मेटर।
सादा जिनगी जीयव संगी,ए ही सबले बेटर।।
खुशी मनावव सादा सिंपल, इही गोठ हे क्लीयर।
आज मनाथें अइसे कतको,मन हैप्पी न्यू ईयर।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत🍫🌹(35)
बहुत बहुत बधाई अउ शुभकामना🌹🍫
नवा बछर के गाड़ा-गाड़ा,झोंकव मोर बधाई।
मंगलमय जिनगी हा राहय,जीयत भर सुखदाई।।
दुख के बादर दुरिहा राहय,सुख के होवय बरसा।
तन मन मा हरियाली राहय,जइसे उलहा परसा।।
हँसी-खुशी मा बीतय जिनगी,पावव मया मिठाई।
नवा बछर के गाड़ा-गाड़ा,झोंकव मोर बधाई।।
जबतक जिनगी हावय संगी,कसके मजा उड़ालौ।
झूमव नाँचव मया बाँट के,अंतस ला हर्षालौ।।
सत के रद्दा चलव हमेशा,खाहू दूध- मलाई।
नवा बछर के गाड़ा-गाड़ा,झोंकव मोर बधाई।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
चौकड़िया छन्द गीत(36)
नइ तो जानँव मथरा काँशी,सदगुरु के मँय दासी।
जानँव एक्के नाम गुरू के,घट घट के हे वासी।।
तन के दुख ला करय किनारा,बाबा एक सहारा।
छिन मा टारय मेटय संतो,तन मन के अँधियारा।
सदगुरु बानी लागे जइसे,बोहय अमरित धारा।
भव सागर ले पार लगे बर,गुरू नाम हे चारा।।
भटके हंसा पार लगावय,सबके बाबा घासी।
नइ तो जानँव मथरा काँशी,सदगुरु के मँय दासी।।1
बाबा घासी सत के ध्यानी,सत के हे वरदानी।
सत रद्दा रेंगावय सबला,सतगुरु बड़का ज्ञानी।
बाधा बिपदा टारय झट ले,टारय मन अभिमानी।
सत के रद्दा रेंगय तेखर,बन जावय जिनगानी।।
सत के पूजा वंदन करथौं,हे जग मा अविनाशी।
नइ तो जानँव मथरा काँशी,सदगुरु के मँय दासी।।2
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत(37)
जात-पात के ए बंधन ला,मिलके आवव टोरी।
हम बनके मानवतावादी,सबले नाता जोरी।।
छुआछूत के भरम भूत मा,होथे बड़ दुखदाई।
आवव मिलके पाटी संगी,ऊँच-नीच के खाई।।
मनखे-मनखे एक बरोबर,मन मा मँदरस घोरी।
जात-पात के ए बंधन ला,मिलके आवव टोरी।।
जात-पात के रोग मिटाबो,तब खुशहाली आही ।
छुआछूत के मारे नइ तो,भारत माँ करलाही।।
पाठ पढ़ाबो मानवता के,भरबो सुख के बोरी।
जात-पात के ए बंधन ला,मिलके आवव टोरी।।
मनखे ला मनके हम जानी,राखन भाईचारा।
आडंबर के रद्दा छोड़न,आवव झारा-झारा।
भीम-राव के जइसे बाँधन,दया-मया के डोरी।।
जात-पात के ए बंधन ला,मिलके आवव टोरी।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
जाड़ा सार (38)
सुरुज नरायन कहाँ लुकागे,अब्बड़ लागे जाड़ा।
पूस महीना लाहो लेवय,काँपत हावय हाड़ा।।
शाल,सुवेटर,कंबल,गदरी,कतको ओढ रजाई।
नइ भागय जाड़ा हा संगी,जिनगी हे दुखदाई।।
सरर सरर धूँका गर्रा हा,जइसे बिच्छी आड़ा।
सुरुज नरायन कहाँ लुकागे,अब्बड़ लागे जाड़ा।
शीत लहर हा आके सबके,तन मन ला झकझोरे।
अइसे लागे सबके जिनगी,ला पानी मा बोरे।।
छिन-छिन मा ए मौसम बदले,सबके करे कबाड़ा।
सुरुज नरायन कहाँ लुकागे,अब्बड़ लागे जाड़ा।।
ताते पानी ताते जेवन,पी खा लव सँगवारी।
सर्दी खासी कोरोना के,नइ लागे बीमारी।।
भुर्री बारे घर मा राहव,अपन बनाके माड़ा।
सुरुज नरायन कहाँ लुकागे,अब्बड़ लागे जाड़ा।।
सार छन्द गीत(39)
गुरू ज्ञान के हवय खजाना,ज्ञान सीख बरसाही।
माथ नँवा लव गुरू चरन मा, चोला हा तर जाही।।
सार हवाय जी गुरू बचन हा,गुरू बचन ला मानौ ।
महिमा हावय बड़ भारी जी,सबो मनुष मन जानौं।।।
सदा सत्य के राह बताही,हंसा पार लगाही।
माथ नँवा लव गुरू चरन मा, चोला हा तर जाही।।(१)
जे माने हे गुरु बचन ला,तरगे ओखर चोला ।।
गुरू सीख अमरित के धारा,भरे कला गुन सोला
अँधियारी ला दूर भगाही, उजियारी बगराही।
माथ नँवा लव गुरू चरन मा, चोला हा तर जाही।।(2)
डी.पी.लहरे"मौज"
मुक्तामणि छन्द गीत(40)
विषय-सम्मान
अंग्रेजी तुकांत
झोंकँय उन सम्मान भर, चलय ग फोटो सेसन।
वर्तमान कवि के कका, होगे एही फेसन।।
सिरतों साहित बर कथौं, नइ राहय कुछ मेटर।
कइसे मानी आज गा, इन ला हम कवि बेटर।।
कहाँ पढ़ावँय गा कभू, इन सुमता के लेसन।
झोंकँय उन सम्मान भर, चलय ग फोटो सेसन।।
सत्य लिखइया के इहाँ, नइए भाई पावर।
चाटुकार कवि मंच मा,बोलय आठो ऑवर।।
ठलहा नाम कमाय के, होगे हावय पेसन।
झोंकँय बस सम्मान भर, चलय ग फोटो सेसन।।
बिना धार के हे कलम, नइए संगी फेयर।
तभ्भो मिलथे मंच मा,इनला हरदम चेयर।।
दँउड़े दँउड़े जाँय जी, पा के इन्मफर्मेशन।
झोंकँय बस सम्मान भर, चलय ग फोटो सेसन।।
शब्दार्थ
शेसन=सत्र,फेशन=शौक,मेटर=मामला,बेटर=अच्छा,पावर=
ताकत,आवर=घंटा,पेशन=जुनून,फेयर=साफ,चेयर=कुर्सी,इन्फर्मेशन=जानकारी
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
प्रदीप छन्द गीत..(41)
जे साहित के सा नइ जाने,वो पावय सम्मान ला।
आसमान ला छूवत हावय,का कहिबे जी शान ला
जोकड़ बनगे हावय भाई,जघा-जघा मा छाय हे।
हँसी-ठिठोली दाँत निपोरी,श्रोता ला भरमाय हे।।
देखव खोवत हावय संगी,कविकुल के पहिचान ला।
जे साहित के सा नइ जाने,वो पावय सम्मान ला।
नाम कमाये के चक्कर मा,छपथे जी अखबार मा।
सरहा लेख लिखइया सिरतो,जगमग हे संसार मा।
आज गिरावत हावय नीचा,साहित के उत्थान ला।
जे साहित के सा नइ जाने,वो पावय सम्मान ला।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा छन्द गीत(42)
विषय- बसंत
ऋतु बसंत हा आय हे,मन मा भरे उलास।
उजरत जंगल देख के,मन ला करय उदास।।
खोजे मा अब नइ मिले,हरियर हरियर बाग।
चट-चट धरती हा जरे,कोन लगादिस आग।।
कभू सुने ला नइ मिले,कोयलिया के राग।
फुलवा बिन भौरा कहाँ,इँखरो फुटगे भाग।।
धुँवा-धुँवा धरती लगे,नइ हे कहूँ उजास।
ऋतु बसंत हा आय हे,मन मा भरे उलास।।(१)
फुरहुर पुरवाही बिना,साँसा घुटते जाय।
इहाँ बसंत बहार हा,अब कइसे रह पाय।
देख कारखाना इहाँ,जघा-जघा मा छाय।
जन जीवन बेहाल हे,कइसे जीहीं हाय।।
लटपट कटथे रात हा,नइ हे दिन हा खास।
ऋतु बसंत हा आय हे,मन मा भरे उलास।।(२)
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ताटंक छन्द गीत..(43)
विषय-पतझड़
पेड़ झड़ाथे सुख्खा पाना,अइसे अवगुण झारौ जी
नवा नवा पाना उलहाथे,तइसे सतगुण धारौ जी।।
