छंद गीत बहार
छन्द गीत बहार विश्व का पहला छत्तीसगढ़ी छन्दबद्ध गीत की किताब
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
प्रकाशक
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समर्पण
मँय द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
अपन छत्तीसगढ़ी छन्द बहार गीत संग्रह
ला मोला जनम देवइया मोर बाबू श्री त्रिलोकी लहरे दाई उर्मिला देवी लहरे अउ मोर गुरूदेव मन के चरण कमल मा
सादर अरपन करत हँव।
----फोटो..
मातु-पिता के पाँव मा,सदा नवावँव माथ।
रहय मूँड़ मा मोर जी,मातु-पिता के हाथ।।
गुरू समर्पण
फोटो..
मन अँधियारी टार के,करय सदा उजियार।
गुरुवर चरणन मा करँव,वंदन बारंबार।।
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भूमिका
"छत्तीसगढ़ी के पहिली छन्द-गीत संग्रह" : "छन्द-गीत बहार"
छत्तीसगढ़ के कवि, गीतकार अउ छन्दकार द्वारिकाप्रसाद लहरे जी के पाण्डुलिपि "छन्द गीत बहार" पढ़के सोचत हँव कि "गीत" शब्द अपन संग अनेक विशेषण रखथे जइसे लोक-गीत, बाल-गीत, नव-गीत, अ-गीत, अति-गीत, प्र-गीत, मुक्त-गीत, छन्द-गीत आदि, तभो पद्य मा "छन्द-शास्त्र" असन "गीत-शास्त्र" के कहूँ उल्लेख नइ मिलय। विद्वान मन कविता अउ गीत के बड़े-बड़े परिभाषा लिखिन फेर मोर समझ मा जेला बोले या पढ़े जाथे वो हर कविता आय अउ जेला गाये जाथे तउन हर गीत आय। मोर मन कहिथे कि दुनिया के पहिली गीतकार कोनो महतारी रहे होही जउन अपन बोली-भाषा मा अपन लइका बर लोरी गाये होही। आदि-अनंत काल ले महतारी मन अपन लइका बर लोरी गावत हें। महतारी के लोरी मा शब्द-चयन अउ व्याकरण खोजे ले कुछु नइ मिलना हे फेर वो लोरी (लघु-गीत) अपन असर दिखाथे, वोला सुनके वोकर लइका भुलर जाथे। गीत के उद्देश्य पूरा हो जाथे। लोक-गीत मन घलो शब्द-चयन, व्याकरण अउ विधान ले मुक्त होके लोक-जीवन मा आनंद-रस घोलत हें तभे तो वाचिक परम्परा मा एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी होवत आज घलो जीयत हवँय। लोरी अउ लोक-गीत मन ये साबित करथें कि गीत बर विद्वता के जरूरत नइ पड़े। गेयता के गुण धरे जउन सहज भाव हिरदे ले निकलगे, उही हर गीत होथे।
गीत के रचना करत मा जब कोनो छन्द आ जाथे वो संजोग के बात होथे फेर छन्द ला आधार बनाके गीत के रचना करना एक कठिन काम होथे। छन्द मा पद होथें अउ गीत के ढाँचा मा स्थायी अउ अंतरा के होना जरूरी होथे। छन्द-ज्ञान अउ काव्य-कौशल बिना छन्द ला गीत के ढाँचा मा ढालना संभव नइ हो सके। छन्द आधारित गीत मन मा स्वाभाविक रूप ले लय अउ गेयता आ जाथे। "छन्द के छ" परिवार के अनेक छन्दकार मन छन्द आधारित गीत के रचना करत हवँय फेर छन्द आधारित गीत के पहिली किताब प्रकाशित करे के श्रेय छन्द-साधक द्वारिकाप्रसाद लहरे जी ला जाथे। "छन्द गीत बहार" छत्तीसगढ़ी भाषा मा छन्द-गीत के पहिली किताब के श्रेय प्राप्त करत हे। मोर जानकारी मा हिन्दी मा तको छन्द-गीत के संग्रह अभी तक देखे सुने मा नइ आये हे।
"छन्द गीत बहार" मा दोहा छन्द गीत, सार छन्द गीत, सरसी छन्द गीत, आल्हा छन्द गीत, चौपाई छन्द गीत, गीतिका छन्द गीत, हरिगीतिका छन्द गीत, बरवै छन्द गीत, विष्णुपद छन्द गीत, रूपमाला छन्द गीत, ताटंक छन्द गीत, कुकुभ छन्द गीत, लावणी छन्द गीत, रास छन्द गीत, प्रदीप छन्द गीत अउ मानव छन्द गीत पढ़े बर मिलही। ये छन्द गीत संग्रह मा गुरु महिमा, मिनीमाता महिमा, भक्ति-भाव, प्रकृति चित्रण, ग्राम्य-चित्रण, मौसम, ऋतु वर्णन, नारी-शिक्षा, महतारी, बेटा, बेटी, बेटी के बिदाई, राष्ट्रीय भावना, सहकारिता के भावना, सामाजिक समरसता जइसन विविध विषय मा छन्द-गीत के संकलन हे। द्वारिकाप्रसाद लहरे जी के मूल स्वर श्रृंगार आय तेपाय के ये संग्रह मा श्रृंगार रस के गीत के बहुलता हवय। "छन्द गीत बहार" संग्रह छत्तीसगढ़ी पद्य साहित्य ला समृद्ध करही। नवा कवि अउ गीतकार मन ला छन्दबद्ध रचना करे बर प्रेरणा दिही अउ छत्तीसगढ़ के गायक-गायिका, संगीतकार अउ फ़िल्म निर्माता मन बर तको ये संग्रह बहुत उपयोगी साबित होही।
मोला विश्वास हे कि ये किताब "छन्द गीत बहार", छत्तीसगढ़ी भाषा के रसिक सुजान पाठक मन ला गीत विधा के एक नवा रूप ले परिचित कराही। छत्तीसगढ़ी भाषा मा छन्द-गीत के पहिली किताब के प्रकाशन बर मँय अपन अउ "छन्द के छ" परिवार डहर ले सुकवि द्वारिकाप्रसाद लहरे जी ला अन्तस ले बधाई देवत हँव।
अरुण कुमार निगम
संस्थापक : "छन्द के छ", छत्तीसगढ़
संपर्क : 9907174334
मेल arun.nigam56@gmail.com
पता - आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
दिनांक...........................
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भूमिका
मया पिरित के धार छंद गीत बहार
मनखे के हिरदे भाव ले भरे रहथे।
सुख-दुख,मया-पीरा,जय-पराजय,हँसी-
दिल्लगी,रिस-पिरित सबो भाव ला मनखे अपन जिनगी में अनुभव करथे।जेन ह भाव उदगार डरथे,चाहे मुँह अखरा होय के लिख के,उही हा साहित्यकार या कवि कहलाथे।काव्य प्रतिभा सबो म नइ होय। अइसन होतिस त सबे झन कवि हो जतिन।
गीत,कविता या साहित्य लिखना सब के बस के बात नोहय। कविता लेखन के रुचि कतको झन पुरखौती मिलथें,ये मन बड़ भागी आँय,जेन ल साहित्य विरासत म मिलथे।पर कतको अइसन होथें,जिंखर पाछू कई पीढ़ी तक साहित्य ले कोनों संबंध नइ राहय।
अइसन मन के प्रेरणा प्रकृति, परिवेश अउ समाज होथे।
अपन तीर-तकार के घटित घटना ह जब मन ल कुलबुलाथे,सहानुभूति संवेदना जगाथे तब साहित्य के सिरजन होथे।
कखरो मया-पीरा ल देख के जब मन अकुलाथे ,तब साहित्य के सिरजन होथे।साहित्य के सिरजन म समाज के हित समाहित होथे।
जेमा सबके हित हे उही साहित्य ये।
हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य गजब पोठ हे।
जब ले हमर छत्तीसगढ़ राज्य बने हे तब ले साहित्य लेखन म बढ़ोतरी देखऊल दे थे।
इही संदर्भ मा एक कवि डी.पी.लहरे"मौज" ह चिरपरिचित छंद के संगे संग अउ कतकोन छन्द के सुघ्घर प्रयोग करे हे।
जइसे-दोहा छंद गीत,सार छंद गीत,आल्हा छंद गीत,उल्लाला छंद गीत,ताटंक छंद गीत,सरसी छंद गीत,बरवै छंद गीत,कुकुभ छंद गीत,लावणी छंद गीत,हरिगीतिका छंद गीत,गीतिका छंद गीत,रूपमाला छंद गीत,विष्णुपद छंद गीत,प्रदीप छंद गीत,आदि।
इही ल संग भल त रंग भल कहिथें।अतेक छंद के बारिकी से जानकारी बहुत बड़े उपलब्धि आय। ये ह संगत के प्रभाव आय।
श्री छंद ज्ञाता अरुण निगम के कुशल मार्गदर्शन के प्रभाव आय।उन ल बधाई।
मोला लगथे छत्तीसगढ़ी म छंद गीत किताब हमर राज म आज तक पढ़े बर नइ मिले हे
ए ह छंद गीत की पहिली किताब आय।
विशेष छंद मा- गीत लिखना सहज बात नोहय छंद शास्त्र के साहित्य म अलगे महत्तम हे।
कवि श्री डी.पी.लहरे"मौज" के काव्य प्रतिभा अउ निखरही अइसे विश्वास अउ आशा हे।
अउ *छंद गीत बहार*
ले घलो सुघ्घर काव्य पढ़े बर मिलही।
मया पिरित के धार सरलग बोहात रहे।
डा० पीसी लाल यादव
गंडई पंडरिया
छत्तीसगढ़
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अपन गोठ
मोर नाँव हे द्वारिका, मुड़ियापारा गाँव।
थाना परथे बोड़ला,जिला कवर्धा ठाँव।।
गाँव बोड़ला मा 14/06/1980 मा मोर जनम होइस।12वी कक्षा तक के पढ़ाई बोड़ला विद्यालय मा करेंव।बचपन ले ही स्कूल के सांस्कृतिक गतिविधि मा भाग लेवँव।
बचपन लेडियो,टेपरिकार्डर,सुन सुन मन हा आनंदित होवय,गीत संगीत चालू कर के पढ़ाई लिखाई करँव।
आदरणीय लक्ष्मण मस्तुरिया जी के गीत ले बहुत जादा प्रभावित होवँव।
इँखर गीत ल सुनते सुनत मोरो मन मा कल्पना आवय की अइसने गीत महूँ लिखतेंव कहिके गुनँव।
दाई बाबू मन के आशीर्वाद मया दुलार ले गरीबी
नइ रहिसे। 12वी प्रथम श्रेणी मा अपन विद्यालय मा पहला स्थान आयेंव। मोला बढ़ाय-लिखाय बर मोर दाई-बाबू मन
सन्-2000 मा कवर्धा महाविद्यालय भेजदिन।
महाविद्यालय म घलो सांस्कृतिक गतिविधि मा भाग लेवँव।
महाविद्यालय से ही डायरी लेखन शुरू कर दे रहेंव जेमा,गीत,कविता लिखँव अपन कल्पना ला उतारँव।
सन्-2005 मा स्नातकोत्तर (एम.ए) हिन्दी विषय मा पढ़ाई पूरा कर डरेंव।
स्नातकोत्तर पढ़ाई के बाद सन्2006 मा बोड़ला के सरस्वती शिशु मंदिर मा अध्यापन के कार्य करेंव।सन्2007 मा बी.एड के पढ़ाई करे बर राइपुर शहर आगेंव।इहाँ भी बी.एड. कालेज मा सांस्कृतिक गतिविधि मा बढ चढ के भाग लेंव। डायरी लेखन बंद नइ करे रहेंव।
17-07-2008 मा मोर नौकरी शिक्षाकर्मी वर्ग-1 शा.उ.मा.वि.इंदौरी म लगिस।
तब सांस्कृतिक गतिविधि के जादा अवसर मिले लगिस।
वाटसाप फेसबुक के जमाना आगे,अपन लिखे रचना ल फेसबुक मा डालत जाँव।अचानक एक दिन बिलासपुर ले श्री गजानंद पात्रे सत्यबोध जी के फोन आइस के छन्द के छ परिवार मा जुड़हू का इहाँ विधान सम्मत अनेको प्रकार के छन्द सीखोय जाथे कहिके।
मोला आदरणीय गजानंद पात्रे सत्यबोध गुरूदेव जी हर छन्द के छ परिवार मा जोड़वाइन।इहें ले मोर साहित्यिक जीवन के सुखद सुनहरा समय चालू होगे।
गुरूदेव अरुण कुमार निगम,गुरूदेव गजानंद सत्योबध,गुरूदेव जितेंद्र वर्मा खैरझिटिया,गुरूदेव कन्हैया साहू अमित,
गुरूदेव मित्र सुखदेव सिंह अहिलेश्वर, गुरूदीदी आशा देशमुख,गुरूदेव ज्ञानु मानिकपुरी, गुरूदेव बोधनराम निषाद जम्मो गुरूदेव मन के
विशेष योगदान हे।गुरू कृपा आशीर्वाद मार्गदर्शन ले ही गीत लेखन संभव हो पाय हे।
एखर बर गुरूदेव मन के आभारी हँव।
छन्द गीत बहार के भूमिका लिखइया
आदरणीय गुरूदेव श्री अरुण कुमार निगम
गुरूदेव श्री डाक्टर पी.सी.लाल यादव जी के
बहुत-बहुत आभारी हँव।
ए मोर छन्द गीत बहार हा राजभाषा आयोग ले प्रकाशित होय हावय।
राजभाषा आयोग के अध्यक्ष,सचिव,जम्मो सदस्य मन के हिरदे ले आभार व्यक्त करत हँव।
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
व्याख्याता शा.उ.मा.वि.इंदौरी
जिला-कबीरधाम छत्तीसगढ़
पिन.कोड-491995
गुरू दोहा छन्द गीत(१)
गुरू सहीं जी कोन हे,ये जग मा भगवान।
मन अँधियारी टारके,देथे सब ला ज्ञान।।
गुरू नाँव ले भागथे,मन के सबो विकार।
शिक्षा-दीक्षा ले बने,देथे नवा विचार।।
महिमा अगम अपार हे,गुरू ज्ञान के खान।
गुरू सहीं जी कोन हे,ये जग मा भगवान।।
गुरू सिखाये सीख ले,होथे बेड़ा पार।
बिना गुरू के जान लव,चलय नहीं संसार।।
गुरू बचन अनमोल हे,राखव गा सम्मान।
गुरू सहीं जी कोन हे,ये जग मा भगवान।।
सरसी छन्द गीत(२)
गुरू चरण के वंदन कर लव,ए ही तीरथ धाम।
हाथ जोर के कर लव संगी,पूजा आठो याम।।
गुरू ज्ञान हा तारय जग ले,करय सदा कल्यान।
ज्ञान सीख हे पावन गंगा,कर लव जी असनान।।
जपत रहौ जी ध्यान लगाके,सदा गुरू के नाम।
गुरू चरण के वंदन कर लव,ए ही चारो धाम।।
अपन पूत के जइसे सब ला,गुरू धरावय ज्ञान।
गुरू शरन मा जे हर जावय,बन जावय गुणवान।
परगट देवा पूजौ संगी,पखरा के का काम।
गुरू चरण के वंदन कर लव,ए ही तीरथ धाम।।
गुरू करावय जानौ भैया,असल-नकल पहिचान।
बाधा-बिपदा छिन मा टारय,मेटय मन अभिमान।।
गुरू कृपा बरसावय निशदिन,टारय दुख के घाम।
गुरू चरण के वंदन कर लव,ए ही तीरथ धाम।।
सार छन्द गीत(३)
पाँव परत हँव दाई मँय हा,निसदिन गुन ला गावँव।
सात जनम बर बेटा बनके,तोर कोख ले आवँव ।।
दया मया ममता सागर हे,महतारी के कोरा।
कृपा मोर बर करके दाई,करथस जोंखा तोरा।।
महिमा अब्बड़ भारी हावय,काया फूल चढ़ावँव।
पाँव परत हँव दाई मँय हा,निसदिन गुन ला गावँव।।
सरग बरोबर तोर हाँथ हे,मोला ओ सिरजाये।
अँगरी धरके तँय हा दाई,ठुमुक ठुमक रेंगाये।।
मोर विधाता तँय हा दाई,सुख छँइहाँ ला पावँव।
पाँव परत हँव दाई मँय हा,निसदिन गुन ला गावँव।।
तहीं मोर ओ चाँदी सोना,धन दौलत अउ हीरा।
मोरे कारन तोला दाई,सहे परय झन पीरा।।
बेटा फर्ज निभाके दाई,सेवा तोर बजावँव।
पाँव परत हँव दाई मँय हा,निसदिन गुन ला गावँव।।
आल्हा छन्द गीत(४)
भारत माँ के बेटा हावँव,वंदत हँव दूनो कर जोर।
माथ नवावँव ए माटी मा,चंदन हे भुँइयाँ हा मोर।।
वीर सिपाही मँय बलिदानी,खड़े हवँव मँय छाती तान।
बइरी मन ला मार भगाहूँ,ले लेहूँ बइरी के जान।।
भारत माँ ला सरग बनाहूँ,दया मया के बोहय धार।
भाई चारा इहाँ लाय बर,सबके करहूँ मँय उपकार।।
ए भुँइयाँ ला पबरित करके,लाहूँ घर-घर सुख के भोर।
भारत माँ के बेटा हावँव,वंदत हँव दूनो कर जोर।।
मान बढ़ाहूँ भारत माँ के,ये भुइयाँ के मँय रखवार।।
आँखी कोनों देखाही ता,धरे हवँव कतको हथियार।।
बइरी बर लाठी बन जाहूँ,हितवा मन बर बनँव मितान।
दुख पीरा मा संग निभावँव,भारत माँ के गावँव गान।।
सच्चा बेटा मँय हा बनके,भारत माँ के करहूँ शोर।
भारत माँ के बेटा हावँव,वंदत हँव दूनो कर जोर।।
सार छंद गीत(५)
हमर देश के शान तिरंगा,झंड़ा ला फहराबो।
चलव चलव जुरमिल के संगी,एखर मान बढ़ाबो।
हमर देश के संविधान हा,हावय सबले पावन।
किसम किसम अधिकार इहाँ हे,तेला सब अपनावन।।
रहय एकता हमर बीच मा,भाई चारा लाबो।
हमर देश के शान तिरंगा,झंडा ला फहराबो।।
जान गँवाइन भारत माँ बर,कतको वीरसिपाही।
आजादी तब पाये हावन,हे संसार गवाही।।
अमर वीर बलिदानी मनके,गाथा ला हम गाबो।
हमर देश के शान तिरंगा,झंडा ला फहराबो।।
उल्लाला छंद गीत गाँव रे-(६)
सबले सुग्घर गाँव रे,बर पीपर के छाँव रे।
हरियर-हरियर पेड़ हे,धनहा डोली मेड़ हे।।
घर-घर सबो किसान हे,कोठी ढ़ोली धान हे।
महिनत करथें तान के,रोटी खाँय ईमान के।।2
फुरहुर पुरवाही बहे,तरिया नदिया ठाँव रे...
