ग़ज़ल संग्रह भाग (2)
(1) सफ़र में चरागां जलाकर चले
बहर-122 122 122 12
सभी दर्द दिल में छुपाकर चले
मिला दर्द जो हम मिटाकर चले
अँधेरों में ही गुम न होना कभी
सफ़र में चरागां जलाकर चले
बहाएँ यहाँ प्रेम धारा सदा
गिले शिकवे दिल से मिटाकर चले
यहाँ चार दिन की मिली जिंदगी
हँसी और'ख़ुशी में बिताकर चले
करे द्वारिका बस भलाई यहाँ
गिरे राह कोई उठाकर चले
(2)-हाले दिल या जिगर..
ग़ज़ल
बहर-212 212 212
हाल-ए- दिल या जिग़र पूछिए
बहते आँसू नज़र पूछिए
तेज होती मेरी धड़कनें
हाल-ए-दिल का बसर पूछिए
जा बसी है मुझे छोड़ के
ला पता है किधर पूछिए
प्यार मुझको न उनका मिला
रह गई क्या क़सर पूछिए
बस अकेला हुआ मौज तो
कौन है हमसफ़र पूछिए
(3)-प्रेम के गीत गाते चलो..
बहर-212-212-212
प्रेम के गीत गाते चलो
बैर मन के मिटाते चलो
कुछ दिनों की जवानी यहाँ
हर घड़ी आज़माते चलो
जिन्दगी चार दिन की यहाँ
सबसे रिश्ते निभाते चलो
राह काँटा बिछाना नहीं
फूल दिल में खिलाते चलो
द्वारिका बस ख़ुशी बाँटना
गैर को भी हँसाते चलो
------------------------------------------------------
(4)-मुलाकात करते..
बहर-122-122-122-122
सनम तुम कभी तो मुलाकात करते
मुहब्बत की यूँ यार बरसात करते
सुहाना बना जिन्दगी के सफ़र को
मिलन की कभी यार शुरुआत करते
पुकारा बहुत हूँ तुझे यार दिल से
शराफत भरी तुम कभी बात करते
निगाहें मिलाते निगाहों से मेरे
कभी साथ गुजरे हसीं रात करते
तुझे ढूँढता द्वारिका इस जहां में
झलक ही दिखाकर तो सौगात करते
-----------------------------------------------------
(5)-दिल किसी का दुखाना नहीं..
बहर-212-212-212-212
दिल किसी का दुखाना नहीं चाहिए
चोट दिल में लगाना नहीं चाहिए
जिन्दगी में सभी काम अच्छा करो
स्वार्थ में डूब जाना नहीं चाहिए
चार दिन की यहाँ जिन्दगी दोस्तों
बैर मन में बसाना नहीं चाहिए
वो खुदा की सभी यार संतान हैं
मुफ़लिसों को सताना नहीं चाहिए
यूँ जरा सच जहां को बता द्वारिका
झूठ में दिन बिताना नहीं चाहिए
------------------------------------------------------
(6)-प्यार दिल से सदा निभाना तुम..
बहर-2122-1212-22
प्यार दिल से सदा निभाना तुम
चाह कर भी नहीं भुलाना तुम
प्यार ही प्यार हो जवां दिल में
साथ में जिन्दगी बिताना तुम
छाँव देना मुझे वफ़ाओं की
यूँ कभी भी नहीं रुलाना तुम
छोड़ मुझको कहीं नहीं जाना
आग दिल में नहीं लगाना तुम
द्वारिका है सदा तुम्हारा ही
महफ़िलें प्यार की सजाना तुम
-----------------------------------------------------
(7)-मुझे उनसे शिकायत है..
बहर-1222 1222 122
मुझे उनसे शिक़ायत है कसम से
मगर फ़िर भी मुहब्बत है कसम से
मुझे बर्बाद करने में लगी वो
वज़ह उनकी जो नफरत है कसम से
हुई मगरूर बैठी बेसबब जो
मेरे दिल की अमानत है कसम से
तेरी मर्जी वफ़ा कर या दगा कर
सदा मेरी इजाजत है कसम से
ख़ुदा से माँगता बस द्वारिका है
इबादत ही इबादत है कसम से
------------------------------------------------------
ग़ज़ल आज के
बहर-1222 1222 1222
सजा है झूठ का बाज़ार देखो तो
बढ़ा है रोज भ्रष्टाचार देखो तो
लगा कैसा जहां पे रोग का धब्बा
मचा है रोज हाहाकार देखो तो
यहाँ अपना पराया कौन पहचानो
कभी बदला हुआ व्यवहार देखो तो
गरीबों की कमाई में मजे करते
सही में कौन है हकदार देखो तो
बनो हरदम सहारा मौज तुम सबका
रहे कोई नहीं लाचार देखो तो
------------------------------------------------------
(9)-दोहा ग़ज़ल तुम हो मेरी जिन्दगी..
तुम हो मेरी जिन्दगी,तुम ही हो तकदीर।
दिल की इस दीवार में,तेरी ही तस्वीर।।
देखूँ हरपल ख़्वाब मैं,दिल में तेरी चाह।
धड़कन में हो तुम बसी,तुम ही प्राण शरीर।।
बिन देखे अब यार सुन,होता हूँ बेचैन।
आ जाते तुम पास में,समझो मन की पीर।
कटे नहीं दिन रात अब,हुआ बावला आज।
तड़प रहा हूँ प्यार में,नयन बहाते नीर।।
तुम मेरी हो प्रियतमा,जब तक मेरी साँस।
नहीं भुलाना भूल के,तुम बिन प्यार अधीर।।
यार द्वारिका चाहता,हरदम तेरा प्यार।
तुमको रब से माँगता,बनके यार फ़कीर।।
--------------------------------------------------------
(10)-कहाँ खो गई?
बहर -212 212 212
यार मुझसे कहाँ खो गई।
चैन से और वो सो गई।।
चाहता था उसे मैं मगर,
राह में काँटे ही बो गई।
बस अँधेरा हुआ प्यार में,
रौशनी अब किधर हो गई।
चाहती खुद अलग होना ही,
वे बिछ्ड़कर मग़र रो गई।
द्वारिका क्या करोगे वफ़ा,
बेवफ़ाई तुझे धो गई।
------------------------------------------------------
(11)-ख़ुदा माना तुझे..
बहर-1222×3
ज़हन में यार तुमको मैं बसाया हूँ,
ख़ुदा माना तुझे दिल में सजाया हूँ।।
गुजारूँ जिन्दगी तुमसे सदा ही मैं,
हसीं वो यार तेरा प्यार पाया हूँ।
कसम से चाह में तेरी दिवाना मैं,
तुम्ही को रास्ता मंजिल बनाया हूँ।
बहुत देखा जमाने में मुहब्बत को,
तुम्ही से जान मेरे दिल लगाया हूँ।
जहां देता रहा है द्वारिका को ग़म,
मग़र मैं प्यार को सच्चा निभाया हूँ।
------------------------------------------------------
(12)-अपना बना कर देखूँ..
बहर2122 1122 1122 22
गैर को भी कभी अपना मैं बनाकर देखूँ
प्यार देकर ही उन्हे दिल में बसाकर देखूँ
बेसहारों का सहारा भी बनूँ मैं हरदम
थाम लूँ हाथ सदा रिश्ता निभाकर देखूँ
मुफ़लिसों का हो भला सच्चा करूँ मैं वादा
सो रहे भूखे उसे रोटी खिलाकर देखूँ
काम होते हैं कहाँ मुझको पता चल जाए
काम करके मैं कभी फसलें उगाकर देखूँ
मौज डरता हूँ बहुत कैसे मैं जी पाऊँगा
हौसला अपने ज़िगर का मैं जमाकर देखूँ
-------------------------------------------------------
(13)-इस दीवाली में..
बहर-1222×3
शमां दिल में जलाना इस दिवाली में
अँधेरों को भगाना इस दिवाली में
रहें मिलके सदा साथी गुज़ारिश है
ख़ता गर हो मिटाना इस दिवाली में
अगर कोई रहे भूखा जहाँ में तो
उसे भोजन खिलाना इस दिवाली में
कोई अपना अगर रूठे हुए हैं जब
मुहब्बत से मनाना इस दिवाली में
पराया कौन कहता है सभी अपने
सदा रिश्ता निभाना इस दिवाली में
कहे यूँ मौज मिलके ही यहाँ रहना
कदम आगे बढ़ाना इस दिवाली में
------------------------------------------------------
(14)-यूँ नज़र से..
