ग़ज़ल भाग-5
ग़ज़ल(1)
वज़्न-212 212 212 2
आशियां मत किसी का जलाओ
जुगनुओं सा मगर जगमगाओ
ऐ ख़ुदा इस वबा को भगाओ
जान सबकी जहां में बचाओ
फ़लसफ़ा जिंदगी का यही है
ग़म मिले या ख़ुशी मुस्कुराओ
आह दिल पे तुम्हारे लगेगी
मुफ़लिसों को कभी मत सताओ
तुम हँसो अब हमें भी हँसाकर
हौसला इस तरह तुम बढ़ाओ
मत करो दूर तुम अज़नबी सा
पास आकर गले से लगाओ
जां लुटा दो मगर दोस्ती में
बेवज़ह मत कभी आज़माओ
मौज दिल से कही है ग़ज़ल जो
है गुज़ारिश ज़रा गुनगुनाओ
ग़ज़ल(2)
वज़्न-122 122 122 12
न विष का जुबां पे असर रख के चल
मुहब्बत का दिल में हुनर रख के चल
सदा मुस्कुरा कर भुला ग़म सभी
भरा हौसलों से जिगर रख के चल
न अपनों को करना पराया कभी
सभी की हमेशा ख़बर रख के चल
कदम डगमगाना नहीं हार के
यहाँ शेर जैसा जिगर रख के चल
संवर जायेगी ज़िंदगानी तेरी
तू चरणों में बस माँ के सर रख के चल
मिली ज़िंदगी चार दिन के लिए
लबों पे हँसी हर पहर रख के चल
मिलेगी वो मंज़िल कदम तो बढा
यहाँ मौज इक हमसफ़र रख के चल
ग़ज़ल(3)
वज़्न-2122 1212 22(112)
तीरगी से निकाल दे कोई
आके अब तो उजाल दे कोई
फिर सुदामा किशन के जैसी ही
दोस्ती की मिसाल दे कोई
मौत का हर तरफ़ है मंज़र अब
इस मुसीबत को टाल दे कोई
ज़िंदगी मुफ़लिसी में चलती है
कैसे बच्चों को पाल दे कोई
मैं वतन के लिए लडू्ँ हरदम
इन रगों में उबाल दे कोई
मौज देखी किसान की पीड़ा
ऐ ख़ुदा मत अकाल दे कोई
ग़ज़ल(4)
वज़्न-1212 1122 1212 22
मैं नफ़रतों को मिटाने की बात करता हूँ
मुहब्बतों को बढ़ाने की बात करता हूँ
बहा के देख ज़रा खूँ पसीना खेतों में
यूँ मेहनतों से कमाने की बात करता हूँ
यूँ दोस्तों के लिए जान भी लुटा दूँगा
मैं दोस्ती को निभाने की बात करता हूँ
वो मार देते हैं क्यों पेट में ही बेटी को
मैं बेटियों को बचाने की बात करता हूँ
मेरे वतन के जो दुश्मन है मौज देखो तो
मैं उनको धूल चटाने की बात करता हूँ
ग़ज़ल{5}
वज़्न-2122 1122 1122 22
हद से ज़्यादा यूँ सनम तुझसे वफ़ा करते हैं
बस तुम्हारी ही मुहब्बत का नशा करते हैं
जीत जाते हैं हरिक जंग यहाँ लड़ कर वो
हौसला रख के जिगर में जो चला करते है
अपने हाथों की कमाई पे बसर करता हूँ
कामयाबी से मेरी लोग जला करते हैं
आज देखो ये ज़माने ने न सच को जाना
लोग सच बात भी कहने से डरा करते हैं
मौज अब ख़ौफ़ वबा का है इसी डर से बस
बंद कमरों में यहाँ लोग रहा करते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(6)
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
हर तरफ़ मौत का साया है ख़ुदा ख़ैर करे
आदमी ख़ौफ़ में ज़िन्दा है ख़ुदा ख़ैर करे
क़ैद अपने ही मकानों में हुआ है देखो
आदमी है कि परिंदा है ख़ुदा खैर करे
है क़यामत सा सफ़र धूप जलाती है बदन
कोई मंज़िल है न रस्ता है ख़ुदा ख़ैर करे
इतना आसां तो नहीं इसमें सफल हो जाना
वक़्त बेवक़्त परीक्षा है ख़ुदा ख़ैर करे
आज के दौर में उम्मीदें वफ़ा किससे करूँ
अब तो अपना भी पराया है ख़ुदा ख़ैर करे
ख़त्म हो सिलसिला ये दौरे-वबा का ऐ मौज
दिल से अपनी ये तमन्ना है ख़ुदा ख़ैर करे
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(7)
वज़्न-1212 1122 1212 22/112
रहे कहीं भी सलामत रखे ख़ुदा उसको
कभी न करना पड़े ग़म का सामना उसको
जो दुश्मनों को हरा दे वतन की खातिर ही
कभी तो करने दिया कर मुकाबला उसको
भटक गया जो यहाँ रास्ता अँधेरों में
दिखा दिया भी करो सीधा रास्ता उसको
वो ग्राहकों को हमेशा ही लूटता रहता
हरेक चीज में होता है फायदा उसको
कराहता हो हमेशा जो दर्द के मारे
ऐ मौज जा के कभी दे न तू दवा उसको
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(8)
वज़्न-2122 1122 1122 22
ख़्वाब *जब* उनके ही आते हैं चले जाते हैं
मेरी उलझन को बढ़ाते हैं चले जाते हैं
पास आते हैं कभी मुझसे दिलासा लेने
अश्क़ आँखों से बहाते हैं चले जाते हैं
देख के आज अकेले में किसी लड़की को
बेवज़ह लड़के चिढ़ाते हैं चले जाते हैं
शह न देना ये कभी गैर वतन वालों को
आग गुलशन में लगाते हैं चले जाते हैं
मतलबी लोग हैं उम्मीद करूँ मैं कैसे
दिल में काँटें वो चुभाते हैं चले जाते हैं
तुम फ़कीरों की दुआ मौज हमेशा लेना
राह सच की वो दिखाते हैं चले जाते हैं
ग़ज़ल(9)
वज़्न-1222 1222 1222 1222
हमेशा घूस के बल पर ही अफ़सर ऐश करता है
यही अपनी कमाई है ये कह कर ऐश करता है
तसव्वुर राम का रहता हमेशा उसकी आँखों में
ख़ुदी को भूल कर शायद कलंदर ऐश करता है
भला जनता का कैसे हो नहीं नेता ने कुछ सोचा
सदा वो बैठ के ऐसी के अंदर ऐश करता है
मुहब्बत को समझ बैठा खिलौना आदमी अक़्सर
मुहब्बत में रुलाके यूँ सितमगर ऐश करता है
ग़ज़ल हो *मौज* या हो गीत बस दिल से लिखा कर तू
किसी की वाह वाही से सुखनवर ऐश करता है
ग़ज़ल(10)
वज़्न-2122 1212 22/112
वक़्त का देख लो तक़ाज़ा है
हर तरफ़ ही यहाँ निराशा है
मुफ़लिसों का नहीं सहारा है
हर कोई उनको ही सताता है
यार सच्चा वही तो है अपना
मुश्किलों में जो साथ आता है
मुस्कुराके सदा यहाँ जी लो
ज़िदगी का नहीं ठिकाना है
चार दिन का है ये झमेला सब
मौत आने पे सबको जाना है
आने जाने की रीत है पक्की
मौत बस ढूँढती बहाना है
बोझ ग़म का उठा उठा के अब
ज़िंदगी बन गई तमाशा है
मौज माँ बाप की दुआ ने ही
हर्फ़ दर हर्फ़ को निखारा है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
अंग्रेजी क़ाफ़िया में
ग़ज़ल(12)
वज़्न-2122 1212 22
ज़ख़्म की माँ ही होती सर्जन है
मेरी नज़रों में माँ जी एवन है
पाक होता है सारी दुनिया में
माँ पिता का जो यह रिलेशन है
काम होता नहीं कभी अच्छा
दफ्तरों में बहुत करप्शन है
क्या किसानी किसान से होगी
रोज बिगड़ा हुआ ये सीज़न है
उसके दम पे ये साँस है चलती
मेरे दिल का सनम ही इंजन है
माँगने वोट सिर्फ़ यह आते
*मौज* हर नेता का ये फ़ैशन है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(13)
वज़्न-2122 1212 22/112
वक़्त का बस यही तक़ाज़ा है
ग़म से लड़ना ही इक मुदावा है
मुफ़लिसों का नहीं सहारा है
हर कोई उनको ही सताता है
यार सच्चा वही तो है अपना
मुश्किलों में जो साथ आता है
मुस्कुराके सदा यहाँ जी लो
ज़िदगी का नहीं ठिकाना है
चार दिन का है ये झमेला सब
मौत आने पे सबको जाना है
आने जाने की रीत है पक्की
मौत बस ढूँढती बहाना है
बोझ ग़म का उठा उठा के अब
ज़िंदगी बन गई तमाशा है
*मौज* माँ बाप की दुआ ने ही
मुश्किलों से मुझे उबारा है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(14)
वज़्न-2122 1122 1122 22(112)
मेरे आँगन में बगीचे की जगह खाली है
ऐ सनम तेरे टहलने की जगह खाली है
एक पौधा ही लगाले तू हवा पाने को
देख तो नल के किनारे की जगह खाली है
इस ज़मी पे ए ख़ुदा भेज मसीहा कोई
कुल ज़माने में फ़रिश्ते की जगह खाली है
अब तो फुटपाथ पे लोगों ने दुकानें रख ली
अब कहाँ देश में धंधे की जगह खाली है
मौज चिठ्ठी मैं लिखूँ वीर जवानों के लिए
