ग़ज़ल संग्रह भाग(4)
ग़ज़ल (१)
बहर-22 22 22 22 22 2
प्यार किया तो खुलकर यार निभाना है
याद मगर रखना दुश्मन ये ज़माना है
दिल से सारी नफ़रत आज मिटाना है
बैर भुलाकर सबको गले लगाना है
जाकर मयख़ाने में जो घर भूल गया
समझो उसको दौलत ख़ूब उड़ाना है
बीच सड़क पर छेड़े भोली लड़की को
और समझता खुद को वो मर्दाना है
मौज बड़ों की लेना तुम आशीष सदा
एक यही तो बस रब का नज़राना है
ग़ज़ल(२)
बहर -221 2121 1221 212
हम उनको देख जैसे ही उनके निकट गए
वो मुस्कुरा के शान से हमसे लिपट गए
समझा था दोस्त जिनको ख़ुशी ग़म में साथ दें
मुश्किल में साथ देने से वो पीछे हट गए
बेनूर हैं नयन भी सजाऊँ मैं अश्क क्या?
इस वास्ते ख़ुशी से हमीं ख़ुद सिमट गए
खु़द को समझ रहे थे मसीहा ग़रीब का
पैसों की बात आई तो पल में पलट गए
इस मौज को मिटाये ज़माने में दम नहीं
इसको मिटाने वाले तो ख़ुद ही निपट गए
गज़ल(३)
बहर-221 2121 1221 212
उन दोस्तों पे हमको अभी तो गुमाँ हुआ
पाकर ही दोस्ती को ये दिल बागबाँ हुआ
निकले कभी सफ़र में अकेले ही दम भरे
बढ़ते कदम हमारे वही कारवाँ हुआ
कैसे जला दी जाती है अरमान की चिता
अब इस वतन में देख लो कैसा धुआँ हुआ
क्यों झूठ का हमेंशा मिलावट किया गया
वो सच को जान कर के भी क्यों बेजुबाँ हुआ
हम मौज पा नहीं सके अपनों के प्यार को
नफ़रत से तो भरा ही यहाँ आसमाँ हुआ
ग़ज़ल(४)
बहर-1222 1222 1222 1222
कोई तो रास्ता होगा सनम दिल में उतरने का
कभी मौका मुझे दे दो मुहब्बत में सुलझने का
यहाँ तो हर जग़ह देखो दरिंदे घूमते फिरते
सदा ही डर बना रहता यहाँ इज़्ज़त उजड़ने का
लुटाना मत कभी दौलत नशे में चूर होकर के
नशा इक़ रोग है यारो ज़माने में बिखरने का
दुआ पाना अगर चाहो ख़ुशी दो मुफ़लिसों को तुम
कभी तो हाल उनका पूछ लो ग़म में सिसकने का
जिगर मज़रूह में ज़ख़्मों का रेला मौज है कैसा
नहीं कुछ फ़ायदा होगा यहाँ पलपल तड़फने
ग़ज़ल(५)
बहर-212 212 212 212
एक हमदम की मुझको कमी रह गई
अब मुहब्बत बिना ज़िंदगी रह गई
कह न पाये कि उनसे हमें प्यार है
बात दिल में कसम से दबी रह गई
फेर कर मुँह हमेशा गुजरती है वो
आस दिल में मिलन की बची रह गई
कुलबुलाते बहुत लोग हैं भूख में
इस वतन में सदा मुफ़लिसी रह गई
काम मिलता नहीं हाथ खाली रहे
मुफ़लिसी इसलिए ही बनी रह गई
अब किसानों को मिलता कहाँ दाम है
मौज उनके लिए बेबसी रह गई
ग़ज़ल(६)
बहर-2122 2122 212
दूर से यूँ दिल्लगी अच्छी नहीं
पास आओ बेरुख़ी अच्छी नहीं
चोट तुम जो दे गये मरहम करो
जख़्म के यूँ ताज़गी अच्छी नहीं
आज़माने की अग़र जब बात हो
तब तो ऐसी आशिक़ी अच्छी नहीं
सुनके भी मुँह से न निकले वाह तो
तब तो अपनी शायरी अच्छी नहीं
हो नहीं सकता तेरा दीदार जब
यार जाना उस गली अच्छी नहीं
दिल दुखाकर मुस्कुराना चाहते
मौज वो फिर जिंदगी अच्छी नही
ग़ज़ल(७)
बहर-2122 1212 22/112
ज़ख़्म नासूर है पता न हुआ
मर्ज़ बढ़ता गया दवा न हुआ