बहर -212×4
यूँ ऩजर से न हम पे सितम कीजिए
यार दिल से वफ़ा की रहम कीजिए
देखते ही मिला जो नज़र आपसे
यार लब से लगा कर गरम कीजिए
आग दिल में लगी है बुझा दे इसे
फिर जिगर को ख़ुशी से नरम कीजिए
कुछ वफ़ा पे भरोसा करो जाने जां
दिल्लगी में सताना ख़तम कीजिए
माँगता है ख़ुदा से तुझे द्वारिका
है ख़ुदा की कसम मत वहम कीजिए
----------------------------------------------------
(15)-दिल लगाते चलो..
बहर-122-122-122-12
यहाँ फूल हरदम खिलाते चलो
सदा दिल सभी से लगाते चलो
मिली जिन्दगी चार दिन क्या हुआ
सदा प्यार दिल से निभाते चलो
कहीं मौत हो उससे पहले यहाँ
जहां पे निशां कुछ बनाते चलो
नहीं हो सका ग़र मुलाक़ात तो
यूँ हर बार दिल को मनाते चलो
सभी द्वारिका यूँ सलामत रहें
ख़ुशी बाँटकर मुस्कुराते चलो
---------------------------------------------------------
(16)-तुम्हारा सताना..
बहर-122×4
तुम्हारा सताना न अच्छा लगेगा
मुझे यूँ रुलाना न अच्छा लगेगा
नहीं यार कोई मिला जिन्दगी में
'तेरा छोड़ जाना न अच्छा लगेगा
बता दूर जाकर मिलेगा तुझे क्या?
ये'दामन छुड़ाना न अच्छा लगेगा
हमारी वफ़ा के इशारे समझ लो
नज़र को छुपाना न अच्छा लगेगा
मुहब्बत भरी तुम वफ़ाएँ निभाओ
बहाना बनाना न अच्छा लगेगा
सदा द्वारिका ही रहेगा तुम्हारा
कभी आज़माना न अच्छा लगेगा
------------------------------------------------------
ग़ज़ल
बहर-2122-1212-22
इक दिया दिल में तुम जला लेना
तीरगी का सबब मिटा लेना
हो हवा कितनी ही मुखालिफ़ पर
बुझ न पाये इसे बचा लेना
बेसहारा कहीं जो मिल जाये
मुस्कुराकर गले लगा लेना
प्यार का खोल कर के दरवाज़ा
मीत सबको यहाँ बना लेना
*मौज* है मशविरा यही तुमको
यार रूठे उसे मना लेना
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
-------------------------------------------------------
(18)-हमसफ़र चाहिए..
बहर -212×4
जिन्दगी के लिए हमसफ़र चाहिए
साथ मिलके चलूँ वह डगर चाहिए
ग़म भुलाते रहूँ हर ख़ुशी के लिए
यार खुशियाँ मुझे इस क़दर चाहिए
ये ज़माना मुझे याद करता रहे
बस दुआओं का मुझपे असर चाहिए
रोज़ सपने सुहाने मिले जो मुझे
देखने के लिए इक नज़र चाहिए
रौशनी हर घरों में रहे द्वारिका
बस नया ही नया हर सहर चाहिए
-------------------------------------------------------
(19)-बेवज़ह ही सवाल करती हो..
बहर-2122-1212-22
इस तरह क्यो बवाल करती हो
बेवज़ह ही सवाल करती हो
जीत क्या हार क्या मुहब्बत में
यार फिर भी धमाल करती हो
तुमको मालूम है बसी तुम हो
दिल मेरा क्यों हलाल करती हो
तोड़ देती मेरा भरोसा तुम
प्यार भी तुम कमाल करती हो
चाहते द्वारिका मनाये बस
रूठ जाने को ढाल करती हो
--------------------------------------------------------
(20)-पी रहा हूँ रोज मैं..
बहर-2122-2122-2122-212
यार देखो दिल लगाकर पी रहा हूँ आज मैं
बेवफ़ा के ग़म भुलाकर पी रहा हूँ आज मैं
लूटते हैं आज के नेता हमारे देश को
सब यहाँ अपना लुटाकर पी रहा हूँ आज मैं
आज से पहले कभी मैं दूर था इस चीज़ से
यार साकी डगमगाकर पी रहा हूँ आज मैं
यार धोख़ेबाज होकर तोड़ते हैं दोस्ती
दोस्त जो ऐसे भुलाकर पी रहा हूँ आज मैं
काम अब मिलता नहीं है हाथ खाली है मेरा
काग़जी डीग्री जलाकर पी रहा रहा हूँ आज मैं
द्वारिका अब देख कैसा हाल है इस देश का
इस लिए तो गुनगुनाकर पी रहा हूँ आज मैं
-------------------------------------------------------
(21)-अंध भक्ति
बहर-2122,,2122,,212
अंध भक्ति के नशे में चूर है
वास्तविकता से वो कोसो दूर हे
माँगता वरदान मूक तस्वीर से
पत्थरों को पूजकर मशहूर है
बस दिखावा रोज करता है यहाँ
शान शौकत में सदा भरपूर है
मातु-पितु को भूल जाता है सदा
आदमी कितना यहाँ मग़रूर है
आँख दिखता ही नहीं अब क्या कहूँ
झूठ धोखा में फँसे ये हुजूर हे
द्वारिका सच का ज़माना है नहीं
कुछ कहूँ तो मारने आतूर है
-------------------------------------------------------
(22)-किया वफ़ा जो कभी...
बहर-1212 1122 1212 22
किया वफ़ा जो कभी प्यार से निभा देना
ख़ुदा समझ के उसे जिंदगी लुटा देना
अगर बिछे हैं कहीं राह में बहुत काँटे
उन्हें हटा के वहाँ फूल ही बिछा देना
कहीं भटक जो गये राह में उन्हें साथी
मुसाफ़िरों को सही रास्ता बता देना
जो तेरा साथ निभाये हँसी ख़ुशी देकर
कभी नहीं फिर उसे यार तुम दगा देना
मिले न मौज कभी ग़म यहाँ गरीबों को
झुकी हुई वो नज़र आज तुम हँसा देना
--------------------------------------------------------
(23)-इकरार करना है..
बहर-1222×4
नज़ारे देख लो जानम मुझे इक़रार करना है
बसाया हूँ तुझे दिल में मुझे इज़हार करना है
भुलाना मत कभी मुझको कसम से जान दे
दूँगा
छुड़ाना मत कभी दामन मुझे बस प्यार करना है
वफ़ा की राह में हमदम तुझे भी साथ चलना है
बनालो तुम मुझे सजना वफ़ा हर बार करना है
ख़ुदा की है यही मरजी रहो तुम साथ में मेरे
वफ़ा तो एक दरिया है ख़ुशी से पार करना है
नहीं मिलता ज़माने में सदा कोई दिवाना दिल
हँसा दो द्वारिका को तुम उमर भर प्यार करना है
---------------------------------------------------------
(24)नज़र से नज़र का मिलाना..
बहर-122 122 122 122
नज़र से नज़र का मिलाना हुआ था
मुहब्बत का मौसम सुहाना हुआ था
रगो में नदी सी रवानी थीं ख़ुशियाँ
मुहब्बत का पैदा तराना हुआ था
वफ़ा कर रहा था वफ़ादार बनकर
मुहब्बत मुहब्बत निभाना हुआ था
सताया बहुत था जमाना मुझे तो
उसे तो ग़मों को बढ़ाना हुआ था
ख़ुशी माँगता मौज रब से हमेशा
इबादत कदा ही ठिकाना हुआ था
-------------------------------------------------------
(25)-जमीन तेरी तेरा आसमान है..
बहर-221 2121 1221 212
बेशक़ जमीन तेरी तेरा आसमान है।
मेरा बना यहीं पर ही इक मकान है।।
प्यारी ज़मीन पर बसा हुआ आशियां।
ये ताज़ तो नहीं पर मेरी जहान है।।
जो खेत है हमारी वो धान से भरी,
जानो रची बसी रग रग में किसान है।
-------------------------------------------------------
(26)-दिल जमीं पे आ सनम..