जोश भर दूँ मैं लिफ़ाफ़े की जगह खाली है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(15)
212 212 212 2
जख़्म में ताज़गी हो गई है
दर्द से आशिक़ी हो गई है
साँस चलती है उसके ही दम से
*वो मेरी ज़िंदगी हो गई है*
वाह कहने लगे लोग पढ़कर
क्या हसीं शायरी हो गई है
मेरे अरमानों की इक चिता से
हर तरफ़ रोशनी हो गई है
ग़म ख़ुशी *मौज*हम किससे बाँटें
सूनी हर इक गली हो गई है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा
ग़ज़ल(16)
वज्न-212 212 212 212
बस मुहब्बत का दिल में नशा रह गया
ज़िन्दगी में यही इक मज़ा रह गया
मेरे महबूब में दाग़ कोई नहीं
चाँद पे दाग़ देखो लगा रह गया
याद में उन शहीदों की अहल-ए-वतन
एक दीपक सा दिल में जला रह गया
दोस्ती को निभाया हरिक तौर ही
दोस्तों से यूँ रिश्ता बचा रह गया
मुफ़लिसी में नहीं ज़िन्दगी हो कोई
"मौज" रब से दुआ माँगता रह गया
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(17)
वज़्न-2122 1122 1122 22
मेरे महबूब के नख़रे भी अदा होते हैं
मैं न तारीफ़ करूँ तो वो ख़फ़ा होते हैं
लाख करते रहे हम उनसे वफ़ाएं लेकिन
उनके इल्ज़ाम हमें फिर भी अता होते हैं
काम आते हैं बुरे वक़्त में जो भी अपने
हम ग़रीबों के लिए वो ही ख़ुदा होते हैं
मेरे माँ बाप का आलम है यही मुद्दत से
सुब्ह होते ही वो बस महवे-दुआ होते हैं
*मौज* जो लोग फ़लक छूते हैं इक रोज़ यक़ीं
उनके अंदाज़ ज़माने से जुदा होते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(18)
वज़्न-2122 1122 1122 22
हम तो हर वक़्त मुहब्बत का नशा करते हैं
दिल से नफ़रत को मिटा के ही जिया करते हैं
आँच आने नहीं देंगे कभी इस गुलशन में
जान अपनी ऐ वतन तुझपे फ़ना करते हैं
हम निभाते हैं हरिक तौर पे सबसे रिश्ते
फिर भी कुछ लोग मगर हमसे दग़ा करते हैं
मयकशी में जो जलाते हैं यहाँ घर अपना
लोग ऐसे ही सदा हाथ मला करते हैं
ग़म के साये भी कभी पास अगर आये तो
मुस्कुराहट से हरिक ग़म की दवा करते हैं
*मौज* आबाद हमेशा ही रहे यह दुनिया
आओ सबके ही लिए आज दुआ करते हैं
ग़ज़ल(19)
वज़्न-2122 2122 2122 212
ज़िंदगी के ग़म सभी दिल में दबाते रह गये
और उनको भूलकर हम मुस्कराते रह गये
क्या बतायें मुफ़लिसी में हाल यूँ बेहाल है
जबकि हरदम खूँ पसीना हम बहाते रह गये
धूप में जलते बदन को चैन कुछ मिल जाए सो
झोपड़ी साये की ख़ातिर हम बनाते रह गये
सिर्फ़ बातों से हमें बहला के सारे रहनुमा
तोड़ कर विश्वास घर अपना सजाते रह गये
*मौज* ने चाहा जिसे उसको कभी पाया नहीं
इसलिए आँखों में उसकी अश्क़ आते रह गये
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(20)
वज़्न-2122 1122 1122 112
बेवफ़ाई का सनम मुझको यूँ इलज़ाम न दो
इस मुहब्बत का कभी ऐसे भी ईनाम न दो
हम तो मजदूर हैं बस काम की लत है हमको
काम इबादात है बराए ख़ुदा आराम न दो
प्यार आबाद रहे दिल में सभी लोगों के
नफ़रतों का जहाँ में एक भी पैग़ाम न दो
ग़म के दरिया में कभी डूब के मैं मर जाऊँ
ऐसी हर्गिज़ मुझे तुम कोई सुबह-शाम न दो
वो जिसे पीने के आदाब नहीं है साकी
ऐसे क़मबख़्त को महफ़िल में कभी जाम न दो
डर गुनाहों का सताता है उसे ख़ूब यहाँ,
ब'ख़ुदा दिल में कभी मौज के असकाम न दो
साकी=शराब पिलाने वाला
असकाम=बुराई,दोष
आदाब=अदब,कायदा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(21)
वज़्न-2122 1122 1122 112(22)
जब भी सोचेगा मेरी याद भुलाने के लिए
इतना आसान नहीं होगा ज़माने के लिए
मेरी सरकार जवानों को निठल्ला न बना
हाथ में काम मिले उनको कमाने के लिए
सोच इंसान जहां में हैं बराबर सारे
कोई मज़लूम नहीं होता सताने के लिए
मुस्कुराता हूँ सदा फ़िक्र नहीं करता मैं
बात इतनी ही सहीं हाल सुनाने के लिए
दिल से नफ़रत को निकालूँगा मेरा वादा है
उल्फ़तों का मैं चला बाग़ लगाने के लिए
गिरह
रूठ जाते हैं सनम बात न होती कुछ भी
हमने क्या क्या न किया उनको मनाने के लिए
मौत आनी है अगर *मौज* तो आ जायेगी
दस बहाने हैं ख़ुदा पास बुलाने के लिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (22)
बड़ा जबसे हुआ बच्चा हमारा
नहीं वो मानता कहना हमारा
अगर चाहो कभी भी आज़मालो
मिटा सकते नहीं ज़ज़्बा हमारा
ज़रा-सी ठेस से ही टूट जाये
नहीं कमज़ोर यूँ रिश्ता हमारा
शराफ़त से ही मिलते हैं सभी से
तभी है हर जगह चर्चा हमारा।
बहुत मँहगा हुआ सामान देखो
बढ़ा है ख़ूब अब खर्चा हमारा
जियो तुम मौज हरदम मुस्कुराकर
यही कहता सदा मौला हमारा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(23)
वज़्न-212 212 212 2
दिल मेरा ख़ुशनुमा हो गया है
प्यार का सिलसिला हो गया है
सच कहो तो यहाँ कौन माने
झूठ का बोलना हो गया है
आज दिखती नहीं है शराफ़त
आदमी अब बुरा हो गया है
हर घड़ी दाँव पर दाँव लगता
आज जीना जुआ हो गया है
ग्राहकों को सदा लूट कर के
सेठ का फ़ायदा हो गया है
अहमियत रिश्तों की मिट गई अब
और पैसा बड़ा हो गया है
देखकर *मौज* की वो सदाकत
जानो-दिल से फ़िदा हो गया है
ग़़ज़ल(24)
वज़्न-1222 1222 1222 1222
जो गुज़रे तेरी क़ुरबत में वो अक्सर याद आते हैं
मुहब्बत के हसीं वो पल ऐ दिलबर याद आते हैं
ग़रीबी में ही तो आटा हुआ गीला सदा अपना
हमेशा बदनसीबी के ही मंज़र याद आते हैं
पिता की डाँट माँ का प्यार ही थे मिल्कियत अपनी
वो पल थे हम मुक़द्दर का सिकंदर याद आते हैं
हमारे यार बचपन के भले हों दूर आँखों से
दिलों में आज भी रहकर बराबर याद आते हैं
कभी थे मौज हम सजदा-रवाँ उनके हुज़ूर आख़िर
ख़ुदा की शक्ल में निकले जो पत्थर याद आते हैं
ग़ज़ल(25)
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
माँ की तालीम से सीखा* है मुहब्बत करना
मुझको आता ही नहीं अपनों से नफ़रत करना
मज़हबी लोग सताते हैं मुझे अक्सर ही
अपनी फितरत में नहीं फिर भी अदावत करना
ख़्वाब जो देखा गरीबों की तरक्की के लिए
आरज़ू है इसे पल भर में हक़ीक़त करना
मुश्किलों से ही फ़क़त भूख को सह पाता हूँ
यह ख़ुदा सोच के दुनिया की निज़ामत करना
है सितमगर ये ज़माना भी सितम ढाता है
ऐसे लोगों की ख़ुदा आप हजामत करना
हो गया सीना अगर छलनी तो घबराना मत
मौज हर हाल वतन की तू हिफ़ाज़त करना
ग़ज़ल(26)
वज़्न-221 2121 1221 212
किस्से सुनाऊँ कैसे यहाँ अपने प्यार के
कोई न हाल समझे दिले बेक़रार के
देने में चोट देर लगाते नहीं हैं लोग
क्या-क्या सिले मिले हैं मेरे ऐतबार के
मेहनत से बाल-बच्चे पढ़ाते गरीब लोग
लाले पड़े हुए हैं इन्हें रोजगार के
नफ़रत की मंज़िलों को गिराने में है मज़ा
हैं रंजिशें भगानी सभी मार मार के
हम फूँक फूँक के ही डगर चलते हैं सदा
रखते हैं अपने आपको हरदम सुधार के
ऐ *मौज* पतझड़ों सा तेरा ग़म भी झड़ गया
यूँ लौट आये फिर से यहाँ दिन बहार के
ग़ज़ल(27)
वज़्न-1212 1122 1212 22/112
हमीं तो सह के सितम मुस्कुराने वाले थे
हर एक सम्त जहाँ दिल दुखाने वाले थे
उतर गये हैं नज़र से वो हमसे करके दगा
वो यार यार नहीं मुफ़्त खाने वाले थे