सबले सुग्घर गाँव रे,बर पीपर के छाँव रे...ll1
सुमता ले सब साथ मा,अन उपजाथें हाथ मा।
मँदरस जइसे गोठ जी,बोली भाखा पोठ जी।।2
सरग बरोबर गाँव ला,कहाँ छोड़ मँय जाँव रे...
सबले सुग्घर गाँव रे,बर पीपर के छाँव रे..ll2
सुन लौ मोर मितान जी,कतका करौं बखान जी।
मन मा धर लौ ध्यान गा,सुख के गाँव खदान गा।
वंदन हावय गाँव ला,जनम-जनम बर पाँव रे...
सबले सुग्घर गाँव रे,बर पीपर के छाँव रे....ll3
दोहा छन्द गीत-(७)
सबले सुग्घर देश हे,भारत जेखर नाँव।
मंदिर मस्जिद चर्च हे,गुरुद्वारा के छाँव।।
सब मनखे मा एकता,इही आय पहिचान।
सुमता समता ले बने,भारत देश महान।।
लोहा,ताम्बा,कोइला,सबके इहाँ खदान।
अन उपजाथें खेत मा,सोना सहीं किसान।।
हरियर खेती खार ले,ममहावय जी गाँव।
सबले सुग्घर देश हे,भारत जेखर नाँव।।
भले अलग हर राज हे,सबो हवँय जी एक।
अलग-अलग भाषा इहाँ,बोली घलो अनेक।।
नदिया सागर बाँध मा,आगर छलकय धार।
बिजली पानी ले इहाँ,खेती होथे सार।।
सरग बरोबर लागथे,येही सुख के ठाँव।
सबले सुग्घर देश हे,भारत जेखर नाँव।।
सार छन्द गीत(८)
भाव भजन कर ले रे संगी,के दिन के जिनगानी।
लहुटे हंसा आय नहीं जी,लहुटे कहाँ जवानी।।
ये तन कच्चा माटी संगी,जादा झन इतराना।
दया मया ले जी ले जिनगी,सब ला हावय जाना।
के दिन बर पाये तँय चोला,झन कर जी अभिमानी।
भाव भजन कर ले रे संगी,के दिन के जिनगानी।
पर सेवा उपकार सबो कर,काम तोर ये आही।
भटकत काया ला रे संगी,येही पार लगाही।।3
काल हवय ए सार जगत मा,जिनगी होही पानी।
भाव भजन कर ले रे संगी,के दिन के जिनगानी।
लगा मया के बिरवा संगी,सुख के छँइहाँ पाबे।
दया-मया अंतस मा भरले,नइ तो बड़ पछताबे।
झन दे कोनो ला तँय पीरा,दे ले मया निशानी।
भाव भजन कर ले रे संगी,के दिन के जिनगानी।।
सार छंद गीत(९)
सोंचे हाँवव पढ़ा लिखा के,अफसर बड़े बनाहूँ।
मोर दुलौरिन बेटी तोला,कइसे बिदा कराहूँ।।
तोर रहे मा होवत हावय,घर अँगना उजियारी।
दसो दिशा ममहाये जइसे,तहीं मोर फुलवारी।।
मँय तो हावँव किस्मत वाले,बेटी फर्ज निभाहूँ।
मोर दुलौरिन बेटी तोला,कइसे बिदा कराहूँ।।
दाई-बाबू के मान बढ़ाबे,बनके राजदुलारी।
सुख-दुख मा तँय संग निभाबे,रखबे मया चिन्हारी।।
तोर खुशी पाये बर बेटी,सब कुछ मँय कर जाहूँ।
मोर दुलौरिन बेटी तोला,कइसे बिदा कराहूँ।।
मोर मयारू हीरा बेटी,पढ़-लिख नाँव कमाबे।
ज्ञान-वान तँय बनके अब्बड़,जिनगी बने चलाबे।।
साँसा के राहत ले बेटी,तोला बने पढ़ाहूँ।
मोर दुलौरिन बेटी तोला,कइसे बिदा कराहूँ।।
सार छंद गीत(१०)
दया-मया हे सार जगत मा,राखव मया चिन्हारी।
दया-मया बिन नइ तो होवय,जिनगी मा उजियारी।।
गुत्तुर बोलव सबले भइया,गढ़लव नवा कहानी।
ये जिनगी के काय ठिकाना,दू दिन के महमानी।।
बैर-भाव ला छोड़व संगी,छोड़व झूठ-लबारी।
दया-मया हे सार जगत मा,राखव मया चिन्हारी।।
काय इहाँ रहि पाही जानव,चारे दिन के काया।
छोड़ जगत ला जाना हावय,छूट जही सब माया।।
नाँव अमर हो जाही संगी,बनव सबो हितकारी।
दया-मया हे सार जगत मा,राखव मया चिन्हारी।।
ताटंक छंद गीत(११)
छोड़व जम्मो चीज बिदेशी,देशी ला अपनाना हे।।
देश हीत के काम करे बर,मिलके फर्ज निभाना हे।
सोन चिरइँया भारत भुँइयाँ,दुनिया मा कहिलाथे गा।
सबो चीज उत्पादन करके,जन जीवन हरसाथे गा।।
फुलवा जइसे चारो कोती,भारत ला महकाना हे।
छोड़व जम्मो चीज बिदेशी,देशी ला अपनाना हे।
सबो चीज भारत के बउरव,राहय देश कमाई मा।
चलव लुटादव तन-मन भइया,मिलके देश भलाई मा।।
परबुधिया झिन बनहू कोनों,सब ला ये समझाना हे।।
छोड़व जम्मो चीज बिदेशी,देशी ला अपनाना हे।
इहाँ चीज हे चोक्खा-चोक्खा,सब हे बड़ उपयोगी जी।
अपन देश के गुन ला गावत,बन जावव उपभोगी जी।।
भारत राहय सब ले आगू,दुनिया ला दिखलाना हे।
छोड़व जम्मो चीज बिदेशी,देशी अपनाना हे।
सार छंद गीत(१२)
ममता करुणा के तँय मूरत,मोर मिनी माता ओ।
अघुवा बनके जोरे राहस,जन-जन ले नाता ओ।।
सतनामी के शान तहीं हस,महके जस फुलवारी।
सुमता समता लाके तँय हा,टारे जग अँधियारी।।
दुखिया मन के दु:ख हरइया,सुख के तँय दाता ओ।
ममता करुणा के तँय मूरत,मोर मिनी माता ओ।।
नारी मन के मान बढ़ाये,पहली संसद बनके।
सत्य राह मा निसदिन तँय हा,चले रहे ओ तनके।।
दीन हीन सब मनखे मनके,तँय भाग बिधाता ओ।
ममता करुणा के तँय मूरत,मोर मिनी माता ओ।।
तोर सहीं महिमा वाले अब,नइ हें कोनो दूजा।
जब तक चाँद सुरुज हा रइही,जुग-जुग होही पूजा।।
भाई-चारा अमर एकता,सब मा उद्गाता ओ।।
ममता करुणा के तँय मूरत,मोर मिनी माता ओ।।
सरसी गीत(१३)
काबर करथौ रे पापी हो,बेटी ऊपर अत्याचार।
दया-धरम मन मा नइ राखौ,बन जाथौ कइसे गद्दार।।
सबके बहिनी बेटी एक्के,होथे जिनगी के आधार।
छोड़व शैतानी रक्सा हो,दे बर सीखौ मया दुलार।।
अंतस के पीरा हा बढ़थे,कलपत रहिथे घर-परिवार।
काबर करथौ रे पापी हो,नारी ऊपर अत्याचार।।
मान करौ नारी के कहिथो,कहिथौ लक्ष्मी के अवतार।
अनाचार तुम करके काबर,कर देथौ तुरथे संहार।।
मानवता ला कुचर कुचर के,दरिंदगी के सीमा पार।
काबर करथौ रे पापी हो,नारी ऊपर अत्याचार।।
कोन सजा देही दोषी ला,न्याय दिला करही उद्धार
न्याय करे बर भूल चुके हे,कोंदा बन बइठे सरकार।।
दुख पीरा ला कौन हरे अब,जग बैरी होथे अँधियार
काबर करथौ रे पापी हो,नारी ऊपर अत्याचार।।
सरसी छंद गीत(१४)
ठाँव ठाँव रावन दुस्शासन,खींचत लुगरा कोर।
कइसे लाज बँचावँव बेटी,आँसू बरसे मोर।।
बनके रावन जइसे करथें अब,निसदिन अत्याचार।
दया-धरम मन मा नइ राखैं,बनगे हें गद्दार।।
सबके बहिनी बेटी ऊपर,दुख छाये घनघोर।
ठाँव ठाँव रावन दुस्शासन,खींचत लुगरा कोर।।
मान करौ नारी के कहिके,कर देथें संघार।
बेटी ला काबर नइ समझैं,लक्ष्मी के अवतार।।
मानवता ला कुचर डरें हें,बनके डाँकू चोर।
ठाँव ठाँव रावन दुस्शासन,खींचत लुगरा कोर।।
कोन सजा देही दोषी ला,सबके इही पुकार।
दुख पीरा ला कोन हरै अब,जग होगे अँधियार।।
कोन जनी अब कइसे होही,घर घर नवा अँजोर
ठाँव ठाँव रावन दुस्शासन,खींचत लुगरा कोर।।
ताटंक+सरसी छंद गीत(१५)
बेटा बन जा सरवन जइसे,जग मा नाँव कमाले रे।
दाई बाबू के सेवा कर,सउँहे भाग जगाले रे।।
नान्हे पन ले पाले पोंंसे,दया मया बरसाके जी।
लइकन मन बर खुशी लुटावँय,दुख पीरा बिसराके जी।।
दाई बाबू बर हँस हँस के,अब्बड़ खुशी लुटाले रे।
बेटा बन जा सरवन जइसे,जग मा नाँव कमाले रे।
समझ इहाँ दाई बाबू मन,परगट हें भगवान।
इँखरे पूजा करके संगी,दे निसदिन सम्मान।।
दाई बाबू के मन हरसाकेनाता बने निभाले रे।
बेटा बन जा सरवन जइसे,जग मा नाँव कमाले रे।
बरवै छंद गीत(१६)
मोर दुलौरिन जाही,अब ससुरार।
सुन्ना करके अँगना,घर परिवार।।
ए अँगना मा आगे,हवय बरात।
दुलरू के सँग परही,भाँवर सात।।
पढ़ लिख बेटी होगे,हे हुशियार।
मोर दुलौरिन जाही,अब ससुरार।।
कुलकत हावय नोनी,देखव आज।
अपन धनी घर बेटी,करही राज।।
ससुर सास ले पाही,मया दुलार
मोर दुलौरिन जाही,अब ससुरार।।
बिदा करे के बेरा,निकले जान।
बेटी बनगे दू दिन,के महमान।
बेटी पाही सुख के,घर संसार।
मोर दुलौरिन जाही,अब ससुरार।।
दया मया के होही,अब बरसात।
हँसी खुशी मा कटही,ए दिन रात।।
जिनगी के नँइयाँ हा,लगही पार।
मोर दुलौरिन जाही,अब ससुरार।।
सार छंद गीत (१७)
मोर दुलरवा राजा बेटा,ए आँखी के तारा।
सुरुज नरायन जइसे बरके,करबे जग उजियारा।।
गूँजत राहय चारो कोती,मन भावन किलकारी।
महकाये बर आये तँय हा,घर अँगना फुलवारी।।
बेटा सरवन के जइसे तँय-बनबे मोर सहारा।
मोर दुलरवा राजा बेटा,ए आँखी के तारा।।
हँसी खुशी मा जिनगी चलही ,पढ़ लिख भाग जगाबे।
सुख के छइँहा पाबे निसदिन,जग मा नाँव कमाबे।।
भारत माँ के सेवा करबे,लाबे भाई चारा।
मोर दुलरवा राजा बेटा,ए आँखी के तारा।।
बसंत रितु सरसी छंद(१८)
रितु बसंत दे बर आये हे,जन जन ला उपहार।
हँसी खुशी मा दिन कटही अब,सुख पाही संसार।।
मन भावन मौसम लाये हे,रितु बसंत हा आज।
धरती लागय दुलहिन जइसे,बिकट करे हे साज।।
रंग बिरंगा फूल फुले हे,महकय खेती खार।
रितु बसंत दे बर आये हे,जन जन ला उपहार।।
देख कोइली कुहक कुहक के,गावय सुघ्घर गीत।
मन हर्षावय गुत्तुर बोली,मन ला लेवय जीत।।
पिंवरा पिंवरा आमा मउरे,लहकय झूमय डार।
रितु बसंत दे बर आये हे,जन जन ला उपहार।।
रितु बसंत राजा हा भरथे,तन मन मा उल्लास।
सदा बनाथे जीव जंतु बर,दिन बादर ला खास।।
फागुन हा आये बर अब तो,खड़े हवय तइयार।
रितु बसंत दे बर आये हे,जन जन ला उपहार।।
सार छंद गीत(१९)
ऋतु बसंत के आये ले जी,बउरागे अमराई।
मौसम हा मन भावन होगे,जन-जन बर सुखदाई।।
परसा फुलवा लाली लाली,सरसो फुलवा पिंवरा।
ममहावत हे चारो कोती,भावत हावय जिंवरा।।
रंग बिरंगा फुलवा मन के,नीक लगे मुस्काई।।
ऋतु बसंती के आये ला,बउरागे अमराई।।
कुहके कारी कोयलिया हा,मारत हावय ताना।
फूल फूल मा झूमे नाचे,भौंरा गावय गाना।।
तन मन ला हरसावय अब्बड़,फुरहुर ए पुरवाई।
ऋतु बसंत के आये ले जी,बउरागे अमराई।।
फागुन के आये के अब तो,होगे हे तइयारी।
गाँव गली मा ढ़ोल नँगारा,चलही जी पिचकारी।।
रंग लगाही हँसी खुशी ले,होही बड़ पहुनाई।।