बहर-2122-2122-212
चाँद बन कर दिल जमीं पे आ सनम
प्रेम की आभा कभी बिखरा सनम
ये बहारें ये फिजाएँ आपकी
प्रेम की जादू कभी दिखला सनम
दम निकलता है तुम्हारे बिन यहाँ
पास आकर उलझने सुलझा सनम
बस तेरी खुशबू बसी है साँस में
फूल जैसे ही मुझे महका सनम
बस धुआं ही है धुआं दिल द्वारिका
प्रेम की बारिश कभी बरसा सनम
--------------------------------------------------------
(27)-भुला तो न दोगे..
बहर-122×4
मुझे तुम नज़र से गिरा तो न दोगे
कभी आजमाकर दगा तो न दोगे
मुझे यूँ चलाकर मुहब्बत की गलियाँ
कहीं यार दामन छुड़ा तो न दोगे
बता क्या है मजबूरियाँ भी तुम्हारी
या करके बहाना भुला तो न दोगे
तुम्हारे सितम से यूँ डर लग रहा है
जुदाई का मुझको सजा तो न दोगे
नही कुछ मेरा द्वारिका बिन तुम्हारे
कभी तोड़ यूं आसरा तो न दोगे
-----------------------------------------------------
(28)-मुहब्बत करोगे..
बहर-122 122 122 122
सुना है हमें तुम मुहब्बत करोगे
बना के मसीहा इबादत करोगे
वफ़ा जो किया तो वफ़ा ही निभाना
ज़माने से फिर क्यूँ शिक़ायत करोगे
ज़माना सताये मुझे तो चलेगा
मग़र तुम मेरा क्यों ख़िलाफत करोगे
घड़ी दो घड़ी की मुहब्बत जता कर
कहाँ फिर सनम तुम इनायत करोगे
चलो छोड़ दो अब बहाना बनाना
नहीं द्वारिका से शरारत करोगे
-------------------------------------------------------
(29)-वफाओं के बदले
बहर-122-122-122-122
वफाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ
मुहब्बत भरी वो अदा चाहता हूँ
मुहब्बत हमारी रहे यूँ सलामत
सदा साथ हो तुम दुआ चाहता हूँ
मुहब्बत की उठती है दिल में तरंगें
हसीं दिलरुबा की रज़ा चाहता हूँ
कहूँ मैं किसे आज दिल की ये बातें
मेरे दर्दे दिल का दवा चाहता हूँ
बता क्या रखा द्वारिका जिन्दगी में
सनम इस लिए तो मज़ा चाहता हूँ
---------------------------------------------------------
(30) सहारा मुहब्बत..
बहर-122×4
जिन्होंने दिया था सहारा मुहब्बत,
उसी ने किया है किनारा मुहब्बत।
जिसे टूट कर मैं बहुत चाहता था,
नहीं बेवफ़ा की गुजारा मुहब्बत।
मुहब्बत से दिल को सजाया बहुत था,
उसी ने न मेरा सँवारा मुहब्बत।
करूँ क्या वफ़ा मैं बुरा हाल मेरा,
दिलों में नहीं अब नज़ारा मुहब्बत ।
यहाँ है सितम द्वारिका देख लो तुम।
मगर आह दिल ने पुकारा मुहब्बत
---------------------------------------------------------
(31)-किया जो मुहब्बत..
बहर-122×4
किया जो मुहब्बत निभाना पड़ेगा
क़दम साथ मिलके बढ़ाना पड़ेगा
अगर रूठ जाऊँ या तुम रूठ जाओ
ख़ुदा की कसम खुद मनाना पड़ेगा
अगर चोट देता जमाना कभी तो
हमें यार आँसू छुपाना पड़ेगा
कोई लाख चाहे हमें यूँ सताना,
उन्हे अपनी नज़रें झुकाना पड़ेगा
नहीं द्वारिका ये जमाना किसी का,
यहाँ आग दिल का बुझाना पड़ेगा
--------------------------------------------------------
(32) कसम से फूल सी सूरत
बहर-1222×4
कसम से फूल सी सूरत,कहाँ से यार पायी हो।
बता दो आज दुनिया को,सितम क्यूँ यार ढायी हो।।
घटाओं सी लगे जुल्फें,लगे मौसम सुहाना है।
महकती अंग में ख़ुशबू,कहाँ से नूर लायी हो।
तुम्हारे नैन का जादू चढ़ा दिल पे हमारा है।
दिवाना तुम बना कर के जिगर में क्यूँ समायी हो।
ज़माने में नहीं देखा,कहीं तुम सा हसीना यूँ,
परी हो या वही कुदरत,सदा ही मुस्कुरायी हो।
बताए द्वारिका सबको,मुहब्बत की कहानी को।
कयामत हो सितमगर हो जुदाई या खुदायी हो।
----------------------------------------------------------
(33)-जिंदगी के कहाँ ठिकाना है..
बहर-2122-1212-22
जिंदगी के कहाँ ठिकाना है ।
चार दिन ही यहाँ बिताना है।।
बाँट लो ग़म ख़ुशी सभी अपना,
धार आँसू नहीं बहाना है।
क्यूँ डरें मौत से यहाँ साथी,
एक दिन छोड़ सबको जाना है।
साथ मिलके चलें ज़माने में,
भेद मन के सभी भुलाना है।
द्वारिका तुम सदा ख़ुशी बाँटो।
जिंदगी में यही तराना है।
----------------------------------------------------------
(34)-मैं हूँ थानेदार
तुम हो दिल की चोरनी,मैं हूँ थानेदार।
डालूँ दिल की जेल में,हो जाओ तैयार।।
जाओगे बच के कहाँ,मेरा चलता राज़।
बैठा कर यूँ पास में,कैसा?दूँ उपहार।।
धारा तुम पर है लगा,कर लो सभी उपाय।
पाओ तुम इतनी सज़ा,प्यार यहाँ भरमार।।
कहीं छोड़कर भागना,यहाँ नहीं आसान।
यार रिहाई भूल जा,मैं तेरा संसार।।
करे द्वारिका माफ़ क्यों,बहुत बड़ा अपराध।
रहना दिल के कैद में,जीवन यहीं गुजार।।
----------------------------------------------------------
(35)तुम्हारी याद में जानम
बहर-1222×4
तुम्हारी याद में रातें सनम कैसे गुजारूँ मैं।
कहाँ हो गुम बता दो तुम तुम्हे कैसे पुकारूँ मैं।।
मुहब्बत में उलझता हूँ करूँ क्या मैं बता दिलबर।
हमारी जान ही जाती यहाँ कैसे सँवारूँ मैं।
तुम्हारी याद यूँ पलपल मुझे आकर सताती है।
नशा छाया मुहब्बत का सनम कैसे उतारूँ मैं।।
कभी तुम चाँदनी बनकर सनम छत पे चले आओ।
मेरी"बिगड़ी हुई हालत तुम्हे पाकर सुधारूँ मैं।।
मचलते द्वारिका हरदम कहाँ मिलना मुहब्बत में।
हसीं दिलबर मिलेगी तो यहाँ दिल को उबारूँ मैं।।
---------------------------------------------------------
(36)मैं प्यार की कहानी..
बहर-221-2122-221-2122
मैं प्यार की कहानी,जाकर किसे सुनाऊँ।
वो बेवफ़ा बड़ी है दिल की किसे बताऊँ।।
है यार अज़नबी सी कुछ भी नहीं बताती।
है मौन जिन्दगी अब दिल में किसे बिठाऊँ।
देकर वफ़ा में धोखा उसने मुझे भुलाया।
अब कौन जिन्दगी में किससे वफ़ा निभाऊँ।।
लगता गमों का मेला रहता यहाँ अकेला।
बनके यहाँ मुसाफ़िर किसको गले लगाऊँ।।
है द्वारिका ज़माना तोड़ा हुआ भरोसा।
बिखरे हुए निशानी फिर से कहाँ सजाऊँ।।
--------------------------------------------------------
(37) होता मन आनंद...
होता मन आनंद है,पा कर तुमको पास।
आ जाते तुम दूर से,बस इतना ही आश।।
तुम बिन तरसे नैन है,बरसे आँसू धार।
प्यास बुझाने आ सनम,थोड़ा करो प्रयास।।
दिल से तुमको चाहता,समझो मेरी बात।
दिल तुझपे कुर्बान है,कर लो तुम अहसास।।
चाहा है तुमको सदा,मैं दुनिया को भूल।
प्यार भुला कर तुम यहाँ,करते मुझे उदास।।
तुम बिन मेरी जिन्दगी,जैसी काली रात।
आ कर के अब तुम प्रिये,मन में भरो उजास।।
सदा रहें आनंद से,हम तुम दोनों संग,
तुमको पाने द्वारिका,रखता है उपवास।।
---------------------------------------------------------
(38) मुस्कुराते चलो..