पिता के दम पे ही देखे थे ख़्वाब हमने सब
वही अकेले तो घर में कमाने वाले थे
मुसीबतों में कोई साथ मेरे था ही नहीं
मिली ख़ुशी तो कई मुस्कुराने वाले थे
गमों की मौज से क्यों आज खुद परेशाँ है
हँसी लबों पे सभी के जो लाने वाले थे
ग़ज़ल(28)
वज्न-2122 2122 212
कौन मुफ़लिस का सहारा देखिए
है नहीं हासिल निवाला देखिए
ग़म ही ग़म मिलता जहां में आजकल
ज़िन्दगी अब है तमाशा देखिए
अब बुजुर्गों की नहीं सुनता कोई
यूँ अदब का भूल जाना देखिए
नौजवां होकर कमाता कुछ नहीं
बन गया बेटा नकारा देखिए
मौज जिसको मानते अपना हैं हम
अब उसे बस मुँह छिपाता देखिए
ग़ज़ल(29)
वज़्न-221 1221 1221 122
क्यों मौत का इम्कान यहाँ देख रहा हूँ
रोता हुआ इंसान यहाँ देख रहा हूँ
पहले तो मिला करते थे आपस में सभी लोग
अब हर गली वीरान यहाँ देख रहा हूँ
अब कौन भरोसे के भी लायक है जहां में
बिकता हुआ ईमान यहाँ देख रहा हूँ
बारूद के ढेरों पे ही इंसान है बैठा
अब मौत का सामान यहाँ देख रहा हूँ
मिलता नहीं है काम कभी हाथ में उनके
हर शख़्स परेशान यहाँ देख रहा हूँ
ऐ मौज करेगा तू भला कैसे किसी का
तू कितना है नादान यहाँ देख रहा हूँ
ग़ज़ल(30)
वज़्न-2122 1122 1122 22
तू रहे ख़ुश तुझे यूँ रोज़ हँसाते रहते
हम मुहब्बत को इसी तौर निभाते रहते
एक रोटी ही खिला दे जो अगर मुफ़लिस को
पेट की आग ज़रा वो भी बुझाते रहते
नफ़रतों को ही सभी मिलके मिटा देते तो
बाग़ उल्फ़त के यहाँ ख़ूब सजाते रहते
क़ाश सब लोग समझदार यहाँ बन जायें
दुश्मनी भूल गले सबको लगाते रहते
अब बुजुर्गों की यहाँ सुनता नहीं कोई भी
हाल अपना वो तो रो-रो के सुनाते रहते
*मौज*का मसविरा मानेगा भला कौन यहाँ
मानते लोग तो सब मौज मनाते रहते
ग़ज़ल(31)
वज़्न-2122 2122 212
नफ़रतों से दिल सदा अंजान है
प्यार करना ही मेरी पहचान है
मतलबी बनकर जहाँ मे रह गया
बदला बदला आज का इंसान है
कौन क़ाबिल है भरोसे का यहाँ
अब कहीं दिखता नहीं ईमान है
आज़माके देख लो अब दोस्तो
दोस्ती पे जां मेरी कुर्बान है
मज़हबी झगड़ों से रहने दूर ही
बस ख़ुदा का एक ही फ़रमान है
मुस्कुराके मौज गम को दूर कर
ज़िन्दगी इससे समझ आसान है
ग़ज़ल(32)
वज़्न-212 212 212 212
मुफ़लिसी में ख़ुशी से जिया कौन है
भूख के दर्द को सह सका कौन है
जी रहा मर रहा हूँ किसे क्या पता
हाल मेरा यहाँ पूँछता कौन है
लोग कहते सभी आदमी है बुरा
आदमी है बुरा तो भला कौन है
दोस्ती में दग़ा हम न पाते कभी
शक्ल से जानते दोगला कौन है
मेरी आँखों में सब झाँक कर देखले
मेरे दिल की हसीं दिलरुबा कौन है
झूठ ही झूठ है हर तरफ़ आज कल
*मौज* अब सच यहाँ बोलता कौन है
ग़ज़ल(33)
वज़्न-122122122122
नहीं मैं किसी से अदावत करूँगा
सभी से हमेशा मुहब्बत करूँगा
अगर मुफ़लिसों को सताया कभी तो
खुदा से तुम्हारी शिक़ायत करूँगा
सलामत रहें लोग है ये तमन्ना
सभी के लिए मैं इबादत करूँगा
मेरी जान कुरबां वतन के लिए है
वतन की हमेशा हिफ़ाजत करूँगा
बदल दूँ ज़माना अगर साथ दो तो
वो चैनों सुकूँ की निज़ामत करूँगा
हँसाना सिखाऊँ गमों को मिटा कर
हरी अब सभी की तबीयत करूँगा
निभाकर यहाँ मौज रिश्ते सभी से
सभी के दिलों पर हुकूमत करूँगा
ग़ज़ल(34)
वज़्न-212 212 212
दूर हमसे सनम हो गए
क्या पता वो कहाँ खो गए
हम निभाते रहे यूँ वफ़ा
बीज नफ़रत का वो बो गए
उन शहीदों को शत-शत नमन
देश पर जो फ़ना हो गए
मुफ़लिसों का बुरा हाल है
देख के उनको हम रो गए
हाल सुन कर मेरा जानेमन
अश्क़ों से अपना रुख़ धो गए
लौट कर के न आये कभी
छोड़ बेटे जो घर को गए
मौज किसपे भरोसा करूँ
सब पराये यहाँ हो गए
हमारा फ़न में पहिली हाज़िरी
इस्लाह की गुज़ारिश🌹🙏🏻
ग़ज़ल(35)
वज़्न-221 2121 1221 212
इतना नशा नहीं है किसी भी शराब में
जितना मैं चूर हो गया हुस्न- ओ- शबाब में
फैली महक फ़ज़ा में है जितनी भी आपकी
उतनी तो मिल न पाएगी ताज़े गुलाब में
जलवों से आपके यूँ मुअत्तर हुई ये रूह
पढ़ते हैं रोज आपको दिल की किताब में
चेहरे पे नूर आपके छाया है जिस कदर
उतना दिखा नहीं है कभी आफ़ताब में
जैसे दिखा हो चाँद हमें ईद का अभी
होती है दीद आपकी ऐसे हिज़ाब में
कितनें तो जल चुके हैं तकब्बुर की आग है
मिटना नहीं है मौज तुम्हें इस रुआब में?
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
शब्दार्थ, मुअत्तर=सुंगधित, हिजाब=पर्दा
ग़ज़ल(36)
वज़्न-1212 1122 1212 22
मैं चाहता था जिसे उसने दिल दुखाया है
हँसी में हमने मगर अश्क़ों को छुपाया है
थी रौशनी सी वफ़ाओं की दिल के जलने से
चिराग़े-दिल मेरा उसने ही तो बुझाया है
यक़ीन कैसे दिलाऊँ मैं दोस्तो उसको
कि मेरा चैनो-सुकूँ उसने ही चुराया है
सबक तो सीख लिया मैंने दिल लगाने का,
कि हर्फ़-हर्फ़ मुझे उसने आज़माया है
ऐ मौज ग़म से कभी हारना नहीं हर्गिज़
भले जहां ने तुझे बारहा सताया है
ग़ज़ल(37)
वज़्न-1212 1122 1212 22
सभी जुबां पे मुहब्बत का ये तराना हो
न नफ़रतों का यहाँ यार अब ज़माना हो
जवां जवां ही रहे दिल भी नौजवानों का
जहां में उनके लिए अब समाँ सुहाना हो
जुड़ा रहे ये सदा तार दिल से उल्फ़त का
हँसी ख़ुशी की ग़ज़ल गाता हर घराना हो
मुसीबतों में कोई तुमको जब पुकारेगा
मदद ही करना लबों पर नहीं बहाना हो
ऐ मौज देख कभी मुझको आज़मा कर तू
मैं चाहता हूँ मेरा यूँ ही आज़माना हो
ग़ज़ल(38)
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
तुम वतन के लिए कुछ तो कभी कुर्बान करो
जिनसे महफ़ूज़ हैं सब उनका यशोगान करौ
उल्फ़तों का भी यहाँ बीज कभी बो देना
नफ़रतें बो के न गुलशन को यूँ वीरान करो
मैं गरीबी को चला जड़ से मिटाने के लिए
कोई तो हाथ बँटा काम ये आसान करो
ऐ सनम दिल ये हमारा तो अभी बच्चा है
हुस्न के जलवे दिखा कर न परेशान करो
मौज ही मौज करो मौज दुआ लेकर तुम
इसलिए सारे बुजुर्गों का ही सम्मान करो
ग़ज़ल(39)
वज़्न-1212 1122 1212 22/112
कसम ख़ुदा की सनम तुमसे प्यार करता हूँ
यकीन कर लो वफ़ा बेशुमार करता हूँ
सलामती के लिए यूँ हरेक लोगों की
ख़ुदा से मैं भी दुआ बार-बार करता हूँ
जो देखना है मुझे आज़माके देख ज़रा
मैं दोस्ती पे तेरी जांनिसार करता हूँ
मुहब्बतों से मुहब्बत ही लेना देना है
मुहब्बतों का यहाँ रोजगार करता हूँ
वो कह गए हैं कि लाएँगे दिन यहाँ अच्छे
सो उन दिनों का ही मैं इंतज़ार करता हूँ
मुझे है शौक़ फ़क़त हँस के मौज जीने का
ग़मों की आँधियों को दरकिनार करता हूँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(40)
बहर-2122,,2122,,2122
ज़िंदगी तुझको बनाना चाहता हूँ
प्यार का मौसम सुहाना चाहता हूँ
गम न आने दूँ कभी दिल में किसी के
रोज सबको मैं हँसाना चाहता हूँ।।
नफ़रतों के बीज मैं बोने न दूँगा
बाग उल्फ़त का सजाना चाहता हूँ
चैन से जीने नहीं देती ये दुनिया
गम भुलाकर मुस्कुराना चाहता हूँ
सब रहें आबाद दिल की है ये ख़्वाहिश
सिर्फ़ खुशियों का ख़जाना चाहता हूँ
देख कर इंसानों की बस्ती में नफ़रत
आसमां में घर बनाना चाहता हूँ
मौज!वो क्योंकर समझते हैं पराया?
