गीत
गीत (50)
कब आबे संगी रे,मोर मया के फुलवारी मा।
तोर बिना जिनगी हे जइसे,घपटे अँधियारी मा।
कब आबे संगी रे..
तोर बिना ओ लागे अब्बड़,गाँव गली हा सुन्ना।
अंतस मा ओ ए सँवरेंगी,पीरा बाढ़य दुन्ना।।
कटे सहीं अब लागे मोला-ए बिरहा के आरी मा।
कब आबे संगी रे...
तोर सुध मा ए पतरेंगी,तन ला खाथे घुन्ना।
कइसे साहँव ए अंतस मा,पीरा होगे जुन्ना।।
अइलाये हे मन बैरी हा-जीथौं जिनगी उधारी मा।
कब आबे संगी रे...
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
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