बहर-212×4
ग़म मिले या ख़ुशी मुस्कुराते चलो
हाल जैसा रहे गुनगुनाते चलो
जिंदगी का ठिकाना नहीं है यहाँ
ग़र ख़ता हो कभी तो भुलाते चलो
बाँट लो गम खुशी यार मिलके सभी
खुद हँसो और सबको हँसाते चलो
जिंदगी है तराना यहाँ दोस्तों
इसलिए हर घड़ी गीत गाते चलो
द्वारिका सब मिलेगा यहाँ प्यार में
प्यार सबसे यहाँ तुम लुटाते चलो
---------------------------------------------------------
(39)जिंदगी बेहाल है...
बहर-2212×4
जब से गये हो छोड़ के तुम जिंदगी बेहाल है
मैं जागता हूँ रात भर यूँ आँख मेरी लाल है
रहता नशा में प्यार का मैं याद करके आपको को
कहते सभी हैं लोग मुझको क्या शराबी चाल है
यादें सताती है मुझे बस रोज़ खाबों में मरूँ
आँसू निकलते आँख से भींगे हुए यूँ गाल है
कैसे रहूँ अब यार तुम बिन मौत भी आती नहीं
कटता नहीं इक पल कभी लगता यहीं अब साल है
मैं चोट खाता रोज पलपल क्या करूँ इस प्यार में
अब सोचता है द्वारिका ये प्यार भी जंजाल है
(40)चोट दिल में..
बहर-2122-2122-2122
चोट दिल में यूँ लगाई जा रही है
चैन से काँटें चुभाई जा रही है
छोड़ कर मुझको ज़माने में अकेला
बेवफ़ा दामन छुड़ाई जा रही है
बेवजह ख़ुद ही भुला कर प्यार मेरा
इस तरह से आजमाई जा रही है
प्यार की काबिल मुझे समझा नहीं वो
इसलिए तो वो सताई जा रही है
रोग़ कैसी द्वारिका लाखों मरे हैं
मौत भी तुमको बुलाई जा रही है
(41) मुहब्बत में क़यामत...
बहर-1222×3
मुहब्बत में क़यामत ही क़यामत हो
सदा दिल में सराफ़त ही सराफ़त हो
कभी टूटे नहीं नाता रहें मिलकर
मुहब्बत यूँ क़राबत ही क़राबत हो
अगर ग़लती किसी से हो भुलाना है
वफ़ा में यूँ इनायत ही इनायत हो
क़राहत को मिटाकर के यहाँ चलना
मुहब्बत में हिफ़ाजत ही हिफ़ाजत हो
रहो तुम द्वारिका बच के जमाने से
यहाँ तेरा क़रामत ही क़रामत हो
----------------------------------------
क़यामत=कायम,स्थिरता
सराफ़त=शरीफ़,इज्जत
क़राबत=समीपता,घनिष्ठता,
इनायत=प्रार्थना,पूजा,
क़राहत=नफ़रत क़रामत=बड़प्पन
(42)खिलौना..
मुझे खिलौना जान कर,क्यों खेले तुम यार।
पल-पल देकर चोट तुम,दिल पे करते वार।।
माना था तुमको ख़ुदा,पर तुम बेपरवाह।
क्या तुमको अहसास है,बहे नैन से धार।।
क्यूँ मुँह मुझसे मोड़ते,दिल से निकली आह।
तुम हो मेरी जिन्दगी,समझो मेरा प्यार।।
सपन सुनहरे देखता,हरदम तेरी चाह।
हरदम मेरे प्यार को,क्यों करते इंकार।
समझ गया है द्वारिका,मायावी की चाल।
मुझको कह के बेवफ़ा,करते हो तकरार।।
(43) जलना छोड़ दो..
बहर-2122-2122-2122-212
खुश रहो हर हाल में तुम यार जलना छोड़ दो
जोश में तुम हाथ अपना यार मलना छोड़ दो
तुम मुहब्बत ही निभाओ जिन्दगी की छाँव में
दुश्मनी की राह में तुम यार चलना छोड़ दो
प्रेम की यूँ फूल खिलाकर जिन्दगी गुलजार कर
पाँव में काँटे चुभाकर यार छलना छोड़ दो
क्यों सताते हो किसी को इस तरह से रोज़ तुम
पाप के इस काम मे तुम यार पलना छोड़ दो
द्वारिका ये जिन्दगी इक बार मिलती है यहाँ
तुम किसी का दिल दुखा कर यार फलना छोड़ दो
(44)-ज़रा सी बात पर..
बहर-2122-2122-2122-212
तुम ज़रा सी बात पर क्यूँ यार होती हो ख़फ़ा
इस तरह से तोड़ कर दिल कर रही हो क्यूँ ज़फ़ा
जो कहोगे सर झुका के मैं करूँगा आज से
माफ़ करना यार मेरे हो गई है जो ख़ता
लाख दो मुझको सितम पर छोड़ कर जाना नहीं
यार तुमसे जान से जादा किया हूँ मैं वफ़ा
प्रेम की बौछार कर अब जिन्दगी खुशहाल कर
आज अपनी दिल जिगर से रूठना करलो दफ़ा
द्वारिका दिलदार आशिक कोई व्यापारी नहीं
प्रेम के सौदे में होते हैं नहीं घाटा नफ़ा
(45) पास आते भी नहीं हो...
बहर-2122×4
पास आते भी नहीं हो दूर जाते भी नहीं हो
क्या इरादा है कभी तुम कुछ बताते भी नहीं हो
सोचना अब छोड़ दो तुम प्यार करलो यार मेरे
मुँह फुलाए देखती हो मुस्कुराते भी नहीं हो
बात क्या है खोल कर अब यार मुझसे कह ज़रा भी
मौन भाषा बोलती हो कुछ सुनाते भी नहीं हो
रूठ जाना बात अच्छी है नहीं अब प्यार में यूँ
इस तरह से दिल दुखाते तुम हँसाते भी नहीं हो
कर न पागल आज दिल को यार चल इकरार कर लो
प्यार की थोड़ी कहानी तुम सुनाते भी नहीं हो
द्वारिका का दिल मचलता है सनम यूँ क्या करे अब
कोई'नगमा प्यार की तुम गुनगुनाते भी नहीं हो।
दोस्ती दिवस में एक मुसलसल
ग़ज़ल
बहर-212-212-212-212
*फूल सी दोस्ती को सजा लीजिए*
*दोस्तों को गले से लगा लीजिए*
*दोस्ती में वफ़ादारी रखिये सदा
*जिन्दगी में बहुत फिर मज़ा लीजिए*
*दोस्ती से बड़ा और कुछ भी नहीं*
*फूल दिल के चमन में खिला लीजिए*
*दोस्ती में दग़ा हो न पाये कभी
*यार दुनिया से तौबा करा लीजिए*
*मौज तो नाज़ करता ख़ुदा की कसम*
*दोस्ती को ख़ुदा ही बना लीजिए*
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
(47)नींद नहीं आती है...
बहर-2122 1122 22
रात भर नींद नहीं आती है
याद अब दूर नहीं जाती है
चैन अब टूट रहा है मेरा
रात क्यों इतना कहर ढ़ाती है
हाल-ए-दिल किसको बताऊँ दुनिया
बेवफा रोज यहाँ गाती है
यार की याद मुझे पल-पल है
नैन में प्यार गज़ब छाती है
द्वारिका ख़ाब तुझे हमदम की
रूप ही रूप नज़र लाती है
(48) यार तेरा मुस्कुराना..
2122-2122-2122-212
यार तेरा मुस्कुराना याद आता है मुझे
प्यार से आँखें झुकाना याद आता है मुझे
रोज़ करते थे शरारत यार हरदम साथ में
रूठना हँसना मनाना याद आता है मुझे
प्यार वाली गीत लिखते साथ मे मिलकर सनम
साथ में वो गुनगुनाना याद आता है मुझे
एक दूजे के लिए हम माँगते हौसले
प्यार की सपने सजाना याद आता है मुझे
द्वारिका क्यों रो रहे हो क्या रहोगे इस तरह
छोड़ना उसका बहाना याद आता है मुझे
(49) वफ़ा दे दो...
