ग़ज़ल भाग 6
ग़ज़ल6
ग़ज़ल(1)
वज़्न-221 2121 1221 212
हासिल जहां में कुछ नहीं अच्छा किए बगैर
रुकना नहीं है ख़्वाब को पूरा किए बगैर
वो तो पहुँच गया है सियासत में आजकल
कैसे रहेगा देश से धोखा किए बगैर
शर्मिंदगी नहीं हैं उन्हे कम लिबास में
जो लड़कियाँ हैं घूमती पर्दा किए बगैर
ख़ुदग़र्ज दिलरुबा मिली तो है ही लाज़मी
जायेगी कैसे बेवफ़ा रुसवा किए बगैर
अच्छी तो चल रही है दुआओं से ज़िन्दगी
जीना है अपनी सोच को नीचा किए बगैर
ऐ मौज यूँ सलाह सभी चाहने लगे
हो जायें मालामाल वो धंधा किए बगैर
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
ग़ज़ल (2)
वज़्न-22 22 22 22 22 2
जब तुम पहली बार मिली थी बचपन में
तब से तुम ही तुम हो मेरे जीवन में
हमको अच्छा लगता है डूबे रहना
अब तो इश्क मुहब्बत के पागलपन में
देख नहीं पायेगा कोई तब हमको
जब हम आँखें चार करेंगे मधुबन में
रौशन है जीवन मेरा तुमसे ही तो
चाँद उतर आया है दिल के आँगन में
जब तक जिंदा हूँ तब तक मैं प्यार करूँ
प्यार नहीं तो आग लगे इस जीवन में
जितनी खुशबू आती तेरी साँसों से
कम लगती है उससे खुशबू चंदन में
तुम तो ख़ुद ही सुंदरता की मूरत हो
क्या रख्खा है उबटन,चूड़ी,कंगन में
मन करता है "मौज"सदा झूमूँ नाचूँ
दिल पागल तेरी पायल की छन-छन में
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (3)
वज़्न-221 1221 1221 122
हाथों में कमाने के लिए कुछ भी नहीं है
घर अपना चलाने के लिए कुछ भी नहीं है
बर्बाद किये जा रहे पानी को हमेशा
पानी को बचाने के लिए कुछ भी नहीं है
मुश्किल से गुजारा मेरा होता है जहां में
बच्चों को पढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं है
महबूब सनम नींद से आकर के जगाती
ख़्वाबों को सजाने के लिए कुछ भी नहीं है
अश्क़ों को मुकद्दर तू समझता रहा है क्यों?
क्या हँसने-हँसाने के लिए कुछ भी नहीं है?
सरकार किया"मौज"हरिक माल को मँहगा
मुफ़लिस को खिलाने के लिए कुछ भी नहीं है
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (4)
वज़्न-22 22 22 22
महँगाई से डर लगता है
जीना अब दूभर लगता है
दौलत वाला इस दुनिया में
सबसे ताकतवर लगता है
लोगों का है आना-जाना
घर मेरा दफ़्तर लगता है
मोल न जाने रिश्तो का जो
वो तो सौदाग़र लगता है
दिलबर को जब जी भर देखूँ
अच्छा वो मंज़र लगता है
काला अक्षर भैंस बराबर
देखो तो अफ़सर लगता है
एक तरफ़ है सारी दौलत
माँ बिन पर बे-घर लगता है
क्यों पूजूँ मैं उसको यारो
जो मुझको पत्थर लगता है
"मौज"यहाँ कहते हैं अक्सर
सबका तू रहबर लगता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (5)
वज़्न-122 122 122 122
मुहब्बत के दीपक जलाते रहेंगे
सदा नफ़रतों को मिटाते रहेंगे
मुक़द्दर में अपने भले ग़म ही ग़म हों
मगर दूसरो को हँसाते रहेंगे
ग़मों को हराने की खातिर सुनो हम
यहाँ रोज खुशियाँ मनाते रहेंगे
ज़माना कहाँ रोक पाएगा हमको
कदम जो बढ़े हैं बढ़ाते रहेंगे
भलाई का अब तो ज़माना नहीं है
कहाँ तक शराफ़त दिखाते रहेंगे
हम इंसानियत के चलन को हमेशा
जहाँ तक बनेगा निभाते रहेंगे
ज़रा पास आके सनम मेरे बैठो
नज़र से नज़र हम मिलाते रहेंगे
करें "मौज"मिलकर वतन की हिफ़ाज़त
यहाँ दुश्मनों को मिटाते रहेंगे
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (6)
वज़्न-2122 1122 1122 22(112)
हम करें कुछ भी गुनहगार नज़र आते हैं
उनके सब काम चमत्कार नज़र आते हैं
धोखा ही धोखा यहाँ मिलता है इंसानों से
अब कहाँ लोग वफ़ादार नज़र आते हैं
जिनके हाथों में हिफ़ाज़त की थी जिम्मेदारी
उनके पीछे छुपे गद्दार नज़र आते हैं
इन युवाओं को वतन की ज़रा भी फ़िक्र नहीं
इश्क़ में आज वो बीमार नज़र आते हैं
बेटियों के सदा ही दाम लगाये जाते
आज रिश्ते भी तो व्यापार नज़र आते हैं
"मौज" देखो वो ग़मों से हैं परेशान बहुत
फिर भी खुश रहने को तैयार नज़र आते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (7)
वज़्न-1212 1122 1212 22
मुहब्बतों का जनाज़ा निकलने वाला है
वो बेवफ़ा तो मुझे यार छलने वाला है
निकल पड़े हैं क़दम नेकियों के रस्ते पर
बताओ कौन मेरे साथ चलने वाला है
कमाई हाथ में आने लगी है मेहनत की
नसीब अपना लगे अब बदलने वाला है
न देख पाऊँगा रुख़सत मैं अपनी बेटी की
कलेजा माँ का तो लगता निकलने वाला है
नशे की लत में जो बरबाद कर रहा जीवन
यक़ीन मानो वो कल हाथ मलने वाला है
बना प्रधान दिया जिसको हमने कल वो ही
हमारी सबकी कमाई निगलने वाला है
वो ज़िंदगी से कभी "मौज" हारता ही नहीं
परख़ के वक्त जो ख़ुद ही सँभलने वाला है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (8)
वज़्न-221 2121 1221 212
हँस हँस के अश्क़ अपना छुपाना पड़ा मुझे
हर ग़म को इस तरह से भुलाना पड़ा मुझे
काटों की रहगुज़र है ज़माना ये दोस्तो
फूलों का रास्ता ही बनाना पड़ा मुझे
दुश्मन निकल गया जो मेरा यार था कभी
वो नाम दोस्ती से मिटाना पड़ा मुझे
सरकार छल रही है यहाँ पर किसान को
उनका पयामे-हक़ भी उठाना पड़ा मुझे
मैदाने-जंग में यहाँ दुश्मन अनेक थे
हर दाँव अपना उन पे चलाना पड़ा मुझे
अच्छे भले सियासी नहीं लोग अब रहे
खुद को ही राजनेता बनाना पड़ा मुझे
अहबाब घर के हों न परेशान धूप से
आँगन में इक दरख़्त लगाना पड़ा मुझे
ऐ *मौज* ज़ख़्म कैसे अजीज़ों ने दे दिए
मरहम जो रोज़ रोज़ लगाना पड़ा मुझे
डी.पी.लहरे"मौज"
बायपास रोड़ कवर्धा
छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (9)
वज़्न
121 22 121 22
गिरे हुए को उठा के देखो
गले से अपने लगा के देखो
कसम ख़ुदा की दुआ मिलेगी
गरीब को तुम हँसा के देखो
सँवारना है तो ज़िंदगी ऐ
हरेक ग़म को भुला के देखो
है कितना मुश्किल ये धन कमाना
पिता के जैसे कमा के देखो
ये कौन बर्बाद कर रहा है
ज़रा ये जंगल बचा के देखो
वफ़ा किया तो दगा न देना
सदा मुहब्बत निभा के देखो
ऐ मौज महफ़िल में यार अपने
हमें कभी तुम बुला के देखो
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(10)
वज़्न-1212 1122 1212 22
वज़्न
1.रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले
2.किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है
3.चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
4.कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
5.तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साए में शाम कर लूँगा
6.न मुँह छिपा के जियो और न सर झुका के जियो
7न तू ज़मीं के लिए है न आस्मां के लिए
8मेरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं
9 झुकी-झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं
10 मिले न फूल तो काँटो से दोस्ती कर ली
ख़ुदा ने मुझको ग़मों से सदा उबारा है
अता से अपनी मेरी ज़ीस्त को सँवारा है
मैं मुश्किलों से कभी हारता नहीं यारो
जो माँ-पिता का हमेशा मिला सहारा है
शहीद बेटा हुआ है हमारा सरहद पर
ख़बर ये देके हमें डाकिये ने मारा है
हमारी ग़लती थी सच बोलते थे हम सबसे
जहाँ को देख के ख़ुद को भी अब सुधारा है
क़यामतों की चमक रोज देखता हूँ मैं
उन्हीं का जलवा निगाहों में अब उतारा है
मेरे हुनर को फ़कीरी नहीं समझना तुम
है गर्दिशों में अभी "मौज" यह सितारा है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(11)
वज़्न-2122 2122 2122 212
देखकर अक्सर बुज़ुर्गों को ठहर जाता हूँ मैं
देते हैं दिल से दुआएँ और निख़र जाता हूँ मैं
ऐ ख़ूदा तू माफ़ करना ग़र ख़ता हो जाए तो
इक ख़ता से सबकी नज़रों से उतर जाता हूँ मैं
मेरी किस्मत को बनाने में इन्ही का हाथ है
माँ-पिता की इक दुआ से ही सँवर जाता हूँ मैं
रोज़ ही अपने लहू से ख़त उसे लिखता रहा
आशिक़ी में इस तरह हद से गुजर जाता हूँ मैं
पूँछते हैं लोग अक़्सर 'मौज'जाता है कहाँ