पतझड़ हा देथे संदेशा,दुख के दिन जल्दी जाथे ।
दुख के पाछू-पाछू भइया,सुख के दिन जल्दी आथे ।।
कभू उदासी मा झन जीयव,चलौ उदासी टारौ जी।
पेड़ झड़ाथे सुख्खा पाना,अइसे अवगुण झारौ जी।।(१)
पेड़ छोड़ के जुन्ना पाना,खुश होथे हरियाली मा।
इही किसम के राहव भाई,आप सबो खुशहाली मा।।
जात-पात के भरम-भूत ला,मिलके भुर्री बारौ जी।
पेड़ झड़ाथे सुख्खा पाना,अइसे अवगुण झारौ जी।।(२)
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
प्रदीप छन्द गीत..(44)
विषय उनहारी(ओन्हारी)
करलौ उनहारी सँगवारी,रबी फसल ला डार के।।
परती झन रखहू खेती ला,जम्मो भाँठा खार के।
बइठे ठलहा झन राहव जी,करलौ खेती काम ला।
जीरा,धनिया,सरसों,अरसी,बोंवव पाहू दाम ला।।
आलू,गोभी,मसूर,बटरा,रद्दा हे व्यापार के।
करलौ उनहारी सँगवारी,रबी फसल ला डार के।।
चना गहूँ चौलाई तिंवरा,रबी फसल के शान हे।
लाल चुकंदर लाल टमाटर,सुरुजमुखी पहिचान हे।।
नगदी फसल कहाथें भइया,नोहे फसल उधार के।
करलौ उनहारी सँगवारी,रबी फसल ला डार के।।
उन्नत खेती उनहारी ले,करलौ सबो किसान जी।
तुँहर भरोसा जग हा चलथे,भुँइया के भगवान जी।।
सौंफ गोंदली सहसुन मेथी,ऊँचा भाव बजार के।
करलौ उनहारी सँगवारी,रबी फसल ला डार के।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
बरवै छन्द गीत(45)
दाई बाबू हावँय,खेवनहार।
मोर इही मन जिनगी,के पतवार।।
बाबू देवा दाई, देवी रूप।
चरण कमल के छइँहा,टारै धूप।।
इँखर कृपा ले लागय,नइयाँ पार।
दाई बाबू हावँय,खेवनहार।।
दाई के अँचरा मा,सुख के खान।
घर-कुरिया के बाबू,हावय शान।।
मया छलकथे जइसे,नदिया धार।।
दाई बाबू हावँय,खेवनहार।।
चरण कमल मा राखौं,निशदिन माथ।
मोर मुड़ी मा राहय, इँखरे हाथ।।
जिनगी भर मँय पावँव,मया दुलार।
दाई बाबू हावँय,खेवनहार।।
डी.पी.लहरे"मौज"
ताटंक छन्द गीत..(46)
विषय-होली म प्रदूषण
आँसो के होली मा तँय हा,रोक प्रदूषण भाई रे।
रंग गुलाल जरूरी नइ हे,दे ले आज बधाई रे।।
कमती होगे हवय पेंड़ हा,खेत-खार अउ डोली मा।
कभू डारबे झन सँगवारी,पेड़ काट के होली मा।।
पर्यावरण बिगाड़ करे मा,होही बड़ करलाई रे।
आँसो के होली मा तँय हा,रोक प्रदूषण भाई रे।।(१)
वायु प्रदूषण हा करथे जी,धुवाँ-धुवाँ जिनगानी ला।
रंग गुलाल उड़ा झन तँय हा,छोड़ अपन अभिमानी ला।
बिरथा बह जाथे सब पानी,कोन करय भरपाई रे।
आँसो के होली मा तँय हा,रोक प्रदूषण भाई रे।।(२)
आज मनाले अइसे होली,माथ लगाले रोली जी।
देख गले तँय मिलके संगी,बोल मया के बोली जी।।
दया मया के गा ले फगुवा,ए मा हे सुखदाई रे।
आँसो के होली मा तँय हा,रोक प्रदूषण भाई रे।।(३)
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ताटंक छन्द गीत...होली(47)
मिले नहीं जी लकड़ी छेना,खेत-खार अउ डोली मा।
कहाँ होलिका हा जर पाही,ए आँसों के होली मा।।
कतका बछर जलावत होगे,फेर कहाँ ले आथे जी।
कोनजनी कइसे गा भाई,ए जिंदा हो जाथे जी।।
आज होलिका हा मर जाही,मारव मिलके गोली मा।
मिले नहीं जी लकड़ी छेना,खेत-खार अउ डोली मा।।
कइसे रंग गुलाल उड़ाबो,पानी बिन करलाई हे।
कहाँ गली मा फाग मताबो,घर घर आज लड़ाई हे।।
सुमता के सब परब नँदागे,कुमता आगे झोली मा।।
मिले नहीं जी लकड़ी छेना,खेत-खार अउ डोली मा।।
पर्यावरण बचाव करे बर,कुछ तो सोचौ भाई हो।
बढ़े प्रदूषण हा झन संगी,करौ सबो अगुवाई हो।।
हँसी-खुशी ले परब मनालौ,मन ला मोहव बोली मा।
मिले नहीं जी लकड़ी छेना,खेत-खार अउ डोली मा।।
डी.पी.लहरे"मौज"
दोहा गीत..।(48)
मोर भरोसा कर गड़ी,मोर मया हे सार।
बरसाहूँ ओ तोर बर,मया-पिरित के धार।।
तोला जोही मोर बर,गढ़े हवय भगवान।
मोर मया ला तँय गियाँ,थोकुन ओ पहिचान।
देख बढ़ा के तँय मया,जिनगी के दिन चार।
मोर भरोसा कर गड़ी,मोर मया हे सार।।(1)
कतको प्रेमी मन इहाँ,होथें ओ बइमान।।
मँय हा तोला मानथौं,मोर मयारू जान।।
सुख मा जिनगी तोर ओ,आज लगाहूँ पार।।
मोर भरोसा कर गड़ी,मोर मया हे सार।।(2)
अंतस मा तँय झाँक ले,हवय मया के खान।
मोर मया मा तँय सदा,पाबे ओ सम्मान।।
जिनगी भर तोला मया,सुख देहूँ भरमार।।
मोर भरोसा कर गड़ी,मोर मया हे सार।।(3)
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीतिका छन्द गीत (49)
शृंगार रस
होठ हा चुक लाल दिखथे,खाय बीरो पान ओ।
नैन मा काजर अँजा के,ढ़ीले चोखी बान ओ।।
अंतरा(1)
चाँद जइसे रूप हे,टिकली चमकथे माथ मा।
गूँजथे झनकार हा,चूरी खनकथे हाथ मा।।
हाँस के मुचमुच गियाँ तँय,मारथस बड़ शान ओ।।
होठ हा चुक लाल दिखथे,खाय बीरो पान ओ।।
अंतरा(2)
लाल के अँचरा उड़ाये, पोलखा भी लाल हे।।
रेंगथस बेनी हला के,तोर हिरनी चाल हे।।
तोर गुरतुर गोठ गोई,लेत हावय जान ओ।।
होठ हा चुक लाल दिखथे,खाय बीरो पान ओ।।।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीतमाला छन्द गीत(50)
मोर हिरदे के मयारू जोगनी ओ।
मोर आँखी के कसम से रोशनी ओ।।
तोर गोरी रूप अब्बड़ भाय मोला।
खींच के ओ तोर कोती लाय मोला।।
मोंगरा के फूल जइसे होंठ लागे।
कोइली के तान जइसे गोठ लागे।।
मीठ बोली तोर जइसे चासनी ओ।
मोर हिरदे के मयारू जोगनी ओ।।
मोर दिल के ओ मयारू डायरी तँय।
सिर्फ़ एक्के ओ मया के शायरी तँय।।
रातदिन हावय मया के बंदगी मँय।
मानथौं तोला पिरोही जिंदगी मँय।।
मोर मन ला मोह डारे मोहनी ओ।
मोर हिरदे के मयारू जोगनी ओ।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीत माला छन्द गीत(51)
नायक
जात के बंधन मयारू टोर लेबो।
चल मया के गाँठ दूनों जोर लेबो।
काय कर लेही जमाना बैर करके।
तोर घर लाहूँ बराती आज धरके।
देख नइ पावे मया जे यार परके।
वो जलइया आज तो मर जाय जरके।।
मीठ मिसरी जिंदगी मा घोर लेबो।
जात के बंधन मयारू टोर लेबो।।1
नायिका
ए मया के सामने का जात जोही।
लान धरके मोर घर बारात जोही।
कोन काखर रोकही औकात जोही।
आज परही संग भाँवर सात जोही।।
तन मया के चाशनी मा बोर लेबो।
जात के बंधन मयारू टोर लेबो।।2
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत(52)