मैं जिन्हें अपना बनाना चाहता हूँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(41)
वज़्न-1212 1122 1212 22/112
चराग़े-इश्क़ से दिल में मेरे उजाला है।
बुझा न दे इसे तूफ़ान यूँ सँभाला है।
बुरी नज़र से कभी लड़कियों को देखे जो
वो आदमी तो समझ दिल का यार काला है
बनूँगा मैं भी मसीहा कभी गरीबों का
ये ख़्वाब मैने अभी अपने दिल में पाला है
ग़रीब क्या भला ओढ़ेंगे क्या बिछाएँगे
है सर्द रात बहुत एक ही दुशाला है
इसी ने एक न होने दिया कभी हमको
ये जात-पात का मुद्दा अजब उछाला है
ऐ *मौज* माँग उसी से जो चाहता है तू
यक़ीन कर ले ख़ुदा सबको देने वाला है
ग़ज़ल(42)
वज़्न-2122 1122 1122 22
आसमां छूती मेरे मुल्क़ में मँहगाई है
मुफ़लिसों के लिए अब दौर ये दुखदाई है
सींचते ख़ून पसीने से वो खेती अपनी
उन किसानों के भले पाँव में बेवाई है
साँस लेना हुआ दुश्वार तेरी दुनिया में
अब तो पैसों में यहाँ बिक रही पुरवाई है
दरमियाँ फ़ासले होकर न ज़ुदा हो पाएँ
याद की बदली कहीं दिल में अगर छाई है
मौज मिलती ही नहीं ज़िन्दगी जीने को यहाँ
हर ख़ुशी आज के इस दौर में हरजाई है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(43)
वज़्न-2122 2122 2122 212
झूठ को करने किनारे मैं खड़ा हो जाऊँगा
सच दिखाने को उसे मैं आइना हो जाऊँगा
अश्क़ उनकी आँख से.बहने न दूँगा दोस्तो
मुफ़लिसों के दर्द की अब मैं दवा हो जाऊँगा
मैं मुहब्बत का अभी इज़हार करता हूँ सनम
है मुहब्बत तुम कहो दिल से हरा हो जाऊँगा
कैद ही अब हो गया हूँ उनके जुल्फ़ो के तले
गेशुओं से उसके कैसे मैं रिहा हो जाऊँगा
चाहता हूँ बेसहारों का सहारा ही बनूँ
उनकी नेमत के लिए अब मैं दुआ हो जाऊँगा
चाहता हूँ दिल से मैं आबाद हो मेरा वतन
*मौज* इसके वास्ते मैं ख़ुद फ़ना हो जाऊँगा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(44)
वज़्न-1212-1122 1212-22
मुहब्बतों का जहां में शबाब हो जाये
जली जो आग है नफ़रत कीआब हो जाये
यूँ रौशनी में चमकता रहूँ हमेशा ही
मेरा सनम ही मुझे माहताब हो जाये
महक फ़ज़ाओं में उल्फ़त की चार सू फैले
हरेक खार वफ़ा का गुलाब हो जाये
कभी चढाओ नहीं सर पे अपने बच्चों को
ज़रा सी ढील से आदत ख़राब हो जाये
दिल-ओ-दिमाग़ में बज उठ्ठे ज्ञान की सरगम
हरेक हाथ में ऐसी किताब हो जाये
ऐ *मौज* नेता वतन कितना अपना लूटे हैं
सियासतों में कभी ये हिसाब हो जाये
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(45)
वज़्न-2122-1122-1122-22/112
आग नफ़रत की बुझाने के लिए काफी हूँ
बाग़ उल्फ़त का सजाने के लिए काफी हूँ
तुम अकेले भले खुशियां ही मनाते रहना
साथ मैं गम में निभाने के लिए काफी हूँ
चाहते गर हो सताना तो सताओ मुझको
बोझ गम का मैं उठाने के लिए काफी हूँ
तुम कहो तो ये सनम चाँद सितारे क्या है
आसमां को भी झुकाने के लिए काफी हूँ
सिर्फ़ दौलत ही नहीं होती यहाँ पर सब कुछ
बात यह सबको बताने के लिए काफी हूँ
*मौज* हिम्मत पे भरोसा है अकेले ही मुझे
अपने दुश्मन को मिटाने के लिए काफी हूँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(46)
वज़्न-212 212 212 212
चार दिन में ही यह ज़िन्दगी देख ली
ग़म खुशी की यहाँ पर नदी देख ली
मुफ़लिसी देख ली बेबसी देख ली
इक भिखारी की जब झोपड़ी देख ली
छुप गई दिलरुबा जा के जाने कहाँ
ढूँढते ढूँढते हर गली देख ली
मुश्किलों में कोई साथ देता नहीं
रिश्तों नातों की वो बानगी देख ली
पत्थरों पे भरोसा नहीं अब रहा
ख़ूब करके यहाँ बन्दगी देख ली
कौन है जो ग़मों से परेशाँ न हो
यूँ हरिक शख़्स में कुछ कमी देख ली
हम लुटाते रहे जिनपे जाँ उम्र भर
उनकी नीयत बहुत मतलबी देख ली
अब उजालों में जीना तुझे *मौज* है
ज़िंदगी में बहुत तीरगी देख ली
डी.पी.लहरे "मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(47)
वज़्न-212 212 212 212
मुफ़लिसी से भरी ज़िन्दगी देख ली
पक्का ईमान है यह खुशी देख ली
है लिखा नाम बस मेरे महबूब का
खोल कर दिल की हर डायरी देख ली
मुश्किलों में कोई साथ देता नहीं
दोस्तों की भी सब दोस्ती देख ली
हीर रांझे के जैसी मुहब्बत नहीं
इस ज़माने में जो आशिकी देख ली
आग नफ़रत की जैसे लगी चार सू
भाई-भाई में भी दुश्मनी देख ली
*मौज* मिलती मुझे बस दुआ ही दुआ
माँ की सेवा में जो बंदगी देख ली
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(48)
वज़्न-1212 1122 1212 22/112
बहुत गरीब है मिट्टी के घर में रहता है
मगर सुकून से अपने क़सर में रहता है
निकल पड़ा जो कदम नेकियाँ ही करने को
वो जन्नतों के हमेशा सफ़र में रहता है
मुझे हो ख़ौफ़ भला कैसे आँधियों का कहो
मेरे माँ बाप का जो प्यार असर में रहता है
चमक ये सिर्फ़ है उसके ही दम से चेहरे पर
कि माहताबे-हसीं वो जिगर में रहता है
वो आदमी भी भला ख़ाक आदमी है जो
हरेक गाम जो बस डर ही डर में रहता है
जो मेहनतों से लिखा करता है नसीब अपना
वो बनके नूर सभी की नज़र में रहता है
ऐ मौज आती नहीं तुमको शायरी करनी
ग़ज़ल का शे'र भले ही बहर में रहता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(49)
वज़्न-221 2121 1221 212
रखना नहीं है बैर सिखाता मेरा वतन
सारे जहाँ से रिश्ता निभाता मेरा वतन
कहलाया है ये विश्व गुरू ऐसे ही नहीं
है प्रेम का ही पाठ पढ़ाता मेरा वतन
कहते हैं लोग सोने की चिड़िया इसे सदा
जन्नत का ताज़ सर पे सजाता मेरा वतन
रखता है भाई-चारा हरिक देश के लिए
आपस में है कभी न लड़ाता मेरा वतन
आते हैं बाहरी जो मुसाफ़िर कभी कभी
जन्नत की सैर सबको कराता मेरा वतन
देखे बुरी नज़र से कभी कोई भी अगर
दुश्मन को धूल ख़ूब चटाता मेरा वतन
ऐ मौज संविधान से चलता है देख लो
दुनिया को राज यह भी बताता मेरा वतन
ग़ज़ल(50)
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
मत गुमां करना ये दौलत भी चली जाएगी
हाथ से तेरे मुहब्बत भी चली जायेगी
आह जिस रोज़ गरीबों की सुनेगा मालिक
बस उसी दिन ये हुकूमत भी चली जायेगी
दिल पे है नक्श जो तहरीर उसे पढ़ लीजे
आपकी सारी शिकायत भी चली जायेगी
नफ़रतों की सभी दीवार गिरा देना तुम
फ़िर मुहब्बत से अदावत भी चली जाएगी
मौज दुनियाँ से गरीबी को मिटाकर देखो
मुस्कुराते हुए ज़िल्लत भी चली जायेगी
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(51)
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
साथ दौलत के मुहब्बत भी चली जायेगी
और फिर जीने की हसरत भी चली जायेगी
आह जिस रोज़ गरीबों की सुनेगा मालिक
बस उसी दिन ये हुकूमत भी चली जायेगी
नफरतों के सभी दीवार गिरा देना तुम
साथ ही दिल से अदावत भी चली जायेगी
गौर से आप भी जब आईने को देखेंगे
आपकी हमसे शिकायत भी चली जायेगी
मौज दुनियाँ से गरीबी को मिटाकर देखो
मुस्कुराते हुए ज़िल्लत भी चली जायेगी