मुफ़लिसों की बस्ती में शामो-सहर जाता हूँ मैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (12)
*आपसे दिल सनम लगा बैठे*
*आपको ज़िन्दगी बना बैठे*
इन हसीनों से दूरियां अच्छी
किस घड़ी कौन दिल दुखा बैठे
दर्द ही दर्द दे रही दुनियां
और अश्क़ो को हम छुपा बैठे
दिल की दुनियां लुटा दी है हमने
और गरीबों की सफ़ में आ बैठे
जो नशे के गुलाम हैं यारों
ज़िन्दगी से वो दूर जा बैठे
उनकी यादों में डूबा रहता हूँ
जिस फ़साने को वो भुला बैठे
रख दिया सर को माँ के कदमों में
रंज ओ ग़म *मौज* सब भुला बैठे
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (13)
वज़्न-1212 1122 1212 22 /112
यूँ सरफ़रोशी के आँखों में ख़्वाब रखते हैं
हम अपने दिल में सदा इंकलाब रखते हैं
वतन के नाम पे जो जाँ निसार कर बैठे
हम उनकी याद में ताज़ा गुलाब रखते हैं
ग़मों की धूप कभी छू न पाएगी हमको
लबों पे अपनी हँसी बे-हिसाब रखते हैं
ये हुस्न वाले भी क्या-क्या नहीं करेंगे भला
तभी तो चेहरे पे अक्सर नकाब रखते हैं
कभी नहीं वो पहुँच सकते हैं बुलंदी पर
जो अपने साथ में हरदम शराब रखते हैं
कभी भी हमको तू कमज़ोर मत समझना *मौज*
सभी सवालों का सच्चा जवाब रखते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(14)
वज़्न-1222 1222 1222 1222
मुहब्बत की मेरे यारा करो बरसात सावन में
महक जायें हमारी ज़ीस्त के लम्हात सावन में
फ़ज़ा रंगीन है जानम बड़े दिलक़श नज़ारे हैं
ज़रा नज़दीक तो आओ करें कुछ बात सावन में
बड़ी उम्मीद है उससे वो आएगा ख़ुशी लेकर
कभी होगी हमारी भी मिलन की रात सावन में
बहा कर ले गया जो था पुराना आशियां मेरा
मुसीबत ऐसी लेकर आई थी बरसात सावन में
कभी सूखा कभी बारिश फसल बर्बाद हो जाती
बिगड़ जाते किसानों के यहाँ हालात सावन में
ग़मों को भूल जाते हैं खुशी से मुस्कुराते हैं
कुछ ऐसी *मौज* करते हैं चलो शुरुआत सावन में
ग़ज़ल
वज़्न-
1222 1222 1222 1222
मुहब्बत का ये मौसम है करो इज़हार सावन में
रहो ख़ामोश मत यारो करो इकरार सावन में
बहुत पानी बरसता है बहुत बादल गरजते हैं
यहाँ बंजर भी अब देखो हुआ गुलज़ार सावन में
नहीं तूफान से डरना नहीं सैलाब से यारों
मुहब्बत का जो दरिया है वो कर लो पार सावन में
नदी में बाढ़ आने से पहुँच पाता नहीं घर तक
नहीं पढ़ने को मिलता है यहाँ अख़बार सावन में
यहाँ हिन्दू सभी भाई यहाँ मुस्लिम सभी भाई
मनाते हैं सदा मिलकर सभी त्योहार सावन में
चलो हम भीग जायें आज बारिश भी सुहानी है
झिझकना मत ज़रा भी मौज तुम इस बार सावन में
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(15)
वज़्न-2122 2122 212
दर्द ही देती रही है ज़िंदगी
इस तरह रुठी हुई है ज़िंदगी
हर ख़ुशी ही छीनती है ज़िंन्दगी
जाने कैसी बेबसी है ज़िंन्दगी
चंद साँसों के सिवा कुछ भी नहीं
अब नहीं ये ज़िंन्दगी है ज़िंदगी
वक्त ने कैसे तमाचे जड़ दिये
किस भँवर में फँस गई है ज़िंदगी
ये हँसाती है रुलाती है कभी
ग़म ख़ुशी की डायरी है ज़िंदगी
दोस्ती को मानता हूँ मैं ख़ुदा
यार तेरी दोस्ती है ज़िंदगी
मौज गहराई नहीं तो क्या हुआ
देख मेरी शायरी है ज़िंदगी
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (16)
वज़्न-2222222222222
ग़ैरों का ये प्यार क़सम से झूठा लगता है
एक मुझे तू इस दुनिया में सच्चा लगता है
सिर्फ़ तुम्हें ही देखूँ हर पल ऐसा लगता है
प्यार तुम्हारा मुझको जन्नत जैसा लगता है
उल्फ़त का ये बाग़ यक़ीनन मुरझा जाएगा
सहने-गुलशन देख तेरे बिन सूना लगता है
जो हरदम ही ऊँचा-नीचा इंसां को समझे
मेरी हस्ती के आगे वो बौना लगता है
करता है बर्बाद कमाई मेहनत की क्योंकर
जीवन जीना है तो पगले पैसा लगता है
ओढ़ रिदा मत हरगिज़ नादाँ "मौज"उदासी की
जब भी तू ख़ुश रहता है तब अच्छा लगता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(17)
वज़्न-1222 1222 122
तेरा वादा मुकरने के लिए था
दिखाया ख़्वाब मरने के लिए था
महज़ कहना तुम्हारा बेवफ़ा हो
मेरे दिल को कुतरने के लिए था
जो गुजरा वक़्त तेरे साथ अपना
बता क्या? आह भरने के लिए था
समझकर आइना तोड़ा जिसे है
ये दिल तेरे सँवरने के लिए था
बुज़ुर्गों का मिला था मश्वरा जो
हमें मौका सुधरने के लिए था
दिया था मौज ने इक फूल तुमको
कभी दिल में उतरने के लिए था
डी.पीलहरे "मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल18
वज़्न-1121 2--122 --1121 --2122
मिले हर क़दम पे धोखा मुझे आशिकी के बदले
मेरी जान जा रही है यहाँ दिल्लगी के बदले
तू बढ़ा सदा मुहब्बत यहाँ नफ़रतें मिटाकर
ज़रा सोच क्या मिलेगा अजी दुश्मनी के बदले
मुझे मिल गया ख़ुदा है तेरी दोस्ती को पा कर
नहीं चाहिए कभी कुछ तेरी दोस्ती के बदले
ऐ ख़ुदा यही तमन्ना मेरी इक है ज़िंन्दगी की
मुझे मौत ही तू देना यहाँ मुफ़लिसी के बदले
मेरी ज़िंन्दगी में रहते हैं सदा घने अँधेरे
मुझे तीरगी मिली है सदा रौशनी के बदले
न ख़ुदा का ख़ौफ़ खाया न ही लाज उनको आई
मुझे अपनों ने ही लूटा मेरी सादगी के बदले
कभी मौज हारना मत भले लाख ग़म सताये
तू हज़ार ग़म भुलादे यहाँ इक ख़ुशी के बदले
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल19
वज़्न-221 2121 1221 212
महँगाई की जो मार यहाँ बेशुमार है
कैसे चलाएँ जीस्त नहीं रोज़गार है
कैसे करूँ यकीन फ़रेबी हैं चार सू
जिसको शरीफ़ समझा वही दाग़दार है
नफ़रत के बीज बो के लड़ाते हैं जो हमें
उनसे लड़ाई आज यहाँ आर-पार है
ऐसे हरेक शख़्स को मिलकर के दो सबक
करता जो बेटियों की अना तार-तार है
ख़ामोशियों में डूब के जानम न चुप रहो
मेरे हबीब तुम कहो क्या? मुझसे प्यार है
तन्हाई चारो ओर है राहें मैं तक रहा
तेरा ख़याल और तेरा इंतजा़र है
होंठों की तिश्नगी को बुझाओ कभी सनम
पाने को तेरा प्यार ये दिल बेकरार है
अंजाम ख़ुद है सामने ऐ मौज देख ले
ये इश्क़ भी बला है भला सा बुखार है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल20
वज़्न-1222 1222 122
कहूँ कैसे कि अच्छा हो रहा है
बदन का घाव गहरा हो रहा है
तेरी अब याद डसती है कसम से
सो दिल में दर्द ज़्यादा हो रहा है
जिसे अपना समझते थे जहां में
वही दुश्मन हमारा हो रहा है
मुहब्बत का ख़ुदा कहता था ख़ुद को
ख़ुदा को देख प्यारा हो रहा है
कभी ख़्वाबों में आती तू नहीं क्यों
मिले तुमसे ज़माना हो रहा है
ख़ुदा से डर नहीं लगता है उसको
वो बंदा जो दरिंदा हो रहा है
जहां में उल्फ़तों का बाग सूना
बिकाऊ आज रिश्ता हो रहा है
जो पूछा हाल मेरा *मौज* ने तो
मेरा दिल आज दरिया हो रहा है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल21
वज़्न-1222 1222 1222 1222
जो पत्थर दिल है उस से दिल लगाना छोड़ देते हैं
हम ऐसे शख़्स से नज़रें मिलाना छोड़ देते हैं
ये रुसवाई से अब हमको नहींं है ख़ौफ़ ऐ हमदम
सनम इक बार हाँ कर दे ज़माना छोड़ देते हैं
कोई तो याद रख्खेगा कोई तो गुन गुनाएगा
चलो हम भी जहाँ में इक तराना छोड़ देते हैं
मेरी कोशिश ये रहती है ख़फा़ कोई न हो जाए
मग़र क्यूँ लोग रिश्तों को निभाना छोड़ देते हैं
तेरी मुस्कान के पीछे यक़ीनन राज है गहरा
मुहब्बत में जो हारें मुस्कुराना छोड़ देते हैं
ग़ज़ल का शेर अच्छा है बुरा है या कमी कुछ है
जिन्हे पूँछें कमी को वो बताना छोड़े देते हैं
जहां में सर बुलंदी मौज हरगिज़ पा नहींं सकते
बड़ों के पाँव में जो सर झुकाना छोड़ देते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल22
वज़्न-1212 1122 1212 22
चराग़ दिल में मुहब्बत का इक जलाना है
ये नफ़रतों का अँधेरा मुझे मिटाना है
मुझे यक़ीन है ये ख़्वाब मेरा सच होगा
तुम्हारे ख़्वाब में फ़ुरसत से आना जाना है
उदास दिल को कभी यार अपने मत रखना
हरेक दौर में हमको भी मुस्कुराना है
गले लगा के ज़रा आगे बढके दुश्मन को
जो दुशमनी को सदा के लिए भुलाना है
बड़े अजीब हैं दौलत से खेलने वाले