ए दुनिया मा तोर बात ला,माने कोन कबीरा।।
सत्य बात ला माने बर तो,सब ला होथे पीरा।।
आडंबर ला छोड़व कहिके,कतका ला समझाये।
तभो आजकल के मनखे हा,एही मा बउराये।।
जात-धरम के सब मनखे ला,खावत हावय कीरा।
ए दुनिया मा तोर बात ला,माने कोन कबीरा।।(1)
एक बरोबर सब मनखे ला,सतगुरु साहिब माने।
तोर सिखाये सत्य ज्ञान ला,लोगन समझें आने।।
तोर सहीं अब कोन इहाँ हे,सच्चा आज फकीरा।।
ए दुनिया मा तोर बात ला,माने कोन कबीरा।।(2)
ऊँच-नीच अउ छुआछूत के,छाये हावय जाला।
सत्य बात बोले बर सब के,मुँह मा लगगे ताला।।
अक्षर अक्षर तोर लिखे हा,जइसे मोती,हीरा।
ए दुनिया मा तोर बात ला,माने कोन कबीरा।।(3)
डी.पी.लहरे"मौज"
कबीरधाम छत्तीसगढ़
सप्रेम साहेब बंदगी🏳️🙏🏻
सरसी छन्द गीत(53)
जात-पात के भरम-भूत हा,होथे जी बेकार।
सब मनखे ले रखबो संगी,अच्छा हम व्यवहार।।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई,भारत के संतान।
हम सब हावन भाई-भाई,नोहन कोनो आन।।
जेन डारथे फूट हमर मा,बडका वो गद्दार।
जात-पात के भरम-भूत हा,होथे जी बेकार।।
आवव सबो बढ़ाबो भाई,भारत माँ के शान।
मानवता के पाठ पढ़ाबो,रखबो ए पहिचान।।
भीमराव के देखे सपना,करबो हम साकार।
जात-पात के भरम-भूत हा,होथे जी बेकार।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत(54)
मजदूर
हावँव जी मजदूर महूँ हा,अब्बड़ महिनत करथौं।
चटनी बासी पसिया पीके,पेट अपन मँय भरथौं।।
करम करइया मोर सहीं गा,कोनों नइ हें दूजा।
मोर भुजा मा बल हे देखौ,मोर करम हे पूजा।।
महिनत मा ही जीथौं संगी,महिनत मा तो मरथौं।
हावँव जी मजदूर महूँ हा,अब्बड़ महिनत करथौं।।
राँपा गैंती कुदरी झउहा,कहाँ मोर गा माढ़ै।
आठो पहरी मोर करम ले,दुनिया आगू बाढ़ै।।
ए जाँगर के पाछू मँय हा,दुख पीरा ला हरथौं।
हावँव जी मजदूर महूँ हा,अब्बड़ महिनत करथौं।।
जाड़ झाँझ अउ पानी बरसा,मोर करम ले डरथे।
लोहा तामा हीरा मोती,मोर करम ले झरथे।
सोना जइसे तपथौं संगी,आगी जइसे बरथौं।
हावँव जी मजदूर महूँ हा,अब्बड़ महिनत करथौं।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत..(55)
*आजकल के लइका*
चूँदी हे कठखोलवा,मारे फेशन भारी।
खाये बर दाना नहीं,अउ लोटा ना थारी।।
पढ़े-लिखे ला छोड़ के,घूमे बस्ती- बस्ती ।
गाड़ी,मोबाइल धरे,झूमे मारे मस्ती।।
मना करे मा रोज के,उल्टा देथे गारी।
चूँदी हे कठखोलवा,मारे फेशन भारी।।
मनमानी करथे सदा,लइका हा बउराये।
कोन जनी ऐला कहाँ,परबुधिया भरमाये।।
दाई बाबू संग मा,पटय नहीं जी तारी।
चूँदी हे कठखोलवा,मारे फेशन भारी।।
काम कुछू एक्को कनी,करय नहीं गा भाई।
घर मा आके देख तो,माते हे करलाई।।
अइसन बेटा के बने,होवत हावय चारी।।
चूँदी हे कठखोलवा,मारे फेशन भारी।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार+सरसी छ्ंद गीत(56)
धरती ला हरियाबो भइया,जुरमिल पेंड़ लगाबो
हमर जान हा तभे बाँचही,जम्मो पेंड़ बँचाबो।।
पेड़ गिराथे पानी संगी,देथे जुड़हा छाँव।
राह चलइया बइठ थिराथे,पाथे सुग्घर ठाँव।।
जीव जंतु के रही बसेरा,पेंड़ चलव सिरजाबो।
धरती ला हरियाबो भइया,जुरमिल पेंड़ लगाबो।।
साल,सरइ,शीशम बीजा,लम्बा लम्बा बाँस।
देथे फुरहुर पुरवाई जी,चलथे सबके साँस।।
बरगद,पीपर देव समाना,पानी रोज चघाबो।
धरती ला हरियाबो भइया,जुरमिल पेंड़ लगाबो।।
अपने बेटी-बेटा जइसन,रुख-राई के जान।
कर लव रक्षा हरदम भइया,ये जिनगी के शान।।
कभू पेंड़ ला मत काटव जी,नइ तो हम पछताबो।
धरती ला हरियाबो भइया,जुरमिल पेंड़ लगाबो।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत..(57)
आज मगन होके बरसत हे,झम-झम बरखा रानी।
ए भुँइयाँ के प्यास बुझावय,रिमझिम-रिमझिम पानी।।
रगड़ चलत हे गली-खोर मा,भरगे डोली परिया।
नदिया नरवा आगर छलके,करे लबालब तरिया।।
बूँद परत हे एती-ओती,बजय पटापट छानी।
आज मगन होके बरसत हे,झम-झम बरखा रानी।।
सबके मन ला भावय संगी,जुड़हा ए पुरवाई।
पल्ला भागे गरमी बैरी,भागे हे दुखदाई।।
जीव चराचर झूमे-नाचे,मस्त लगय जिनगानी।
आज मगन होके बरसत हे,झम-झम बरखा रानी।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत(58)
पितृ-दिवस
बाबू पालनहार हे,बाबू मोर सहारा।
बाबू आवय देवता,बाबू सबले प्यारा।।
बाबू सिरजनहार हे,बाबू मोर विधाता।
बाबू तो संसार मा,सब ले बड़का दाता।।
कमा-कमा के लानथे,मुँह मा डारै चारा।।
बाबू पालनहार हे,बाबू मोर सहारा।।
चरन कमल के धूल हा,मोर माथ के चंदन।
करय द्वारिका रोज गा,बाबू तोला वंदन।।
सुरुज असन लाये सदा,जिनगी मा उजियारा।
बाबू पालनहार हे,बाबू मोर सहारा।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द(59)
जे आये हे ये दुनिया मा,तेला परही जाना।
दुनिया ले जाये के संगी,दस ठन हवय बहाना।।
पाँच तत्व के बने शरीरा,माटी मा मिल जाही।
कोन जानथे ए काया हा,लहुटे फिर कब आही।।
तेखर सेती गा लव संगी,दया मया के गाना।
जे आये हे ये दुनिया मा,तेला परही जाना।।
सत्य करम तुम करके भाई,राखव इहाँ चिन्हारी।
तब तो ए जिनगानी संगी,रइही बड़ उजियारी।।
दया मया ला जोरे राखव,छोड़व गरब गुमाना।
जे आये हे ये दुनिया मा,तेला परही जाना।
मुक्तामणि गीत...(60)
गाये गाथा भरथरी,मोर सुरुज महतारी।
सात बछर के उम्र ले,नाम कमाये भारी।।
ढोला मारू संग मा,आल्हा उद्दल गाये।
तोर चँदैनी साज के,पार कोन हा पाये।।
महके देश बिदेश मा,तोर गीत फुलवारी।
गाये गाथा भरथरी,मोर सुरुज महतारी।
गायन शैली तोर ओ,सबके मन ला भाये।
लोक कला मा देश के,ऊँचा मान बढ़ाये।।
हमर संस्कृति बर सदा,हावस ओ हितकारी।।
गाये गाथा भरथरी,मोर सुरुज महतारी।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत(61)
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।
पावन अँचरा छाँव के,महिमा अब्बड़ भारी।।
नौं महिना ले कोख मा,राखे दाई मोला।
वंदन बारंबार हे,जग जननी माँ तोला।।