ऋतु बंसत के आये ले जी,बउरागे अमराई।।
ताटंक छंद गीत(२०)
ऋतु बसंत के दिन आये हे,ख़ुशी सबो बर लाये हे।
परसा फुलवा लाली लाली,अमुवा हा मउराये हे।
आज कोइली कुहकत हावय,गावय गुत्तुर गाना जी।
रंग बिरंगी फूल फुले हे,उलहा डारा-पाना जी।।
फूल फूल मा जाके अब तो,भौंरा हा मँडराये हे।
ऋतु बसंत के दिन आये हे,ख़ुशी सबो बर लाये हे।
आनी-बानी साज करे हे,ये धरती महतारी हा।
गमकत हावय चारो कोती,बगिया अउ फुलवारी हा।
फागुन महिना आही कहिके,रंग बसंती छाये हे।
ऋतु बसंत के दिन आये हे,ख़ुशी सबो बर लायेll
गरमी जाड़ा कुछ नइ लागे,मौसम मस्त सुहाना हे।
मया-मयारू मिलना होही,उँखरे आज जमाना हे।।
फुरहुर-फुरहुर पुरवाही जी,सबके मन ला भाये हे।
ऋतु बसंत के दिन आये हे,ख़ुशी सबो बर लाये हेll
सार छंद गीत मौसम-(२१)
बिन मौसम के बरसै पानी,करय अपन मनमानी
बिजली चमकै बादर गरजै,बरसै बरखा रानी।
सनन-सनन बड़ गर्रा धूँका,जाड़ा लागय भारी।
चिखला माते गली खोर मा,डर लागै अँधियारी।।
काम बिगाड़े ये मौसम हा,हलाकान जिनगानी।
बिन मौसम के बरसै पानी,करय अपन मनमानी।।
अलकरहा हे ये मौसम हा,चिटको जी नइ भावै।
सबो फसल ला चौपट करदिस,ये हा कब ले जावै।।
ठुठरत हावँय चारो कोती,जम्मो जीव परानी।
बिन मौसम के बरसै पानी,करय अपन मनमानी।।
सावन महिना जइसे लागे,ये मौसम के सेती।
तबियत सबके बिगड़े संगी,बिगड़त हावय खेती।।
कभू सुहावै अब नइ मोला,बादर के शैतानी।
बिन मौसम के बरसै पानी,करय अपन मनमानी।।
सार छंद गीत (२२)
उजरत कखरो घर ला संगी,मिलके चलव बसाबो।
दया मया के रस धारा मा,नइयाँ पार लगाबो।।
झन रोवँय पीरा मा कोनो,पीरा सबो मिटाबो।
उजरत कखरो घर ला संगी,मिलके चलव बसाबो।।
मिटय सबो के पीरा संगी,सबला बने हँसाबो।
दीन दुखी सब मनके मन के,हम लाठी बन जाबो।।
भेद भाव ला हमन भुला के,आगू हाथ बढ़ाबो।
उजरत कखरो घर ला संगी,मिलके चलव बसाबो।।
सत के रस्ता चलँय सबो झन,सत रस्ता देखाबो।
रहय अँजोरी सबके जिनगी,उजियारा जी लाबो।।
दया मया के दीया संगी,मिलके आज जलाबो।
उजरत कखरो घर ला भाई,मिलके चलव बसाबो।।
मया बाँधबो सब मनखे बर,छाती अपन लगाबो।
बने रहय जी भाई चारा,जिनगी सुघर पहाबो।
सुमता के रस्ता मा चलके,दुनिया ला देखाबो।
उजरत कखरो घर ला संगी,मिलके चलव बसाबो।।
ताटंक छंद गीत(२२)
मोर मयारू मैना आ रे,हिरदे के फुलवारी मा।
बाँह पसारे रद्दा जोहत,खड़े हवँव तइयारी माll
आँखी-आँखी झूलत हावै,तोर रूप हा रानी ओ।
तोर मया मा अरझे हावै,अब तो ये जिनगानी ओ।।
तोर मया बिन जीयत हावँव,जिनगी यार उधारी मा।
मोर मयारू मैना आबे,हिरदे के फुलवारी मा।।
माला जपथौं तोर नाँव के,पाहूँ कहिके तोला ओ ।
तोर दरश अब होय बरस हे,कलपत हावै चोला ओ।।
तोर मया बिन मन नइ लागे,जग के महल अटारी मा।
मोर मयारू मैना आबे,हिरदे के फुलवारी मा।।
मन मंदिर के देवी जानौं,तोला राजकुमारी ओ।
तँय चंदा मँय तोर सुरुज हौं,हमर मया उजियारी ओ।।
जरै भले ओ ये दुनिया हा,का हे दुनियादारी मा।
मोर मयारू मैना आबे,हिरदे के फुलवारी मा।।
सरसी छन्द गीत(२४)
मोर मयारू आबे संझा,लगे मिलन के आस।
नैना तरसे तोर मया बर,बाढ़त हवय पियास।।
सोवत जागत उठते बइठत,सुरता तोर सताय।
का जादू तँय डारे गोरी,सुध-बुध मोर भुलाय।।
जोहत हावँव रद्दा तोरे,मन हा उडे अगास।
मोर मयारू आबे संझा,लगे मिलन के आसll
काम-बुता मा मन नइ लागे,मन ला कुछ नइ भाय।
भाँय-भाँय जिंवरा लागत हे,तन मा घुना समाय।।
बिन देखे तोला ओ रानी,मन हे मोर उदास।
मोर मयारू आबे संझा,लगे मिलन के आस।।
चघे हवय ओ तोर मया के,मोला अबड़ बुखार।
मन के कुरिया सुन्ना लागै,सुन्ना हे संसार।।
मन अँधियारी तोर मया बिन,तँय हा मोर उजास
मोर मयारू आबे संझा,लगे मिलन के आस।।
कुकुभ छंद गीत(२५)
चंदन जइसे काया गोरी,महर-महर ममहाये ओ।
सोन परी तँय जग के रानी,मुचमुच ले मुस्काये ओ।।
काजर आँजे नैना कारी,जइसे बादर हारे हे।
सुरुज उए कस माथ टिकुलिया,मन ला मोही डारे हे।।
चंदा लागे तोर रूप हा,उजियारा बगराये ओ।
चंदन जइसे काया गोरी,महर-महर ममहाये ओ।।
आनी-बानी गहना गोंटी,अंग अंग मा तँय साजे।
गोरी गोरी तोर पाँव मा,रुनुक-झुनुक पैरी बाजे।।
कारी नागिन चूँदी जेमा,गजरा ला अरझाये ओ।
चंदन जइसे काया गोरी,महर-महर ममहाये ओ।
फूल झरे ओ तोर हँसी मा,मन भौंरा हा माते हे।
खनर-खनर चूरी कँगना हा,गीत मया के गाते हे।।
रूप मोहनी जादू-मंतर,जग ला तँय भरमाये ओ
चंदन जइसे काया गोरी,महर-महर ममहाये ओ।
कुकुभ छंद गीत(२६)
मन बगिया मा आबे रानी,मन भौंरा गीत सुनाये।
तोर अगोरा हावय मोला,सुरता हा तोर सताये।।
मया-पिरित के फूल फुले हे,आ रानी ममहाबे ओ।
नैन मिला के मया बढ़ा के,मया अमर कर जाबो ओ।।
आजा रानी छोड़ बहाना,जोही ओ तोर बुलाये।
मन बगिया मा आबे रानी,मन भौंरा गीत सुनाये।
तोर बिना सुख्खा बगिया हा,कइसे ओ हरिया पाही,
मया-पिरित के फूल नार हातोर बिना मुरझा जाही।।
डार मया के पानी जोही,सउँहे ओ प्यास बुझाये।
मन बगिया मा आबे रानी,मन भौंरा गीत सुनाये।।
ताटंक छंद गीत (२७)
मया छोड़ के झिन जाबे तँय,मोर मयारू मैना रे।
मन पिंजरा मा बोलत रहिबे,गुत्तुर गुत्तुर बैना रे।।
तपत कुरू रे तपत कुरू भइ,रोटी देहूँ तोला रे।
नाचत रहि तँय मन बगिया मा,देख-देख के मोला रे।।
बँध के रहि तँय मया डोर मा,तहीं मोर फुलकैना रे।
मया छोड़ के झिन जाबे तँय,मोर मयारू मैना रे।
कवल करेजा तोला जानौं,झन देबे तँय पीरा रे।
तोर मया मा मोर जान हे,तँय हा मन के हीरा रे।।
तोला पा के मन हरसाथौं,तहीं मोर दिन रैना रे।
मया छोड़ के झिन जाबे तँय,मोर मयारू मैना रे।।
हिरदे मा राखे हँव तोला,मोर मया के बँधना मा।
उड़-उड़ के तँय खेलत रहिबे,ये हिरदे के अँगना मा।।
ये हिरदे ला चमकाये तँय,तहीं बसे हस नैना रे।
मया छोड़ के झिन जाबे तँय,मोर मयारू मैना रे।।
ताटंक छंद गीत(२८)
बइठे-बइठे रद्दा जोहत,होगे अब अँधियारी रे।
तोर अगोरा हावय मोला,कब आबे सँगवारी रे।
फरकत हावय जौनी आँखी,आस मिले के लागे हे।
जल्दी आजा मोर मयारू,आज मया बड़ जागे है।।
तोर मया बर चोला तरसे,धधकय धतिया भारी रे।
बइठे-बइठे रद्दा जोहत, होगे अब अँधियारी रे।
एक झलक देखे बर राजा,चूरत हावय चोला गा।
कहाँ भुलाये हावस तँय हा,सुध नइ हे का तोला गा।।
अब्बड़ बेरा होगे हावय,घर मा देहीं गारी र।
बइठे-बइठे रद्दा जोहत,होगे अब अँधियारी रे।।
मया अगन हा बाढ़त हावय,आके प्यास बुझाते गा।
इहाँ अक्केला बइठे हावँव,आते बोल बताते गा।।
चुप-चुप आबे मोर पिरोही,करथें कतको चारी रे।
बइठे-बइठे रद्दा जोहत,होगे अब अँधियारी रे।।
उल्लाला छंद गीत (२९)
बिरथा जिनगी हे गियाँ,तोर बिना अब मोर ओ।
नैना तरसे रात दिन,आना ले ले सोर ओ।।
अन पानी भावै नहीं,लगे मिले के आस मा।
दुरिहा काबर होय तँय,आजा रानी पास मा।।
बिरहा आगी मा जरौं,सुरता लेशय तोर ओ।
बिरथा जिनगी हे गियाँ,तोर बिना अब मोर ओl
तन के पीरा का कहौं,झर-झर नैना रोत हे।
तोला देखे बर इहाँ,भुकुर-भुकुर मन होत हे।।
सुते नींद आवै नहीं,लामे सुरता डोर ओ।
बिरथा जिनगी हे गियाँ,तोर बिना अब मोर ओll
आ रानी बरसा मया,जिनगी मोर सँवार दे।
अँधियारी जिनगी हवै,आके तँय उजियार दे।।
सुन रानी गोहार ला,हिरदे ला झिन टोर ओ।
बिरथा जिनगी हे गियाँ,तोर बिना अब मोर ओll
लावनी छंद गीत श्रृंगार(३०)
कुहके कारी कोयलिया हा,चल अमरइया जाबो ओ।
सनन-सनन पुरवइया रानी,राग मया के गाबो ओ।।
पीपर पाना कस मन डोले,मैना ताना मारत हे।
तोर बिना ओ सुन सँगवारी,नैना आँसू ढ़ारत हे।
पबरित हावय हमर मया हा,दुनिया ला दिखलाबो ओ।
कुहके कारी कोयलिया हा,चल अमरइया जाबो ओ।।
किसम-किसम के महकत हावय,अमरइया मा फुलवा हा।
तोर बिना ओ सुन्ना जोही,अमरइया के झुलवा हा।।
सरग बरोबर लागे छइँहा,मया-पिरित बरसाबो ओ।
कुहके कारी कोयलिया हा,चल अमरइया जाबो ओ।।
नाचत गावँय पड़की मैना,मिलके तान सुनावत हें।
ए डारा ले ओ डारा मा,उड़-उड़ के मुस्कावत हे।।
मया अमर करबो चल जोही,बने खुशी ला पाबो ओ।
कुहके कारी कोयलिया हा,चल अमरइया जाबो ओ।।
कुकुभ छंद गीत (३१)
काबर मोला छोड़े जोही,मैना सहीं उड़ागे ओ।
खोजत हावँव बन-बन तोला,कइसे मया भुलागे ओ।।
तोला देखे बर सँवरेंगी,तरसत हावय नैना हा।
लटपट मा ये दिन ला काटौं,कटै नहीं ओ रैना हा।।
बनके तँय परदेशी चंदा,जाके कहाँ लुकागे ओ।
काबर मोला छोड़े जोही,मैना सहीं उड़ागे ओ।।
सुरता आथे तोर मया के,देखत रहिथौं सपना ओ।
जिनगी मा होगे हावय अब,तोर नाँव के जपना ओ।।
ये हिरदे के पिंजरा ला तँय,बैरी सहीं तियागे ओ।
काबर मोला छोड़े जोही,मैना सहीं उड़ागे ओ।।
कोन डहर तोला मँय पावौं,खोजँव आरा-पारा मा।
पता मिलै नइ शोर तोर ओकहाँ धँधाये तारा मा।
अन पानी नइ भावै मोला,चोला मोर सुखागे ओ
काबर मोला छोड़े जोही,मैना सहीं उड़ागे ओ।।
ताटंक छंद गीत(३२)
लाली पिंवरी लुगरा पहिरे,अँचरा ला उड़वाये ओ
कारी नागिन चूँदी जेमा,गजरा ला अरझाये ओ।
पातर-पातर कनिहा गोरी,अब्बड़ लिच-लिच डोले ओ।
खनर-खनर चूरी अउ कँगना,भेद मया के खोले ओ।।