हाँ रेत जैसे इन्हे तो बिखर ही जाना है
बहुत दिनों से तड़पती है प्यास से धरती
वो आसमान ज़मीं पर चलो झुकाना है
ऐ"मौज" कर भी सको तो ही साथ देना तुम
कि झुग्गियों को मुझे ताज सा बनाना है
ग़ज़ल23
बहर-1222 1222 122
तुम्हारे दिल के अंदर देखता हूँ
मुहब्बत का है सागर देखता हूँ
यहाँ तो चारसू है ग़म के बादल
ये कैसा आज मंज़र देखता हूँ
हमारे वोट से नेता बने जो
उन्ही के आज तेवर देखता हूँ
उदासी पास जब आए कभी तो
हसीनों को मैं अक़्सर देखता हूँ
मुहब्बत दिल में जो रखते नहीं हैं
उन्ही को "मौज" कमतर देखता हूँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल24 मोटीवेशन
वज़्न-221 2121 1221 212
सूरज के जैसे रोज़ निकलते रहो मियाँ
बेरंग ज़िंदगी को बदलते रहो मियाँ
शासन भी आपका है ये सत्ता भी आपकी
जनता को रोज़-रोज़ ही छलते रहो मियाँ
आई बहुत दिनों में सियासत जो हाथ में
जनता का माल आप निगलते रहो मियाँ
दुनिया के दाँव-पेंच में फँसना नहीं कभी
बस बार-बार आप सँभलते रहो मियाँ
हाथों में आपके हो अलादीन का चिराग़
ख़ुशियों में रोज़-रोज़ उछलते रहो मियाँ
दुनिया के रास्ते में बढ़े मत भले क़दम
नेकी के रास्ते में ही चलते रहो मियाँ
ऐ "मौज"गीत हो सदा होठों पे हो ग़ज़ल
यूँ ग़म को ज़िंदगी के कुचलते रहो मियाँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 25
बहर-2122 1212 22/112
उनसे हम दिल लगा के बैठ गए
दर्द दिल में छुपा के बैठ गए
बेवफाई मिली मुहब्बत में
दिल की दौलत लुटा के बैठ गए
अपनी तन्हाइयों की हम तन्हा
घर में महफ़िल सजा के बैठ गए
हम किसानों को दाम क्या दोगे
ख़ूँ-पसीना बहा के बैठ गए
हैं गुनहगार वो हक़ीक़त में
अपनी नज़रें झुका के बैठ गए
घर को भी दाँव पे लगाया है
वो जुए में उड़ा के बैठ गए
कुछ पढ़ाई न कुछ लिखाई है
अपने चेहरे सजा के बैठ गए
"मौज" होती नहीं कभी पूरी
अपनी ख़्वाहिश जला के बैठ गए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल26 देश भक्ति
वज़्न-221 1221 1221 122
इस मुल्क़ के जैसा कोई गुलशन न मिलेगा
हाँ इस धरा की मिट्टी सा चंदन न मिलेगा
तुझ जैसा कोई भी नहीं ये मान लिया पर
मुझ जैसा भी तुझको यहाँ साजन न मिलेगा
खिलते हों जहाँ प्यार मुहब्बत से ये रिश्ते
वो घर में कहीं आपको आँगन न मिलेगा
देखो तो ज़रा ढूँढ के दुनिया में कभी भी
माँ-बाप के जैसा कहीं भी धन न मिलेगा
हर ग़म को निगाहों में छुपा ले जो ख़ुशी से
जीनें का यहाँ हमसा कोई फन न मिलेगा
कैसे मैं कहूँ यार यहाँ लोग हैं अपने
मतलब का ज़माना है सगापन न मिलेगा
रोके जो नहीं" मौज"उजड़ते हुए जंगल
तो यार कहीं झूमता सावन न मिलेगा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल27
वज़्न-1222 1222 122
नशा अब भी नहीं उतरा है मेरा
नशा ये प्यार का पहला है मेरा
हुकूमत चलती है मेरी यहाँ पर
तभी तो शह्र में चर्चा है मेरा
कोई मरहम लगाओ यार आके
कसम से ज़ख़्म ये गहरा है मेरा
ग़मों के बोझ को ही ढो रहा हूँ
कहूँ कैसे ये दिन अच्छा है मेरा
सदा उनको ही देखा आईने में
तभी तो रूप जो निखरा है मेरा
ज़माना झूठ का हो या हक़ीक़त
मगर ए साँच का रस्ता है मेरा
रहूँ अब" मौज' हरदम मौज में ही
यही तो यार अफ़साना है मेरा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल28
2122 1212 22
चाँद पर घर हमें बनाना है
ख़्वाब फिर इक नया सजाना है
आए तूफान ग़र तो आने दो
ग़म के साये में मुस्कुराना है
बाँटने से कभी न कम होगा
दिल में हर ग़म हमें छुपाना है
यूँ कभी आज़माके देखो तो
दिल तेरे प्यार में दीवाना है
अब समुंदर की तह में जाके ही
कोई गौहर हमें उठाना है
प्यार ही प्यार हो चमन में अब
दिल से नफ़रत को यूँ मिटाना है
इश्क़ वाले ज़रा सम्हल जाएँ
आज दुश्मन यहाँ ज़माना है
वक़्त जब होगा हम सुना देंगे
यार अपना भी कुछ फ़साना है
टूट जाना है साँस को इक दिन
मौत आना तो इक बहाना है
हो वतन के लिए जवानी मौज
कर्ज़ कुछ तो हमें चुकाना है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल29
वज़्न-212 212 212 212
प्यार दो प्यार लो प्यार करते रहो
राह उल्फ़त की गुलजार करते रहो
रोज़ तलवार में धार करते रहो
जीना दुश्मन का दुश्वार करते रहो
मज़हबी मज़हबी बात करके सदा
मुल्क़ को यूँ न बेकार करते रहो
नफ़रतों को मिटा के यहाँ दोस्तों
हाँ मुहब्बत में हद पार करते रहो
छोड़ दो अब नशे को मेरे दोस्तों
ज़ीस्त को यूँ न बीमार करते रहो
हाथ में है सियासत तुम्हारी यहाँ
जी में आए वो सरकार करते रहो
छोड़ना ही पड़ेगा ज़माने को "मौज"
मौत से लाख इंकार करते रहो
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल30
वज़्न-1222 1222 1222 1222
मुहब्बत जिनसे करते हैं उन्हें बतला नहीं पाये
उलझते दिल को ऐ यारो कभी सुलझा नहीं पाये
गरीबी में गुजारे हैं कई दिन ऐ मेरे मालिक
कभी रोटी नहीं पाये कभी कपड़ा नहीं पाये
अँधेरे ही अँधेरे हैं हमारी झुग्गियों में यूँ
मुक़द्दर अपनी मेहनत से हमीं चमका नहीं पाये
पढ़ाई के दिनों में ढूँढते थे शह्र में अक्सर
मगर हम जाति के चलते कभी कमरा नहीं पाये
चुनावी जीत पाने को सदा वो झूठ ही बोले
यहाँ हम एक भी नेता कभी सच्चा नहीं पाये
हमारा मौज दिल तो दरिया है यह जानते हैं हम
मगर दिल में उतरने के लिए रस्ता नहीं पाये
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल31
वज़्न-1212-1122-1212-22
तुम्हारी एक झलक पाने को मचलते हैं
मिले नज़र तो खुशी में सनम उछलते हैं
मैं कामयाब तो हूँ अपनी मेहनतों के बल
मेरे हुनर को यहाँ देख लोग जलते हैं
भरोसे में जो मुकद्दर के ही रहा करते
जहाँ में शख़्स हमेशा वो हाथ मलते हैं
क्या नफ़रतों की कभी आँधियाँ बुझा पाये
दिये हमारी मुहब्बत के अब भी जलते हैं
ग़मों से मौज नहीं कोई लेना देना है
कि मेरे शामों सहर तो ख़ुशी में ढलते हैं
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल32
वज़्न-122 122 122 12
ख़ुदा की कसम मत सितम कीजिए
ग़रीबों पे कुछ तो करम कीजिए
नुमाइश बहुत हो गई जिस्म की
ज़रा शर्म अब तो सनम कीजिए
सदा बेझिझक कीजिए शायरी
बयां अपने रंजो-अलम कीजिए
मिलेगा मुक़द्दर में लिख्खा है जो
कभी भी नहीं फ़िक्र-ओ-ग़म कीजिए
बसर कीजिए मौज ही मौज में
कभी शानों-शौकत न कम कीजिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल33मोटीवेशन
वज़्न 2122 1122 1122 22/112
अपने बाज़ू में सदा जोश जगाए रखना
मुश्किलों में इसे फौलाद बनाए रखना
मेंहदी को हाथ में तुम अपने रचाए रखना
इस तरह नाम सनम मेरा लिखाए रखना
लाख दुश्मन हो यहाँ यार ज़माने वाले
दोस्ती के लिए तू हाथ बढाए रखना
देखके आपके चेहरे को सुकूँ मिलता है
और घूँघट को थोड़ी देर उठाए रखना
फौज में हूँ कभी ये जान चली जाए तो
मेरी यादों को सनम दिल में दबाए रखना
एक मुस्कान में सब दर्द की होगी छुट्टी
चहरे पे यार तू मुस्कान बनाए रखना
बेवफाई मिले महबूब से तो समझो तुम
इश्क़ की आग में ख़ुद को न जलाए रखना
हम रहें या न रहें "मौज" इस ज़माने में
अपनी महफ़िल को हमेशा तू सजाए रखना
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गज़ल34
वज़्न-121 22 121 22
गरीब का जब भला करेगा
खुदा भी तुझ* पर दया करेगा
किया भरोसा बहुत उसी पर
नहीं पता था दग़ा करेगा
सभी उदासी को छोड़ दे अब
तभी जहां में मजा करेगा
रखे अगर लब पे मुस्कुराहट
वो दर्द-ए-दिल की दवा करेगा
ऐ मौज खा तू कसम ख़ुदा की
नहीं किसी का बुरा करेगा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल35
वज़्न 1212 1122 1212 22
जवां जवां ये मेरा दिल भी आशिकाना है
मुहब्बतों का ज़ुबाँ पे सदा तराना है
अगर मिले कभी फुरसत तो आप आ जाना
महल से कम नहीं मेरा ग़रीबख़ाना है
नहीं है चाह मुझे और कोई जन्नत की
यूँ माँ पिता की दुआ ही मेरा ख़जाना है
मैं नेकियों से चकमता हूँ इस ज़माने में
अभी तो और भी सूरज सा जगमगाना है