करथस मया दुलार ले,जिनगी ला उजियारी।।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(१)
नान्हे ला बड़का करे,सहिके कतको पीरा।
तन-मन ला हरसाय ओ,समझे मोला हीरा।।
तोर सहीं ओ कोन हे,जग मा पालनहारी।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(२)
दाई देवी ले घलो,पाये ऊँचा दर्जा।
कइसे दाई छूटहूँ,तोर दूध के कर्जा।।
तोर पाँव सुखधाम हे,हावस ममताधारी।
दाई कोरा तोर ओ,ममहावत फुलवारी।।(३)
डी.पी.लहरे"मौज"
दोहा गीत गरमी(62)
तात-तात चलथे हवा,दिन भर अब्बड़ घाम।
घर के भितरी मा घलो,चट-चट जरथे चाम।।
परय नहीं ए नींद हा,बैरी कस हे रात।
इन्द्र-देव करदे कृपा,जल्दी ला बरसात।।
कूलर-पंखा हा घलो,करय नहीं जी काम।
तात-तात चलथे हवा,दिन भर अब्बड़ घाम।।
जीव-जंतु होगें सबो,गरमी मा हलकान।
सुरुज देव करदे दया,अब झन कर परशान।।
बादर बरसा कर बने,तब मिलही आराम।
तात-तात चलथे हवा,दिन भर अब्बड़ घाम।
छूट जही तइसे लगे,ए गरमी मा जान।
जीना मुश्कल हे इहाँ,तहीं बँचा भगवान।।
एक बरोबर हे लगे,गरमी आठोयाम।
तात-तात चलथे हवा,दिन भर अब्बड़ घाम।।
डी.पीे लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
*प्रवेश उत्सव बर प्रेरित रचना*
*सरसी छन्द गीत*(63)
संविधान से मिले हवय जी,शिक्षा के अधिकार।
पढ़व-लिखव सब नोनी बाबू,शिक्षा जग मा सार।।
खुलगे इसकुल जावव पावव,अपन गुरू ले ज्ञान।
नोनी-बाबू कहना मानव,फट ले देवव ध्यान।।
पढ़हू-लिखहू तब तो होही,जिनगी के उद्धार।।
संविधान से मिले हवय जी,शिक्षा के अधिकार।।
ज्ञान खजाना मिलथे अब्बड़,शिक्षा हे वरदान।
शिक्षा ले तो मनखे मन के,होथे जी पहिचान।।
पढ़े-लिखे के बड़ा महत्तम,पढ़व बनव हुशियार।
संविधान से मिले हवय जी,शिक्षा के अधिकार।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत।।(64)
बने झमाझम आज बरस जा,तँय हा बरखा रानी।
अनदाँता मन जोहत हावँय,आगे हवय किसानी।
बढ़े उमस हे जीव चराचर,गरमी मा उसनाही।
पवन देवता ढील बने तँय,सुरुर सुरुर पुरवाही।।
रिमझिम रिमझिम बरसा देना,करिया बादर पानी।
बने झमाझम आज बरस जा,तँय हा बरखा रानी।
कलपत हावय धरती दाई,कइसे प्यास बुझाही।
बिन पानी के चारो कोती,जग सुख्खा पर जाही।।
हाहाकार मचा झन तँय हा,झन कर ना मनमानी।
बने झमाझम आज बरस जा,तँय हा बरखा रानी।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीत..सरसी छन्द(65)
तोर बिना नइ भावय राजा,
मोला ए संसार।।
तोर बिना जिनगानी सुन्ना,
होगे हे अँधियार।।
आजा संगी आज सुनादे,
अमर प्रेम के राग।।
कहूँ लगाबे झन तँय राजा,
मधुर मिलन मा आग।।
अउ कतका तरसाबे मोला,
नैना रोवय यार।
तोर बिना नइ भावय राजा,
मोला ए संसार।।
मुश्कल होगे जीना जोड़ी,
कटे नहीं दिन-रैन।
धक-धक जिंवरा करथे भारी,
मन होथे बेचैन।।
तोर मया के आके जोही,
कर देना बौछार।
तोर बिना नइ भावय राजा,
मोला ए संसार।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
लावणी छन्द गीत(66)
विषय-अन्धभक्ति
अन्धभक्ति के चारो कोती,लागे हावय मेला रे।
पढ़े-लिखे मन ए रद्दा मा,दउँड़े रेलम पेला रे।।
ढ़ोंग दिखावा आडम्बर हा,अब तो घर-घर छाये हे।
मानवता के नाँव सिरागे,कइसन कलयुग आये हे।।
तर्क बिना मानव जिनगानी,होगे माटी ढ़ेला रे।
अन्धभक्ति के चारो कोती,लागे हावय मेला रे।।
मनोकामना पूरा होही,कहिके जाल बिछाये हे।
ठग-जग बइगा बाबा गुनिया,लोगन ला भरमाये हे।।
दिन मा दुगुनी रात चोगुनी,बाढ़ँय बाबा चेला रे।
अन्धभक्ति के चारो कोती,लागे हावय मेला रे।।
झूठा झन पतियाहू भैया,समझौ गा सच्चाई ला।
सत रद्दा मा चलहू तब तो,खाहू दूध मलाई ला।।
तुँहर चढ़ावा दान-दक्षिणा,बाबा धरै अकेला रे।
अन्धभक्ति के चारो कोती,लागे हावय मेला रे।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी छन्द गीत(67)
विषय-मरिया भात (मृत्यु भोज)
जे अँगना मा दुख के बादर,छाये हे दिन-रात।
वो अँगना मा कइसे संगी,खाबे मरिया भात।।
बेटा हा परलोक सिधारे,घर-अँगना अँधियार।
बिलख-बिलख के दाई रोवय,कलपत हे परिवार।।
बड़े चाव से खाये भइया,पंगत ताते तात।
जे अँगना मा दुख के बादर,छाये हे दिन-रात।।
पाँच-गाँव के सगा सहोदर,आये हें भरमार।
मालपुवा लाडू सोंहारी,खायें जी चटकार।।
माई-पिल्ला डँट के खाबो,कहिथें एक्के बात।
जे अँगना मा दुख के बादर,छाये हे दिन-रात।।
दुखिया मनखे के कुरिया मा,करजा बाढ़े जाय।
पारा बस्ती झारा-झारा,मजा उड़ावत खाय।।
दुख के ऊपर अउ दुख लादे,कइसन मनखे जात।
जे अँगना मा दुख के बादर,छाये हे दिन-रात।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा छन्द गीत(68)
छुआ-छूत जे मानथे,वो पापी चंडाल।
ज्ञान-बुद्धि ले वो रथे,जिनगी भर कंगाल।।
जात-पात के भावना,राखे जे इंसान।
नोहय संगी आदमी,वो होथे शैतान।
हाड़-मास हा एक हे,एक सबो के खाल।
छुआ-छूत जे मानथे,वो पापी चंडाल।।
जाति भेद जे मानथे,बेच खाय हे लाज।
गोबर भरे दिमाक मा,वो मनखे के आज।
रूप-रंग हा एक हे,खून सबो के लाल।
छुआ-छूत जे मानथे,वो पापी चंडाल।।
जात-धरम के नाँव ले,जे करथे आघात।
सबले मूरख आदमी,वोखर का औकात।।
जात-पात के फेर मा,चलथे जे हा चाल।
छुआ-छूत जे मानथे,वो पापी चंडाल।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा गीत शृंगार रस (69)
चुपचुप हस काबर गियाँ,अब तो मुँह ला खोल।
हँस मुसका के तँय बने,गोठ मया के बोल।।
मोर पिरोही झन रिसा,बात मयारू मान।
तोर उदासी मा बही,मोर निकलथे जान।।
सुनले ओ मनमोहनी,जिनगी हे अनमोल।
चुपचुप हस काबर गियाँ,अब तो मुँह ला खोल।
ले जाहूँ बाजार मँय,हो जा ओ तइयार।
लेहूँ रानी तोर बर,सोला ओ सिंगार।।
तोर मयारू मँय हवँव,आगू-पाछू डोल।।
चुपचुप हस काबर गियाँ,अब तो मुँह ला खोल।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
बसंत रितु (70)
रितु राजा आये हे कहिके,भौंरा राग सुनावै।
रितु बसंत के स्वागत खातिर,गीत कोइली गावै।
आमा मउरय बाग बाग मा,पाना हा हरहियागे।
दुलहिन जइसे अरसी लागे,सरसो चना लजागे।।