बहर-2122-1212-22
माँगता हूँ प्रिये वफ़ा दे दो
चाहतों का मुझे सिला दे दो
बात दिल की सनम बता दो अब
प्यार की तुम मुझे रज़ा दे दो
मेरी दुनिया में आ के तुम दिलबर
जिन्दगी का मुझे मज़ा दे दे
हाथ थामें चलूँ तुम्हारा मैं
प्यार वाली मुझे अदा दे दो
*द्वारिका* प्यार का दिवाना है,
प्यार अपना मुझे ज़रा दे दो
(50) ख़्वाब मुझको दिखाने लगे..
बहर-212-212-212
ख़्वाब मुझको दिखाने लगे
यार हरपल लुभाने लगे
रोग़ जबसे लगा प्यार का
दिल जिग़र छटपटाने लगे
हौसला तो बहुत है मग़र
ये क़दम डगमगाने लगे
कल तलक थे जो मेरे क़रीब
छोड़ कर दूर जाने लगे
द्वारिका चैन आती कहाँ
याद उसके जो आने लगे
(51) निगाहें मिली थी...
बहर-122 122 122 122
निगाहें मिली थी फ़साना बना था
मेरे दिल में सीधा निशाना बना था
बहुत ख़ूबसूरत हसीना मिली थी
मुहब्बत में उसके दिवाना बना था
मुझे भूलकर बेवफ़ा हो गई वो
मेरा दर्दे ग़म ही तराना बना था
तड़पता रहा बेवफ़ा नाम से मैं
सदा मयक़दा ही ठिकाना बना था
कहूँ द्वारिका हमसफ़र या सितमग़र
वो जो दोस्त दुश्मन पुराना बना था
52)-मुस्कुराना यार तुम।
बहर-2122-2122-2122-212
देखते ही दूर से यूँ ,मुस्कुराना यार तुम
प्यार की है इस ग़ज़ल को,गुनगुनाना यार तुम
चाहता हूँ जान से भी,आज कहता हूँ तुझे।
रोशनी हो तुम वफ़ा की,झिलमिलाना यार तुम
शाम देखूँ रात देखूँ ,खाब तेरे रूप का
आज बाहों में समा के,क़समसाना यार तुम
दूर जाना तुम नहीं अब,साथ मेरा छोड़ के
पास मेरे रोज ही अब,खिलखिलाना यार तुम
द्वारिका तो इस जमाने में,तुझे है चाहता।
तोड़ कर दिल को नहीं अब,आज़माना यार तुम
गजल-(53)
बह्र-रमल मुसद्दस मेहजूफ़
फ़ाइलातुन/फ़ाइलातुन/फाइलुन
2122/2122/212
ख़ूब हँसना औऱ हँसाना सीख लो
ज़िन्दगी में गम भुलाना सीख लो
नफ़रतों से मिट गए लाखों मकां
प्यार से रिश्ते निभाना सीख लो
सब अँधेरे खुद ब ख़ुद मिट जायेंगे
ज्ञान का दीपक जलाना सीख लो
मुफ़्लिशों के काम आओ उम्र भर
गैरों* को अपना बनाना सीख लो
चार दिन की ज़िन्दगी है*द्वारिका*
ग़म में*भी तुम मुस्कुराना सीख लो
(54)गले से लगा कर पराया न कर..
बहर- 122 122 122 12
कभी यार दामन छुड़ाया न कर
कही दूर जाकर रुलाया न कर
तुम्हीं आरज़ू हो तुम्हीं जिंदगी
कभी आस मेरा मिटाया न कर
तुझे माँगता हूँ तुझी से सनम
गले से लगाकर पराया न कर
सदा यार हमने निभाई वफा
वफा नाम लेकर सताया न कर
मुहब्बत निभाया तुझी से यहाँ
मुझे द्वारिका यूँ सताया न कर
(55) अभी शाम-ए-सुहानी है..
बहर-1222×4
अभी तुम हो अभी मैं हूँ अभी शाम-ए- सुहानी है
ज़रा समझो नजाक़त को मुहब्बत भी निभानी है
सँभाला है बहुत दिल को सनम अब पास आ जाओ
उदासी छोड़ भी दो कुछ दिनों की ये जवानी है
कभी तुम भूल मत जाना मुहब्बत के इशारो को
मुहब्बत की मिले गर वक़्त तो किस्से सुनानी है
बसाया हूँ जिग़र में मानकर तुमको ख़ुदा अपना
जुड़ी ये जीस्त की मेरी तुम्ही से हर कहानी है
मचलता द्वारिका का दिल तुझे बाहों में" लेने को
तुम्हारा मौन रहना तो लगे जैसे विरानी है
(56) आपको नाम लेकर बुलाते रहे...
बहर --212 212 212 212
आपको नाम लेकर बुलाते रहे
और मुझसे जफ़ा तुम निभाते रहे।
क्या वजह थी मुझे तुम भुला जो दिये
बेसबब ही सदा आजमाते रहे
टूट कर भी खड़ा हूँ वफ़ा राह में
और मेरा जिगर तुम जलाते रहे
इस तरह से मिला प्यार का है सिला
बस नयन धार आँसू बहाते रहे
बेवफ़ाई मिली द्वारिका चाह में
और हम दिल जिगर यूँ दुखाते रहे
(57) कहाँ तक किसी की...
बहर-122 122 122 122
कहाँ तक किसी की बुराई करेंगे
जहाँ तक बनेगा भलाई करेंगे
🌸🌸
करेंगे ग़ज़ल की हिफाज़त हमेशा
न बदनाम हम रोशनाई करेंगे
🌸🌸
बहुत हाथ जोड़े न हासिल हुआ कुछ
जरूरत पड़ी तो ठुकाई करेंगे
🌸🌸
हमारे भरोसे है* कश्ती अदब की
क़लम से न हम बेबफाई करेंगे
🌸🌸
चलो द्वारिका ख़ुशियाँ* बाँटे जहाँ में
गमों की कहाँ तक बुबाई करेंगे
(58) यार दिल में..
बहर-2122-12-12-22
यार दिल में उतर गये मेरे
जिंदगी ही सँवर गये मेरे
मोम बन कर पिघल रहा हूँ मैं
प्यार में जां निखर गये मेरे
अब वफ़ाई मुझे लगे प्यारे
दुःख सारे बिखर गये मेरे
प्यार की बात रोज होती है
गम सभी यूँ बिसर गये मेरे
द्वारिका मौज़ में जीया जाता
चाल सारे सुधर गये मेरे
(59) तेरा मुस्कुराना..
2122 2122 2122 212
जब भी* तेरा मुस्कुराना याद आता है मुझे।
नींद खुलते टूट जाना याद आता है मुझे।l
मैं अगर छोटी सी* ज़िद पे रूठ जाता था कभी।
माँ का*फिर मुझको मनाना याद आता है मुझे।l
ख़्वाब जो हमने बुने थे ज़िन्दगी के साथ में।
सच कहूँ गुजरा जमाना याद आता है मुझेll
अश्क़ आँखों से निकल पड़ते हैं* मेरे आज भीl
यार जब बिखरा घराना याद आता है मुझे।l
द्वारिका इस ज़िन्दगी की बस यही है फ़लसफ़ा।
झुकके* बस रिश्ते निभाना याद आता है मुझे।l
(60) न जी रहे न मर रहे..
बहर 1212 1212 1212 1212
न जी रहे न मर रहे अजीब माज़रा हुआ।
कहाँ चली गई सनम जमीन फ़ासला हुआ।।
बहार थी ए जिंदगी बेज़ार हो रही अभी।
वफ़ा कभी मिला नहीं हसीन हादसा हुआ।।
*झुकी हुई नज़र कभी उठा नहीं सकी सनम।*
निसार कर के जिंदगी सनम पे बावरा हुआ।
घडी़ घडी़ करीब थी वही सता रही मुझे।
कभी मिटे कभी उठे कसक दिलें जफ़ा हुआ।
मुहब्बतों में घायलों सा हाल अब बना मेरा।
बची हुई ए जिंदगी में कुछ तो फ़ायदा हुआ।।
(61) आग सी क्यूँ लगी...
बहर-212 212 212 2
आग सी क्यूँ लगी है बदन पर
जल रहा हूँ बहुत मैं तपन पर
चाहता हूँ उसे इस तरह मैं
चाँद तारे हैं जितने गगन पर
बंद पलकें करूं तो दिखे वो
वो बसी है सदा इस नयन पर
जिंदगी की हसीं मीत वो है
फूल बनकर महकती चमन पर
द्वारिका पूजता है तुझे ही
प्यार रखना सदा इस सजन पर
(62) होली..