सँभल के जाना हसीनों की आप महफ़िल में
नज़र का वार बड़ा इनका क़ातिलाना है
मैं ख़ुशनुमा तो हमेशा रहा ही करता हूँ
मगर जहाँ को हँसा कर ही मुस्कुराना है
ऐ मौज लिख ले ग़ज़ल देश और दुनिया पे
मिज़ाज तेरा हमेशा से शायराना है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल36
वज़्न-122 122 122 122
कभी जब सनम से मुलाक़ात होगी
यकीं है मुहब्बत की बरसात होगी
अगर छत पे आओ सनम तुम अकेले
ख़ुदा की क़सम वो हँसीं रात होगी
वतन पे कभी आँच आने न दूँगा
यहाँ दुश्मनों की सदा मात होगी
सभी को बना दो ख़ुदा नेक इंसां
न इससे बड़ी कोई सौगात होगी
छलावा फ़रेबी ज़माने में अक़्सर
शराफ़त की अब तो कहाँ बात होगी
मिटाए मुझे वो ज़माना मिटा दूँ
कहाँ दुश्मनों की ये औकात होगी
कभी 'मौज' का बाल बाँका न होगा
गरीबों की जब तक दुआ साथ होगी
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल37मुसलसल
वज़्न-122 122 122 122
ग़मों से उबरने को जी चाहता है
मुहब्बत में मरने को जी चाहता है
मिली ख़ाक में अब मुहब्बत हमारी
न सजने सँवरने को जी चाहता है
कहाँ की मुहब्बत कहाँ की इनायत
उन्हे अब बिसरने को जी चाहता है
चलो आज साक़ी पिलादो मुझे भी
यहीं पे ठहरने को जी चाहता है
हसीना मिले या कोई अप्सरा हो
मुहब्बत न करने को जी चाहता है
वतन का पुजारी ही बनकर रहूँगा
वतन पे बिखरने को जी चाहता है
मुक़्द्दर में अपना लिखा 'मौज' है क्या
मुक़्द्दर से डरने को जी चाहता है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल38 मोटीवेशन
वज़्न-1212 1122 1212 22
ग़मों को दिल में दबाके जो मुस्कुरातें हैं
वो जुगनुओं की तरह यार जगमगाते हैं
नज़र उठा के इन्हे देखते नहीं फिर भी
ये हुस्न वाले हमेशा हमें रिझाते हैं
जो मेहनतों की कभी कद्र ही नहीं समझे
कमाई बाप की अक्सर वही उड़ाते हैं
बड़े अज़ीब हैं मसनद पे बैठने वाले
ये उंगलियों से गरीबों को ही नचाते हैं
सफ़र का वक़्त जो आए तो कौन रुकता है
मुसाफिरों की तरह लोग आते-जाते हैं
ऐ 'मौज' दिल को सुकूं और चैन देने को
हम अपनी एक ग़ज़ल रोज़ गुनगुनाते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल39 मोटीवेशन
वज़्न-221 1222 221 1222
माँ-बाप के पैरों में जन्नत का ख़जाना है
उनकी ही इबादत में सर अपना झुकाना है
🧦🧦
रौशन हो जहाँ सारा वो दीप जलाना है
जीवन के अँधेरों को अब दूर भगाना है
🌞🌞
कटने मैं नहीं दूँगा अब एक शजर को भी
जंगल का सिपाही हूँ जंगल को बचाना है
🌴🌴
मज़हब की लड़ाई को होने मैं नहीं दूँगा
नफ़रत को मिटाकर के बस प्यार जताना है
🤷♂️💁🏻♂️
सरहद पे खड़े होकर दुश्मन को मिटा दे जो
सारे ही जवानों को जाँबाज़ बनाना है
💪💪
पड़ जाये मुझे रखने गिरवी ही अगर गहने
हर हाल मुझे अपने बच्चों को पढ़ाना है
👨🎓👨🎓
कुछ लोग यहाँ हर दिन देते हैं सदा ताना
ऐ मौज चलो बचके दुश्मन ये ज़माना है
🚶♂️🚶♂️
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 40
वज़्न-2122 1122 1122 22
*प्यार ही प्यार जताने के लिए ज़िंदा हूँ*
*दौर नफ़रत का मिटाने के लिए ज़िंदा हूँ*
*बोल कर झूठ करोड़ो को दबा रख्खा है*
*सामने सच को मैं लाने के लिए ज़िंदा हूँ*
*जो सियासत में सदा लूटते हैं जनता को*
*उनको सत्ता से हटाने के लिए ज़िंदा हूँ*
*लोग कहते हैं सभी पाप यहाँ धुल जाते*
*यार गंगा में नहाने के लिए ज़िंदा हूँ*
*मुझको हर हाल में तालीम उन्हें देना है*
*अपने बच्चों को पढाने के लिए जिन्दा हूँ*
*कामयाबी पे किसी के न जलो ये लोगो*
*'मौज' कुछ बन के दिखाने के लिए जिन्दा हूँ*
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल41
वज़्न-1222 1222 122
ख़ुदा हर सू मुझे लगने लगा है
वो ज़र्रे ज़र्रे में मिलने लगा है
जिसे दिल में बसा कर मैं रखा हूँ
पराया वो मुझे कहने लगा है
नहीं इंसान बन पाया कभी भी
मगर शैतान वो बनने लगा है
सदा ही झोपड़ी में दिन गुजारा
हवेली में वो अब रहने लगा है
भरोसा उठ गया रिश्तों से अब तो
कि भाई-भाई को ठगने लगा है
लगाई ही नहीं सच की कमाई
क़िला वो झूठ का ढहने लगा है
बुरा करता नहीं फिर भी किसी का
ज़माना मौज से जलने लगा है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
*ग़ज़ल*42
*दोस्ती बाग-ए दिल में सजा लीजिए*
*फूल दिल के चमन में खिला लीजिए*
*दोस्ती है ख़ुदा दोस्ती है दुआ*
*दोस्तों को गले से लगा लीजिए*
*दोस्ती से बड़ा और कुछ भी नहीं*
*उम्र भर दोस्ती का मज़ा लीजिए*
*दोस्ती की है गर तो निभाना सदा*
*फ़र्ज़ अपने सभी अब निभा लीजिए*
*दोस्ती चाँद से खूबसूरत रहे,*
*साँस में दोस्तों को बसा लीजिए*
*'मौज' तो नाज़ करता रहा है सदा*
*प्यार से दोस्ती को निभा लीजिए*
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 43
चाँदनी रात का नज़ारा है
मेरे दिल ने तुम्हे पुकारा है
खोया खोया सा दिल हमारा है
यार तुम बिन नहीं गुजारा है
भूख में ही तड़प के मर जाते
मुफ़लिसों का नहीं सहारा है
जान लेती यहाँ पे महँगाई
कौन इससे हमें उबारा है
मज़हबी लोग मेरे दुश्मन हैं
इनको नज़रों से ही उतारा है
वक़्त बेवक़्त मुस्कुराया हूँ
तब ग़मों का हुआ किनारा है
हाँ फकीरी नहीं समझना तुम
'मौज'गर्दिश में यह सितारा है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 44
वज़्न-221 2121 1221 212
ग़म छोड़ मुस्कुराये वो दिलदार मौज है
अपने ही दिल का साहिबे सरकार मौज है
कहते हैं लोग इश्क़ तो दरिया है आग का
जाना है मुझको डूब के उस पार मौज है
जब चाहे आज़मा के इसे देख लीजिये
हम मुफ़लिसों का सिर्फ़ मददगार मौज है
पहले उड़ा रहा था ज़माना मेरा मज़ाक
अब लोग कह रहे हैं समझदार मौज है
ये ख़ुश मिज़ाज रखता सदा अपने ज़ीस्त को
यूँ हर ख़ुशी का देख लो बाज़ार मौज है
जो दुश्मनी को भूल के करता है दोस्ती
जो जोड़ दे दिलों को वही तार मौज है
डाले बुरी नज़र जो मेरे मुल्क पर कोई
उस नामुराद के लिए तलवार मौज है
आईने की तरह मेरे किरदार हैं रकम
ऐ दोस्त पढ़ ले ग़ौर से अखबार मौज है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 45
वज़्न-2122 1212 22/112
जब भी मैं खोल कर पलक देखूँ
अपने माँ बाप की झलक देखूँ
डाल कर छत पे दाना-पानी मैं
पंछियों की सदा चहक देखूँ
दर्द कितना ये जख़्म देते हैं
मैं लगा कर ज़रा नमक देखूँ
मेरे महबूब साथ में ही रहें
चूड़ियों की सदा खनक देखूँ
ग़म का ये सिलसिला ही थम जाये
अब नहीं और मैंं कसक देखूँ
मौज ग़म छोड़ मुस्कुरा लेना
तेरे चेहरे में बस चमक देखूँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 46
बहर-2122 2122 212
रदीफ़-से
काफ़ीया-अंजाम,काम,शाम,नाम,
बच के रहना तुम बुरे हर काम से
रिश्ता रखता कौन है बदनाम से
जान लेवा है नशा इक रोग है
जान से जाते बहुत हैं जाम से
चोट देते लोग हैं हर बात पर
मैं मिटाता दर्द झंडू बाम से
जिंदगी कटती खुशी में आजकल
आशिकी में डूबकर आराम से
आ सनम अब प्यार का वादा निभा
मौज तो डरता नहीं अंजाम से
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा ग़ज़ल 47
आपस में हो एकता,बढ़े सदा संस्कार
जहाँ प्यार ही प्यार हो,गढ़ ऐसा संसार✅
जात धर्म की भेद से,उपजै मन में दोष
बैर भावना छोड़कर,करना सद व्यवहार✅
मानुष मानुष एक हैं,एक सभी के रंग।
मन को रखना साफ जी,रखना उच्च विचार✅
मानव जीवन कीमती,करना है सतकाम
दीन-दुखी के बन सदा,अब तो पालनहार✅
ख़ुशिया देना तुम सदा,मौज सभी को रोज
सबके दिल को जीतना,ये जग है परिवार✅
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 48देश भक्ति
बहर-212-212-212
काम ऐसा किया कीजिए
सबके हक़ में दुआ कीजिए
है भरोसा जिन्हें आप पर
उनसे यूँ मत दग़ा कीजिए
ले सदा माँ पिता की दुआ
ज़िंदगी भर मज़ा कीजिए
देश के दुश्मनों की यहाँ
चाल है क्या पता कीजिए
इस वतन में मिली ज़िंदगी
शुक्रिया तो अदा कीजिए
*मौज* मुश्किल के इस दौर में