मोर मयूरी नाच-नाच के,बसंत ला परघावै।
रितु राजा आये हे कहिके,भौंरा राग सुनावै।।
महकै बाग बगइचा लहकै,देख गहूँ के बाली।
राहर तिंवरा चमके झझके,चना बजावय ताली।
मतवारा मँउहा ला छिन-छिन,पुरवइया झर्रावै।
रितु राजा आये हे कहिके,भौंरा राग सुनावै।।
सेम्हर परसा के फुलवा हा,अँगरा कस ललियागे।
आनी-बानी फुलवा ऊपर,तितली हा मँडरागे।।
सुरुज नरायन चमकै चमचम,चंदा हा उजरावै।
रितु राजा आये हे कहिके,भौंरा राग सुनावै।।
मनखे-मन मा जीव जंतु मा,इहाँ सुमंगल छाये।
मौज कहे सच ए मौसम हा,सबके मन ला भाये।
सबके खुशहाली ला देखे,धरती हा मुस्कावै।
रितु राजा आये हे कहिके,भौंरा राग सुनावै।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा गीत... *गंगा*(71)
गंगा जमुना सरसती,धोवत हावय पाप।
संगम मा डुबकी लगा,तरबो अपने आप।।
माई-पिल्ला सब चलौ,चलौ इलाहाबाद।
पावन प्रयागराज हे,कर लेवव तुम याद।।
चलौ सनातन धर्म के,कर लेबो हम जाप।
संगम मा डुबकी लगा,तरबो अपने आप।।
पुन्य कमाबो आज हम,अपन जगाबो भाग।
धुल जाही सब पाप हा,गाबो हिन्दू राग।।
गंगा पावन हे सगा,मिटा दिही संताप।
संगम मा डुबकी लगा,तरबो अपने आप।।
छुआ-छूत हा रोग हे,मनखे-मनखे एक।
जानव हिन्दू धर्म के,हावय रंग अनेक।।
जात-पात के भेद ला,मेटव मिल चुपचाप।
संगम मा डुबकी लगा,तरबो अपने आप।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीतिका छन्द गीत(72)
चौमास
2122 2122 2122 212
एक पौधा तँय लगाले आय दिन चौमास के।
पुन्य भैया तँय कमाले आज खुल-खुल हाँस के।।
छाँव देही पेड़ हा फर फूल देही साथ मा।
जस लिखा जाही बने गा तोर पावन हाथ मा।।
रोज देही शुद्ध पुरवाई दवाई साँस के।
एक पौधा तँय लगाले आय दिन चौमास के।।
देख सौ बेटा बरोबर पेड़ होथे जान ले।
हाँ तहूँ बेटा अपन गा आज एला मान ले।।
तोर जिनगानी रही गा रात-दिन उल्लास के।
एक पौधा तँय लगाले आय दिन चौमास के।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत (73)
*बरसात*
करिया बादर छाय हे,आगे बरखा रानी।
तन मन ला हर्षाय हे,झम-झम गिरके पानी।।
जुड़हा पुरवाई चले,झूमे डारा पाना।
झिंगुरा राग सुनात हे,मैना गावय गाना।
चारो कोती छाय हे,धरती मा हरियाली।
मनखे सबो मनात हें,हँस-हँस के खुशहाली।
भुँइयाँ के भगवान मन,जुरमिल करैं किसानी।
करिया बादर छाय हे,आगे बरखा रानी।।
भरगे तरिया,खेत हा,नदिया मटकत भागे।
छल-छल छलके बाँध हा,जीव डर्रावन लागे।।
गली-खोर मा मातगे,अब तो चिखला भारी।।
लइका सबो सियान मन,गिरथें पारी-पारी।।
चुचवावत हे धार हा,बाजय पट-पट छानी।
करिया बादर छाय हे,आगे बरखा रानी।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी छन्द गीत(74)
गाँव●●
सरग बरोबर लागे संगी, मुड़ियापारा गाँव।
बीच चँउक मा जैत खाम हे,बरगद के हे छाँव।
रोज आरती संझा बिहना, गूँजय जय सतनाम।
सतनामी बस्ती ए लागय, जइसे सत के धाम।।
अब्बड़ सुमता समता माढ़े,एही सुख के ठाँव।
सरग बरोबर लागे संगी, मुड़ियापारा गाँव।।
माता देवाला उत्ती मा,हम सब के आधार।
ठाकुर देव बिराजे बुढ़ती,बस्ती के रखवार।।
एक देवता इसकुल आगू,साँड-साँडहिन नाँव।।
सरग बरोबर लागे संगी, मुड़ियापारा गाँव।
घर-घर सबो किसानी करथे, उपजाथें जी धान।
कोठी-ढ़ोली भरे लबालब, सुख के इहाँ खदान।
बड़े बिहनिया छानी आके,कउवाँ करथे काँव।
सरग बरोबर लागे संगी, मुड़ियापारा गाँव।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
मानक छन्द (75)
हमर गाँव तँय आबे जी,दूध मलाई खाबे जी।
अब्बड़ होही पहुनाई,जिनगी लगही सुखदाई।।
स्वागत हे अभिनंदन हे,मेहमान के वंदन हे।
ले माथा मा चंदन हे,भाग हमर तो धन-धन हे।।
जेखर घर तँय जाबे जी,मीठा भाखा पाबे जी।
हमर गाँव तँय आबे जी,दूध मलाई खाबे जी।।
घर-घर सुमता समता हे,महतारी के ममता हे।
दया-मया के बोली मा,भरबे सुख तँय झोली मा।
मया बिकट के पाबे जी,तन मन ला हर्साबे जी।
हमर गाँव तँय आबे जी,दूध मलाई खाबे जी।।
दू ठन बाँधा तरिया हे,बंजर कतको परिया हे।
जुड़हा पावन-पुरवाई,मन ला मोहे अमराई।
गीत मया के गाबे जी,दया मया बरसाबे जी।
हमर गाँव मा आबे जी,दूध मलाई खाबे जी।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी छन्द गीत(76)
लोक गीत पंथी देवदास बंजारे
देवदास बंजारे भैया, नाँव अमर हे तोर।
लोक गीत पंथी के धुन ला, बगराये चहुँ ओर।।
माटी चोला माटी काया, पंथी मा बतलाय।
सत्य अहिंसा भाई चारा, जन-जन ला समझाय।
माँदर के जब थाप परे ता, मन मा भरे हिलोर।
देवदास बंजारे भैया, नाँव अमर हे तोर।।
झूम-झूम के पंथी नाचे, तँय माँदर के ताल।
विश्व रिकॉड बना डारे गा, सतनामी के लाल।।
माँदर झाँझ मँजीरा बाजय, करदच भाव विभोर।
देवदास बंजारे भैया, नाँव अमर हे तोर।।
छत्तीसगढ़ म लाये भैया, पंथी के परिवेश।
मनखे-मनखे एक बताये, जा के देश-बिदेश।
गली-गली मा होवत हावय, तोर नाँव के सोर।
देवदास बंजारे भैया, नाँव अमर हे तोर।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
प्रदीप छन्द गीत(77)
जन्म स्थली गुरु घासी के, पावन गिरौद धाम हे।
संत सिरोमणि गुरु बाबाके, जग मा ऊँचा नाम हे।
करे तपस्या घासी बाबा, छाता सहीं पहाड़ मा।
धुनी रमा के बइठे राहय, गुरु बघवा के माड़ मा।
इही जघा मा पाये हावय, सतगुरु हा सतज्ञान जी।
चलौ दरश कर आबो संतो, हो जाही कल्यान जी।
गूँजत संगी गुरुद्वारा मा, पंथी आठो-याम हे।
जन्म स्थली गुरु घासी के, पावन गिरौद धाम हे।।
जैत खाम हा ऊँचा हावय, दिल्ली कुतुबमीनार ले।
बोहत हावय अमरित भैया, पँच कुण्डी के धार ले।
चरण कुण्ड अउ जोक नदी के, पानी काटै ताप ला।
सत्य नाम के जुरमिल संगी, कर लेबो हम जाप ला।
सत्य संदेशा भाई-चारा, के सुघ्घर पैगाम हे।
जन्म स्थली गुरु घासी के, पावन गिरौद धाम हे।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी-सार छन्द गीत 78
सोना चाँदी हीरा मोती, नारी के सिंगार।
गर मा सोहे मन ला मोहे, नौ लखिया के हार ।।
माँघ लाल सेंदूर सजाथे, तब फबथे गा नारी।