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(52)
वज़्न-2122 1212 22/112
पास अपने बुला रहे थे मुझे
हाल दिल के सुना रहे थे मुझे
हार जाता जहां से मैं लेकिन
हौसले ही जिता रहे थे मुझे
एक भी हर्फ़ जानते वो नहीं
जो मुहब्बत पढ़ा रहे थे मुझे
जिनको समझा था मैने अपना वो
गैर कहकर भगा रहे थे मुझे
जब भी मैने कदम बढ़ाया तो
मेरे अपने गिरा रहे थे मुझे
मौज यूँ ग़म रुला नहीं पाया
यार मेरे हँसा रहे थे मुझे
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(53)
वज़्न-2122 1122 1122 22
कितनी हसरत से मकाँ उसने बनाया होगा
नींव में ख़ून-पसीना भी मिलाया होगा
मौत आने पे ज़माने से चले जाना है
ज़िन्दगी में नहीं कुछ और बक़ाया होगा
लेके तक़दीर कहाँ जायें ज़माने से अब
हर तरफ़ साँस का देना भी किराया होगा
छोड़ कर यूँ ही मुसीबत में चला जाये जो
शख़्स अपना नहीं वो दिल से पराया होगा
मौज रहता है यहाँ बन के चहेता क्यूँकि
परवरिश ने उसे ऐसा ही बनाया होगा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(54)
वज़्न-221 2121 1221 212
सीने से मुझको अपने लगाने का शुक्रिया
यूँ दोस्ती का फ़र्ज़ निभाने का शुक्रिया
मुद्दत से जी रहा था उदासी के साए में
इस ग़मजदा बशर को हँसाने का शुक्रिया
नफ़रत की आग दिल को जलाती रही यहाँ
उल्फ़त लुटा के इसको बुझाने का शुक्रिया
मैं अपनी ज़िंदगी से था हारा हुआ बहुत
इन बाज़ुओं में जोश जगाने का शुक्रिया
सबसे अज़ीज़ तुझको ही माना था ऐ सनम
महफ़िल में गै़र मुझको बताने का शुक्रिया
आँखों में तेरी झाँक के देखा है *मौज* ने
तस्वीर मेरी दिल से हटाने का शुक्रिया
ग़ज़ल(55)
वज़्न-1212 1122 1212 22(112)
मतला
वफ़ा की राह में दिलबर नज़र नहीं आते
मैं ढूँढता हूँ उन्हें पर नज़र नहीं आते
खड़ा हूँ आज भी दाना लिए मैं छत पे मगर
कहाँ गए वो कबूतर नज़र नहीं आते
है खौफ अश्कों को दुनियाँ न देख ले उनको
इसी लिए कभी बाहर नज़र नहीं आते
जो अहले इल्म हैं सादा मिज़ाज़ रखते हैं
बदन पे उनके ये ज़ेवर नज़र नहीं आते
देख शिद्दत से ख़ुदा आस-पास तेरे हैं
शकी निगाह को वो पर नज़र नहीं आते
हर एक सिम्त से उठती है नफ़रतों की मौज
मुहब्बतों के समुंदर नज़र नहीं आते
ग़ज़ल(56)
वज़्न-122 122 122 12
मुझे जब खुदा का सहारा मिला
हरिक दर्द से फिर किनारा मिला
मदद के लिए मन में हलचल हुई
कोई जब भी आफत का मारा मिला
हमेशा निभाता है जो दोस्ती
मुझे दोस्त वो जां से प्यारा मिला
सनम क़ातिलाना अदा आपकी
हमे टुकड़ों में दिल हमारा मिला
ज़माने में करने को बस नेकियाँ
ख़ुदा का मुझे अब इशारा मिला
चला आसमां के सफर के लिए
फ़लक तक मुझे जो सितारा मिला
नहीं बुग़्ज़ है यूँ किसी से कभी
सभी से मुझे भाई-चारा मिला
जिताया उसे मौज तुमने ही है
जहां में अगर कोई हारा मिला
ग़ज़ल(57)
वज़्न-2122 2122 2122 212
ज़िंदगी के ग़म भुलाकर मुस्कुराना चाहिए
अश्क़ आँखों के हमेशा ही छुपाना चाहिए
डाला करिये छत पे दाना रोज़ इनको भी मियाँ
सुब्ह होते ही परिन्दे चहचहाना चाहिए
दर्द के किस्से तुम्हारे हम कभी भी सुन सकें
ऐसे लोगों से हमें अब दोस्ताना चाहिए
कितनी आसानी से कहती है मुझे वो बेवफ़ा
दिलरुबा को प्यार मेरा आज़माना चाहिए
झोपड़ी मेरे लिए तो ताज से भी कम नहीं
सर छुपाने के लिए बस आशियाना चाहिए
मुफ़लिसी में चीखता कब तक रहूँगा मौज मैं
मेरे हाथों में मुकद्दर का ख़जाना चाहिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(58)
वज़्न-212 1222 212 1222
मुफ़लिसी में हमने भी ज़िंदगी गुजारी है
कर्ज कुछ चुका पाया और कुछ उधारी है
जान लेके छोड़ेगी वो नज़र मिलाने से
आँख मेरे दिलबर की तेज़ इक कटारी है
एक बार सुन लो तुम वाह वाह कहना फिर
दिल में घर जो करती ये शायरी हमारी है
लूट कर गरीबों को मालदार बन बैठा
है भरी तिजोरी पर दिल का वो भिखारी है
नफ़रतें मिटाता है मौज तो हमेशा ही
दिल मिला के देखो तुम प्रेम का पुजारी है
ग़ज़ल(59)
वज़्न-212 212 212 212
आदमी अब नहीं आदमी की तरह
ज़िन्दगी जी रहा बेबसी की तरह
बदज़ुबाँ बदज़ुबाँ लोग हैं चार-सू
अब नहीं है ज़ुबाँ चाशनी की तरह
दोस्तों से निभाई सदा दोस्ती
दोस्ती हमने की दोस्ती की तरह
चैन आता नहीं अब मुझे एक पल
दिल को वो ले गई चोरनी की तरह
ग़म छुपा के हमेशा जियो मौज में
मुस्कुराते रहो हर कली की तरह
मौत से ख़ौफ़ कैसा यहाँ दोस्तो
यूँ हटाओ इसे तीरगी की तरह
मुस्कुराते रहो मौज हर हाल में
मौज में तुम बहो इक नदी की तरह
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(60)
वज़्न 1212 1122 1212 22
जवां जवां ये मेरा दिल भी आशिकाना है
मुहब्बतों का ज़ुबाँ पे सदा तराना है
अगर मिले कभी फुरसत तो आप आ जाना
महल से कम नहीं मेरा ग़रीबख़ाना है
नहीं है चाह मुझे और कोई जन्नत की
यूँ माँ पिता की दुआ ही मेरा ख़जाना है
मैं नेकियों से चकमता हूँ इस ज़माने में
अभी तो और भी सूरज सा जगमगाना है
सँभल के जाना हसीनों की आप महफ़िल में
नज़र का वार बड़ा इनका क़ातिलाना है
मैं ख़ुशनुमा तो हमेशा रहा ही करता हूँ
मगर जहाँ को हँसा कर ही मुस्कुराना है
ऐ मौज लिख ले ग़ज़ल देश और दुनिया पे
मिज़ाज तेरा हमेशा से शायराना है
ग़ज़ल(61)
रात का ये* सन्नाटा ख़ौफ़ की निशानी है
इक दिया जलाकर ही रोशनी जगानी है
जंग चाहे* जैसी हो हारना नहीं हमको
हौसला है रग-रग में खून में रवानी है
मुश्किलों में* हारा जो ज़िन्दगी से हारा है
मौत सर पे*आई है ज़िन्दगी बचानी है
ठोकरें सिखाती है ज़िन्दगी जिएं कैसे
जानता हूँ* क्यों दुनियाँ प्रेम की दिवानी है
मौज ये समझ जाओ किस तरह की* है दुनियाँ
ज़ख़्म भी पुराने हैं चोट भी पुरानी है
ग़ज़ल(62)
वज़्न-1222 1222 1222 1222
ग़रीबों का यहाँ कोई सहारा क्यूँ नहीं होता
कभी थाली में उनके भी निवाला क्यूँ नहीं होता
😢
किसानों की कमाई से ज़माना पेट भरता है
मगर उनको किसानी में मुनाफ़ा क्यों नहीं होता
👨🏭
अँधेरी रात में अक्सर चराग़ाँ ढूँढते रहते
ग़रीबों के घरों में भी उजाला क्यूँ नहीं होता
🌞
बहुत मुश्किल है बतलाना यहाँ बेहाल रहता हूँ
जिसे मैं चाहता दिल से वो अपना क्यूँ नहीं होता
👩❤️👨
बुरा है हाल मज़लूमों का दुनिया में जिधर देखो
ऐ मौज उनके लिए कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं होता
😭
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(63)
वज़्न-212 212 212 212
साँस में हरघड़ी तू बसी है मेरी
सच कहूँ तू सनम ज़िंदगी है मेरी
चाहता हूँ हमेशा रहे साथ में
उम्र भर के लिए संगिनी है मेरी
देखकर के सदा मुस्कुराता रहूँ
एक तू ही सनम हर ख़ुशी है मेरी
पूजता हूँ तुझे ही ख़ुदा की तरह
सुब्ह शामों की यूँ बंदगी है मेरी
तीरग़ी दो दिलों की मिटाती है जो
दिलरूबा तू वही रौशनी है मेरी
जगमगाता रहूँगा सदा 'मौज' मैं
जब तलक तू सनम चाँदनी है मेरी