मुफ़लिसों का भला कीजिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 49
वज़्न-2122 1122 1122 22(112)
चाहे झूठा ही सही प्यार का वादा कर ले
ऐ सनम दिल पे मेरे आज तू कब्ज़ा कर ले
मुस्कुराकर ही यूँ जीने में मजा आएगा
ज़िंदगी के सभी ग़म से तू किनारा कर ले
हारना मैं कभी सीखा ही नहीं बचपन से
ज़िंदगी चाहे तू कितना भी तमाशा कर ले
लाख कोशिश करे दुश्मन न डरा पायेगा
जोश हिम्मत को मेरे यार तू जिंदा कर ले
झूठ खुद शर्म से हो जाएगा पानी पानी
पहले ऐ दोस्त मेरे ख़ुद को तू सच्चा कर ले
रौशनी तुझसे ज़माने को मिलेगी उस दम
'मौज'सूरज की तरह कुछ तो उजाला कर ले
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(50)
वज़्न-2122 2122 212
जलने वालों को जलाना चाहिए
आग दिल में यूँ लगाना चाहिए
मुफ़्त की रोटी न तोड़ो दोस्तों
जब तलक है जाँ कमाना चाहिए
मज़हबी करते लड़ाई जो यहाँ
मुल्क़ से उनको भगाना चाहिए
और कुछ देना भले मत ऐ ख़ुदा
मुफ़लिसों को आबदाना चाहिए
चारसू मिलते हैं देखो मतलबी
चाँद पे अब घर बनाना चाहिए
मौज में रहना हमेशा 'मौज' तुम
छोड़ ग़म को मुस्कुराना चाहिए
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ताज़ा
ग़ज़ल(51)
*नज़र हम उन से मिलाते थे मौज करते थे*
*हसीन ख़्वाब सजाते थे मौज करते थे*
*धुआ उगलता जहाँ आज कारखाना है*
*हम अपनी गाय चराते थे मौज करते थे*
*नज़र कहीं भी नहीं आती है नदी हमको*
*कि जिस में ख़ूब नहाते थे मौज करते थे*
*मशीन का है ज़माना तो हाथ खाली है*
*कि चार पैसे कमाते थे मौज करते थे*
*वो बचपना ही मजेदार 'मौज' लगता था*
*वगैर फ़िक्र बिताते थे मौज करते थे*
डी.पी. लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल-52
वज़्न-22 22 22 22 22 22
मुफ़लिस का ही अक़्सर माल दबाया तुमने
तब जा कर ये ऊंचा भवन बनाया तुमने
रास नहीं आता है तुमको मेहनत करना
रोज़ यहाँ पे फोकट का ही खाया तुमने
भूखे को रोटी देना मंजूर नहीं है
पत्थर पे पर छप्पन भोग चढ़ाया तुमने
दैरो हरम की बातों में सबको उलझा कर
इक दूजे को आपस में लड़वाया तुमने
'मौज'ज़माने वालों से क्या शिकवा करना
धोखा हरदम अपनों से जब खाया तुमने
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल -53
वज़्न-2122 1212 22/112
यूँ सियासत का तुम नशा न करो
और कुर्सी से तुम दग़ा न करो
एक भी सच तो बोल देते तुम
झूठ ही झूठ बस कहा न करो
और कितना सताओगे सबको
सबकी नज़रों से तुम गिरा न करो
अपनी जुल्फ़ों में कैद रख लो तुम
ज़िंदगी भर मुझे रिहा न करो
दोस्त होते हैं जान से प्यारे
दोस्ती में कभी दग़ा न करो
बिन पढ़ाई लिखाई के यारों
बेटियों को कभी विदा न करो
गीदड़ो की हैं भभकियाँ तो क्या
शेर के बाप हो डरा न करो
'मौज' कट जाये सर भले लेकिन
आगे दुश्मन के तुम झुका न करो
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 54
वज़्न2122 1122 1122 22
कौम के नाम पे हर रोज सताने वाले
उनको औकात में हम दोस्त हैं लाने वाले
हम जो चाहें तो ज़माने को हिला सकते हैं
कम नहीं हम भी हैं दुश्मन को हराने वाले
बेख़ता हमको ही बदनाम किया करते हैं
खुद ही बदनाम हैं ये ऊँगली उठाने वाले
कितनी ताकत है ज़रा देख ले ये बाजू में
आसमानों को अभी हम हैं झुकाने वाले
मौज तो दोस्ती में जान भी दे सकते हैं
हम भी हैं दोस्ती में हाथ बढ़ाने वाले
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 55
बहर-2122 1122 1122 22
भाई चारे* का यहाँ पाठ पढ़ाना होगा
दिल में नफ़रत है उसे दूर भगाना होगा
ये गिराएँगे यहाँ मज़हबी दीवारों को
नौजवानों* में ज़रा जोश जगाना होगा
और दुश्मन भी नहीं यार हमारा कोई
देश को घर के ही दुश्मन से बचाना होगा
लाख़ तूफ़ान चले यार ज़माने में हमें *
खुद के सीने को यूँ फौलाद बनाना होगा
मुफ़लिसों को कभी दो वक्त की रोटी दे दे*
तेरी दुनिया में दुआओं का ख़जाना होगा
जो भलाई कभी करते ही* नहीं जनता की
ऐसे नेताओं को हर हाल हराना होगा
'मौज'तू प्यार से ही जीत ले सबके दिल को*
देख* क़दमों में तेरे* सारा ज़माना होगा
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल56
वज़्न-2122 1212 22/112
शायरी का जो इक नशा है मुझे
रोज़ शब्दों से खेलना है मुझे
सारी दुनिया ने तो ठगा है मुझे
और अपनों ने भी छला है मुझे
बात जो सच है बोलना है मुझे
चार-सू झूठ बस दिखा है मुझे
वो गुनहगार है पता है मुझे
क़ैद में उसको देखना है मुझे
ज़िंदगी में जो मशवरा है मुझे
ख़ूब माँ-बाप से मिला है मुझे
दे दिया उसने तो दग़ा है मुझे
'मौज' तुझसे ही आसरा है मुझे
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 57
वज़्न-2122 1212 22 (112)
वो ख़तरनाक़ देख मंज़र है
दर्द आँसू का जो समंदर है
जिसमें इंसानियत नहीं कोई
आदमी तो नहीं वो पत्थर है
दाम मिलता नहीं किसानों को
हाल उनका यहाँ पे बद्तर है
एक दिन मौत सबको आएगी
आज या कल तेरा भी नंबर है
वो कभी सच तो बोलता ही नहीं
झूठ वो बोलता सरासर है
क्यूँ डराता है उन ग़रीबों को
कौन सा तू यहाँ सिकंदर है
बेइमानी का माल है खाता
घूस लेता सदा जो अफ़सर है
इश्क़ की एक बूँद मिल जाए
'मौज' दिल की ज़मीन बंजर है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
पेश-ए-ख़िदमत इक
ग़ज़ल58
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
जंग क्या होती है मैदान में आओ तो सही
अपने दुश्मन को कभी मार गिराओ तो सही
हक़ हमारे जो सभी छीन के बैठा है यहाँ
ऐसे गद्दार को अब सामने लाओ तो सही
अपने माँ बाप की दौलत को उड़ाते क्यों हो
चार पैसे ही सही खुद भी कमाओ तो सही
हर गली में ही तो रावण यहाँ दिख जाते हैं
बेटियों को बुरी नज़रो से बचाओ तो सही
शेर बनते हो गरीबों को सताने के लिए
और कब तक यूँ सताओगे बताओ तो सही
'मौज' नफ़रत से यहाँ कुछ भी नहीं मिलता है
भाई-चारे का कभी पाठ पढ़ाओ तो सही
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल59 मोटीवेशन
वज़्न
221 2121 1221 212
नफ़रत भुलाके यार मुहब्बत किया करो
सबके दिलों में आप हुकूमत किया करो
सच्चाई के लिए भले ही जान हो फ़ना
हाँ झूठ के ख़िलाफ़ बग़ावत किया करो
चैन-ओ - सुकून सारे ही संसार में रहे
सबके लिए ही आप इबादत किया करो
मैं चाहता हूँ सीख लो हर दाँव-पेंच को
पर बात-बात पे न सियासत किया करो
ऐ दोस्त तेरी दोस्ती को मानता हूँ मैं
शिकवा गिला जो हो तो शिक़ायत किया करो
कब तक उदास बैठे रहोगे यहाँ वहाँ
ख़्वाबों को'मौज'अपने हकीकत किया करो
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
इक मुसलसल
ग़ज़ल 60 रोमांटिक
वज़्न-2122 1212 22
चाँद जैसे ही ख़ूबसूरत हो
ऐ सनम क्या कहूँ क़यामत हो
क्या कहूँ और क्या हो तुम मेरे
मेरे महबूब हो मुहब्बत हो
बिन तुम्हारे मैं जी नहीं सकता
मेरी साँसों की तुम ज़रूरत हो
सारी दुनिया तो ख्वाब लगती है
कैसे मानूँ कि तुम हक़ीक़त हो
आज जिंदा हूँ बस तुम्हारे लिए
'मौज'की एक तुम ही चाहत हो
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 61
वज़्न-1212 1122 1212 22/112
वफ़ा की चाह तबीयत बिगाड़ देती है
किसी किसी को मुहब्बत बिगाड़ देती है
बहुत ही लोग बुलाते हैं रोज़ घर आके
मैं जानता हूँ कि संगत बिगाड़ देती है
सँभाल के ज़रा रखना जहां में बच्चों को
हाँ आपकी इन्हे दौलत बिगाड़ देती है
मैं ज़िंदगी को सदा मुस्कुरा के जीता हूँ
मग़र ख़ुशी को ज़रूरत बिगाड़ देती है
ख़ुशी रहे या रहे ग़म कभी नहीं पीना
शराब चीज़ तबीयत बिगाड़ देती है
ये चाहते हैं सदा 'मौज' मौज है करना
रईंश ज़ादों को शौक़त बिगाड़ देती है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 62
वज़्न-1212 1122 1212 22
*वो बेवफ़ा हैं कभी भी वफ़ा नहीं करते
*इसिलिए तो हम उनसे मिला नहीं करते
यक़ीन कैसे करूँ चार-सू फ़रेबी हैं
बताओ कौन जहां में दग़ा नहीं करते?