पान खाय कस होंठ दिखत हे,मुचमुच ले मुस्काये ओ।
लाली पिंवरी लुगरा पहिरे,अँचरा ला उड़वाये ओ।
कंचन काया दमकत हावय,रूप रंग हा गोरी हे।
नज़र लगाही कोन तोर बर,बँधे बाँह मा डोरी हे।।
गर मा सोहे हार सोनहा,धरके मन हरसाये ओ।
लाली पिंवरी लुगरा पहिरे,अँचरा ला उड़वाये ओ।।
काबर आँजे काजर कारी,मिरगिन जइसे नैना मा।
काय मोहनी जादू डारे,गुत्तुर गुत्तुर बैना मा।।
चम-चम चमके माथ टिकुलिया,बिजुरी ला बगराये ओ।।
लाली पिंवरी लुगरा पहिरे,अँचरा ला उड़वाये ओ।।
सार छंद गीत-(३३)
तँय आ जाबे मोर पिरोही,अउ कतका तड़पाबे।
मन बगिया हा मुरझावत हे,मयापिरित बरसाबे।
एक नज़र देखे बर तोला,चूरत रहिथे चोला।
माला जपथौं तोर नाँव के,का होगे हे मोला।।
नज़र-नज़र मा झूलत रहिथस,कब तँय दरश दिखाबे।
तँय आ जाबे मोर पिरोही,अउ कतका तड़पाबे।
जागे-जागे सपना देखौं,सुध-बुध मोर भुलाये।
तन-मन मा तँय मोर समाये,सुरता तोर सताये।।
मीठ-मीठ मँदरस कस बोली,आके तोर सुनाबे।
तँय आ जाबे मोर पिरोही,अउ कतका तड़पाबे।।
सार छंद गीत श्रृंगार रस-(३४)
देखे काबर गोरी मोला,धक-धक करथे चोला।
नैन कटारी झिन मारे कर,तोर उमर हे सोला।।
मटमट मटमट करते रहिथस,मुच-मुच ले मुस्काथस।
अइसन काबर लाहो लेथस,अब्बड़ तँय इतराथस।।
मार मारके शेखी भारीखाथस चुस्की गोला।
देखे काबर गोरी मोलाधक-धक करथे चोला।।
आनी बानी किरिम पाउडर,मुँह मा तोर लगाथस।
का साबुन मा रोज नहाथस,अब्बड़ ओ ममहाथस।।
लकर-धकर तँय रेंगे धरके,मोबाइल अउ झोला।
देखे काबर गोरी मोला धक-धक करथे चोलाll
उल्लाला छंद गीत श्रृंगार रस-(३५)
रूप लगे मन मोहनी,चंदा घलो लजाय हे।
चर्चा होवय गाँव मा,तोला कोन बनाय हे।।
मोती जइसन दाँत हा,चमकत हावय तोर ओ।
का संझा का रात के,जग ला करै अँजोर ओ।।
गोरी गोरी अंग हा,जादू अबड़ चलाय हे।
रूप हवय मन मोहनी,चंदा घलो लजाय हे।।
झुमका सोहे कान के,झूमय नाँचय गाल मा।
लिच-लिच कनिहा डोलथे,मन डोलत हे चाल मा।।
हँसथस ता फुलवा झरे,महर-महर ममहाय हे।
रूप हवय मन मोहनी,चंदा घलो लजाय हे।।
होठ गुलाबी तोर ओ,मँदरस ला टपकाय हे।
रूप हवय मन मोहनी,चंदा घलो लजाय हे।।
ताटंक छंद गीत श्रृंगार रस-(३६)
मन के रानी मोर मोहनी,मन ला अब्बड़ भाये ओ।
रूप गजब हे नैन जोगनी,बिजुरी ला चमकाये ओ।।
मोर पिरोही मोर मयारू,मोर तहीं फुलकैना ओ।
नीक-नीक लागे अब्बड़ मोला,मीठ-मीठ हे बैना ओ।।
सोन परी हिरदे के चंदा,मया अँजोरी लाये ओ..
मन के रानी मोर मोहनी,मन ला अब्बड़ भाये ओ।।
हस अलबेली रे सँवरेंगी,मुचमुच ले मुस्काये ओ।
तोर हँसी मा झरे मोंगरा,मन बगिया महकाये ओ
अंग-अंग महमावत हावै,हिरदे मा तँय छाये ओ
मन के रानी मोर मोहनी,मन ला अब्बड़ भाये ओ।।
ताटंक छंद गीत श्रृंगार रस-(३७)
नदिया के तिर आबे रानी,तोर अगोरा मोला हे।
सुरुर सुरुर पुरवाही चलथे,हरसत अब्बड़ चोला हे।।
आनी-बानी फूल फुले हे,भौंरा हा मँडरावै ओ।
कुहके आमा डार कोयली,मैना राग सुनावै ओ।।
मन भौंरा हा खोजत हावय,का चिंता अब तोला हे।
नदिया के तिर आबे रानी,तोर अगोरा मोला हे।।
आगी जइसे तन भभकत हे,आके प्यास बुझाते ओ।
मया-पिरित के गोठ-बात मा,आके मन हरसाते ओ।।
तोर मया बिन ये हिरदे मा,बरसे आगी गोला हे।
नदिया के तिर आबे रानी,तोर अगोरा मोला हे।।
नदिया के पानी कस धारा,आँसू बोहत हे भारी।
तोर दरश बिन ये हिरदे मा,बिरहा के चलथे आरी।।
तोर बिना मन अइलावत हे,चलत झाँझ अउ झोला हे।
नदिया के तिर आबे रानी,तोर अगोरा मोला हे।।
ताटंक छंद गीत-(३८)
चल सँगवारी हम बर जाबो,बनके दीया बाती ओ।
सुरुज नरायन जइसे बरबो,का दिन अउ का राती ओ।।
जिनगी के अँधियारी कखरो,घर के धूर भगाबो ओ।
उजियारी हो जाही जिनगी,बरके नाँव कमाबो ओ।।
सदा आरती देवन मन बर,बरबो हम संझाती ओ।
चल सँगवारी हम बर जाबो,बनके दीया बाती ओ।।
गली दुवारी बरते रहिबो,ख़ुशी सबो घर लाबो ओ।
जतको बरबो ततके संगी,सुख देबो सुख पाबो ओ।।
मया अमर कर लेबो हमरो,लगे लगे हम छाती ओ।
चल सँगवारी हम बर जाबो,बनके दीया बाती ओ।।
ताटंक छंद पुन्नी के चंदा कस-(३९)
पुन्नी के चंदा कस हावय,तोर रूप हा गोरी ओl
संग लगाले मोला जोही,बाँध मया के डोरी ओll
नैन जोगनी जइसे हावय,बिजुरी ला चमकाये हेl
चमकत हावय कंचन काया,उजियारा बगराये हेll
मुचमुच ले मुस्काये काबर,दिल के होगे चोरी ओl
पुन्नी के चंदा कस हावय,तोर रूप हा गोरी ओll
करिया बादर जइसे चूँदी,कनिहा ले लहराये हेl
फुरहुर छइँहा चारों कोती,धरती मा बगराये हेll
झाँक मयारू मया डगर ला,करले बँइहाँ जोरी ओl
पुन्नी के चंदा कस हावय,तोर रूप हा गोरी ओll
सरसी छंद गीत युगल-(४०)
मोर मयारू मन के रानी,मँय राजा दिलदार।
मया-पिरित बरसाबो रानी,आबे तरिया पार।।
घर मा अब्बड़ काम परे हे,कइसे आवँव पास।
मया-पिरित के ए गा राजा,लगे महूँ ला आस।।
बने बहाना करके आजा,आज हवय इतवार।
मोर मयारू मन के रानी,मँय राजा दिलदार।।
तोर अगोरा मोला हावय,सुरता तोर सताय।
मया-पिरित के गोठ करे बर,जोही तोर बुलाय।।
आवत हावँव मोर मयारू,रहिबे गा तइयार।
मोर मयारू मन के राजा,मँय रानी दिलदार।।
सार छंद(४१)
जोही काबर छोड़े मोला,कइसे मया भुलागे।
मोर मया मा महुरा घोरे,कइसे मया तियागे।।
नइ पाबे अब तँय हा रानी,मोर सहीं दीवाना।
तोही ला मँय मितवा जानौं,नइ हे मोर ठिकाना।।
तोर अगोरा मा चंदा रे,सगरी उमर पहागे।
जोही काबर छोड़े मोला,कइसे मया भुलागे।।
बिरहा के बिख ला पीयत हँव,कइसन ये लाचारी।
सुरता के तरिया मा बूडौं,जिनगी हे अँधियारी।।
का गलती हे मोर बिधाता,कइसे गियाँ रिसागे।
जोही काबर छोड़े मोला,कइसे मया भुलागे।।
सार छंद सुरता-(४२)
सुरता सुरता ये सुरता के,लामे हावय डोरी।
नजरें नजर म झूलत रहिथे,तोर रूप हा गोरी।।
एक नजर देखे बर तोला,जिंवरा मोर लगे हे।
रतिहा-रतिहा जागत रहिथौं,मन मा आश जगे हे।।
तोर बिना ओ अइसे लगे,दिल के होगे चोरी।
सुरता सुरता ये सुरता के,लामे हावय डोरी।।
कान-कान मा गूँजत रहिथे,मीठ-मीठ वो बोली।
तोर बिना ये नैना रोथे,दिल मा चलथे गोली।।
बिरहा मा तन जरथे जोही,जइसे जरथे होरी।
सुरता सुरता ये सुरता के,लामे हावय डोरी।।
ताटंक छन्द गीत(४३)
मटकत कुलकत हाँसत गावत,बरसा रानी आये हे।
प्यास बुझाये बर धरती के,धरके पानी लाये हे।।
नवा बहुरिया जइसे लागे,ये भुँइयाँ हरियाली मा।
मजा उड़ावे जीव चराचर,बरसा के खुशहाली मा।।
सेज सहीं अब लागे भुँइयाँ,माटी हा ममहाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,बरसा रानी आये हे।।
मया-पिरित के डोर बँधागे,झुलवा बर अमराई मा।
सबो जहुँरिया मजा उड़ावें,फुरहुर ए पुरवाई मा।।
गीत कोइली गाके सुघ्घर,तन-मन ला हर्षाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,बरसा रानी आये हे।।
खेत-खार सुघराई होवय,आगे काम किसानी के।
नाँगर बख्खर जोरावय जी,बइला संग मितानी के।
अबड़ सुहावय सावन महिना,सुख के बादर छाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,बरसा रानी आये हे।।
सरसी छन्द गीत श्रृंगार रस(४४)
आँखी हावय कजरारी ओ,ढ़ीले चोखी बान।
होंठ दिखत हे लाली-लाली,खाये बीरो पान।।
करिया चूँदी नागिन जइसे,कनिहा ले लहराय।
बेनी के ओ फूल मोंगरा,महर महर ममहाय।।
मटक मटक के रेंगे गुँइया,मारे अब्बड़ शान।
आँखी हावय कजरारी ओ,ढ़ीले चोखी बान।।
रूप लगे जस तोर मोहनी,गोरी-गोरी अंग।
तोर नाक मा चमकत हावय,फुल्ली के ओ नंग।।
खनर-खनर ओ चूरी गावय,मया-पिरित के गान।।
आँखी हावय कजरारी ओ,ढ़ीले चोखी बान।।
कुकुभ गीत -(४५)
मया पिरित के रंग डार के,बने मनाबो होरी ओ।
आज लुका झन घर मा जोही,रंग लगाले गोरी ओ।।
सुन सतरंगी मोर मयारू,बाजत ढ़ोल नँगारा हे।
सब खेलत हें गाँव गली मा,फगुवा झारा-झारा हे।।
फाग मया के मिलके गाबो,झन कर जोरा जोरी ओ।
आज लुका झन घर मा जोही,रंग लगाले गोरी ओ।।
मया रंग बरसाबो संगी,कुलके मन हा अब मोरो।
मया पिरित ला जान मयारू,का सुध नइ हे अब तोरो।।
मया बढ़ा के नैन मिला के,करे हवस मन चोरी ओ।
आज लुका झन घर मा जोही,रंग लगाले गोरी ओ।।
देख निकल के घर ले बाहिर,तोर दुवारी आये हौं।
झन शरमाना ये अलबेली,मया तोर बर लाये हौं।।
फागुन महिना मया बढ़ावय,बाँध मया के डोरी ओ।
आज लुका झन घर मा जोही,रंग लगाले गोरी ओ।।
ताटंक छंद गीत(४६)
गीत कोइली जब-जब गाथे,सुध बुध मोर हराथे ओ।
धकधक-धकधक जिंवरा करथे,सुरता तोर सताथे ओ।।
रंग बिरंगी फूल फुले कस,दिखथे तोर हँसाई हा।
गुत्तुर गुत्तुर तोर गोठ मा,महके मन अमराई हा।।
बादर सुरता के जब छाथे,बिरहा पीर बढ़ाथे ओ।
गीत कोइली जब जब गाथे,सुरता तोर सताथे ओ।।
मया मतौना सुध बुध खोथे,खोजत रहिथे मन तोला।
तोर बिना ओ मोर मयारू,तरसत रहिथे ए चोला।।
जुड़ पुरवाही जब जब चलथे,अब्बड़ मया बढ़ाथे ओ।
गीत कोइली जब जब गादथे,सुरता तोर सताथे ओ।।
दोहा गीत(४७)
मन बगिया के कोइली,तोर करे ओ बात।
तोर मया हा फूल कस,महके हे दिन-रात।।
मन के चंदा मोर तँय,मँय हा तोर अगास।
चिटिक अँजोरी छाँव मँय,तँय हा मोर उजास।।
उलहा अंतस ला करे,मया तोर बरसात।
मन बगिया के कोइली,तोर करे ओ बात।।
जुड़हा पुरवाही सहीं,लगे तोर ए साँस।