आनी-बानी गहना-गोंटी, नारी मन के भारी।।
खिनवा झुमका ढरकी लुरकी, झुले कान के ढार।
सोना चाँदी हीरा मोती, नारी के सिंगार।।
फबे नाक मा नथनी फुल्ली, बेनी बर हे गजरा।
होंठ रचावँय लिपस्टिक मा, आँखी बर हे कजरा।
इसनु पावडर लगे गाल मा,रूप दिखे उजियार।
सोना चाँदी हीरा मोती, नारी के सिंगार।।
ऐठी बहुँटा चूरी कंगन, खनखन खनखन खनके।
हर्रइया हा खुले हाथ मा, चमचम मुँदरी चमके।
अंग अंग मा खिले गोदना, जुड़े मया के तार।
सोना चाँदी हीरा मोती, नारी के सिंगार।।
टोंड़ा साँटी पैजन पैंरी, सजे गोड मा लच्छा।
कटहर चुरवा चुटकी बिछिया, लागे सब ला अच्छा।
सात लरी के कनिहा करधन,हे गहना मा सार।
सोना चाँदी हीरा मोती, नारी के सिंगार।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीतिका छन्द गीत79
2122 2122 2122 212
छोड़ दारू मोर भाई जीव के जंजाल हे।
जेन पीथे रोज दारू तेन हा कंगाल हे।।
हे नशा महुरा बरोबर ले जथे रे जान ला।
ए मिटा देथे सबो के मान अउ सम्मान ला।।
जेन आदी हे नशा के वो सदा बेहाल हे।
छोड़ दारू मोर भाई जीव के जंजाल हे।।
बस कलह माते रथे घर मा सदा बेकार के।
हो जथे मरना नशा मा रोज गा परिवार के।
आज मन मा सोच तँय हा ए नशा हा काल हे।
छोड़ दारू मोर भाई जीव के जंजाल हे।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत *जाति-प्रथा* 80
आवव मिलके पाटी संगी, ऊँच-नीच के खाई।
हिन्दू-मुस्लिम सिख-ईसाई, हम सब भाई-भाई।।
जाति-प्रथा से चारो कोती,बाढ़ँय अत्याचारी।
भारत माँ ला घायल करथे, बड़का ये बीमारी।।
भारत माँ अब रोवत हावय, माते हे करलाई।
आवव मिलके पाटी संगी, ऊँच-नीच के खाई।
छुआछूत के भरम भूत ला, आवव मन ले झारी।
राक्षस जइसे डाहत हावय, मुख ला एखर टारी।।
मानवता के पाठ पढ़ा के, सुमता समता लाई।
आवव मिलके पाटी संगी, ऊँच-नीच के खाई।।
कोन बना पाही संगवारी ,भारत माँ ला पावन।
भाई-चारा ला खावत हे, जात-पात के रावन।
मानवता के नाश होत हे, कोन करय भरपाई।
आवव मिलके पाटी संगी, ऊँच-नीच के खाई।।
जात-पात के ए बंधन ला, मिलके आवव टोरी।
मनखे- मनखे एक बरोबर, सबले नाता जोरी।
भेद-भाव ला तज के जम्मो, नवा सुरुज परघाई।
आवव मिलके पाटी संगी, ऊँच-नीच के खाई।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीतिका छन्द गीत जातपात 81
2122 2122 2122 212
जात के ही नाँव से नित होत अत्याचार हे।
का दलित का शुद्र मन के रोज हाहाकार हे।।
आदमी हन आदमी सब रूप एके रंग के।
जात के ताना कसौ झन आज ले बेढंग के।।
जेन कोती देखहू ता जात के बाजार हे।
जात के ही नाँव से नित होत अत्याचार हे।।
देख लव माँ भारती के हम सबो संतान गा।
भारती हन भारती हे एक बस पहिचान गा।
आदमी मा भेद करथे तेन हा गद्दार हे।
जात के ही नाँव से नित होत अत्याचार हे।।
बंधना ला जात के मिलके चलौ हम टोरबो।
एकता राहय बने नाता सबो ले जोरबो।
ऊँच के अउ नीच के गा भावना बेकार हे।
जात के ही नाँव से नित होत अत्याचार हे।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा छन्द गीत82
विषय-छुआ-छूत
छुआ-छूत तँय मानबे,परही डंडा लात।
सड़बे रे तँय जेल मा,भूल जबे औकात।।
मनखे-मनखे एक तँय,नइ माने गद्दार।
भेद-भाव मन मा रखे,तोला हे धिक्कार।
कहे अपन ला ऊँचहा,नीच दुसर के जात।
छुआ-छूत तँय मानबे,परही डंडा लात।।
तोर सोंच दानव सहीं,मानव जइसे सोंच।
मानवता ला झन कभू,गिधवा जइसे नोंच।।
आतंकी ले तँय बड़े,तोर कुठाराघात।।
छुआ-छूत तँय मानबे,परही डंडा लात।।
जात-पात के छोड़ दे,अब तँय खेला-खेल।
देख सत्रह अनुच्छेद मा,चल देबे रे जेल।
नरक सहीं जिनगी रही,पछताबे दिन-रात।
छुआ-छूत तँय मानबे,परही डंडा लात।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत 83
दहेज
दानव जइसे जान लौ, ए दहेज हे भाई।
बेटी-बहु के होत हे ,दौलत मा तौलाई।।
मरना होथे बाप के, ए दहेज के सेती।
कर्जा-बोड़ी बाढथे, बिक जाथे जी खेती।
कमर टूटथे बाप के, ऊपर ले मँहगाई।
दानव जइसे जान लौ, ए दहेज हे भाई।।
लालच करे दहेज के, बेटा वाले भारी।
बेटी वाले के सदा, गर मा चलथे आरी।
ए कइसन के रीत हे, देथे बस करलाई।।
दानव जइसे जान लौ, ए दहेज हे भाई।।
दुल्हन असल दहेज हे, मानय कहाँ जमाना।
जलथे बेटी आग मा, मिलथे निशदिन ताना।
इही कलंक समाज के, मेटे हे सुघराई।
दानव जइसे जान लौ, ए दहेज हे भाई।।
बाढ़े अत्याचार हा, ये दहेज के कारन।
आवव अइसन रीत के, मिलके भुर्री बारन।
बिन दहेज के हम सबो, कन्या करिन बिदाई।
दानव जइसे जान लौ, ए दहेज हे भाई।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी छन्द गीत..तिरंगा84
हमर तिरंगा झंड़ा संगी,हम सबके पहिचान।
सदा बढ़ावय ऊँचा रहिके,भारत माँ के शान।।
केशरिया के रंग निशानी,साहस अउ बलिदान।
दे बर सिखलावत हावय गा,देश हीत मा जान।।
लहर लहर लहरावत राहय,रतिहा अउ दिनमान।
हमर तिरंगा झंड़ा संगी,हम सबके पहिचान।
शेत शांति के हवय निशानी,सच्चाई के खान।
हरा रंग हे समवृद्धी के,खुशहाली के धान।।
शेत रंग के पट्टी मा हे,अशोक चक्र महान।
हमर तिरंगा झंड़ा संगी,हम सबके पहिचान।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत अशिक्षा85
पढ़ा-लिखा नोनी बाबू ला, भेज स्कूल सँगवारी।
हवय अशिक्षा के सेती गा, जिनगी मा अँधियारी।
नरक बरोबर होथे संगी, बिन शिक्षा जिनगानी।
अनपढ़ कहलाथे मनखे हा, रहि जाथे अज्ञानी।।
लइका मन पढ़हीं तब बनही, नेता अउ अधिकारी।
पढ़ा-लिखा नोनी बाबू ला, भेज स्कूल सँगवारी।
ढ़ोंग रूढ़ि पाखंड बढ़ाथे, इही अशिक्षा भाई।
जान अशिक्षा के सेती गा, होथे बस करलाई।।
शिक्षा से आ पाही भैया, जिनगी मा उजियारी।
पढ़ा-लिखा नोनी बाबू ला, भेज स्कूल सँगवारी।।
सोचे समझे के क्षमता हा, शिक्षा ले ही बढ़थे।
ज्ञानवान बनके मनखे हा, सरग निशैनी चढ़थे।।
शिक्षा जिनगी पार लगाथे, शिक्षा तारनहारी।
पढ़ा-लिखा नोनी बाबू ला, भेज स्कूल सँगवारी।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा गीत..अशिक्षा86