यूँ शेर जैसा ही जज़्बा रखे हैं सीने में
हाँ गीदड़ों से कभी हम डरा नहीं करते
*भरा हुआ है फ़ज़ाओं में ज़हर इतना अब
कि आसमान में पंछी उड़ा नहीं करते
लगा हुआ है ज़माना बुराई करने में
मग़र किसी का कभी हम बुरा नहीं करते
ऐ मौज मंजिलें जबतक नज़र नहीं आती
कदम हमारे कभी भी रुका नहीं करते
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 62 रोमांटिक
वज़्न-221 2121 1221 212
लेके खड़े हैं फूल सनम हम गुलाब के
हम कब से मुंतज़िर हैं तुम्हारे जवाब के
जलवा बिखेरती हो सदा हुस्न का यहाँ
अब चार सू है चर्चे तुम्हारे शबाब के
हम इश्क़ के नशे में यहाँ झूमते सदा
पर लोग आज आदि हुए हैं शराब के
लिख्खा है तेरा नाम मेरे ख़ून से सनम
पन्ने पलट के देख ले दिल की किताब के
चेहरे से तेरे मौज ये रौशन है दो जहां
फीके पड़े है नूर यहाँ माहताब के
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल63
वज्न-221 2121 1221 212
माँ-बाप की दुआओं से आगे बढ़ा हूँ मैं
अब ज़िंदगी में मौज ही करने लगा हूँ मैं
लेके गुलाब सामने कब से खड़ा हूँ मैं
चेहरे पे देख नूर तुम्हारे फ़िदा हूँ मैं
आबो हवा कभी न बुझा पाएगी मुझे
तूफ़ान को डराये वो जलता दिया हूँ मैं
कोई भी घर नहीं है जहाँ में यहाँ वहाँ
बरसों से उसके दिल में ही रहने लगा हूँ मैं
ये ग़म कभी तो पास में आया नहीं मगर
हर ग़म को हँसी से ही भगाता रहा हूँ मैं
राहों में डगमगाते नहीं है मेरे क़दम
पत्थर को लात मार के चलता गया हूँ मैं
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल-64
तू आइना है सँवरने से कौन रोकेगा
मैं देखता हूँ निख़रने से कौन रोकेगा
शराब पी के जो बरबाद कर रहे खुद को
लगी है लत जिन्हें मरने से कौन रोकेगा
मिले फ़क़ीर को दो वक़्त की अगर रोटी
तो डूबते को उबरने से कौन रोकेगा
नहीं है क़द्र जहां आज रिश्ते- नातों की।
तो उन घरों को बिख़रने से कौन रोकेगा।
बस एक बार नज़र से नज़र मिले तो सही
तुम्हारे दिल में उतरने से कौन रोकेगा
जो मुस्कुरा के कभी 'मौज' की तरफ़ देखो
तो ज़ख्म-ए-दिल मेरा भरने से कौन रोकेगा
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 65
वज़्न-2122 2122 2122 212
अर्कान-फ़ाइलातुन फ़ाइलतुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
बह्र-बह्रे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
मुझको अपने दर्द के किस्से सुनाया मत करो
दुख बहुत होता है तुम आँसू बहाया मत करो
कामयाबी से तुम्हारी लोग अब जलने लगे
राज़ की जो बात है सबको बताया मत करो
दिल तड़पता है बहुत जब दूर जाती हो सनम
दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्कुराया मत करो
आप बँटवारा कभी करना नहीं माँ बाप का
अपने तो अपने ही होते हैं पराया मत करो
दोस्ती में हम लुटा दें जान भी ऐ दोस्तो
'मौज'की दरियादिली को आज़माया मत करो
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल66
वज़्न-1222 1222 122
मतला
कभी ये ग़म कभी मिलती ख़ुशी है
इसी का नाम तो बस ज़िंदगी है
कभी तुम भी उतर कर देख लेना
मेरे दिल में भरी जो सादगी है
ज़माने से नहीं अब चाहिए कुछ
तू मेरे पास है तो क्या कमी है
ये दुनिया तो लगे जन्नत के जैसी
मुहब्बत की यही कारीगरी है
करेंगे लोग अपने पेट का क्या
जिधर भी देखिए बस मुफ़लिसी है
ख़ुशी देती है लोगों को हमेशा
हक़ीक़त में मेरी जो शायरी है
वही जिंदा जहां में 'मौज'रहता
निशां कुछ छोड़ता जो आदमी है
डी.पी. लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल67
वज्न-22 - 22- 22- 22- 22- 2
उनकी नज़रों में हम तो बेगाने हैं
फिर भी उनको अपना सब कुछ माने हैं
रक्षक होकर भक्षक कैसे बन बैठे?
लगता है इनके ही सारे थाने हैं
उजडेगी मुफ़लिस की फिर झोपड़ बस्ती
खोल दिये जो साहब ने मयखाने हैं
हिन्दू-मुस्लिम सिख-ईसाई सब भाई
नारे यह बेमतलब आज पुराने हैं
सुख दुख का है पढ़ लेना ताना-बाना
एक नहीं लाखों मेरे अफ़साने हैं
इश्क़ मुहब्बत करके हमने देख लिया
लुट कर ही हम मौज इसे पहचाने
हैं
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल68
वज़्न-2122 1212 22
हाँ रुलाती है फिर हँसाती है
ज़िंदगी रोज़ आज़माती है
ये सियासत तो आम जनता को
उँगलियों पे सदा नचाती है
छोड़ दो लत शराब पीने की
मौत को पास यह बुलाती है
भूल पाते नहीं कभी इक पल
याद तेरी हमें सताती है
सरहदों पर जो जाँ लुटाते हैं
उनसे अपनी ये चौड़ी छाती है
देख कर खेल उन दरिंदों का
मेरी तो रूह काँप जाती है
भोली-भाली सी मौज इक लड़की
मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाती है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल69
वज़्न-22 22 22 22 22 2
अपना है पर क्यों बेगाना लगता है
मुझको मेरा दिल दीवाना लगता है
सारी दौलत ठुकरा दूँगा दुनिया की
मुझको तेरा प्यार ख़जाना लगता है
किसको हाल सुनाऊँ दर्दे दिल का मैं
मेरा ग़म मेरा अफ़साना लगता है
इज़्ज़त है दुनिया में झूठे लोगों की
सच्चे लोगों पर जुर्माना लगता है
जमघट रहता था बूढ़े और बच्चों का
गाँव का वो पीपल वीराना लगता है।
बच जाता हूँ अक़्सर अपने दुश्मन से
लेकिन दिल पे रोज निशाना लगता है
दर्द मिला है इतना मेरे अपनों से
ग़म से अब मुझको याराना लगता है
डूबा रहता है उसकी ही यादों में
मौज मुहब्बत का दीवाना लगता है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(70)
वज़्न-1222 1222 122
जो चाहो आज़मा लो आशिकी को
सँवर जाने दो बिखरी जिंदगी को
निभाते हैं सदा दिल से यकीं कर
भुलाते हम नहीं हैं दोस्ती को
जहां में ज़िंदगी है चार दिन की
जियो हरपल ख़ुशी से ज़िंदगी को
मिटाते है जलन दिल की इसी से
कभी पढ़ना हमारी शायरी को
बदलता है हमेशा रंग अपना
कहें क्या आज कल के आदमी को
ये लब भी 'मौज' सूखे पड़ गये हैं
बुझाओ तो कभी इस तिश्नगी को
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(71)
वज़्न-221 2121 1221 212
उनसे दुआ मिले कि कोई मशवरा मिले
माँ-बाप से मिलो तो लगे है ख़ुदा मिले
मरने लगे हैं लोग यहाँ जात-पात में
इस रोग के निदान की कुछ तो दवा मिले
कानून पे यूँ लोग करेंगे सभी यकीं
जो हैं गुनाहगार उन्हे बस सज़ा मिले
ये ज़िंदगी तो कट नहीं सकती ख़ुशी खुशी
सो दर्द सहन करने का भी हौसला मिले
नफ़रत का ज़हर फैल न पाए कभी यहाँ
अच्छी से अच्छी मुल्क़ को आबो हवा मिले
ऐ 'मौज' एक रोग है उस शख़्स को ये इश्क़
जो चाहता है बारहा उसको वफ़ा मिले
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(72)
वज़्न-2122 1122 1122 22
ज़िंदगी में न रहे कोई मुसीबत तेरी
यूँ रहे यार हरी रोज तबीयत तेरी
झूठ ही झूठ ज़माने को सुनाते आया
लोग सब जान चुके आज हक़ीक़त तेरी
आम जनता का नहीं कुछ भी बिगड़ने वाला
एक दिन खुद को डुबाएगी हुकूमत तेरी
छोड़ के यार ज़माने को चला जाएगा
काम कुछ भी नहीं आएगी ये दौलत तेरी
जो भी है हाल अभी दिल का सुना डालो'मौज'
दूर कर दूँगा मैं हर एक शिक़ायत तेरी
ग़ज़ल 73
वज़्न-221 2121 1221 212
पीछे नहीं हटे कभी अपनी जुबां से हम
बोलो तो तारे तोड़ लाएँ आसमां से हम
सौ बार आज़मा के हमें चाहे देख लो
डरते नहीं हैं ज़िंदगी के इम्तिहां से हम
है नफ़रतों का दौर ज़माने में आजकल
लाएँगे प्यार इश्क़ मुहब्बत कहां से हम
इस ज़िंदगी का क्या ही भरोसा है दोस्तो
सजधज के निकल जाएँगे अपने मकां से हम
फैली हुई है नफ़रतों की आग चार-सू
डरने लगे हैं 'मौज' वो उठते धुआं से हम
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 74
वज़्न-1212 1122 1212 112
नहीं दो जून की रोटी भी आदमी के लिए
मैं जिम्मेदार कहूँ किसको मुफ़लिसी के लिए
लुटा दो जान सभी अपनी दोस्ती के लिए
*जगह रहे न कभी दिल में दुश्मनी के लिए*
*कभी उदास नहीं होना ज़िंदगी में तू*