तोर मोहनी रूप हा,मन ला लेहे फाँस।।
जब-जब देखँव रे गियाँ,तोला मँय मुस्कात।
मन बगिया के कोइली,तोर करे ओ बात।।
बरवै छंद गीत-(४८)
गियाँ बिना नइ आवय,मोला चैन।
ऐती ओती खोजत,रहिथे नैन।।
अइसे लगथे होगे,गियाँ पराय।
कोन शहर मा जाके,कहाँ धँधाय।।
धधकत रहिथे चोला,लगगे आग।
गियाँ मिले बर छेड़य,मन हा राग।।
लटपट मा कटथे दिन,बिरहा रैन।
गियाँ बिना नइ आवय,मोला चैन।।
देखे बर अब रोवय,चोला मोर।
निरदइया हे लेवत,नइ हे सोर।।
अंतस मा अब छाये,ओखर रूप।
गियाँ बिना जग लागय,मोला कूप।।
सुरता आवय छिन-छिन,गुरतुर बैन।
गियाँ बिना नइ आवय,मोला चैन।।
कुकुभ छंद गीत (४९)
आँखी के काजर हा लागय,जइसे बादर छाये हे।
ये आँखी मा का जादू हे,अब्बड़ मन ला भाये हे।।
चाँद बरोबर तोर माथ मा,सोहे लाल टिकुलिया हा।
अइसे लागय चारो कोती,चमकय ठाढ़ बिजुरिया हा।।
झाँक-झाँक के देखे काबर,मन मा कोन समाये हे।
आँखी के काजर हा लागय,जइसे बादर छाये हे।।
तोर कनेकी नज़र गियाँ रे,घायल ओ कर देही का।
करिया नागिन जइसे चूँदी,जिंवरा ला ले लेही का।।
सोन परी तँय जग मा तोला,कोन विधाता लाये हे।
आँखी के काजर हा लागय,जइसे बादर छाये हे।।
कुंकुभ छंद गीत..श्रृंगार रस-(५०)
तँय बन जाबे गोंदा फुलवा,मँय भौंरा बन जाहूँ।
तोर महक मा मँय हा गोंदा,महर-महर ममहाहूँ।।
तोर मया के रस ला चंदा,अमरित जइसे पीहूँ।
देख देख के आठो पहरी,ये जिनगी ला जीहूँ।।
ओ डारा ले ये डारा मा,उड़ उड़ के मँय आहूँ।
तँय बन जाबे गोंदा फुलवा,मँय भौंरा बन जाहूँ।।
अमर कहानी मया-पिरित के,दुनिया मा रहि जाही।
हमर मया हा सब मनखे के,अब्बड़ मन ला भाही।।
गुनगुन-गुनगुन तिर मा सुग्घर गीत मया के गाहूँ।
तँय बन जाबे गोंदा फुलवा,मँय भौंरा बन जाहूँ।।
ताटंक छंद गीत..श्रृंगार रस(५१)
ए चंदा रे ए गुँइयाँ रे,मया तोर बर लागे ना।
खवा डरे तँय मया मतौना,एदे मन मा छागे ना।।
तोर मया मा मोर मयारू,होगे हवँव दिवाना ओ।
आठो पहरी तोर नाँव के,गावत रहिथँव गाना ओ।।
बइठे-बइठे देखँव तोला,जम्मो दु:ख हरागे ना।
ए चंदा रे ए गुँइयाँ रे,मया तोर बर लागे ना।।
तोर सहीं दिलवाली पाके,जिंवरा नाँचे गाये हे।
खुशी मनाथँव तोर मया के,अब्बड़ मन हरसाये हे।।
माला जपथौं तोर नाँव के,मन मा तहीं समागे ना।
ए चंदा रे ए गुँइयाँ रे,मया तोर बर लागे ना।।
सार छंद गीत-(५२)
आँखी ले आँसू बरसत हे,भींजत हावय दसना।
अब तो आजा मोर मयारू,सुन ले मोर कलपना।।
तन के पीरा कोन हरय अब,काला मँय दुख बाँटौं।
बिरहा लागय जाहर जइसे,दुख के ढ़ेरा आँटौं।।
आठो पहरी होथे जोड़ी,तोर नाँव के जपना।
आँखी ले आँसू बरसत हे,भींजत हावय दसना।।
अब्बड़ सुरता तोर सताथे,धक-धक जिंवरा करथे।
जिंवरा तड़फत रहिथे भारी,आगी जइसे बरथे।।
तोर रूप के देखत रहिथौं,जागे जागे सपना।
आँखी ले आँसू बरसत हे,भींजत हावय दसना।।
ताटंक गीत(५३)
चंदा उतरे हे भुँइयाँ मा,तइसे लगथस गोरी ओ।
तोर रूप मा ये दुनिया हा,होवत हवे अँजोरी ओ।।
चमकत बिजली जइसे आँखी,जेमा फभथे काजर हा।
छाय घटा कस ये काजर हा,जइसे हारे बादर हा।।
कोन तोर बर नजर लगाही,पहिरे करिया डोरी ओ।
चंदा उतरे हे भुँइयाँ मा,तइसे लगथस गोरी ओ।।
रूप-रंग हे हीरा जइसेपाये उज्जर काया ला,
सरग सुंदरी अतका काबर,बगराये तँय माया ला।।
तोर होठ के लाली जोही,जिवरा के करथे चोरी ओ।
चंदा उतरे हे भुँइयाँ मा,तइसे लगथस गोरी ओ।।
सरसी छंद गीत-(५४)
बेलबेलही टूरी अब्बड़,मारय शेखी शान।
ओंठ रचाये लाली-लाली,खाके बीरो पान।।
मटक-मटक के रेंगत हावय,कनिहा ला लछकाय।
ममहावत हे फूल मोंगरा,चूँदी मा अरझाय।।
कजरेली बड़ काजर वाले,नैना चोखी बान।
बेलबेलही टूरी अब्बड़,मारय शेखी शान।।
गर मा चम-चम चमके भारी,नव लख्खा के हार।
आनी-बानी गहना गोंटी,फभे कान मा ढ़ार।।
मँदरस जइसे गुत्तुर बोली,मुच-मुच ले मुस्कान।
बेलबेलही टूरी अब्बड़,मारय शेखी शान।।
ताटंक गीत (५५)
कब ले दुरिहा रहिबे तैं हा,मोर मया संगवारी रे।
तोर बिना अब सुन्ना लागे,घपटे जग अँधियारी रे।।
सुरता छिन-छिन आथे राजा,धकले करथे छाती हा।
का होगे तोर आय नहीं गा,अब तो चिठ्ठी पाती हा।।
मुरझावत हे तोर बिना अब,मोर मया फुलवारी रे
कब ले दुरिहा रहिबे तैं हा,मोर मया संगवारी रे।।
सपना देखँव तोर मया के,जाग-जाग दिन राती मा।
पखरा लदके जइसे लागय,बिरहा बैरी छाती मा।।
मैं राधा हँव तोर मया के,तहीं मोर बनवारी रे।
कब ले दुरिहा रहिबे तैं हा,मोर मया संगवारी रे।।
*कुकुभ छंद गीत(५६)
सावन झूला झुलबो संगी,मनभावन सावन आगे।
मया-पिरित के डोर बँधे ले,तन-मन हा अब हरसागे।।
मोर कहे ला मान गड़ी अब,चल जाबो हम अमराई।
गीत मया के मिलके गाबो,फुरहुर पाबो पुरवाई।।
अइसे करबो गोठ मया के,दुख पीरा जम्मो भागे।
सावन झूला झुलबो संगी,मनभावन सावन आगे।।
हरियर-हरियर चारो कोती,दिखथे धनहा डोली हा।
तान सुना के मन ला मोहय,आज कोइली बोली हा।।
लगगे महिना मया-पिरित के,तइसे अब मोला लागे।
सावन झूला झुलबो संगी,मनभावन सावन आगे।।
विष्णु पद छंद गीत(५७)
देखत हावँँव रस्ता तोरे,कब आबे सजना।
तोर बिरह मा होगे हावय,निसदिन के तपना।।
टप-टप टप-टप नैना ले गा,आँसू हा बरसे।
तोला देखे बर सँगवारी,नैना हा तरसे।
अलथ-कलथ रतिहा ला काटौं,आथे बड़ सपना।
देखत हावँँव रस्ता तोरे,कब आबे सजना।।
आजा अब तँय मोर मयारू,दुख-पीरा हरले।
तोर मया मा जीयत हावँँव,सुरता तँय करले।।
तोर नाँव के होगे हावय,माला गा जपना।
*देखत हावँँव रस्ता तोरे,कब आबे सजना।।
बिन पानी के मछरी जइसे,कब ले मँय मरहूँ।
आके प्यास बुझादे जोही,सँउहे मँय तरहूँ।।
सुन्ना-सुन्ना लागे अब्बड़,मोर गली अँगना।
देखत हावँँव रस्ता तोरे,कब आबे सजना।।
कुकुभ गीत (५८)
मोर संग तँय मया बढ़ाके,नाता काबर टोरे ओ।।
कलपत हावय जिंवरा भारी,कइसे महुरा घोरे ओ।।
तोर बिना ए जग अँधियारी,गाँव गली घर सुन्ना हे।
तोर बिरह अब तन ला छेदय,मोर दरद हा जुन्ना हे।।
नइ समझे तँय मोर मया ला,पखरा जइसे फोरे ओ।
मोर संग तँय मया बढ़ाके,काबर नाता टोरे ओ।।
कइसे पाहूँ तोला संगी,तरसत हावय ए चोला।
अन पानी एक्को नइ भावय,का होगे हावय मोला।।
बीच धार मा ए जिनगी के,तँय हा डोंगा बोरे ओ
मोर संग तँय मया बढ़ाके,काबर नाता टोरे ओ।।
कइसे जीहूँ तोर बिना मँय,सुरता मा नैना रोथे।
कोन समझही मोर दरद ला,धक-धक ए छतिया होथे।।
मया-पिरित के ए बँधना ला,बैरी होके छोरे ओ
मोर संग तँय मया बढ़ाके,काबर नाता टोरे ओ।।
विरह गीत सार छंद (५९)
तैं छोड़े काबर ओ चंदा,मोला अपन बनाके।
राखे हावँव तोर मया ला,दिल मा मोर बसाके।।
मोर सहीं दिलवाला राजा,खोजे नइ तो पाबे।
मोर मया के सुरता आही,पाछू बड़ पछताबे।।
करे रहँव मैं तोर भरोसा,किरिया कसम खवाके।
तैं छोड़े काबर ओ चंदा,मोला अपन बनाके।।
मोर मया फुलवारी ला तँय,करके चल दे सुन्ना।
कइसे जीहूँ तोर बिना मैं,पीरा बाढ़य दुन्ना।।
बीच भँवर मा कइसे बोरे,जिनगी मोर फँसाके।
तैं छोड़े काबर ओ चंदा,मोला अपन बनाके।।
मया बिना अब होगे जोही,जिनगी मा अँधियारी।
अइलाये कस होगे हावय,मोर मया फुलवारी।।
पंछी कस तैं उड़गे काबर,जिंवरा मोर जलाके।
तैं छोड़े काबर ओ चंदा,मोला अपन बनाके।।
ताटंक छन्द गीत (६०)
मटकत कुलकत हाँसत गावत,
बरसा रानी आये हे।
प्यास बुझाये बर धरती के,
धरके पानी लाये हे।
नवा बहुरिया जइसे लागे,ये भुँइयाँ हरियाली मा।
मजा उड़ावे जीव चराचर,बरसा के खुशहाली मा।
सेज सहीं अब लागे भुँइयाँ,
माटी हा ममहाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,
बरसा रानी आये हे।।
मया-पिरित के डोर बँधागे,झुलवा बर अमराई मा।
सबो जहुँरिया मजा उड़ावें,फुरहुर ए पुरवाई मा।।
गीत कोइली गाके सुघ्घर,तन-मन ला हर्षाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,बरसा रानी आये हे।।
खेत-खार सुघराई होवय,आगे काम किसानी के।
नाँगर बख्खर जोरावय जी,बइला संग मितानी के।
अबड़ सुहावय सावन महिना,सुख के बादर छाये हे।
मटकत कुलकत हाँसत गावत,बरसा रानी आये हे।।
सार छन्द गीत श्रृंगार रस(६१)
रूप मोहनी रंग चाँदनी,आँखी हे कजरेली।
देखे भर मा मया उमड़थे,अंतस मा बरपेली।।
सुरुज नरायण जइसे चमके,तोर माथ के बिंदिया।
तोर कान के झुमका गोरीले जाही का निंदिया।।
फूल फुले हे जग बगिया मा,चम्पा तहीं चमेली।
रूप मोहनी रंग चाँदनी,आँखी हे कजरेली।।
पान खाय कस होंठ रचे हे,छलके मँदरस सागर।
करिया चूँदी कनिहा लोरय,छाये जइसे बादर।।
बाली हावय तोर उमरिया,लगथस ओ अलबेली।
रूप मोहनी रंग चाँदनी,आँखी हे कजरेली।।
सार छन्द गीत..(६२)
मोर मया ला आज भुलागे,का होगे हे तोला।
तोर बिरह मा नैना रोवय,बरसे आँसू गोला।।
तड़पत हावय जिंवरा भारी।तोर बिना सँगवारी।
सुन्ना सुन्ना लागत हावय।घर अँगना अउ बारी।।
आगी बारे जइसे छिन छिन,धधकय हावय चोला।
मोर मया ला आज भुलागे,का होगे हे तोला ओ।।
करुहा करके मोर मया ला,महुरा काबर घोरे।
मया बढ़ा के बीच भँवर मा,ए जिनगी ला बोरे।।
मोर सहीं तँय नइ तो पाबेहँव सिधवा बड़ भोला।
मोर मया ला आज भुलागे,का होगे हे तोला।।
सरसी छन्द गीत(६३)
अतका अच्छा काबर लगथे,रूप रंग हा तोर