बहर-2122 1212 22
यार होली चलो मनायेंगे
फासले दरमियाँ मिटायेंगे
भूलकर अब यहाँ गिले शिकवे
प्यार की धार ही बहायेंगे
झूठ धोखे यहाँ बहुत मिलते
संग होली इसे जलायेंगे
प्रेम के रंग में रंग जाना है
आज सबको गले लगायेंगे
द्वारिका आज से हटा काँटे
फूल राहों में बस बिछायेंगे
(63) ये युवा दौर...
बहर-212×4
ये युवा दौर किस सिम्त जाने लगे
यार बहके हुए घर जलाने लगे
रोज़ करते नशा शाम हो या सुबह
मेहनत की कमाई उड़ाने लगे
डूब कर ये नशा के ही आगोश में
रंग महफिल में अपने जमाने लगे
कौन समझाये इनको ये हैं नासमझ
नाम माता पिता का डुबाने लगे
नाश की जड़ नशा है यहाँ द्वारिका
फिर भी क्यों लोग हस्ती मिटाने लगे
(64) मैं नदी हूँ..
बहर-212-212-212-212
मैं नदी हूँ मुझे आजमाना नहीं
धूल कचरा मुझी में बहाना नहीं
प्यास जन्मों से सबकी बुझाती रही
हे मनुज तुम मेरा दिल दुखाना नहीं
बह रही हूँ सदा चोट खाते हुए
राह चट्टान मेरे बिछाना नहीं
लहलहाती हुई वो फसल देख लो
वो सिंचाई को तुम भूल जाना नहीं
जिंदगी दायनी जान लो तुम मुझे
पाट कर तुम मुझे यूँ मिटाना नहीं
(65)दूर जाकर मुझे...
बहर-212 -212 -212 -212
दूर जाकर मुझे क्यूँ भुलाने लगी
पास आजा तेरी याद आने लगी
दर्द बढ़ने लगा है जिगर पे सनम
क्यूँ रुलाकर मुझे मुस्कुराने लगी
ये सितम ये जफा़ मार डाला मुझे
क्यूँ सनम बेवफाई दिखाने लगी
पूजता था तुझे मैं खुदा मान कर
अब कलेजे में छूरी चलाने लगी
हार कर प्यार में द्वारिका जी रहा
याद जालिम कहर रोज ढ़ाने लगी
-(66) क्या मिलेगा...
2122×3
इस तरह मुझको *सता* के क्या मिलेगा
ग़मजदा दिल को *दुखा* के क्या मिलेगा
धड़कनों में तुम बसी हो जान लो तुम
यार मुझको *आजमा* के क्या मिलेगा
चाह कर के तुम मुझे रुशवा न करना
यार दामन को *छुड़ा* के क्या मिलेगा
तोड़ते क्यूँ जान तुम वादे वफा को
गैर के बाहों में *जाके* क्या मिलेगा
है मुहब्बत में जुदाई बेवफ़ाई
द्वारिका आँसू *बहा* के क्या मिलेगा
(67) फ़ासले दरमियाँ
बहर-212×4
फ़ासले दरमियाँ जो मिटाते नहीं
दोस्ती उनसे फ़िर हम निभाते नहीं
जिनसे दिल उम्र सारी मिले ही नहीं
हाथ उनसे कभी हम मिलाते नहीं
झूठ का बोलबाला ज़हां में बहुत
सच को सच लोग भी क्यों बताते नहीं
कोई बातें मुहब्बत की सुनते कहाँ
इसलिए या ख़ुदा हम सुनाते नहीं
अपने महफ़िल में लाखों नहीं द्वारिका
हम नुमाइश ए महफ़िल सजाते नहीं
(68)बारहा हक नहीं यू...
बहर-212 212 212 212
बारहा हक नहीं यूँ जताया करो
पास आकर गले से लगाया करो
बाँध कर प्यार की डोर में तुम सनम
प्यार वाली ग़ज़ल गुनगुनाया करो
चार दिन जिंदगी के मिली है यहाँ
फासलें दरमियाँ को मिटाया करो
आग दिल में लगी है मची खलबली
प्यास दिल की सनम तुम बुझाया करो
प्यार के सिलसिले यूँ रहे उम्र भर
द्वारिका को कभी आज़माया करो
(69)मैं हूँ तेरा प्यार...
क्यों समझे तुम अजनबी,मैं हूँ तेरा प्यार।
तुम ही मेरी जिंदगी,कर दो अब इज़हार।।
रग-रग में हो तुम बसी,तुम ही मेरे मीत।
दिल से दिलबर जान लो,जुड़ा हुआ है तार।।
दिल तुझपे है बावरा,अजब हुआ हालात।
इस दुनिया में एक ही,मैं तेरा दिलदार।।
पल-पल की अहसास तुम,जीने की तुम राह।
कह कर के तुम अजनबी,दिल पे करती वार।।
जनम जनम तक द्वारिका,सदा निभाए साथ।
बनकर अब तुम राधिका,कर दो बेड़ा पार।।
(70) जिंदगी सजा देना...
बहर-2122 1212 22
यार तुम जिंदगी सजा देना
फूल जैसी हँसी खिला देना
दूर जाना नहीं खयालों से
हम मिलें सिलसिले बढ़ा देना
मानकर तुम मुझे जीवन साथी
नफरतों को सनम मिटा देना
टूटता हूँ बिना तुम्हारे मैं
प्यार की आशियां बना देना
द्वारिका चाहता बहुत तुमको
गर ख़ता हो मुझे बता देना
(71) मैने अपना रब बनाया...
बहर-2122 2122 212
मैंने अपना रब बनाया आपको
हर घड़ी दिल में बसाया आपको
जुस्तज़ू हो आरज़ू भी जाने जां
रोज सपनों में सजाया आपको
पड़ न जाए इस जमाने की नज़र
धड़कनों में है छुपाया आपको
साथ मिलता आपका यूँ ही सदा
अपने पलकों में बिठाया आपको
खुशनसीबी है बहुत वो द्वारिका
इस जहां में जो भी पाया आपको
(72) देखिए तो...
बहर-2122×3
ख़ौफ़ से दुनियाँ भरी है देखिए तो
कितनी*मुश्किल ये घड़ी है देखिए तो
अब भरोसा उठ गया है पत्थरों से
जान मुश्किल में पड़ी है देखिए तो
मौत का मंजर दिखाया अब ख़ुदा ने
ढे़र लाशों की लगी है देखिए तो
मिट रहा है आशियां अब क्या करें हम
खलबली हर दिन मची है देखिए तो
*द्वारिका* समझो अभी भी वक़्त रहते
दुनियाँ* कितनी मतलबी है देखिए तो
ग़ज़ल-(73)ख़ुदा भी हमे...
बहर-122×4
ख़ुदा भी हमें आजमाने लगा है
नक़ाबों से परदा हटाने लगा है
सभी आज बेबस नजर आ रहे हैं
समय अपना करतब दिखाने लगा है
तबाही के मंजर इशारा है कोई
नहीं समझे जाँ उनके जाने लगा है
समझते यहाँ वक़्त के चाल को जो
सितम सह के भी मुस्कुराने लगा है
भरोसा करूँ कैसे अब 'द्वारिका' मैं
यहाँ साया दामन छुड़ाने लगा है
ग़ज़ल-(74) रात का ये सन्नाटा...
बहर-212 1222 212 1222
रात का ये सन्नाटा ख़ौफ़ की निशानी है
इक दिया जलाकर ही रोशनी जगानी है
जंग चाहे जैसी हो हारना नहीं हमको
हौसला है रग-रग में खून में रवानी है
मुश्किलों में हारा जो ज़िन्दगी से हारा है
मौत सर पे आई है ज़िन्दगी बचानी है
ठोकरें सिखाती है ज़िन्दगी जिएँ कैसे
जानता हूँ क्यों दुनियाँ प्रेम की दिवानी है
द्वारिका समझ जाओ किस तरह की है दुनियाँ
ज़ख़्म भी पुराने हैं चोट भी पुरानी है
दोहा ग़ज़ल-(75)
नव युग का संदेश सुन,सुधर ज़रा इंसान।
छोड़ प्रकृति को छेड़ना,कहते हैं भगवान।।
होड़ लगा शहरीकरण,काट रहे क्यों पेड़।
जंगल आज उजाड़ कर,बन बैठा हैवान।।
कातिल अब आबो हवा,थम-थम जाती साँस।
यही रहे हालात तो,जग होगा वीरान।।
लालच में आकर सदा,करते हो क्यों काम।
पर्यावरण बदहाल कर,बनते हो नादान।।
कल-कल बहती थी नदी,पाट रहे हैं लोग।
वेग नदी का थम गया,दिखता नहीं उफान।।
समझ जरा अब द्वारिका,मतलब के हैं लोग।
बेच दिए हैं देख लो,कितनों ने ईमान।
(76)रफ़्ता-रफ़्ता नज़र से...