हजार ग़म को भुला यार इक ख़ुशी के लिए
करेंगे रोज इबादत यूँ इनकी चरणों में
हमारे पास हैं माँ बाप बंदगी के लिए
नसीब में जो लिखा था वही मिला तुझको
कभी ख़ुदा को नहीं कोसता कमी के लिए
कदम कदम पे भले 'मौज' यूँ मिले धोखा
वो हीर और मैं *रांझा* हूँ आशिकी के लिए
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 75
वज्न-1212 1122 1212 22
जिगर में दर्द छुपाने की क्या ज़रूरत है
ग़मों के आँसू बहाने की क्या ज़रूरत है
मेरे नसीब में माँ-बाप ही ख़जाने हैं
तो और कोई ख़जाने की क्या ज़रूरत है
मैं पेट भर के ही खाता हूँ रोज फोकट का
मुझे पसीना बहाने की क्या ज़रूरत है
बना के दे नहीं सकते महल गरीबों को
तो उनके घर को जलाने की क्या ज़रूरत है
कभी भलाई नहीं कर सके जो जनता की
उन्हें ही नेता बनाने की क्या ज़रूरत है
ऐ 'मौज'मिलती नहीं है जहाँ कभी इज़्ज़त
करीब उनके भी जाने की क्या ज़रूरत है
ग़ज़ल 76
वज़्न-1212 1122 1212 22/112
दुबारा मिलने का क्या उससे सिलसिला है कोई
मेरे ख़याल की दुनिया सजा गया है कोई
नज़र मिला ही नहीं सकता है किसी से भी
नज़र झुका के मेरे दर से जा रहा है कोई
भटग गया मैं ग़मों की अँधेरी रातों में
मुझे दिखाओ उजाले का रास्ता है कोई
सम्हल सम्हल के चलो ज़िंदगी की राहों में
यकीन कर लो नया रोज हादसा है कोई
गुनाहगार समझ के मुझे सजा मिलती
मैं आदमी वो नहीं और दूसरा है कोई
ऐ 'मौज'खुद की कमाई का क्यूँ नहीं खाते
किसी के हक का यहाँ रोज़ खा रहा है कोई
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल77
2122 1212 22/112
बाप का माल मत उड़ाया कर
चार पैसे भी ख़ुद कमाया कर
हुस्न-ए-मतला
यार मुझसे न दूर जाया कर
पास आकर गले लगाया कर
हाँ ज़मीं बेचनी पड़े फिर भी
बाल-बच्चों को तू पढ़ाया कर
चार दिन की है ज़िंदगी प्यारे
लाख़ ग़म आए मुस्कुराया कर
पूछ लेता है हाल दिल का मेरा
हाल अपना भी कुछ सुनाया कर
जो भी होना है वो तो होगा ही
बेसबब दिल को मत दुखाया कर
बद्दुआ देंगे आह के बदले
मुफ़लिसों को न तू सताया कर
जलने वाले बहुत हैं दुनिया में
'मौज' बचके तू आया-जाया कर
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
छोटी बहर की
ग़ज़ल 78
वज़्न-212 212 212
तुम भले आज़मा लो हमें
या रुला के हँसा लो हमें
नफ़रतों को भुलाकर सभी
आज दिल में बसा लो हमें
मौत से हम तो डरते नहीं
चाहे जितना डरा लो हमें
जान दे दें वतन के लिए
सरहदों पे बुला लो हमें
है अभी भी बहुत बचपना
गोद में माँ बिठा लो हमें
'मौज' ताने बहुत मारते
अब तो तुम भी सुना लो हमें
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 79
वज़्न-2122 2122 2122
मैं किसी की याद में तन्हा नहीं हूँ
ग़म के आँसू मैं कभी पीता नहीं हूँ
क्यूँ खिलौनों से मुझे बहला रहे हो
दूध पीता मैं कोई बच्चा नहीं हूँ
शेर हूँ मैं आज़मा के देख लो तुम
भौंकने वाला कोई कुत्ता नहीं हूँ
गीदड़ों की भभकियों से क्या डरूँगा
दुश्मनों के सामने झुकता नहीं हूँ
रोक पाता मैं नहीं सच बोलने को
सच ही सच कहता हूँ मैं झूठा नहीं हूँ
माँ मुझे कहती हमेशा लाड़ला है
लोग कहते हैं कि मैं अच्छा नहीं हूँ
आदमी हूँ आदमी की जात हूँ मैं
'मौज' ऊँचा और मैं नीचा नहीं हूँ
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 80
वज़्न-2122 2122 2122
आदमी से आज नफ़रत हो गई है
जानवर से अब मुहब्बत हो गई है
मुल्क़ में कैसी सियासत हो गई है
चार-सू देखो मुसीबत हो गई है
झूठ बोला तो यकीं करने लगे हैं
बोलने से सच बग़ावत हो गई है
ग़म भुलाने के लिए पीने लगे सब
आदमी की रम ज़रूरत हो गई है
रात में यूँ नींद भी आती नहीं अब
हर घड़ी तेरी जो आदत हो गई है
मुफ़लिसों का हाल यूँ बेहाल यारो
मुल्क़ पे किसकी हुकूमत हो गई है
क़द्र रिश्तों की नहीं है 'मौज' देखो
हाँ बड़ी रिश्तों से दौलत हो गई है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 81
2122 1212 22 /112
इश्क़ तुमसे किया नहीं होता
दिल मेरा बावरा नहीं होता
हाँ अगर मयकदा नहीं होता
ज़िंदगी में मज़ा नहीं होता
वो अगर दोगला नहीं होता
तो नज़र से गिरा नहीं होता
जिसमें दिखता नहीं तेरा चेहरा
वो कोई आइना नहीं होता
मुस्कुरा के न देखते मुझको
आपसे दिल लगा नहीं होता
आदमी जो भलाई करता है
साथ उसके बुरा नहीं होता
मतलबी लोग हैं ज़माने में
हर कोई तो भला नहीं होता
मुस्कुराने से 'मौज' दुनिया में
ग़म कभी दोगुना नहीं होता
मौज कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 82
वज़्न-2122 1212 22
है तेरा इंतज़ार सावन में
आज बरसा दे प्यार सावन में
बूँद की है फुहार सावन में
भीग लो बार बार सावन में
दिल तो लगता नहीं यहाँ मेरा
ले चलो ख़ुश दयार सावन में
दिल के आँगन में नाचती कोई
दिल की बजती गिटार सावन में
एक पौधा सभी लगा लेना
जो रहे यादगार सावन में
यूँ फ़ज़ा में शराब की ख़सलत
छा गई है बहार सावन में
दरमियाँ फासले बढ़ाना मत
जोड़ लो दिल के तार सावन में
मौज समझो न हाल मेरा तुम
है वफ़ा का ख़ुमार सावन में
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 83
वज़्न-122 122 122 122
शजर का जो ख़ुद भी ठिकाना नहीं है
परिंदों का अब आशियाना नहीं है
दुआ है ख़ुदा से ग़रीबी मिटा दे
ग़रीबों की थाली में खाना नहीं है
यूँ ही जगमगाते रहें ज़िंदगी भर
मुहब्बत के दीपक बुझाना नहीं है
वो तीर-ए-नज़र जो करे मुझको घायल
अभी तक तो ऐसा निशाना नहीं है
जिगर को रखा हमने फौलाद जैसा
मिटा दे हमें वो ज़माना नहीं है
ज़माने की दौलत का मैं क्या करूँगा
मेरी माँ के जैसा ख़ज़ाना नहीं है
न गरजे न बरसे है पागल ये बादल
अभी 'मौज' मौसम सुहाना नहीं है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 84
वज़्न-2122 2122 212
अश्क़ आँखों में छुपाना चाहिए
बेसबब यूँ मुस्कुराना चाहिए
बस मुहब्बत हो हमारे बीच में
हिन्दू-मुस्लिम भूल जाना चाहिए
भीख से अच्छी कहूँ मैं भूख है
भीख का कोई न दाना चाहिए
जो वतन के वास्ते कुरबान हों
ऐसे लोगों को जगाना चाहिए
नफ़रती बातों से है क्या फ़ायदा
ज्ञान की गंगा बहाना चाहिए
लड़कियों की शर्म ही सिंगार है
हुस्न की दौलत छुपाना चाहिए
मैं सिकंदर हूँ फ़कीरी मत समझ
'मौज' को फिर आज़माना चाहिए
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल85
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
हम तो ऐसे हैं समंदर को सुखा देते हैं
वक्त आने पे पहाड़ों को हिला देते हैं
जाने क्यों लोग बहुत दिल को दुखा देते हैं
फिर भी हम मुस्कुरा के ग़म को भुला देतें हैं
एक हैं सेफ हैं यह बात बताने वाले
और नफ़रत की यहाँ आग़ लगा देते हैं
झूठ का चाहे तू जितना भी सहारा ले ले
हम तो सच के लिए दुनिया को झुका देते हैं
इस सियायत की सदा देखी है दहशतगर्दी
झुग्गियों को ये गरीबों की जला देते हैं
हम तो ये जान मुहब्बत में फ़ना कर बैठे
जाने क्यों लोग मुहब्बत में दग़ा देते हैं
मैं बुजुर्गों का सदा मान किया करता हूँ
'मौज'ऐसे ही नहीं लोग दुआ देते हैं
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 86 देशभक्ति
वज़्न-212 212 212 212
ये ज़मीं आसमां ये चमन है मेरा
जान से भी ये प्यारा वतन है मेरा
जिनके दम से हटी है गुलामी यहाँ
उन शहीदों को दिल से नमन है मेरा
जान कुरबान है बस वतन के लिए
यह तिरंगा अभी से क़फ़न है मेरा
दुश्मनों को मिटाता सिपाही हूँ मैं
देख फ़ौलाद जैसा बदन है मेरा
आँच आने न दूँगा कभी मुल्क़ में
बस तरक्की करे यह वचन है मेरा
देख कर हिन्दू-मुस्लिम में नफ़रत यहाँ
दिल दुखी है बहुत मन रुदन है मेरा
चैन से ही रहें 'मौज' हर आदमी
सिलसिलेवार अब तो मनन है मेरा
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 87
वज़्न-2122 2122 212
है मुहब्बत ही मुहब्बत आपसे
क्या करूँगा मैं शिक़ायत आपसे?