आज बतादे मोला गोई,हावस का चितचोर।।
रूप रंग मा झन जा राजा,मँय हँव गा दिलदार।
मया भरे हावय अंतस मा,इही जगत मा सार।।
कोन बिधाता गढ़े हवय ओ,कंचन काया पाय।
रूप नगर के तँय हा रानी,दुनिया ला भरमाय।
अइसे लगथे बाँध डरे तँय,मया पिरित के डोर।
अतका अच्छा काबर लगथे,रूप रंग हा तोर।।
कंचन काया नोहय राजा,हाड़ मास के ताय।
एखर करके काय भरोसा,काबर गा ललचाय।।
चरदिनिया हे ए जिनगानी,जोड़ मया के तार।
रूप रंग मा झन जा राजा,मँय हँव गा दिलदार।।
दोहा गीत(६४)
आ जोही तँय बाँध ले,मया पिरित के डोर।
जिनगी भर करबो मजा,सुख पाबो चहुँओर।।
जात पात ला छोड़ के,हम बन जाबो मीत।
सदा निभाबो संग मा,हमर मया के रीत।।
रानी बन जा मोर ओ,बनहूँ राजा तोर।
आ जोही तँय बाँध ले,मया पिरित के डोर।।
नशा करत होबे कहूँ,तेला तुरते छोड़।
बिना नशा के मोर ले,तँय हा नाता जोड़।
जब तक चलही साँस हा,बनके रइहूँ तोर।
आ जोही तँय बाँध ले,मया पिरित के डोर।।
मानव छंद गीत(६५)
झन देबे धोखा तँय हा,मोला सँगवारी रे।
हो जाही तोर मया बिन,जिनगी अँधियारी रे।
महकाबे मोर मया ला,बनके फुलवारी रे।
झन देबे धोखा तँय हा,मोला सँगवारी रे।
कब तँय पतियाबे राजा,अब्बड़ हे पिरिया गा।
तोर बिना कइसे जीहूँ,खावत हँव किरिया गा।
अँधियारी हे जिनगी मा,करहूँ उजियारी रे।
नइ देवँव धोखा मँय हा,तोला सँगवारी रे।
बैरी ए दुनिया हावय,बचके अब रहना हे।
कतको सुख दुख आही ता,मिलके ओ सहना हे।
तहीं मोर राधा रानी,मँय हा बनवारी रे।
झन देबे धोखा तँय हा,मोला सँगवारी रे।
कुकुभ गीत(६६)
मया बढ़ाके मोर संग मा,काबर नाता टोरे ओ।
कलपत हावय जिंवरा भारी,कइसे महुरा घोरे ओ।।
तोर बिना ए जग अँधियारी,गाँव गली घर सुन्ना हे।
तोर बिरह अब तन ला छेदय,मोर दरद हा जुन्ना हे।।
नइ समझे तँय मोर मया ला,पखरा जइसे फोरे ओ।
मया बढ़ाके मोर संग मा,काबर नाता टोरे ओ।।
कइसे पाहूँ तोला संगी,तरसत हावय ए चोला।
अन पानी एक्को नइ भावय,का होगे हावय मोला।।
बीच धार मा ए जिनगी के,तँय हा डोंगा बोरे ओ।
मया बढ़ाके मोर संग मा,काबर नाता टोरे ओ।।
कइसे जीहूँ तोर बिना मँय,सुरता मा नैना रोथे।
कोन समझही मोर दरद ला,धक-धक ए छतिया होथे।।
मया-पिरित के ए बँधना ला,बैरी होके छोरे ओ
मया बढ़ाके मोर संग मा,काबर नाता टोरे ओ।।
सार छंद गीत(६७)
मीठ मीठ मिसरी के जइसे,गोठ बात होगे ओ।
तोर संग मा चंदा रानी,मुलाकात होगे ओ।।
मीठ मीठ मिसरी के जइसे,गोठ बात होगे ना।
तोर संग मा छैला राजा,मुलाकात होगे ना।।
नजर मिला के जी भर के तँय,देख मयारू मोला।
तोर मया ला हृदय बसाके,मँय देखँव ओ तोला।।
लहराये तँय करिया चूँदी,हँसी रात होगे ओ।
मीठ मीठ मिसरी के जइसे,गोठ बात होगे ओ।।
देख देख के एक दुसर ला,तन मन ला हरसाबो।
हमर मया के बगिया संगी,मिलके हम महकाबो।।
ए दुनिया मा हमर मया के,शुरूवात होगे ना।।
तोर संग मा छैला राजा,मुलाकात होगे ना।।
प्रदीप छन्द गीत गीत (६८)
चरदिनिया ए जिनगानी हे,सबले सुघ्घर काम कर।
सत्य राह मा चलके संगी,जग मा ऊँचा नाम कर।
दीन-दुखी से मया बाँट ले,मानवता पहिचान ले।
दया-धरम ला ह्दय बसाके,छुट्टी पा अभिमान ले।।
पर नेकी के काम इहाँ जी,तँय हा आठो-याम कर।
चरदिनिया ए जिनगानी हे,सबले सुघ्घर काम कर।।
गुरू,ददा-दाई के सेवा,कर परगट भगवान हे।
माथ नवा ले चरन कमल मा,इँखरे ले उत्थान हे।।
कहाँ भटकबे एती-ओती,मन ला चारोधाम कर।
चरदिनिया ए जिनगानी हे,सबले सुघ्घर काम कर।
लेख लिखा ले सत्य करम के,छोड़ बने जी छाप ला।
सत के करले लेनी-देनी,करले एखर जाप ला।।
जी ले जिनगानी ला हँस के,झन तँय एखर दाम कर।
चरदिनिया ए जिनगानी हे,सबले सुघ्घर काम कर।।
हरिगीतिका छंद गीत श्रृंगार -(६९)
ए तोर नैना हाय दौना मारथे बड़ बान ओ।
लचकाय काबर तोर कनिहा लेत हावै जान ओ।
चूँदी सजाये तोर तँय हा मोंगरा के फूल मा।
मन मोहडारे मोहनी तँय तोर खोपा झूल मा।।
चंदा सहीं हे रूप जोही तोर उज्जर अंग हे।
ए चकमकावै नाक फुल्ली सोनहा के नंग हे।
लाली दिखत हे होठ सुग्घर खाय बीरो पान ओ।
ए तोर नैना हाय दौना मारथे बड़ बान ओ।
बड़ नीक लागे रेंगना ओ पाँव पैरी बोलथे।
ए छमछमावत गीत गाथे भेद मन के खोलथे।
हे कोइली कस तोर बोली मीठ मँदरस घोरथे।
चूरी सजाये बाँह भर भर कान बाली लोरथे।।
अब्बड़ सजाये तोर गर मा नौ लखा के हार तँय।
कंचन सहीं हे तोर काया भाय मन ला यार तँय।
रानी बरोबर रूप गोरी सोभथे मुस्कान ओ।
ए तोर नैना हाय दौना मारथे बड़ बान ओ।।
गीतिका छंद गीत-नानपन के दोस्ती-(७०)
नानपन के दोसती ला,तँय कभू झन टोरबे।
राख बँधना बाँध जोही,संग ला झन छोरबे।।
झन भुलाबे यार मोला,हाथ गुँइया थाम ले।
तँय मया हिरदे लगा ओ,द्वारिका के नाम ले।।
चार दिन के ये जवानी,हे गियाँ झन बोरबे।
नानपन के दोस्ती ला,तँय कभू झन टोरबे।।
चल अमर करबो मया ला,बात जोही मान ले।
ये जमाना काय करही,तँय मया ला जान ले।
रेंगबो हम संग जोही,हाथ धरके हाथ मा।
तँय बताना तोर गोई,माँग भरदँव माथ मा।।
तँय निभाबे रीत सुग्घर,मीठ मिसरी घोरबे।
नानपन के दोसती ला,तैं कभू झन टोरबे।।
सरसी छंद गीत जगार(७१)
उठव उठव गा अब तो भइया,जागव वीर जवान,
तुँहर बाँह मा जोश भरे बर,आगे नवा बिहान।।
जे सोवय सो खोवत रहिथे,जागव पावव मान।
धरती माँ के जतन करे बर,देवव छाती तान।।
जे जागय सो पावत रहिथे,धरलव अइसन ज्ञान
उठव उठव गा अब तो भइया,जागव वीर जवान।।
कुकरा बासत सब जागत हें,जागँय इहाँ किसान।।
बइला नाँगर धरँय तुतारी,जाँय खेत खलिहान।।
देखव अन उपजइया ला जी,कइसे बोथे धान।।
उठव उठव गा अब तो भइया,जागव वीर जवान।।
बिना करम के कुछ नइ होवय,बनहू कहाँ महान।
आलस मा कुछ नइ बन पाहू,धरौ बात ला ध्यान।।
करम इहाँ पूजा कहिलाथे,कहिथे वेद पुरान।
उठव उठव गा अब तो भइया,जागव वीर जवान।।
बरवै छन्द गीत(७२)
सबले सुग्घर हावय,हमरो गाँव।
बर पीपर के पबरित,जुड़हा छाँव।।
नदिया नरवा बोहत,रहिथे धार।
हरियर हरियर दिखथे,खेती खार।।
जुरमिल जम्मो करथें,खेती काम।।
महिनत के बदला मा,पाथें दाम।
चिरई चहके कउँवा,करथे काँव।
सबले सुग्घर हावय,हमरो गाँव।।
करथें सबो किसानी,पाथें धान।
मारय नइ जी कोनो,शेखी शान।।
संझा बेरा मनखे,सब सकलाँय।
गुरतुर गुरतुर बोली,मा बतियाँय।।
बिहना धरती के सब,परथें पाँव।
सबले सुग्घर हावय,हमरो गाँव।।
मिलके रहिथें जम्मो,जी परिवार।
आपस मा रखथें गा,मया अपार।।
सरग बरोबर लगथे,सबके संग।
दया मया के देखे,मिलथे रंग।।
महमानी हे सब घर,ठाँवे-ठाँव।
सबले सुग्घर हावय,हमरो गाँव।।
गीतिका छंद गीत(७३)
2122 2122 2122 212
मोंगरा के फूल जइसे तोर हे मुस्कान ओ।
तोर सुघराई मयारू ले जही का जान ओ।
महमहावय साँस अब्बड़ का मया रस घोरथे
होंठ लाली तँय रचाये खाय बीरो पान ओ।।
मोह डारे मोहनी ओ तोर माया जाल मा।
मस्त करिया तिल दिखत हे तोर गोरी गाल मा।।
नैन के काजर पिरोही मारथे बड़ बान ओ।।
मोंगरा के फूल जइसे तोर हे मुस्कान ओ।।
दाँत हीरा कस चमकथे जग अँजोरी छाय हे।
कान के झुमका मया के गीत सुघ्घर गाय हे।।
तोर बोली मा निकलथे कोइली के तान ओ।
मोंगरा के फूल जइसे तोर हे मुस्कान ओ।।
रास छन्द गीत श्रृंगार रस*(७४)
मया पिरित हा,नइ तो चिनहे,जात गियाँ।
आना करले,मया पिरित के,बात गियाँ।
मया मयारू,लिख ले दिल मा,लेख इहाँ।
दू दिन के ए,जिनगी हावय,देख इहाँ।।
सुख के देहँव,छँइहाँ,मँय दिनरात गियाँ।
मया पिरित हा,नइ तो चिनहे,जात गियाँ।।
तोर नाँव मँय,लिख दे हावँव,जान अपन।
मोला अब तो,जोही तँय हा,मान अपन।
तँय जी लेबे,भले मयारू,मोर बिना।
नइ जी पाहूँ,मँय मर जाहूँ,तोर बिना।।
मया पिरित के,करदे तँय बरसात गियाँ।
मया पिरित हा,नइ तो चिनहे जात गियाँ।।
भले जमाना,कतको जर लै,जोर मया।
मोला अब्बड़,भाथे गोई,तोर मया।
मन मंदिर के,देवी तँय हा,मोर बने।
मया पिरोही,मिसरी जइसे, घोर बने।।
मया नशा मा,आना जाबो,मात गियाँ।
मया पिरित हा,नइ तो चिनहे,जात गियाँ।।
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रूप माला आधारित गीत..(७५)
रूप लागे फूल गोंदा फूल गोंदा फूल।
कान मा लोरै दिवानी झूमका के झूल।
रूप लागे फूल गोंदा फूल गोंदा फूल।।
रातरानी कस गियाँ ओ अंग हा ममहाय।
तोर ममहाई पिरोही मोर मन ला भाय।
नैन के काजर करेजा मा लगावे शूल।
तोर ओ सूरजमुखी कस मस्त हे मुस्कान।
पाय हावस का विधाता ले बने वरदान।
मन उदासी लाय के करबे कभू झन भूल।।
कुकुभ गीत(७६)
छाय घटा ये करिया बादर,बरसावत हे पानी।
बिजली चमके बादर गरजे,बरसे बरखा रानी।।
सनन सनन बड़ हवा चलत हे,जाड़ा लागय भारी।
चिखला माते गली खोर मा,डर लागय अँधियारी।।
उमड़ घुमड़ के बरसत हावय,करय अपन मनमानी।
छाय घटा ये करिया बादर,बरसावत हे पानी।
हरियर हरियर रुखुवा होगे,होय मगन फुलवारी।
तरिया नदिया नरवा बाँधा,आगर झलकय धारी।।
ऐती ओती चारो कोती,दउँड़य सबो परानी।
छाय घटा ये करिया बादर,बरसावत हे पानी।।
करम फूल उपजाँवय भइया,ख़ूब करँय जी खेती।
करय किसानी सब मनखे मन,पेट भरे के सेती।।
पटपट पटपट बाजे अब्बड़,चुचवावय जी छानी
छाय घटा ये करिया बादर,बरसावत हे पानी..