बहर 212×4
वो जो'अपनी हदों से गुजरने लगे
रफ़्ता'रफ़्ता नज़र से उतरने लगे
कोई देता नही है सहारा यहाँ
समझे अपना जिसे सर कुचलने लगे
ठोकरों ने सिखाया है जीने का फन
वक़्ते गर्दिश में भी हम सँवरने लगे
साँच को आँच लगता कभी भी नहीं
झूठ कुछ देर में ही पिघलने लगे
मौज़ का नाम है जिंदगी द्वारिका
दर्द सहकर यही सोच हँसने लगे
(77) है अज़ां बेहद कहूँ...
बहर-2122 2122 2122 212
है अज़ां बेहद कहूँ क्या हाल भी बेहाल है
दौंरे -मुश्किल में वत़न ये दुश्मनों की चाल है
किसने घोला है फिज़ा में जह्र यह तू ही बता
क्या किसी जयचंद का फेका हुआ यह जाल है
बद्दुआएं मुफ़्लिसों की तूने ली होंगी जरूर
झोपड़ी के बीच रहकर आज मालामाल है
जां से भी प्यारा जिसे लगता हो यह अपना वतन
वो ही सच्चा रहनुमा है वो ही सच्चा लाल है
जो जमीं जन्नत बनाये यूँ हिफाज़त ही करे
द्वारिका उनसे ही ऊँचा भारती का भाल है
(78)ख़ूब करें इबादत....
बहर-211 212 22
खूब करें इबादत हम
छोड़ चलें शिकायत हम
बैर कभी नहीं करना
यार करें मुहब्बत हम
रोग लगा जमाने में
आज करें हिफाज़त हम
चोट नहीं लगे दिल में
पास रखें सराफ़त हम
जान नहीं गँवाना है
तोड़ चलें अदावत हम
बात न द्वारिका मानें
यार करें अदालत हम
विज्ञात छंद आधारित
ग़ज़ल-(79)
बहर-211 212 22
यार मुझे वफ़ा देना
और नहीं दगा देना
पास रहो हमेशा तुम
फ़र्ज़ सभी चुका देना
दूर कहीं नहीं जाना
रोज वफा़ सिला देना
देख चिराग जलता है
यार नहीं बुझा देना
छोड़ निराश क्यों होना
राज़ हमें बता देना
व़क्त सहीं सलामत हो
माँग रहा खुदा देना
छोड़ न द्वारिका बातें
आज गिले मिटा देना
ग़ज़ल(80)
2122-12-12-22
बेसबब क्यूँ हमें सताते हो
मुफलिसी की हँसी उड़ाते हो
मौत छाने लगी फ़िजाओं में
और मिलने मुझे बुलाते हो।
प्यार का नाम है फ़ना होना
आप हो यूँ कि आजमाते हो।
क्या इरादा जरा बता भी दो
प्यार भी दुश्मनी निभाते हो
हो सके तो हक़ीम बन जाओ
दर्द दिल के सदा बढ़ाते हो
तुम गरीबी समझ कभी पाते
बेसबब झोपड़ियाँ जलाते हो
*द्वारिका* छोड़ दो नशा करना
मौत को क्यूँ गले लगाते हो
ग़ज़ल-(81)
बहर-1222×3
मुहब्बत में जुदाई बस समझ जाओ
वफ़ा की है दुहाई बस समझ जाओ
लगा कैसा वत़न को रोग ये यारों
खुदा की बेवफ़ाई बस समझ जाओ
बिलखते भूख से बच्चे गरीबों के
रईसों की मलाई बस समझ जाओ
मची अब होड़ सी है लूट खाने की
सियासत में कमाई बस समझ जाओ
मिटी है द्वारिका इंसानियत अब तो
यहाँ मजहब लड़ाई बस समझ जाओ
ग़ज़ल -(82)
बहर-1212 -1212 -1212-1212
तर्ज-अभी न जाओ छोड़कर
चरागे-दिल जला गया वो हमनवा अभी-अभी
कराहता हूँ इस कदर धुआँ उठा अभी-अभी
यहाँ चमन उजड़ रहा है मौत का निशां बना
दिखा दिया फ़िजा ने कैसा जलजला अभी-अभी
अजी सुनो कहें किसे ये जिंदगी उदास है
बड़ी हसीं निगाह से याँ खूँ हुआ अभी-अभी
गरीब भूख से मरे रईंस देखते रहे
फ़रेब के ही नोट से महल बना अभी-अभी
उठा है क्यों ये जलज़ला जिगर में तेरे *द्वारिका*
मिटाले गमज़दा ख़ुशी से मुस्कुरा अभी-अभी
ग़ज़ल -(83)
बहर-212×4
तुम अगर साथ--
क्यो सनम बेवफ़ाई दिखाया मुझे
चोट दिल में लगाकर रुलाया मुझे
मैं खुदा मानता था हमेशा उन्हें
और वो बेवफ़ा आजमाया मुझे
ठोकरों से सम्हलना यहाँ आ गया
ये जमाना भी कितना डराया मुझे
दिल जवां है जवां ही रहेगा सदा
उसने अपनी गले जो लगाया मुझे
द्वारिका भूल कर याद करना नहीं
आँसुओं की तरह जो बहाया मुझे
ग़ज़ल-(84)
बह्र-221-2121-1221-212 में
तर्ज- *मिलती है जिंदगी में मुहब्बत कभी-कभी*
तीरे-नज़र का अपना निशाना बना गई
मुझको अदा दिखाके दिवाना बना गई
मैं तो यूँ जल रहा हूँ मुहब्बत की आग में
वो अपनी जिंदगी का ठिकाना बना गई
चलते ही जा रहा था वफ़ा के ही रास्ते
आशिक मुझे कसम से पुराना बना गई
अच्छा सबक सिखाकर वो खुद ही चली गई
बदरंग सी जिंदगी को मौलाना बना गई
सैलाब सा उठा है जिगर में क्यूँ द्वारिका
वो बेवफ़ा सनम क्यूँ बेगाना बना गई
ग़ज़ल(85)
बहर-
2122-1212-22
मुफ़लिसों को सभी नकारे हैं
लोग देते नहीं सहारे हैं
लूट कर लोग कुछ व़तन यारों
अपनी तकदीर ही सँवारे हैं
काम भाता नहीं निठल्लों को
माँगने हाथ को पसारे हैं
है नवाबों का ये व़तन कहते
कौन हैं कर्ज जो उतारे हैं
कौन अब तीरगी मिटायेगा
सब खड़े दूर जो किनारे हैं
अन्नदाता किसान भूखा ही
द्वारिका जिंदगी गुजारे हैं
ग़ज़ल(86)
बहर-212-212-212-212
तर्ज-तुम अगर साथ देने का वादा
दर्द देकर सदा मुस्कुराते रहे।
उम्र भर वो हमें आजमाते रहे।
उनके घर खुद अँधेरा रहा उम्र भर
दीप औरों के घर जो जलाते रहे
मेरे ग़म में न आए क़भी दोस्तों
मेरी खुशियों में जो आते जाते रहे
मैं ये समझा कि मेरे मददगार हैं
मुफ़लिसी की हँसी वो उड़ाते रहे
अब शराफ़त के दिन तो गये द्वारिका
और हम बस शराफ़त दिखाते रहे
ग़ज़ल-(87)
बहर-2122 2122 212
साथ तेरा ख़ुशनुमा सा है सनम
प्यार तेरा इक दुआ सा है सनम
देखकर तुमको मुझे ऐसा लगा
चाँद बादल में खिला सा है सनम
इश्क़ में पागल हुआ हूँ इस कदर
जैसे कोई लापता सा है सनम
*हर दुआओं में तुझे ही माँगकर*
*बस मुझे जन्नत मिला सा है सनम*
*प्यार पाकर मैं महकता हर घडी़*
*फूल दिल में यूँ खिला सा है सनम*
साथ देना उम्र भर अब द्वारिका
दूर जाना तो सजा सा है सनम
ग़ज़ल(88)
बहर-1222 1222 1222
कभी तुम मुफ़लिसों की हाल पूछो तो
नयन क्यों सिसकियों में लाल पूछो तो
बिलखते भूख में बच्चे यहाँ हरदम