समझ अशिक्षा ले सखा, जिनगी हे बेकार।
पढ़े नहीं जे आदमी, तेखर जग अँधियार।।
होय अशिक्षा ले कहाँ, असल-नकल पहिचान।
बिन शिक्षा के आदमी, होथे बड़ परशान।
संविधान ले हे मिले, शिक्षा के अधिकार।
समझ अशिक्षा ले सखा, जिनगी हे बेकार।।
सोच अशिक्षा ले कभू, मिले नहीं सम्मान।
शिक्षा ले तँय हो जबे, ज्ञानवान गुणवान।।
शिक्षा मा संस्कार हे, शिक्षा मा उद्धार।
समझ अशिक्षा ले सखा, जिनगी हे बेकार।।
हवय अशिक्षित जेन हा, अब्बड़ के पछताय।
एक्को अक्षर ला कभू, वो तो नइ पढ़ पाय।
बिन शिक्षा के आदमी, अनपढ़ बंठाधार।
समझ अशिक्षा ले सखा, जिनगी हे बेकार।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी गीत अशिक्षा87
वर्तमान मा शिक्षा हावय, जिनगी के आधार।
बिन शिक्षा के मनखे भैया, रोवय आँसू ढ़ार।।
देश खोखला करे अशिक्षा, ये बड़का अभिशाप।
शासन सत्ता बइठे-बइठे, देखय बस चुपचाप।।
अनपढ़ ऊपर जादा होवय, शोषण-अत्याचार।
वर्तमान मा शिक्षा हावय, जिनगी के आधार।।
पढ़ना-लिखना बहुत जरूरी, सोंचव अपने आप।
नइ ते पाछू चलके होही, अब्बड़ पश्चाताप।
शिक्षा ही डोंगा जिनगी के, शिक्षा ही पतवार।
वर्तमान मा शिक्षा हावय, जिनगी के आधार।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
गणेश वंदना.. चतुर्थी स्पेशल
सरसी छन्द गीत 88
हे शिव नंदन पहली वंदन, तोला बारंबार।
गौरी पुत्र गजानन स्वामी, कर दे बेड़ा पार।।
कइसे भोग लगावँव तोला, मेवा लड़डू आज।
मोर गरीबी दूर करौ जी, हे गणपति गणराज।।
घायल करथे गणपति बप्पा, मँहगाई के मार।
हे शिव नंदन पहली वंदन, तोला बारंबार।।
तहीं बुद्धि के दाँता स्वामी, दे जग ला वरदान।
भैर-भाव ला मिटा इहाँ ले, गजानंद भगवान।
भाई-भाई मरत-कटत हें, बाढ़े अत्याचार।
हे शिव नंदन पहली वंदन, तोला बारंबार।।
सब सुमता ला घुन्ना खागे, कुमता बाढ़े जाय।
दया-धरम माटी मा मिलगे, पाप घरो-घर छाय।
हे लंबोदर दसो-दिशा के, रोकव हाहाकार।
हे शिव नंदन पहली वंदन, तोला बारंबार।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
अंधविश्वास
मुक्तामणि गीत89
रोज अंधविश्वास के ,जपथें कतको माला।
चारो कोती छाय हे, अंध-भक्ति के जाला।।
देखव तो पाखण्ड हा, बनगे पक्का धंधा।
पढ़े-लिखे मनखे घलो, मानय होके अंधा।।
जादू टोना टोटका, पर बइगा के पाला।
रोज अंधविश्वास के ,जपथें कतको माला।
ठग-जग बाबा हे बनें, बाढ़त हें पाखंडी।
धरम बने बाजार हे, खुलगे जइसे मंडी।
बेंचावत हे झूठ हा, सच के मुँह मा ताला।
रोज अंधविश्वास के ,जपथें कतको माला।।
अंध-भक्ति हा पेरथे, जइसे बइला घानी।
सूते मन अब जागजौ, छोड़व गा नादानी।
बात मौज के मान लौ, सत्य वचन हे लाला।
रोज अंधविश्वास के ,जपथें कतको माला।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा गीत 90
अंधविश्वास
अल्प ज्ञान ले बाढ़थे, सदा अंधविश्वास।
तर्क बिना सब झूठ हा, बन जाथे जी खास।।
मनखे अड़हा भोकवा, दिन-दिन होवत जाय।
ढ़ोवत हे पाखंड ला, आँख मूँद के हाय।।
अंधभक्ति मा डूबके, मनखे बनथे दास।
अल्प ज्ञान ले बाढ़थे, सदा अंधविश्वास।
आडंबर के रोग हा, मानवता ला खाय।
दशा बिगाड़त आज हे, मनखे ला पगलाय।।
निरबुद्धी मनखे खपे, नापत हवय अगास।
अल्प ज्ञान ले बाढ़थे, सदा अंधविश्वास।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी छन्द गीत91
किन्नर छक्का हिजड़ा कहिके, करथौ सब अपमान।
काबर नइ समझौ मनखे मन, इनला जी इंसान।।
छियालीस नंबर मनखे के, हावय क्रोमोसोम।
दू ठन क्रोमोजोम लिंग के, बाकी आटोड्रोम।।
एक्स-वाय से लड़का होथे, डाक्डर हा बतलाय।
एक्स-एक्स से लड़की होथे, एला समझे जाय।।
तीन एक्स अउ वाय-वाय ले, होथे जे संतान।
किन्नर छक्का हिजड़ा कहिके, करथौ सब अपमान।।
गर्भवती महिला हा रहिथे,परथे जब बीमार।
बच्चा दानी मा आ जाथे, हारमोंस के धार।।
तहाँ ट्राँस जेंडर हो जाथे, मन मा करौ-विचार।
इनला जम्मो मानौ संगी, हम सब के परिवार।।
रोजगार शिक्षा के मौका, इनला दौ पहिचान।
किन्नर छक्का हिजड़ा कहिके, करथौ सब अपमान।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत92
मूल निवासी हम भारत के, जंगल के रखवाला।
लोग आदिवासी कहिथें जी, कहिथें भोला-भाला।
इष्ट देवता हमर प्रकृति हे, करथन एखर पूजा।
बुढ़ा देव ले बड़का देवा, हमर कोंन हे दूजा।
जय सेवा जय सेवा संगी, मिलके जपथन माला।
मूल निवासी हम भारत के, जंगल के रखवाला।।
रेला-पाटा करमा सरहुल, सुघ्घर नाचा-गाना।
गौर-माड़िया सैला गेंड़ी, सुख के हमर खजाना।।
बिरसा मुंडा के हम वंशज, झन परहू रे पाला।
मूल निवासी हम भारत के, जंगल के रखवाला।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि छन्द गीत
विषय-गरीबी93
जनसंख्या बढ़वार से, बढ़े गरीबी भारी।
आज गरीबी देश के, बड़का हे बीमारी।।
रोजगार बिन देख ले, बढ़े आर्थिक तंगी।
दहकत आगी पेट के, कोन बुझावय संगी।
देखौ घर-परिवार मा, छाय सदा लाचारी।
जनसंख्या बढ़वार से, बढ़े गरीबी भारी।।
बाढ़े भ्रष्टाचार हा, शासन के कमजोरी।
बढ़हर मालामाल हे, पैसा बोरी-बोरी।
रोजगार के कुछ इहाँ, नइ हे गा तइयारी।
जनसंख्या बढ़वार से, बढ़े गरीबी भारी।।
रोटी कपड़ा घर नहीं, इही भाग के लेखा।
बाढ़त जावय देश मा, रोज गरीबी रेखा।।
मजदूरी के दाम हा, कम हावय सरकारी।
जनसंख्या बढ़वार से, बढ़े गरीबी भारी।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा छन्द गीत 94
विषय-गरीबी
बड़का ए अभिशाप हे, हाय गरीबी हाय।
दाना-पानी के बिना, पोटा काँपे जाय।।
लेवत हावय जान ला, महँगाई के मार।
बढ़हर मनके संग मा, मौज करै सरकार।।
रोजगार के आश ले, भूख गरीबी छाय।।
बड़का ए अभिशाप हे, हाय गरीबी हाय।।
भूख-गरीबी के इहाँ, गूँजत हावय राग।
एखर कहाँ उपाय हे, ये समाज बर दाग।।
जिनगी हा जिनगी सहीं, नइ लागे नइ भाय।।
बड़का ए अभिशाप हे, हाय गरीबी हाय।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
मुक्तामणि गीत..