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(64)
तोतला कोई कोई होता है
बोलता कोई कोई होता है
ढेर जो लाश का लगा देता
हदसा कोई कोई होता है
यूँ तो होते हैं लोग सब अच्छे
हाँ बुरा कोई कोई होता है
आदमी लाख हैं ज़माने में
आप सा कोई कोई होता है
दर्दे दिल यूँ मेरा समझ पाये
जानता कोई कोई होता है
पत्थरों को यहाँ बहुत देखा
देवता कोई कोई होता है
है यहाँ अपने तो सभी लेकिन
अक़रिबा कोई कोई होता है
तेरे जैसा ऐ *मौज* दुनिया में
दिलजला कोई कोई होता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
इस्लाह की गुज़ारिश के साथ🌹🙏🏻
ग़ज़ल(65)
वज़्ज-2122 1122 22
अपने गेसू को खुला रहने दो
मुझको गेसू में घिरा रहने दो
छोड़ दो फ़िक्र ज़माने की तुम
मुझको सीने से लगा रहने दो
कौन इसको जो मिटा सकता है
नाम दिल पे ही लिखा रहने दो
मुस्कुराते ही हमेशा रहना
ग़म पे परदा ही पड़ा रहने दो
इस वतन का मैं बनूँ रखवाला
मुझको सरहद पे खड़ा रहने दो
माँ की गोदी में सदा खेलूँगा
मुझको बच्चा ही बना रहने दो
तुम बुजुर्गों की दुआ लेना *मौज*
सर को कदमों में झुका रहने दो
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(66)
वज़्न-221 2121 1221 212
लोगों को देख मज़हबी चश्मे उतार कर
इंसानियत बढ़ाने को ग़ैरों से प्यार कर
मतलबपरस्तियों से तेरी आज हार कर
मैं जा रहा हूँ ज़िन्दगी से ग़म गुज़ार कर
बारूद का हमें न दिखा ख़ौफ़ इस तरह
इंसान की औलाद है तू हद न पार कर
आऊँगा यार लेके हथेली पे अपना दिल
देखो तो ज़रा दिल से मुझे भी पुकार कर
मासूमियत हमारी कभी आप देख लें
जीते हैं बड़े शान से हर शौक मार कर
दुनिया हवस की भूख में पागल है रात दिन
ऐ मौज इससे ख़ुद को ज़रा दरकिनार कर
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(67)
वज़्न-1212 1122 1212 22
वतन के काम न आये तो क्या जवानी है
रगो में ख़ून कहूँ या कहूँ के पानी है
न मार पायें कभी पेट में इन्हे कोई
हाँ बेटियों की हमें ज़िंदगी बचानी है
बहुत पसीना बहाया तो कामयाब हुए
सहज मिली नहीं ये हमको शादमानी है
डरा चुका है अँधेरा बहुत ये अब हमको
मिटा के तीरगी अब रौशनी जगानी है
समझ सको तो समझ लेना हाल मेरा भी
जिगर में ज़ख़्म हरा चोट भी पुरानी है
गुरूर छोड़ मुहब्बत वफ़ा निभाते हैं
हमारे ख़ून में पुरखों से यह रवानी है
ऐ मौज किस पे भरोसा करूँ यहाँ पर मैं
हरेक सिम्त यहाँ देख बेइमानी है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़्
ग़ज़ल(68)
वज़्न-22 22 22 22 22 2
*ख़ून-पसीना रोज़ बहाना होता है*
*तब जाकर के नोट कमाना होता है*
*हमसे पूछो तो कैसे हम जीते हैं*
*बोझ ग़मो का रोज़ उठाना होता है*
*दीवानों का हाल न पूछो ऐ साहिब*
*मयख़ाने में ठौर-ठिकाना होता है*
*इससे ज़्यादा और विवशता क्या होगी?*
*दर्द उठे लेकिन मुसकाना होता है*
*प्यार मिलाकर ख़ूब पकाती है मइया*
*वो खाना ही असली खाना होता है*
*क़ातिल होती मौज हसीनों की नज़रें*
*दिल की ज़ानिब यार निशाना होता है*
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(69)
वज़्न-212 212 212 212
तीरगी ने मुझे भी डराया बहुत
हौसलों से मग़र जगमगाया बहुत
बेवफ़ाई ने उसकी सताया बहुत
दिलरुबा ने कसम से रुलाया बहुत
मैं निभाता रहा दोस्ती उम्र भर
दोस्तों ने मगर आज़माया बहुत
मज़हबी मसअलो का वो रहबर रहा
भाई-भाई को जिसने लड़ाया बहुत
इक निवाले की ख़ातिर तरसता रहा
अन्न खेतों में जिसने उगाया बहुत
*मौज* तो तेरे अपनों में था हमनशीं
किसलिए कर दिया यूँ पराया बहुत
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(70)
वज़्न-221 2121 1221 212
देखो तो चार-सू है बलाएँ नई नई
कानों में गूँजती है सदाएँ नई नई
फूलों से यूँ वफ़ाओं के महकाओ ये चमन
ले आओ इस चमन में फ़ज़ाएँ नई नई
बोझल से इन दिलों को मिलेगा सुकून यूँ
महफ़िल में आप, नज़्म सुनाएँ नई नई
क्या मशविरा मैं दूँ कभी वो मानता नहीं
करता है नासमझ जो ख़ताएँ नई नई
ज़ाहिर है मेरे क़त्ल का सामान हैं सनम
अल्लाह रोज़-रोज़ अदाएँ नई नई
ऐ मौज कामयाब हुआ इस तरह यहाँ
लेकर बुजुर्गों की मैं दुआएँ नई नई
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गैर मुरद्दफ़(72)
ग़ज़ल
वज़्न-212 212 212 2
चाँद किसने ज़मीं पे उतारा
ख़ूबसूरत हुआ है नज़ारा
हाल देखों यहाँ मुफ़लिसी में
ज़िन्दगी की है गाड़ी खटारा
लड़खड़ाती हुई ज़िन्दगी को
माँ पिता की दुआ ने सँवारा
जिनका कोई नहीं इस जहाँ में
उनकी खातिर ख़ुदा का सहारा
मौज जीना सदा मुस्कुराकर
फिर तो ग़म भी करेगा किनारा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(73)
वज़्न-122 122 122 122
ख़ुदा सब पे करना इनायत ज़ियादा
सभी के घरों में हो बरकत ज़ियादा
सलीके से करते नहीं काम कोई
बड़े दफ़्तरों में है ग़फ़लत ज़ियादा
समझ लो ग़ज़ल में मैं कच्चा अभी हूँ
नहीं शायरी में महारत ज़ियादा
हर इक इल्म सीखा है हमसे ही जिसने
वो देता है हमको नसीहत ज़ियादा
न समझो मुझे बेवफ़ा मेरे हमदम
निभाई है मैंने मुहब्बत ज़ियादा
अगर सच को सच जो बयाँ मैं करूँगा
तो लोगों को होगी शिकायत ज़ियादा
नहीं मौज कोई तरक्की की राहें
यहाँ चार-सू है मुसीबत ज़ियादा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (74)
वज़्न-1212 1122 1212 22
हर एक ग़म को भुलाकर जो मुस्कुराता है
सहीह ज़िन्दगी का लुत्फ़ वो उठाता है
कभी भी चैन-ओ-सुकूँ से नहीं वो रह सकता
जो मुफ़लिसों को यहाँ बेसबब सताता है
हाँ शायरों में भले बच्चा हूँ अभी लेकिन
मेरी ग़ज़ल को बशर ख़ूब गुनगुनाता है
कसौटियों पे परखता है वक़्त हरदम ही
कि इंतज़ार मुझे बेसबब कराता है
ऐ *मौज* तुझको अँधेरा नहीं डरा सकता
तू हौसलों से जो सूरज सा जगमगाता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(75)
वज़्न-2122 2122 2122 212
कुछ नज़र आता नहीं जिसको अना के सामने
आईना मैं क्या रखूँ उस बेवफ़ा के सामने
उँगलियाँ थामें हुए जब प्यार से पुचकारती
दूर हट जाती बला माँ की दुआ के सामने
नेकियों के रास्ते दिखला नहीं सकते कभी
सर झुकाना छोड़ ऐसे औलिया के सामने
मत गुमाँ करना कभी है चारदिन की ज़िन्दगी
हार जाना ही पडे़गा फिर क़ज़ा के सामने
कसमसा कर रह गयी बूढ़े बुजुर्गों की सदा
बेसहारा लग रहे हैं मुब्तिला के सामने
ग़ज़ल(77)
वज़्न-1222 1222 122
हमारा हाल भी पूछो तो जानें
ग़मों का बोझ तुम बाँटो तो जानें
*मुहब्बत में हमें मदहोश कर दो*
लबों से लब भी टकराओ तो जानें
*हमेशा जीती है तुमने मुहब्बत*
मुहब्बत में कभी हारो तो जानें
लुटाते हो सदा महफ़िल में दौलत
ग़रीबों में कभी बाँटो तो जानें
*हमेशा झूठ ही कहते हो साहब*
कभी सच्चा *अगर बोलो तो जानें
*हमारे अन्नदाता हैं ये हलधर*
अगर इनके लिए सोचो तो जानें
*नशे की लत बुरी होती समझ लो*
अभी ठानो इसे छोड़ो तो जानें