घरों में क्या है रोटी दाल पूछो तो
जो महलों में सजाते हैं बड़ी महफ़िल
रईंसों की बड़ी क्या चाल पूछो तो
पसीने की कमाई है कहाँ देखो
तिजोरी में है कितना माल पूछो तो
सुनाये द्वारिका अब दास्तां कैसे
गुनाहों का बिछा है जाल पूछो तो
ग़ज़ल(89)
व़ज़्न-1222-1222-1222
व़तन पे हो फ़िदा बंदा नहीं मिलता
बहादुर अब कोई अच्छा नहीं मिलता
बहुत देखा वफ़ा करके ज़माने में
मुहब्बत में वफ़ा सच्चा नहीं मिलता
ज़माने में लगी है भीड़ अपनों की
मग़र माँ बाप सा रिश्ता नहीं मिलता
यहाँ कीमत मुहब्बत का समझ जाओ
दुकानों में कभी पक्का नहीं मिलता
गमों को जो मिटादे वो कभी दिलबर
जहां में द्वारिका अपना नहीं मिलता
ग़ज़ल(90)
बहर-122 -122 -122 -12
ख़ुदा की क़सम मैं कँवारा नहीं
मुहब्बत से अपना किनारा नहीं
जियें हम भले मुफ़लिसी की जिंदगी
मग़र यार किस्मत का मारा नहीं
ज़माने की सारी ख़ुशी मिल गई
मिली तुम मुझे बेसहारा नहीं
सदा आँधियों ने डराया मुझे
जो पल में बुझे वो सितारा नहीं
अगर आँख कोई दिखाये यहाँ
कभी द्वारिका फिर बेचारा नहीं
ग़ज़ल(91)
बहर-221 2122 221 2122
तर्ज-वो रात के मुसाफ़िर
जाने वफ़ा कसम से,मुझको करार दे दो।
पतझड़ सी जिंदगी है,अब तो बहार दे दो
अपना मुझे बना कर आबाद जिंदगी को
बस चाहिए मुहब्बत ही बेशुमार दे दो।
बरसों से ग़मजदा हूँ आँखे नमी नमी सी
गमगीं दिलों जिगर में कुछ तो खुमार देदो
कब से मचल रहा हूँ बस साथ हो तुम्हारा
यूँ मैं बहक न जाऊँ ऐसा बुखार दे दो
है मेरी द्वारिका इतनी सी यही गुज़ारिश
मिट जाए दर्दे गम ये ऐसी बयार दे दो
ग़ज़ल(92)
बहर-221-2121-1221-212
जो लूटता वतन को वो गद्दार कम नहीं
नज़रे झुकाया है जो गुनहगार कम नहीं।
दिल से तो सुन के देखिये इस दौर की ग़ज़ल
मीर-ओ जिगर से आज भी फ़नकार कम नहीं
कैसे वत़न को रोग लगा आज देख लो
सब हौसला बढ़ाऐ मददगार कम नहीं
तूफ़ान से लड़े जो यहाँ जंग जीत ले
जो हारता है यार वो दिलदार कम नहीं।
अब द्वारिका ख़ुशी से चलो नेक रास्ते
सबको गले लगालो हो कुछ प्यार कम नहीं
ग़ज़ल सादर(93)
बहर 221 1222 221 1222
ऐ मेरे सनम मेरी पहचान मुहब्बत है
रखता हूँ वफ़ा दिल में ईमान मुहब्बत है
प्यारा सा वतन अपना रंगीन नजारे हैं
इस पर तो सदा मेरी कुर्बान मुहब्बत है
हालात जरा देखो कैसे हैं गरीबों के
ज़रदार निगाहों में बेजान मुहब्बत है
सरकार नहीं करना गुमराह जवानों को
इनके भी तो सीनों में तूफान मुहब्बत है
*लहरे* ने यही जाना समझा है यही अब तक
अल्लाह खुदा मौला भगवान मुहब्बत है
ग़ज़ल-(94)
बहर-2122 1212 22
या ख़ुदा एक रहगुजर दे दो।
चाहे फिर जैसे भी डगर दे दो।
माँगता हूँ सदा दुआओं में
खूबसूरत सी हमसफ़र दे दो
उलझनों को मिटा सकूँ अपनी
बस यही एक ही हुनर दे दो
मुफ़लिसों का कहाँ ठिकाना है
सर छुपाने उन्हे भी घर दे दो
द्वारिका उम्र यूँ गुजर जाए
ख़ुशनुमा सा नया सहर दे दो
ग़ज़ल(95)
बहर-2122 1212 22
हर तरफ है डगर उदासी का
छोड़ होगा जो डर उदासी का
हाल जैसा भी ख़ुश रहो यारो
फिर न होगा असर उदासी का
ठोंकरों से कभी न हारा जो
जीत जाते समर उदासी का
चार दिन की मिली जवानी है
रोक लेना कहर उदासी का
मौज़ तुम जोश भर लो बाजू में
तोड़ना है जिगर उदासी का
ग़ज़ल (96)
बहर-122 122 122 122
बड़ी ख़ूबसूरत मेरी दिलरुबा है
नज़र कात़िलाना नशीली अदा है
बनाया निशाना निगाहों से अपनी
मग़र आज़माना कहाँ की वफा़ है
यहाँ बावलों सा हुआ हाल मेरा
मुहब्बत तुम्हारी नशा ही नशा है
सनम साथ मिलके रहेंगे हमेशा
सदा माँगता दिल ख़ुदा से दुआ है
रखो *मौज़* हरदम वफ़ा को सलामत
तेरे दर्दे दिल की यही इक दवा है
ग़ज़ल(97)
बहर-2122 2122 2122 212
चार दिन की जिंदगी है भूल मत करतार को
एक दिन जाना पडे़गा छोड़ कर संसार को
मुफ़लिसों में बाँट दो अपनी कमाई यार कुछ
क्या करोगे दौलतों से है भरे भंडार को
बेसबब ही यूँ गरीबों को सताना छोड़ दो
वो अमीरों लो बदल बिगड़े हुए व्यवहार को
है वही गद्दार देखो जो उजाड़े ये चमन
लूटते हैं वो जमीं मेरे वतन गुलज़ार को
दुश्मनी सारे भुला कर दोस्ती हमसे करो
देख लो तुम आज़माकर मौज इस दिलदार को
ग़ज़ल(98)
बहर-122 122 122 122
निगाहें मिलाकर निगाहें चुराना
अदाएँ कहाँ सीखी तुम कात़िलाना
कभी दूर जाती कभी पास आती
यूँ अच्छा नहीं बारहा आज़माना
कभी रूठकर दूर जाती हो मुझसे
सनम छोड़ दो इस तरह तुम सताना
लगाओ गले से यही आरजू है
मुहब्बत किये तो मुहब्बत निभाना
तुम्हे *मौज* अपना खुदा मानता है
कभी दर्द देकर इसे ना रुलाना
ग़ज़ल(99)
बहर-212-212-212
यूँ मुहब्बत वफ़ा कीजिए
सबके हक़ में दुआ कीजिए
जो तेरा साथ दे उम्र भर
उससे फिर मत दग़ा कीजिए
माँ पिता की दुआ साथ फिर
जिंदगी भर मज़ा कीजिए
कौम के दुश्मनों का यहाँ
है चलन क्या पता कीजिए
इस वतन में मिली ज़िंदगी
कुछ अदा शुक्रिया कीजिए
*मौज़* भूखा रहे ना कोई
रब से यह इल्तिज़ा कीजिए
ग़ज़ल(100)
बहर-2122 2122 2122 212
यार की नजरों से जब नज़रें मिलाना आ गया
प्यार का अब हर तरफ मौसम सुहाना आ गया
रोटियाँ मुझको खिलाती खुद कभी माँ हाथ से
याद बचपन का मुझे गुजरा जमाना आ गया
है पिता की सीख ही अब काम आता हौसला
हो बुरा गर वक़्त भी तो मुस्कुराना आ गया
यार दुनिया में बहुत ही कीमती है दोस्ती
याद कान्हा औ सुदामा दोस्ताना आ गया
जिंदगी भर बेसहारों का सहारा मौज बन
तेरे हाथों में मुक़द्दर से खज़ाना आ गया
Comments