सार छन्द गीत श्रृंगार (७७)
कभू दगा झन देबे संगी,नइ ते बड़ पछताबे।
मोर सहीं तँय ये दुनिया मा,संगीनइ तो पाबे।।
हँव दीवाना तोर नाँव के,सुन ले ओ दीवानी।
रोग मया के लागे हावय,दे दे मया निशानी।।
दीया बारे खोजत रहिबे,मया कहाँ ले लाबे।
कभू दगा झन देबे संगी,नइ ते बड़ पछताबे।।
तोर नाँव के जपथँव माला,सुन ले मन के मैना।
हिरदे के भीतर मा जोही,तिहीं हवस फुलकैना।।
तोर बिना रे मँय मर जाहूँ,कहूँ छोड़ के जाबे।
कभू दगा झन देबे संगी,नइ ते बड़ पछताबे।।
तिहीं मोर ओ चंदा रानी,मन के मोर तिजौरी।
मँय हा तोरे भोले शंकर,तैंहा हावस गौरी।।
हाथ छोड़ के झन तँय जाना,अउ कतका तरसाबे।
कभू दगा झन देबे संगी,नइ ते बड़ पछताबे।।
सार छन्द गीत श्रृंगार (७८)
कुआँ पार मा बइठे हावँव,सुरता तोर लमाये।
रस्ता तोरे जोहत हावँव,तँय कइसे नइ आये।।
छुनुर छुनुर बड़ पैरी बाजे,बोली गुरतुर बोले।।
मुड़ मा गगरी बोहे गोरी,कनिहा लिच लिच डोले।
धर के गगरी आजा गोरी,जोही तोर बलाये।
कुआँ पार मा बइठे हावँव,सुरता तोर लमाये।।
बने बहाना करके आबे,भर ले जाबे पानी।
देखे बर ओ नैना तरसे,सुन ले मोरे रानी।।
वो दिन के ओ सुरता आथे,नैना रोज लड़ाये।
कुआँ पार मा बइठे हावँव,सुरता तोर लमाये।।
झन तरसाना आजा गोरी,बाँध मया के बँधना।
दे देहूँ मँय चिनहा जोही,खिनवा चूरी कँगना।।
एक झलक देखँव ओ तोला,तरसत हँव बिन पाये।।
कुआँ पार मा बइठे हावँव,सुरता तोर लमाये।।
विरह गीत सरसी छंद (७९)
रहि रहि तोरे सपना आथे,जागत रहिथँव रात।
नैना मा तँय झूलत रहिथस,मन मा करथँव बात।।
रतिहा सपना तोर जगाथे,कर देथे झकझोर।
जाग जाग मँय हुलसत रहिथँव, सुरता आथे तोर।।
आवय नइ ये निंदिया बैरी, का निंदिया के जात।
रहि रहि तोरे सपना आथे,जागत रहिथँव रात।।
सपना मा तँय आके संगी, हरसाये मन मोर।
आके तँय हा कहाँ भगाथस,बन जाथस चितचोर।।
अलथ कलथ के रात पहावँव,हवय मिले के आस।
सपना मोरे सच हो जातिस,आते जब तँय पास।।
मन भर देख देख के तोला, करँव मया बरसात।
रहि रहि तोरे सपना आथे,जागत रहिथँव रात।
नैना मा तँय झूलत रहिथस, मन मा करथँव बात।
रहि रहि तोरे सपना आथे,जागत रहिथँव रात।।
सार छंद(८०)
वियोग श्रृंगार
अंतस के पीरा ला गोरी,देखे बर तँय आजा।
तँय मोरे ओ मन के रानी,अउ मँय तोरे राजा।।
सपना आके अबड़ सताथे,तरसत हावय चोला।
बोहत रहिथे आँसू झर झर ,सुरता करके तोला।।
मन भीतर मा बाजत हावय,गुदुम गुदुम ओ बाजा।
तँय मोरे ओ मन के रानी,अउ मँय तोरे राजा।।
तन मन मा ओ तहीं समाये,अनपानी नइ भावय।
घेरी बेरी आथे सुरता,छिन भर नइ तो जावय।।
मन मंदिर मा तहीं बिराजे,आके झलक दिखाजा।
तँय मोरे ओ मन के रानी,अउ मँय तोरे राजा।।
मोर दरद ला काला काहँव,सुन लेओ फुलकैना।
तहीं समझ पाबे ओ गोरी,मया पिरित के बैना।।
भरे जवानी हा तड़पत हे,पीरा हावय ताजा।
तँय मोरे ओ मन के रानी,अउ मँय तोरे राजा।।
आठो पहरी गावत रहिथौं,हमर मया के गाना।
तोर मया बर कलपय जिवरा,झन मोला तरसाना।।
बन के तहीं सुवारी संगी,मोर दुवारी आजा।
तँय मोरे ओ मन के रानी,अउ मँय तोरे राजा।।
सार छन्द गीत(८१)
धक ले जिंवरा करथे गोरी,बिन देखे ओ तोला।
गदगद मन हो जाथे जोही,तँय देखे ता मोला।
पइरी बाजे छन छन गोरी,मन ला मोही डारे।
नैना तोरे काजर वाले,करिया बादर हारे।।
मन बउरागे देख देख के,ठाढ़ जवानी सोला।
धक ले जिवरा करथे गोरी,बिन देखे ओ तोला।।
फुलकैना तँय मन मा छागे,मन मा मधुरस घोले।
कोयल जइसन गुरतुर हावय,बोली सुग्घर बोले।।
कहाँ लुकाये आना जोही, गोजँव बारी कोला।
धक ले जिवरा करथे गोरी,बिन देखे ओ तोला।।
बेनी मा ओ सोहे गजरा,फुलवा जइसन हाँसी।
फूल फुले जस आनी बानी,लगथस बारामासी।।
बन जा संगी मोर मयारू,तर जाही ओ चोला।
धक ले जिवरा करथे गोरी,बिन देखे ओ तोला।।
बँधे मया के हावय डोरी,नइ छूटय ओ बँधना।
बन जा ओ तँय मोर सुवारी,पहिराहूँ मँय कँगना।।
आवत हँव मँय धरे बराती,ले जाहूँ मँय डोला।
धक ले जिवरा करथे गोरी,बिन देखे ओ तोला।।
ताटंक गीत(८२)
तोर रूप के हँव दीवाना,झुलथस हरदम नैना मा।
का जादू का मंतर मारे,गुरतुर बोली बैना मा।।
आठो पहरी सुरता आथे,सुधबुध ला भूला डारे।
बन भौंरा कस माते रहिथौं,मया पिरित लहरा मारे।।
मोर हृदय मा बसके गोरी,दिखथस मन के ऐना मा।
तोर रूप के हँव दीवाना,झुलथस हरदम नैना मा।।
मन बगिया के भौंरा मैं हा,चंपा तिहीं चमेली ओ।
कुहु कुहु कुहके मन बगिया मा,कोयल सही नवेली ओ।।
साँवरिया तैं अपन बनाले,गुनते रहिथँव रैना मा।
तोर रूप के हँव दीवाना,झुलथस हरदम नैना मा।।
चंदा जइसे तोर रूप हे,मन मोरे मोहागे ओ।
अबड़ मया मैं करथौं गोरी,मोर हृदय मा छागे ओ।।
कोन जनी का जादू डारे,ये पिंजरा के मैना मा।
तोर रूप के हँव दीवाना,झुलथस हरदम नैना मा।।
गीतिका छंद-मँय दिवाना-(८३)
मँय दिवाना तोर हावँव,तँय दिवानी मोर ओ।
ए मया ला झन भुलाबे,मोर लेबे शोर ओ।
हे गज़ब के रूप गोई,चाँद हा शरमाय हे।
का बनाये हे बिधाता,मोर मन ललचाय हे।।
बाँध लैबे आ मयारू,तँय मया के डोर ओ।
मँय दिवाना तोर हावँव,तँय दिवानी मोर ओ।।
देंह गोरी सोन जइसे,रूप लागे फूल हे।
मोह डारे कान के ओ,तोर बाला झूल हे।।
माथ के चमके टिकुलिया,टारथे अँधियार ला।
नाक मा फुल्ली बरे जे,मोहथे संसार ला।।
देख के तोला लगे,जइसे मिले सुख भोर ओ।
मँय दिवाना तोर हावँव,तँय दिवानी मोर ओ।।
खोंच के ओ तँय किलिप ला,राख चूँदी बाँध के।
छोर अँचरा हा उड़त हे,ढ़ाँक जोंही खाँध के।।
मुचमुचाले तँय करौंदा,ये जनम हे सार ओ।
फेर नइ तो आय जिनगी,कर मया भरमार ओ।।
मोर हिरदे ला तहूँ,पखरा सहीं झन फोर ओ।
मँय दिवाना तोर हावँव,तँय दिवानी मोर ओ।।
सरसी छन्द गीत(८४)
मँय भारत हँव मँय भारत हँव,करौ सदा जयकार।
भाग्य बिधाता मँय हँव सबके,करथौ जी उद्धार।
उत्तर मा ए खड़े हिमालय,मोरे उन्नत भाल।
तीन दिशा सागर ले घिरके,करथौं माला-माल।।
पाँव पखारे गंगा निशिदिन,बहथे पावन धार।
मँय भारत हँव मँय भारत हँव,करौ सदा जयकार।।
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,सब झन मोरे लाल।
इँखर एकता भाई-चारा,हे पूजा के थाल।।
देशभक्ति सबके रगरग मा,करथें अब्बड़ प्यार।।
विश्व गुरू मँय कहिलाथौं जी,देथँव सब ला ज्ञान।
इहें तिरंगा झंडा फहरे,जे मोरे पहिचान।।
जम्मू ले कश्मीर सबो हा,हे मोरे परिवार।
मँय भारत हँव मँय भारत हँव,करौ सदा जयकार।।
सार छन्द गीत(८५)
*वियोग श्रृंगार रस*
कोरोना जग बैरी होगे,कइसे मिलबो जोही ।
कब ले दुरिहा रहिबो राजा,छिन-छिन अंतस रोही।।
एक झलक देखे बर तोला,तरसत रहिथे चोला।
घर ले बाहिर कइसे निकलँव,बाहिर बरसे गोला।।
रोग बढ़े अब चारो कोती,कोन जनी का होही।
कोरोना जग बौरी होगे,कइसे मिलबो जोही।।
मया-मयारू बिन सुन्ना मन,सुन्ना हे दिन रतिया।
कइसे जीबो ए जिनगी ला,धधकत रहिथे छतिया।।
जुलुम करे हे कोन बिधाता,अउ कतका दुख बोही।
कोरोना जग बैरी होगे,कइसे मिलबो जोही।।
लावनी छंद गीत नं.(८६)
तोर बिना मन नइ लागत हे,कब आबे तँय सँगवारी।
खड़े खड़े रद्दा जोहत हँव,आँखी फरकत हे भारी।।
छिन छिन आथे सुरता जोंही,मोर दरद ला मैं जानौं ।
मन नइ लागे कोनों कोती,तोही ला मितवा मानौं।।
सुरता तोर सताथे मोला,दिल मा चल जाथे आरी।।
तोर बिना मन नइ लागत हे,कब आबे तँय संगवारी।।
तोर दरश बर नैना रोवय,मन मा मोर बसाये हौं।
नैना के पुतरी मा तोला,काजर असन अँजाये हौं
अन पानी नइ भावय मोला,रहिथे थारी के थारी।
तोर बिना मन नइ लागत हे,कब आबे तँय सँगवारी।।
झन निरमोही बनबे जोंही,दया मया नइ हे तोला।
कइसे रहिथौं तोर बिना मँय,चूरत रहिथे ये चोला।।
आके दरश दिखा जा मैना,अभी मिले के हे पारी।
तोर बिना मन नइ लागत हे,कब आबे तँय सँगवारी।।
मया भुलावँव कइसे संगीअंतस मा तँय छाये हस,
नजर नज़र मा झूलत रहिथस,अब्बड़ मोला भाये हस।
तोर मया के पानी बिन ओ,सूखत हे मन के
बारी।।
तोर बिना मन नइ लागत हे,कबआबे तँय सँगवारी।।
लावनी गीत(८७)
तोर माथ के टिकली जोही,चंदा ला बिजरावत हे।
ऐती ओती चारो कोती,बजुरी ला चमकावत हे।।
तोर पाँव के पैरी गोई,छुनुर छुनुर बड़ बाजै ओ।
गुत्तुर गुत्तुर लागे अब्बड़,राग मया के साजै ओ।।
तोर रूप ला देखे बर ओ,सब मनखे सकलावत हे।
तोर माथ के टिकली जोही,चंदा ला बिजरावत हे।।
छाय घटा जस कारी चूँदी,जइसे बादर हारे ओ।
तोर नैन के कारी काजर,ठाढ़ कटारी मारे ओ ll
रूप मोहनी जादू मंतर,दुनिया ला भरमावत हे,
तोर माथ के टिकली जोही,चंदा ला बिजरावत हे।।
कोन बिधाता रूप गढ़े ओ,पाये कंचन काया ला
गाँव गली मा शोर उड़त हे,बगराये तँय माया ला।।
काया हावय चंदन जइसे,महर महर ममहावत हे।
तोर माथ के टिकली जोही,चंदा ला बिजरावत हे।।
सार छन्द गीत(८८)
हमर मया के बँधना संगी,छोरे मा नइ छूटै।
जुग जुग रइही मया परित हा,टोरे मा नइ टूटै।।
भले जमाना बैरी होवय,जिनगी संग पहाबो।।
मया दुवरिया मा सँगवारी,मिलके दीप जलाबो।
इहाँ जरइया मन के दिल हा,खपरा जइसे फूटै।
हमर मया के बँधना संगी,छोरे मा नइ छूटै।।
ए दुनिया मा हमर मया के,रखबो बने चिन्हारी।
महकाबो दूनों सँगवारी,मया पिरित फुलवारी।।
जात-पात के भेद करइया,मनके दम हा घूटै।
हमर मया के बँधना संगी,छोरे मा नइ छूटै।।
सार छन्द गीत(८९)
मोर मयारू तँय हा रानी,तोर हवँय मँय राजा।।
तोर मया के ए हिरदे मा, बाजत हावय बाजा।।
नाँव लिखा ले तोर हाथ मा,मोर के नाँव गोरी।
जिनगी भर चिनहा जाही,बाँध मया के डोरी।
हमर मया ममहावत राहय,तइसे फूल खिलाजा।
मोर मयारू तँय हा रानी,तोर हवँय मँय राजा।।
मन मंदिर के मोर देवता,रोज तोर हे पूजा।
तोर सिवा गा ए हिरदे मा,नइ हे कोनो दूजा।।
सदा खुले हे तोर मया बर,हिरदे के दरवाजा।
तोर मयारू मँय हा रानी,मोर हवस तँय राजा।।
ताटंक गीत (९०)
हमर मया के बगिया संगी,दुख मा अब मुरझाये हे।
कोन करम के फर ला संगी,इहाँ बिधाता लाये हे।।
कइसे तोला पाँवव बेटा,तँय आँखी के तारा गा।
तोर बिना ये जग अँधियारी,सुन्ना अँगना पारा गा।।
तोर बिना हम कइसे जीबो,तन-मन हा भरमाये हे।
हमर मया के बगिया संगी,दुख मा अब मुरझाये हे।।
तहीं अँजोरी ये बगिया के,कुल के तँय हा हीरा गा।
तर-तर रोवत हावय नैना,अंतस मा हे पीरा गा।।
आज विधाता हमर करम मा,दुख पीरा बरसाये हे।
हमर मया के बगिया संगी,दुख मा अब मुरझाये हे।
किलकारी अब कोन सुनाही,मया दुवारी बगिया मा।
आगी जइसे लगगे हावय,भभकय बैरी छतिया मा।।
कलपत हावय जिंवरा भारी,किस्मत रंग दिखाये हे।
हमर मया के बगिया संगी,दुख मा अब मुरझाये हे।।
दोहा गीत(९१)
बन जा चंदा मोर तँय,बनँव सुरुज मैं तोर।
जुग जुग रहिबो संग मा,मया पिरित रस घोर।।
सात जनम ले संग ला,छोड़व नइ ईमान।
मया हवय अनमोल ओ,थोरक तो पहिचान।।
काय खवा के मोहनी,मन ला हर ले मोर।
बनजा चंदा मोर तँय,बनँव सुरुज मैं तोर।।
चीर करेजा देख ले,तब होही बिसवास।
ये जिनगी हे तोर बर,रखले जोही आस।।
तिहीं मोर ओ सुंदरी,करले नैना चार।
मया पिरीत ला जान के,जिनगी बने गुजार।।
मया अमर हे जान ले,छुटे मया नइ डोर।
बनजा चंदा मोर तँय,बनँव सुरुज मैं तोर।।
मया बिना का काम के,कतको कर सिंगार।
मया पिरित के छाँव मा,बइठे हवँय हजार।
अपन मयारू मान ले,होगे हवस जवान।
काया के दिन चार हे,काबर हस अंजान।।
ताटंक गीत(९२)