मृदा अपरदन95
मृदा अपरदन रोक लव, पेड़ लगा के भाई।
नइ तो पाछू हो जही, ए जग मा करलाई।।
भूमि क्षरण ला रोकथे, रुखवा के जड़ भारी।
कभू चलाहू झन सखा, रुखुवा मन मा आरी।।
जंगल तुमन उजारहू, रोही धरती दाई।
मृदा अपरदन रोक लव, पेड़ लगा के भाई।।
मृदा बाँध के राखथे, बने पेड़ के जड़ हा।
इही पेड़ ला काटथौ, काबर बनके अड़हा।।
हवा गरेरा बाढ़ ला, टारय जी रुखराई।
मृदा अपरदन रोक लव, पेड़ लगा के भाई।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सार छन्द गीत96
विषय-नारी
हाँ इतिहास रचइया हावँय, आजकाल के नारी।
अत्याचार सहइया नोहँय, हिम्मत हावय भारी।।
शिक्षा के जे अलख जगाये, हे सावित्री बाई।
मदर टरेसा पाटे जानव, ऊँच-नीच के खाई।।
इंद्रा गाँधी प्रतिभा पाटिल, होइन सत्ताधारी।।
हाँ इतिहास रचइया हावँय, आजकाल के नारी।।
बीस बलत्कारी मन ला तो, मारिस दन-दन गोली।
फूलन देवी पापी मन के, बंद करिस हे बोली।।
देखव तो मजबूर कहाँ हें, नइ हे अब लाचारी।
हाँ इतिहास रचइया हावँय, आजकाल के नारी।।
मैरी काम किरण बेदी मन, पाइन ऊँचा दर्जा।
आज कल्पना दीदी मनके, कहाँ चुकाबो कर्जा।।
वंदन कर लौ घेरी-बेरी, इनमन तारनहारी।।
हाँ इतिहास रचइया हावँय, आजकाल के नारी।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
सरसी छन्द गीत97
बेजा कब्जा
चारो कोती बेजा कब्जा, के हावय भरमार।।
कोंदा जइसे बइठे बइठे, देखय बस सरकार।
छेंकागे हावय सँगवारी, दिखे नहीं मइदान।
देख रपोटे बइठे हावँय, कतको मन दइहान।।
खेल चले बेजा कब्जा के, बाढ़े भ्रष्टाचार।
चारो कोती बेजा कब्जा, के हावय भरमार।।
नइ बाँचे हे नदिया नरवा, उजरे जंगल आज।
बेजा कब्जा धारी मनके, आये हावय राज।।
छेंकागे अब गाँव गली हा, छेंकागे कोठार।
चारो कोती बेजा कब्जा, के हावय भरमार।।
सरकारी परिया भुँइयाँ मा, कब्जा बाढ़े जाय।
मरघट्टी मा बेजा कब्जा, हाय आदमी हाय।।
कोन रोकही बेजा कब्जा, बाढ़े कब्जादार।
चारो कोती बेजा कब्जा, के हावय भरमार।।
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
गीतिका छन्द गीत98
2122 2122 2122 212
वंदना हे वंदना हे वंदना सतनाम के।
बंदगी साहेब के हे बंदगी सतधाम के।।
आपके पूजा गुरू जी रोज बारमबार हे।
आपके चरणन कमल मा फूल के बौछार हे।
आपके सतज्ञान गंगा ए जगत मा सार हे।
आपके उपदेश बाबा जीव के आधार हे।
जब गुरू के भक्ति नइहे जिंदगी का काम के।
वंदना हे वंदना हे वंदना सतनाम के।।
आपके सत के निशानी श्वेत झंड़ा शान हे।
हे खड़ाऊ आपके सत राह के पहिचान हे।
आपके कंठी जनेऊ ले गुरू जी प्रीत हे।
हे गुरू सत के कहानी ठेठ पंथी गीत हे।
हे गुरू के आरती हे याचना जय खाम के।
वंदना हे वंदना हे वंदना सतनाम के।।
डी.पी.लहरे'मौज'
मुक्तामणि छन्द गीत99
*हैप्पी* वाला *बर्थ डे*, मैं दूँ आज बधाई।
*लाँग लाँग लाईफ* हो, खाओ दूध-मलाई।।
देता हूँ शुभकामना, नित-नित खुशियाँ पाओ।
*सैडनेस* ना पास हो, पल-पल ही मुस्काओ।।
सदा-दुआ ही आपकी, होती रहे कमाई।
*हैप्पी* वाला *बर्थ डे*, मैं दूँ आज बधाई।।
*हैप्पी-हैप्पी मूड* हो, जीवन रहे निराला।
जीवन की हर *रोड* पे, मिलता रहे उजाला।।
पाओ बस *सक्सेज* की, *परडे* ही ऊँचाई।
*हैप्पी* वाला *बर्थ डे*, मैं दूँ आज बधाई।।
खुशियों की *फारेस्ट* हो, *फ्लावर* सा मन ताजा।
दिल में बजता ही रहे, बस खुशियों का बाजा।।
*हेल्दी-हेल्दी* नित रहो,खाओ आप मिठाई।
*हैप्पी* वाला *बर्थ डे*, मैं दूँ आज बधाई।।
🎂🍭🌹🍫
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा गीत
परीक्षा के घड़ी...
आय परीक्षा के घड़ी,पढ़ के बनव सुजान।
नोनी-बाबू मन उठव,होगे हवय बिहान।।
तुमन परीक्षा ले कभू, झन घबराहू आज।
अच्छा पेपर ला बना, करहू जग मा राज।
होना हे हर हाल मा, जम्मो झन ला पास।
दाई-बाबू के हवय, बस अतके कन आस।।
आलस मा कुछ नइ बनय, जागव धर लौ ध्यान।
आय परीक्षा के घड़ी,पढ़ के बनव सुजान।।
याद करव हर पाठ ला, समझव करव विचार।
दूर करव तुम आज ले, मन के सबो विकार।।
पढ़हू तब तो प्रश्न के, उत्तर देहू खास।
अच्छा नंबर लान के, हो पाहू तुम पास।।
जे सोवय वो खोत हे, जागव पावव ज्ञान।
आय परीक्षा के घड़ी,पढ़ के बनव सुजान।।
डी.पी.लहरी'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
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