हो नहीं सकती सियासत आपसे
छीन लेंगे हम हुक़ूमत आपसे
हो नहीं सकती शराफ़त आपसे
किसने माँगी है नसीहत आपसे
चाँद भी शरमा गया है देख कर
कौन है जो ख़ूबसूरत आपसे
आइये छत पर अकेले में कभी
दिल को है मिलने की चाहत आपसे
आपसे से मुझको मिला है हौसला
मेरे बाजू में है ताकत आपसे
ख़ुद जलेंगे ख़ुद मरेंगे देखिए
'मौज' करते हैं जो नफ़रत आपसे
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
🙏🏻🇳🇪
ग़ज़ल 88
वज़्न - 22 22 22 22 22 2
मुश्किल से पाई हमने आज़ादी है
हँसती गाती अब देखो आबादी है
कोई दुश्मन हमसे क्या टक्कर लेगा
हर-बच्चे की छाती जब फ़ौलादी है
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हैं भाई
दिल में हिन्दुस्तानी यार जगा दी है
सौंधी-सौधी ख़ुशबू मेरी मिट्टी की
महक़.फ़जा ने ये अच्छी फैला दी है
यार जवानों आओ अब पहचान करो
कौन यहाँ पर देखो अवसरवादी है
गाँधी जी के सपने चरखे टूट गए
कपड़ा किसका देखो भैया खादी है
रोज तिरंगे झंडे का यश गान करे
मौज अभी तक देखो तो फरियादी है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 89
वज़्न-122 122 122 122
कभी तीरग़ी है कभी रौशनी है
यही ज़िंदगी है यही ज़िंदगी है
हमारी अभी तक तबीयत हरी है
तुम्हारी मुहब्बत की जादूगरी है
सभी के दिलों में जगह है बनाती
मेरी शायरी है मेरी शायरी है
दुआ ही बहुत है मेरे पास माँ की
मुझे क्या कमी है मुझे क्या कमी है
चलौ मौज अब दुश्मनी को मिटा दें
जलाएँ दिया एक दीपावली है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 90
वज़्न-1222 1222 122
ये कैसा रोग देखो मुफ़लिसी है
नहीं इसकी कोई चारागरी है
ये महँगाई कभी जीने न देगी
मुसीबत में सभी की ज़िंदगी है
सदा सच को कुचलते आ रहे हैं
फ़रेबी लोगों की दादागिरी है
करो माँ-बाप की सेवा हमेशा
बड़ी इससे न कोई बंदगी है
कहाँ से देश की अब हो तरक्की
युवाओं को नशे की लत लगी है
सियासत में कभी ग़फ़लत न करना
तुम्हारे सामने जनता खड़ी है
जो तुम देखे थे जानम मुस्कुरा के
मेरे दिल में अभी तक खलबली है
कभी दिल में उतर कर देख पहले
पता कर 'मौज' कैसा आदमी है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 91
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
आपको इश्क़ में हमदम न जुदाई दूँगा
आपकी आँखों में हरदम मैं दिखाई दूँगा
सुनके आवाज़ मेरे पास चले आना तू
जब तेरी याद सताए तो दुहाई दूँगा
चोट खाई है अगर इश्क़ में तो आ जाओ
दर्दे दिल की मैं तुम्हें आज दवाई दूँगा
हाँ मुलाक़ात कभी आप से जब होगी तो
भरके बाहों में रखूँगा न रिहाई दूँगा
मेरी आवाज़ तो गूँजेगी ज़रा सुन लेना
'मौज' धड़कन में तेरी रोज़ सुनाई दूँगा
ग़ज़ल 92
वज़्न-22 22 22 22
काश यहाँ मैं नेता होता
दिन सबका ही अच्छा होता
सबसे अच्छा रिश्ता होता
घर-घर आना जाना होता
बदनामी से बच जाता तू
सत्य हमेशा बोला होता
हम दोनों की होती शादी
तू रानी मैं राजा होता
मुफ़लिस की खाली थाली में
हे मौला अब खाना होता
मुल्क़ तरक्की करता जाता
वह जुमला ग़र सच्चा होता
मुश्किल होता जीना यारो
मौज नहीं जब पैसा होता
ग़ज़ल 93
यूं नफ़रतों को दिलों से मिटा दिया मैंने।
कि पत्थरों में मुहब्बत जगा दिया मैंने।
वो जी रहा था शराफत की ओढ़कर चादर।
शराब पी के बहकना सिखा दिया मैंने।
हवाले कर दिया खुद को तुम्हारी यादों के।
बड़े सलीक़े से ग़म को भुला दिया मैंने।
जो सारी रात जगाता था याद आता था।
उसे तो थपकियां देकर सुला दिया मैंने।
चेराग़ ए इश्क़ जो जलता था दिल के गोशे में
यकीन मानो वो कब का बुझा दिया मैंने।
जहां में मौज को सब बेवफ़ा समझते थे
वफ़ा की राह में चलकर दिखा दिया मैंने
ग़ज़ल 94
वज़्न-2122 2122 212
आपसे नज़रें मिलाना हो गया
प्यार का मौसम सुहाना हो गया
जब से तेरा मुस्कुराना हो गया
दिल मेरा पागल दीवाना हो गया
जब से देखा आपको जानेवफ़ा
सच कहूँ दिल शायराना हो गया
मुफ़लिसी में पेट भरने के लिए
रात-दिन अपना कमाना हो गया
क्या करें महँगी यहाँ हर चीज़ है
आँख से आँसू बहाना हो गया
चंद लम्हों के लिए मिल #मौज तू
हाँ मिले तुमसे ज़माना हो गया
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 95
वज़्न-2122-1212-22
सबसे मीठी ज़ुबान हो अपनी
हाँ इसी में ही शान हो अपनी
झूठ ही झूठ है ज़माने में
एक सच की दुकान हो अपनी
यूँ तरक्की करे वतन अपना
सारी दुनिया में शान हो अपनी
ये ज़मीं आसमान है अपना
क्यों न ऊँची उड़ान हो अपनी
बाद मरने के लोग याद करें
'मौज' कुछ दास्तान हो अपनी
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 96
वज़्न-2122 2122 2122 212
आ -स्वर
कौन कहता है हमें दौलत में हिस्सा चाहिए
हम ग़रीबों के लिए बस आबो-दाना चाहिए
दूर कर दूँगा हमेशा के लिए मैं मुफ़लिसी
माँ मुझे नेता है बनना एक कुर्ता चाहिए
नफ़रतें दिल से मिटाकर है मुहब्बत बाँटना
हाँ मुहब्बत का मुझे अब कारखाना चाहिए
जब भी देखूँ आपको मदहोश कर देना सनम
आपका चेहरा हमेशा मुस्कुराता चाहिए
बेसहारों का सहारा हैं नहीं कोई यहाँ
ऐ ख़ुदा बस आपका हमको सहारा चाहिए
चार-सू है तीरगी रस्ता न कोई मंजिलें
ज़िंदगी में ऐ ख़ुदा हमको उजाला चाहिए
ख़वाब में आकर जगाती है हक़ीक़त में नही
'मौज' बतलाओ मुहब्बत में सताना चाहिए?
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
छोटी बहर की
ग़ज़ल97
वज़्न-122 122 122
लबों पे हँसी तुम भी लाओ
चलो बेसबब मुस्कुराओ
सनम प्यास दिल की बुझाओ
गले से मुझे तुम लगाओ
सियासत जुआ है समझना
नहीं इसमें पैसे बहाओ
मिलेगी सदा इनकी आहें
ग़रीबों को तुम मत सताओ
फ़ज़ा में न घोलो ये नफ़रत
मुहब्बत की दौलत लुटाओ
मुसीबत में कोई पुकारे
मदद के लिए आप जाओ
हमारे हैं ये अन्न दाता
किसानों को तुम मत सताओ
दुआएँ मिलेगी हमेशा
ग़रीबों को खाना खिलाओ
ज़मीं आसमां है हमारा
परिन्दों सदा चहचहाओ
सदाक़त सदा *मौज* लिखना
चलो अब कलम तो उठाओ
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 98
वज़्न-2122 1212 22 /112
मुश्किलों में जो मुस्कुराया है
जुगनुओं सा वो जगमगाया है
खूँ-पसीना नहीं बहाया है
माल फोकट का तू दबाया है
जो मुहब्बत में पड़ गया यारो
उसने चैनों-सुकूँ गँवाया है
झोपड़ी था महल के जैसा ही
इक दिया ने उसे जलाया है
यार सच्चा वही है कहलाता
मुश्किलों में जो काम आया है
एक रोटी नहीं है थाली में
ख़्वाहिशों ने बहुत रुलाया है
याद रखना सनम भुलाना मत
नाम दिल पे तेरा लिखाया है
क्यूँ सदाक़त की बात को सुनकर
मज़हबी'मौज'तिलमिलाया है
ग़ज़ल 99
वज़्न-22 22 22 22 22 2
ज़ाहिरदारी में जो अंधा होता है
जीते जी देखो वो मुर्दा होता है
कौन ज़माने में अब सच्चा होता है
जिसको सच्चा समझो झूठा होता है
टूट गया है आज भरोसा अपनों से
अक्सर ही अपनों से धोखा होता है
जो नेकी के रस्ते में चलता हरदम
सबके दिल में वो ही ज़िन्दा होता है
भागम भाग मची है इसको पाने को
इस दुनियां में सब कुछ पैसा होता है
मुश्किल से मिल पाता है दाना-पानी
महँगाई में गीला आटा होता है
'मौज' कहाँ तुम मानवता को देखोगे
आँखों पर जो काला चश्मा होता है
डी.पी.लहरे'मौज'
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल 100
वज़्न-212 212 212 212
पूजता था जिसे देवता ही नहीं
पत्थरों से मुझे कुछ मिला ही नहीं
घूसखोरी में जिंदा हरिक महक़मा
जेब उनका अभी तक भरा ही नहीं
चार-सू नफ़रतों का बवंडर यहाँ
हाँ मुहब्बत का अब सिलसिला ही नहीं
ज़िंदगी का ठिकाना नहीं दोस्तों
मौत कब आएगी जानता ही नहीं
मैने सारे नशे आज़माए मगर
आपके इश्क़ जैसा नशा ही नहीं
आपसी रंजिशें छोड़ दो आज से
इससे कोई कभी फ़ायदा ही नहीं
चाँद जैसे सनम ख़ूबसूरत हो तुम
इस ज़मीं में कोई दूसरा ही नहीं
'मौज' सच के लिए तू बढ़ा तो क़दम
क्या जिगर में तेरे हौसला ही नहीं
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