सदा ऐ मौज धुआँ दिल में उठा है
किसी की याद में तड़पो तो जानें
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(77)
वज़्न-2122 2122 2122 212
ऐ ख़ुदा अब सुख ही सुख मंज़ूर होना चाहिए
इस तरह से ग़म का बादल दूर होना चाहिए
ज़िन्दगी तू कब तलक हरपल रुलायेगी हमें
दर्द दिल का आज ही काफूर होना चाहिए
हो सके तो तुम लुटादो उम्र की पूँजी सभी
नेकियों से नाम कुछ मशहूर होना चाहिए
आ गया हूँ आज तो महफ़िल में मैं ख़ुद आपकी
ग़म भुलाकर आपको मसरूर होना चाहिए
मौज असली मुस्कुराहट की दुकानें खोल दो
सुख ही सुख सबके लिए भरपूर होना चाहिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(78)
वज़्न-22 22 22 22
जो दिल का सच्चा होता है
साथी वो अच्छा होता है
दूर गया तो क्या होता है
अपना तो अपना होता है
आँखों में हो प्यार वफ़ा तब
वो रिश्ता गहरा होता है
रहता है बस ख़्वाब अधूरा
ख़्वाब कहाँ पूरा होता है
कौन भरोसे के है काबिल
धोखा ही धोखा होता है
जब-जब अपना मुखड़ा देखा
टूटा वो शीशा होता है
पैसों का है चक्कर यारो
दफ़्तर में घपला होता है
मुफ़लिस पे जो प्यार लुटाए
कद में वो ऊँचा होता है
कौन मना सकता है यारो
जब भी रब रूठा होता है
मौज कभी घबराना मत तू
ग़म में भी हँसना होता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
पेशे ख़िदमत मेरी एक
ग़ज़ल(79)
वज़्न-2122 1212 22/112
जब तेरा ख़्वाब देर तक देखूँ
चाँद रोता सरे-फ़लक देखूँ
चाँद सूरज सा इक चमक देखूं
जब भी माँ बाप की झलक देखूं
डाल कर छत पे दाना-पानी मैं
पंछियों की सदा चहक देखूँ
दर्द कितना ये जख़्म देते हैं
मैं लगा कर ज़रा नमक देखूँ
मेरा महबूब साथ में ही रहे
चूड़ियों की सदा खनक देखूँ
ग़म का ये सिलसिला ही थम जाये
अब नहीं और मैंं कसक देखूँ
'मौज' ग़म छोड़ मुस्कुरा लेना
तेरे चेहरे में बस चमक देखूँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(80)
वज़्न-212 212 2122
अब तो चैनो अमन चाहती है
ज़िन्दगी इक कफ़न चाहती है
ज़िन्दगी इस ज़मीं का बिछौना
ओढ़ने को गगन चाहती है
एक बहना है प्यारी हमारी
दुश्मनों का दमन चाहती है
हाँ मुहब्बत ने शायर बनाया
शायरी पर लगन चाहती है
ढूँढती है खुशी मेरी ख़्वाहिश
दर्द ग़म का शमन चाहती है
*मौज* माँ यूँ ख़फ़ा भी न होती
बस ख़ुशी का चमन चाहती है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
दर्द भरी ग़ज़ल(81)
ग़ज़ल
वज़्न-221 2121 1221 212
इस ग़म ने ज़िन्दगी को परेशान कर दिया
अश़्कों को मेरी आँख ने कुर्बान कर दिया
भाई निकल गया है सफ़र पर अभी-अभी
अब हर गली को उसने तो वीरान कर दिया
माँ डबडबाई आँख से हर पल है ढूँढती
घर से निकल के लाल ने हैरान कर दिया
कैसे मैं जी सकूँगा यहाँ तन्हा दोस्तो
इस ग़म ने मेरी मौत को आसान कर दिया
वादा-ख़िलाफ़ शाह का दिखता रहा असर
मँहगा जो मेरे मुल्क़ में सामान कर दिया
ऐ "मौज" दुख में दावतों की रीत तोड़ने
बस्ती में आज मैने भी ऐलान कर दिया
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(82)
वज़्न-1212 1122 1212 22
है रौशनी तो मुझे तीरगी से क्या लेना
चमक यूँ क़ल्ब में है चाँदनी से क्या लेना
हर एक तौर निभाता हूँ दोस्ती सबसे
मुझे जहाँ में कभी दुश्मनी से क्या लेना
बुझा न पाये कभी तिश्नगी मेरे दिल की
तो अब भला मुझे ऐसी नदी से क्या लेना
जो मुश्किलों में मेरे काम ही नहीं आया
सहीह ऐसे मुझे मतलबी से क्या लेना
जो बादशाह बना बैठा है सिहासन पर
भला उसे किसी की मुफ़लिसी से क्या लेना
उतर न पाये कभी पढ़के शायरी दिल में
ऐ "मौज" ऐसी मुझे शायरी से क्या लेना
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(83)
वज़्न-122 122 122 122
चलो मुस्कुराएँ नये साल में हम
सभी ग़म भुलाएँ नये साल में हम
यहाँ नफ़रतों को जड़ो से मिटाकर
मुहब्बत बढ़ाएँ नये साल में हम
सलामत रहें सब ख़ुदा के हैं बंदे
दुआ यह मनाएँ नये साल में हम
जो रूठे हुए हैं यहाँ यार अपने
उन्हें अब मनाएँ नये साल में हम
जो हैं लोग ग़ुरबत के मारे यहाँ पर
उन्हे कुछ खिलाएँ नये साल में हम
बशर *मौज* सारे तरक्की करें अब
कदम यूँ बढाएँ नये साल में हम
ग़ज़ल-(84)
वज़्न-212 212 212 212
दिल मेरा तो सनम पे फ़िदा हो गया
इस क़दर प्यार का अब नशा हो गया
वो अकेले मुझे छोड़कर चल दिये
दोस्त समझा था जिसको ज़ुदा हो गया
बढ़ गई है बहुत मार मँहगाई की
दाम हर चीज़ का चौगुना हो गया
एक रोटी गरीबों को मिलती नहीं
आँतों में भूख का ज़लज़ला हो गया
"मौज" कहता हमेशा यहाँ बातें सच
इसलिए झूठ से फ़ासला हो गया
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(85)
वज़्न-1212 1122 1212 22
मुहब्बतों के दिये हम जला के चल देंगे
तुम्हारे दर पे सनम सर झुका के चल देंगे
हमें गरीब समझ आज़माना छोड़ो तुम
हसीन दिल की ये दौलत लुटा के चल देंगे
खुशी में साथ निभायेंगे हम हमेशा और
तुम्हारे ग़म में भी आसूँ बहा के चल देंगे
सुकून चैन मिले मौसमे बहारों से
ख़िज़ाँ में फूल भी ऐसे खिला के चल देंगे
करीब आके कभी हाल जान सकते हो
हम अपनी आँख से किस्से सुना के चल देंगे
हमारी याद से दिल बागबाग कर लेना
ऐ *"मौज"* अपनी भी यादें बचा के चल देंगे
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(86)
वज़्न-2122 1212 22 / 112
बारहा लोग आज़माते हैं
बेसबब क्यूँ हमें सताते हैं
खूँ-पसीना बहुत बहाते हैं
खेत में अन्न हम उगाते हैं
लोग कहते गरीब हैं फिर भी
दिल की दौलत सदा लुटाते हैं
चोट देते यहाँ तो अपने ही
दर्द सह सह के मुस्कुराते हैं
दुश्मनी से नहीं हमें मतलब
हम तो बस दोस्ती निभाते हैं
मौज क्या डरना है अँधेरों से
हम तो सूरज सा जगमगाते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(87)
वज़्न-212 212 212 212
आप मय पीजिए मौज ही मौज है
चार सू देखिए मौज ही मौज है
फौज है दोस्तों की मेरे पास अब
मत डरा कीजिए मौज ही मौज है
मान देकर बुजुर्गों को दिल से सदा
कुछ दुआ लीजिए मौज ही मौज है
मुस्कुराके सदा गुनगुनाके सदा
दूर ग़म कीजिए मौज ही मौज है
राज़ दिल का छुपाना नहीं चाहिए
खोल ही दीजिए मौज ही मौज है
दुश्मनी को मिटा दोस्ती को बढ़ा
दिल से दिल जोड़िए मौज ही मौज है
हो सके तो सभी के लिए दोस्तो
बस खुशी सोचिए मौज ही मौज है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(88)
वज़्न-2122 1212 22
तुमसे गर आशिकी नहीं होती
ज़िन्दगी में ख़ुशी नहीं होती
मेरे माँ-बाप की दुआओं से
इस जहां में कमी नहीं होती
ग़म का मारा अगर नहीं होता
फिर तो ये मयकशी नहीं होती
जब भी करता हूँ काम नेकी का
इससे बढ़कर खुशी नहीं होती
बे-सबब यार आज़माते हो
इस तरह दोस्ती नहीं होती
ग़र ख़ुशी ही ख़ुशी मिले मौला
आँख में फिर नमी नहीं होती
मौज ही मौज हो ज़माने में
ऐसी क्यूँ ज़िन्दगी नहीं होती?