का बरनँव महतारी महिमा,शब्द कहाँ ले पावँव।
एको अक्षर ला नइ जानँव,कइसे कलम चलावँव।।
महतारी कस इहाँ बिधाता,नइ हे कोनों दूजा।
मोर बिधाता महतारी हे,करौं रातदिन पूजा।
करौं वंदना चरण कमल के,काया फूल चघावँव।।
का बरनँव महतारी महिमा,शब्द कहाँ ले पावँव।।
महतारी के पबरित कोरा,सरग बरोबर लागय।
अँचरा के सुख छँइहाँ ले सब,दुख बाधा हर भागय।।
कभू चुका नइ पावँव करजा,बस मँय गुन ला गावँव।
का बरनँव महतारी महिमा,शब्द कहाँ ले पावँव।।
महतारी ममता ले होवय,जिनगी हा उजियारी।
बड़ महकावय घर अँगना ला,बनके खुद फुलवारी।।
अमरित जइसे गोरस पी के,भाग अपन चमकावँव।।
का बरनँव महतारी महिमा,शब्द कहाँ ले पावँव।।
छन्द गीत (९३)
मुटुर मुटुर बड़ देखे गोरी,कुलके बड़ अलबेली।
चिक्कन चिक्कन गाल हवय ओ,आँखी हे कजरेली।।
होठ तोर ओ लाली लाली,मुचमुच ले मुस्काये।
बोले गुरतुर गुरतुर बोली,बतरस ला बरसाये।।
फभे कान मा ढ़ार सोनहा,देखँय सबो सहेली।
चिक्कन चिक्कन गाल हवय ओ,आँखी हे कजरेली।।
कारी चूँदी लहराये ओ,दाँत बरय जस हीरा।
देखे भर मा तोला गोरी,मोर मिटय सब पीरा।।
हरियर लुगरा लाल पोलखा,अंग अंग ला साजे।
तोर पाँव के पैरी गोरी,छुनुर छुनुर बड़ बाजे।।
गर मा पहिरे हार सोन के,देखाये बरपेली।
चिक्कन चिक्कन गाल हवय ओ,आँखी हे कजरेली।
कंचन जइसन चमकत हावय,तोर गजब के काया।
चंदा घलो लजावत हावय,तोर देख के माया।।
कोन बिधाता गढ़े हवय ओ,कंचन काया पाये।
लगय चेहरा गोंदा फुलवा,मन बैरी ललचाये।।
तन अब्बड़ ममहावे गोरी,लागे फूल चमेली।
चिक्कन चिक्कन गाल हवय ओ आँखी हे कजरेली।।
सार छन्द गीत(९४)
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये।
चटक मटक हे रेंगना जोही,कनिहा ला लचकाये।।
उलहा पाना जइसन जोही,मन ला तँय डोलाये।
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये।।
कोयल जइसन गुरतुर बोली,मन ला अब्बड़ भाये।
कारी नागिन चूंदी तोरे,कनिहा ले लहराये।।
कनिहा करधन सोहत हावे,नैना बान चलाये।
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये।।
माथा मा ओ टिकली सोहे, लाली होठ लगाये।
आँखी तोरे हिरनी जइसन,काजर बने अँजाये।।
कोन गढ़े हे तोला रानी,अंतस ला भरमाये।
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये।।
तोर गोड़ के पइरी गोरी,छम छम गीत सुनाये।
हाथ बाँह मा कँगना चूरी,खनखन ओ खनकाये ।।
चमकत हावय कंचन काया,माया जाल फँसाये।
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये।।
बरवै छन्द गीत(९५)
धनी बिना नइ आवय,मोला चैन।
सुरता मा अब रोवत,हावय नैन।।
अइसे लगथे होगे,धनी पराय।
दूर शहर मा जाके,कहाँ लुकाय।।
धधकत हावय छतिया,लग गे आग।
आस मिले के छेड़य,मन हा राग।।
सपना देखँव मँय हा,अब दिन रैन
धनी बिना नइ आवय,मोला चैन।
मन मन करथौं अब तो,मँय हा बात।
मया पिरित के होही,कब बरसात।
ये बिरहा मा निकलत,हावय जान।
आके दरश दिखा जा,अब बयमान।।
ए हिरदे हा खोजय,गुरतुर बैन।
धनी बिना नइ आवय,मोला चैन।।
सार छन्द गीत(९६)
मोर मयारू तँय हा रानी,तोर हवँय मँय राजा।।
तोर मया के ए हिरदे मा, बाजत हावय बाजा।।
नाँव लिखा ले तोर हाथ मा,मोर के नाँव गोरी।
जिनगी भर चिनहा जाही,बाँध मया के डोरी।
हमर मया ममहावत राहय,तइसे फूल खिलाजा।
मोर मयारू तँय हा रानी,तोर हवँय मँय राजा।।
मन मंदिर के मोर देवता,रोज तोर हे पूजा।
तोर सिवा गा ए हिरदे मा,नइ हे कोनो दूजा।।
सदा खुले हे तोर मया बर,हिरदे के दरवाजा।
तोर मयारू मँय हा रानी,मोर हवस तँय राजा।।
सरसी छन्द गीत (९७)
चलौ बसालव सब मनखे मन,अंतस मा सतनाम।
भटके नइयाँ पार लगाही,बनही बिगड़े काम।।
सार नाम सतनाम हवय जी,कर लव एखर जाप।
मन के अवगुण छिन मा टरही,दुरिहाही चुपचाप।।
सत परमाण हवय तुम जाके,देखव गिरौद धाम।
चलौ बसालव सब मनखे मन,अंतस मा सतनाम।।
सुख के छँइहाँ पाहू संतो,धर लव मन मा धीर।।
सत रद्दा मा चलके खाहू,सत के मेवा खीर।।
नाँव अमर हो जाही जग मा,मिलही सत के दाम।।
चलौ बसालव सब मनखे मन,अंतस मा सतनाम।।
मनखे मनखे एक बरोबर,कहिथे गुरू हमार।
ऊँच-नीच के भेद-भाव ला,मन ले देवव टार।।
हाड़ माँस के ए काया हा,सबके एक्के चाम।
चलौ बसालव सब मनखे मन,अंतस मा सतनाम।।
सार छन्द गीत(९८)
(राखी)
रंग बिरंगी राखी धर के,बहिनी मइके आथे।
चंदन टीका माथ लगाके,राखी ला पहिराथे।।
भाई-बहिनी के नाता हा,जग मा होथे पावन।
सदा बरसथे दया मया हा,होथे सुख के सावन।।
रक्षा करके बहिनी मन के,भाई फरज निभाथे।
रंग-बिरंगी राखी धरके,बहिनी मइके आथे।
बँधे रहय ए मया डोर हा,बहिनी के ए आसा।
भाई के मन मा नइ देखय,बहिनी कभू निरासा।।
सुख होवय चाहे दुख होवय,भाई संग निभाथे।।
रंग-बिरंगी राखी धरके,बहिनी मइके आथे।।
अबड़ मयारू बहिनी होथे,जइसे सुख के सागर।
खुशी लुटाथे भाई मन बर,दया मया ला आगर।।
भाई के खुशहाली खातिर,निशदिन दुआ मनाथे।
रंग-बिरंगी राखी धरके,बहिनी मइके आथे।।
सरसी छन्द(९९)
ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।
संविधान ले मिले सबो ला,मानवता अधिकार।।
सबो ग्रंथ ले पावन ऐमा ,भरे ज्ञान के खान।
झन बदलव तुम संविधान ला,राखव ऐखर मान।।
सुघ्घर जिनगी ला जीये के,ऐही हे आधार।
ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।
संविधान ला पढ़के सबके,बने जागही भाग।
गावव मिलके नर-नारी मन,भीम राव के राग।।
संविधान के निरमाता ला,वंदन बारंबार।
ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।।
दलित मसीहा लिखे हवय जी,भारत के संविधान।
ए जग मा हे अलगे देखव,भारत के पहिचान।।
जानौ समझौ अपनावौ जी,अब तो झारा-झार।
ये भारत भुँइयाँ के संगी,संविधान हे सार।।
मुक्तामणि छन्द गीत
गाड़ सकौ ता गाड़ लौ,मानवता के झंडा।
लगय नहीं एमा कभू,कोनो मुल्ला पंडा।।
मानवता सबले बड़े,धर्म हवय पहिचानौ।
मनखे हव मनखे सहीं,भाई-चारा लानौ।।
जात-धरम के भेद मा,झन भाँजवजी डंडा।
गाड़ सकौ ता गाड़ लौ,मानवता के झंडा।
ऊँच-नीच के भावना,अंतस ले तुम टारौ।
इरखा जम्मो छोड़ के,जोत मया के बारौ।।
दया मया हा सार हे,भर लव बटुवा हंड़ा।।
गाड़ सकौ ता गाड़ लौ,मानवता के झंडा।
मनखे मनखे एक हव,राखव भाई-चारा।
सत रद्दा मा रेंगलव,मिलके झारा-झारा।।
रहय एकता देश मा,जोश परै झन ठंडा।
गाड़ सकौ ता गाड़ लौ,मानवता के झंडा।।
प्रदीप छन्द गीत-महँगाई
दुखदाई मा जीना होगे,अब कइसन दिन आय हे।
महँगाई महँगाई संगी,चारो कोती छाय हे।।
जनता मन के आँसू झरथे,मँहगाई के मार मा।
लदकाये हें जनता मन हा,मँहगाई के भार मा।।
नेता मन के माल ख़जाना,सत्ता कुरसी भाय हे।
महँगाई महँगाई संगी,सबो जिनिस मा छाय हे।।
छप्पन भोग डकारँय भइया,नेता मालामाल जी।
महँगाई बैरी के सेती,जनता मन बेहाल जी।।
कइसे चलही जिनगी सबके,अंतस हा करलाय हे।
महँगाई महँगाई संगी,चारो कोती छाय हे।।
कोन उबारय महँगाई ले,कोन बने सरकार गा।
आज भरोसा काखर करबो,कोन करै उद्धार गा।
अच्छा दिन के आस लगा के,जनता ला भरमाय हे।
महँगाई महँगाई संगी,चारो कोती छाय हे।।
अनुक्रमणिका
क्र.
(१) दोहा छन्द गीत-गुरू सहीं
(२)सरसी छन्द गीत-गुरू चरण
(३)सार छन्द गीत-पाँव परत हँव दाई
(४)आल्हा छन्द गीत-भारत माँ के बेटा
(५)सार छन्द गीत-हमर देश के
(६)उल्लाला छन्द गीत-गाँव रे
(७)दोहा छन्द गीत-सबले सुघ्घर देश
(८)सार छन्द गीत-भाव भजन
(९)सार छन्द गीत-मोर दुलौरिन बेटी
(१०)सार छन्द गीत-दया मया हे सार
(११)ताटंक छन्द गीत-देशी ला अपनाना हे
(१२)सार छन्द गीत-मोर मिनी माता
(१३)सरसी छन्द गीत-काबर करथौ रे पापी
(१४)सरसी छन्द गीत-ठाँव-ठाँव रावन
(१५)ताटंक+सरसी गीत-सरवन जइसे
(१६)बरवै छन्द गीत-मोर दुलौरिन
(१७)सार छन्द गीत-मोर दुलरवा
(१८)सरसी छन्द गीत-रितु बसंत
(१९)सरसी छन्द गीत-ऋतु बसंती
(२०)ताटंक छन्द गीत-ऋतु बसंत के दिन
(२१)सार छन्द गीत-बरसै पानी
(२२)सार छन्द गीत-दया-मया के रस
(२३)ताटंक छन्द गीत-मयारू मैना
(२४)सरसी छन्द गीत-मोर मयारू
(२५)कुकुभ छन्द गीत-चंदन जइसे काया
(२६)कुकुभ छन्द गीत-मन बगिया मा
(२७)ताटंक छन्द गीत-मया छोड़ के
(२८)ताटंक छन्द गीत-बइठे-बइठे
(२९)उल्लाला छन्द गीत-बिरथा जिनगी
(३०)लावनी छन्द गीत-कुहके कारी
(३१)कुकुभ छन्द गीत-काबर छोड़े मोला
(३२)ताटंक छन्द गीत-लाली पिंवरी लुगरा
(३३)सार छन्द गीत-तँय आ जाबे
(३४)सार छन्द गीत-देखे काबर गोरी
(३५)उल्लाला छन्द गीत-रूप लगे मनमोहनी
(३६)ताटंक छन्द गीत-मन के रानी
(३७)ताटंक छन्द गीत-नदिया के तिर
(३८)ताटंक छन्द गीत-चल सँगवारी
(३९)ताटंक छन्द गीत-पुन्नी के चंदा
(४०)सरसी छन्द गीत-राजा दिलदार
(४१)सार छन्द गीत-जोही काबर
(४२)सार छन्द गीत-सुरता सुरता
(४३)ताटंक छन्द गीत-बरसा रानी
(४४)सरसी छन्द गीत-ढीले चोखी बान
(४५)कुकुभ छन्द गीत-मया-पिरित
(४६)ताटंक छन्द गीत-गीत कोइली
(४७)दोहा छन्द गीत-मध बगिया
(४८)बरवै छन्द गीत-गियाँ बिना
(४९)कुकुभ छन्द गीत-आँखी के काजर
(५०)कुकुभ छन्द गीत-गोंदा फुलवा
(५१)ताटंक छन्द गीत-ए चंदा रे
(५२)सार छन्द गीत-आँखी ले आँसू
(५३)ताटंक छन्द गीत-चंदा उतरे हे
(५४)सरसी छन्द गीत-बेलबेलही
(५५)ताटंक छन्द गीत-कबले दुरिहा रहिबे
(५६)कुकुभ छन्द गीत-सावन झूला
(५७)विष्णुपद छन्द गीत-देखत हावँव
(५८)कुकुभ छन्द गीत-मोर संग तँय
(५९)सार छन्द गीत-तँय छोड़े काबर चंदा
(६०)ताटंक छन्द गीत-मटकत कुलकत
(६१)सार छन्द गीत-रूप मोहनी
(६२)सार छन्द गीत-मोर मया ला
(६३)सरसी छन्द गीत-अतका अच्छा काबर
(६४)दोहा छन्द गीत-मया-पिरित के डोर
(६५)मानव छन्द गीत-धोखा मोला
(६६)कुकुभ छन्द गीत-मया बढ़ा के
(६७)सार छन्द गीत-मीठ मिसरी
(६८)प्रदीप छन्द गीत-चरदिनिया जिनगानी
(७९)हरिगीतिका छन्द गीत-ए तोर नैना
(७०)गीतिका छन्द गीत-नानपन के दोस्ती
(७१)सरसी छन्द गीत-उठव-उठव गा
(७२)बरवै छन्द गीत-हमरो गाँव
(७३)गीतिका छन्द गीत-मोंगरा के फूल
(७४)रास छन्द गीत-मया-पिरित
(७५)रूपमाला छन्द गीत-मोंगरा के फूल
(७६)कुकुभ छन्द गीत-छाय घटा ये
(७७)सार छन्द गीत-कभू दगा झन देबे
(७८)सार छन्द गीत-कुआँ पार मा
(७९)सरसी छन्द गीत-सपना आथे
(८०)सार छन्द गीत-अंतस के पीरा
(८१)सार छन्द गीत-धकले जिंवरा करथे
(८२)ताटंक छन्द गीत-तोर रूप के
(८३)गीतिका छन्द गीत-मँय दिवाना
(८४)सरसी छन्द गीत-मँय भारत हँव
(८५)सार छन्द गीत-कोरोना जग बैरी
(८६)लावनी छन्द गीत-तोर बिना मन
(८७)लावनी छन्द गीत-तोर माथ के टिकली
(८८)सार छन्द गीत-हमर मया के बँधना
(८९)सार छन्द गीत-मोर मयारू रानी
(९०)ताटंक छन्द गीत-हमर मया के बगिया
(९१)दोहा छन्द गीत-चंदा मोर
(९२)-सार छन्द गीत-महतारी महिमा
(९३)सार छन्द गीत-मुटुर-मुटुर
(९४)सार छन्द गीत-रूप गजब हे
(९५)बरवै छन्द गीत-धनी बिना
(९६)सार छन्द गीत-मोर मयारू
(९७)सरसी छन्द गीत-अंतस मा सतनाम
(९८)सार छन्द गीत-रंग-बिरंगी राखी
(९९)सरसी छन्द गीत-संविधान हे सार
(१००)मुक्तामणी छन्द गीत-गाड़ सकौ ता
(१०१) प्रदीप छन्द गीत-महँगाई
संप्रति
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
शिक्षा-एम.ए. (हिन्दी) बी.एड.
व्यावसाय-(शिक्षक) व्याख्याता शा.उ.मा.वि.इंदौरी जिला कबीरधाम
जन्म-१४-०६-१९८०
रुचि-छन्द,गीत,ग़ज़ल
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