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(89)
वज़्न-212 1222 212 1222
साहिबा मुहब्बत का सिलसिला बना लेना
देखना सदा मुझको आइना बना लेना
हर दुआ मिलेगी यूँ दर पे सर झुकाने से
माँ-पिता को दुनिया में देवता बना लेना
टूटना नहीं यारो लाख ग़म जो आये तो
मुस्कुराहटों को तुम हौसला बना लेना
नफ़रतों से अक़्सर ही ठोकरें जो मिलती है
आज ही मुहब्बत का रास्ता बना लेना
बेसबब दिखावा ये आदमी जो करता है
शख़्स जब मिलें ऐसे फ़ासला बना लेना
फायदा नहीं कोई मज़हबी लड़ाई में
आदमी सभी को तू हमनवा बना लेना
बारहा ज़माने में लोग आज़माते हैं
उनसे तू सबक लेकर दायरा बना लेना
मुश्किलों में आकर जो साथ ही निभाता है
*मौज* वो कोई भी हो तू सगा बना लेना
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(90)
वज्न-122 122 122 122
ज़माना फ़रेबी,सदाक़त कहाँ है
हुई गुम,न जाने शराफ़त कहाँ है
जो महफ़ूज़ रहते वतन के सहारे
उन्हीं को वतन से मुहब्बत कहाँ है
कई लोग तो पेट में मार देते
यहाँ बेटियों की हिफ़ाज़त कहाँ है
ग़मों से बचा शख़्स कोई न होंगा
हरी आदमी की तबीयत कहाँ है
भलाई करे जो यहाँ आमजन की
बची मुल्क में वो सियासत कहाँ है
खड़े हैं सभी साथ मेरे तो लेकिन
मुकद्दर में उन से ही क़ुर्बत कहाँ है
ज़मीं पर भी सोकर हमें नींद आये
वो चैनों सुकूँ की निज़ामत कहाँ है
वो मतलब से साथी बनाता है सबको
उसे अब हमारी जरूरत कहाँ है
चलो हम सभी चाँद पर घर बसायें
यहाँ ज़िंदगी अब सलामत कहाँ है
भले मौज पूजो यहाँ लाख पत्थर
गुरू,माँ-पिता,सी इबादत कहाँ है
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(91)
वज़्न-2122 2122 2122 212
झूठ को करने किनारे मैं खड़ा हो जाऊँगा
सच दिखाने को उसे मैं आइना हो जाऊँगा
अश्क़ उनकी आँख से बहने न दूँगा दोस्तो
मुफ़लिसों के दर्द की अब मैं दवा हो जाऊँगा
मैं मुहब्बत का अभी इज़हार करता हूँ सनम
है मुहब्बत तुम कहो दिल से हरा हो जाऊँगा
कैद ही अब हो गया हूँ उनके जुल्फ़ों के तले
गेशुओं से उसके कैसे मैं रिहा हो जाऊँगा
चाहता हूँ बेसहारों का सहारा ही बनूँ
उनकी नेमत के लिए अब मैं दुआ हो जाऊँगा
चाहता हूँ दिल से मैं आबाद हो मेरा वतन
*मौज* इसके वास्ते मैं ख़ुद फ़ना हो जाऊँगा
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(92)
जिसको मैने अपना हमदम समझा था
दूर रहो अब मुझसे उसका कहना था
लोग यहाँ कहते हैं मुझको पत्थर दिल
अब भी दरिया दिल पहले भी दरिया था
मज़हब की बातों में अक़्सर उलझा कर
वो नफ़रत के बीज हमेशा बोता था
भीगी भीगी एक हसीना घर आई
वो देखा सावन का मस्त महीना था
सबको आज समझ दारी ने बाँटा है
नादानी का आलम कितना अच्छा था
डूब गया हूँ अब मैं उसकी यादों में
पहले अक्सर तन्हा तन्हा रहता था
मौज बनाया यूँ सबको बस अपना ही
पैगामे उल्फ़त जग में फैलाना था
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
गज़ल(93)
वज़्न-1212 1122 1212 22/112
जो ओढ़ता हूँ बिछाता हूँ ग़म की चादर है
मेरे लिए तो यही मख़मली सा बिस्तर है
कभी ख़ुशी तो कभी ग़म में भी पुकारा हूँ
मैं मानता था जिसे देवता वो पत्थर है
ख़ुदारा अब ये सफ़ीना न ग़र्क़ हो जाये
हर एक सिम्त उठा मज़हबी बवंडर है
सियासतों के इशारों पे नाचता है जो
इसीलिए वो बना चापलूस अफ़सर है
वफ़ा के बदले कहाँ मिलती है वफ़ा यारो
मेरा सनम तो कसम से बड़ा सितमगर है
ऐ *मौज* देख ज़रा हाल उन किसानों का
गले में फंदे लगे पेट में भी ख़ंज़र है
ग़ज़ल(94)
वज़्न-221 2121 1221 212
क़ातिल है यार उसकी निगाहों से बच के चल
बिजली गिराती शोख़ अदाओं से बच के चल
होते नशे की लत में सदा चूर-चूर जो
ऐसे जहाँ में यार जवानों से बच के चल
यूँ तो गुनाहगार है हर आदमी यहाँ
अच्छा है हो सके तू गुनाहों से बच के चल
रिश्ता वफ़ा का आज निभा ले हँसी खुशी
ऐ यार मेरी मान ज़फ़ाओं से बच के चल
तू आँख मींच के न भरोसा किसी पे कर
अपनों की ज़हर युक्त अदाओं से बच के चल
लेना नहीं कभी तू किसी से भी बद् दुआ
बेबस की औ'र गरीब की आहों से बच के चल
ऐ मौज ग़म का यार हँसी ही इलाज है
जीना है शान से तो दवाओं से बच के चल
ग़ज़ल(95)
वज़्न-221 1222 221 1222
माँ-बाप के पैरों में जन्नत का ख़जाना है
उनकी ही इबादत में सर अपना झुकाना है
रौशन हो जहाँ सारा वो दीप जलाना है
जीवन के अँधेरों को अब दूर भगाना है
कटने मैं नहीं दूँगा अब एक शजर भी मैं
जंगल का सिपाही हूँ जंगल को बचाना है
मज़हब की लड़ाई को होने मैं नहीं दूँगा
नफ़रत को मिटाकर के बस प्यार जताना है
सरहद पे खड़े होकर दुश्मन को मिटा दे जो
सारे ही जवानों को जाँबाज़ बनाना है
पड़ जाये मुझे रखने गिरवी ही अगर गहने
हर हाल मुझे अपने बच्चों को पढ़ाना है
कुछ लोग यहाँ हर दिन देते हैं सदा ताना
ऐ मौज चलो बचके दुश्मन ये ज़माना है
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(96)
221 2121 1221 212
चेहरा है चाँद जैसा छुपाते हो किसलिए
हर वक्त यूँ नकाब में आते हो किसलिए
भूखे को एक रोटी कभी तुम न दे सके
दौलत ये बेहिसाब कमाते हो किसलिए
क्यूँ मज़हबी ही बात किया करते हो सदा
नफ़रत की आग दिल में लगाते हो किसलिए
देखोगे एक रोज तुम्हे आह लगेगी
बेकस की झोपड़ी को जलाते हो किसलिए
देवी समझ के लोग सदा पूजते इन्हे
औरत पे हाथ रोज उठाते हो किसलिए
मेहनत से *मौज* आप सँवर जाओगे यहाँ
तक़दीर को ही दोषी बनाते हो किसलिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (97)
वज़्ज-2122 2122 2122 212
जब शुरू अपनी मुहब्बत के फ़साने हो गए
ज़िन्दगी जीने के तब से दस बहाने हो गए
गुफ़्तगू करते थे मिलके साथ में हर रोज ही
दोस्तों से अब मिले हमको ज़माने हो गए
आपकी बाहों में आकर मैं सिमट जाऊँ सनम
आपके आने से ये मौसम सुहाने हो गए
मुस्कुराकर गुनगुनाती हो मेरी लिख्खी ग़ज़ल
ऐसा लगता है मुहब्बत के तराने हो गए
आप से ही ज़िन्दगी है ये मुझे मालूम है
आशिकी में आपके हम तो दिवाने हो गए
बस मुहब्बत के सफ़र में जिन्दगी यूँ कट रही
आशिकों में *मौज* अब सबसे पुराने हो गए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(98)
वज़्न
1222 1222 1222 1222
गले मिलकर भुला देंगे सभी तकरार होली में
गिरा देंगे वो मज़हब की हर इक दीवार होली में
नहीं बरबाद करना है इसी से जान बचती है
बहायेंगे अधिक पानी नहीं इस बार होली में
अगर कोई रहे भूखा खुशी कैसे मनायेंगे
चलो मुफ़लिस को देंगे हम कोई उपहार होली में
लगाकर माथ में टीका ख़ुशी से मुस्कुराना है
भुला कर के गिले शिकवे करें हम प्यार होली में
छुपा कर मुँह को जाती है कहाँ तू आज ऐ जानम
उठा घूँघट तेरा कर लूँ ज़रा दीदार होली में
बचाना है हमें जंगल जलाना भी नहीं लकड़ी
कसम खाएँ चलो यह *मौज* भी इस बार होली में
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(99)
वज़्न-2122 1212 22/112
दिल मेरा यार तुझपे मरता है
सिर्फ़ तुझसे ही प्यार करता है
दिल दुखाते हैं जब भी अपने तो
अश्क़ आँखों से मेरे झरता है
जो बुजुर्गों की दुआ ले लेता
हर्फ़ दर हर्फ़ वो सँवरता है
मुफ़लिसों की जो बद्दुआ लेता
रेत के जैसे वो बिखरता है
वो तो क़ाबिल नहीं भरोसे के
खुद के वादों से जो मुकरता है
मौज डर डर के भी ये क्या जीना
किसलिए यार इतना डरता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
इस्लाह के लिए🌹🙏🏻
ग़ज़ल(100)
वज़्न-1212 1122 1212 112/22
मैं चाहता था जिसे मेरी ज़िन्दगी न हुई
मगर वफ़ा की जहां में कभी कमी न हुई
हरेक ग़म को सदा मुस्कुराके सहता हूँ
इसीलिए तो कभी आँख में नमी न हुई
मैं दोस्ती के लिए हाथ ख़ुद बढ़ाता हूँ
किसी भी शख़्स से मेरी यूँ दुश्मनी न हुई
मैं जुगनुओं की तरह रौशनी लुटाता हूँ
मुझे डराये कभी ऐसी तीरगी न हुई
अमीर दिल का हूँ ऐ *मौज* तू परख लेना
यूँ ज़िन्दगी में कभी यार मुफ़लिसी न हुई
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
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