हैं दरिंदे बहुत गुनाहों के
आज तक भी उन्हे सज़ा न हुआ
कैसे कह दूँ कि मैं मुहबबत है
दिल किसी पर भी तो फ़िदा न हुआ
बस ख़ुशी में ही लोग आते हैं
मेरे ग़म में तो क़ाफ़िला न हुआ
छोड़ कर वो चले गये खुद ही
क्या भरोसा जो आपका न हुआ
मुफ़लिसों को सदा ही लूटे जो
मौज उनका कभी भला न हुआ
ग़ज़ल(८)
बहर-221 2121 1221 212
करता हूँ रोज़ ख़्वाब में दिलबर से ग़ुफ़्तगू
फिर जागने से होती है मंज़र से ग़ुफ़्त्तगू
बारिश करेंगे़ देख लो दिल से पुकार कर
करना किसान के लिए अंबर से ग़ुफ़्तगू
जो ख़ून ही बहाये ऐसा काम छोड़ दे
करना नहीं तू यार वो ख़ंज़र से ग़ुफ़्तगू
गिर गिर के राह में चला था फिर उठा कभी
इस दिल को आज याद है ठोकर से ग़ुफ़्तगू
मुफ़लिस को बोलने से सदा रोकते यहाँ
करते रईंस देख लो अफ़्सर से ग़ुफ़्तगू
अब मौज क्या कहोगे यहाँ हाल है बुरा
कर लो तो ज़रा अपनी मुकद्दर से ग़ुफ़्तगू
ग़ज़ल(९)
बहर-221 1222 221 1222
बर्बाद हमें करके वो कैसे मगन होगा
आँसू से भरे देखो उसका भी नयन होगा
जो ख़ूब सजाता महफ़िल होश भुला कर के
करता है नशा हरदम उसका तो पतन होगा
मैं आज कदम रोका दुश्मन न बने कोई
बढ़ जाऊँगा जब आगे लोगों में जलन होगा
मैं जान लुटा दूँगा अपने ये वतन ख़ातिर
मरने से तिरंगा ही मेरा तो क़फ़न होगा
हरदम ही ज़माने में ग़म ही तो नहीं रहता
अब मौज सदा देखो ख़ुशहाल चमन होगा
ग़ज़ल(१०)
बहर-221 2121 1221 212
*इक दिलरूबा हसीन जो जीवन में आ गई*
*झंकार सरगमों की सी धड़कन में आ गई*
*क्यों रूठ करके मुझको सताती रही भला*
*आँसू पलक में देने को तड़पन में आ गई*
*तुम भूल जाना कहके लिखी है मेरे लिए*
*चिठ्ठी सनम की देखो तो आँगन में आ गई*
*दीवारे-दिल में यार की तस्वीर क्या लगी*
*सारी ख़ुदाई आपकी दामन में आ गई*
*बातें मुहब्बतों की जो छेड़ीं किसी तरह*
*वो सुनके मौज बातों को उलझन में आ गई*
ग़ज़ल(११)
बहर-12122 12122
नज़र सनम से मिला रहे हैं
इसी लिए ख़िलख़िला रहे हैं
यहाँ रईंसों का बोलबाला
ग़रीब को सब दबा रहे हैं
जवान देखो नशे की लत में
कमाई अपनी उड़ा रहे हैं
वे मज़हबों की लड़ाई हरदम
बेकार में ही बढ़ा रहे हैं
नहीं गिराते कभी पसीने
मग़र तिज़ोरी सजा रहे हैं
किसान का हाल है बुरा क्यों
गले में फंदे लगा रहे हैं
यूँ सल्तनत में होने को क़ाबिज़
सभी को वे वरग़ला रहे हैं
न तीरगी मौज को डराये
दिये जिग़र में जला रहे हैं
ग़ज़ल(१२)
बहर-1222 1222 1222 1222
कोई तो रास्ता होगा सनम दिल में उतरने का
कभी मौका मुझे दे दो मुहब्बत में सुलझने का
यहाँ तो हर जग़ह देखो दरिंदे घूमते फिरते
सदा ही डर बना रहता यहाँ इज़्ज़त उजड़ने का
लुटाना मत कभी दौलत नशे में चूर होकर के
नशा इक़ रोग है यारो ज़माने में बिखरने का
दुआ पाना अगर चाहो ख़ुशी दो मुफ़लिसों को तुम
कभी तो हाल उनका पूछ लो ग़म में सिसकने का
जिगर मज़रूह में ज़ख़्मों का रेला मौज है कैसा
नहीं कुछ फ़ायदा होगा यहाँ पलपल तड़फने का
ग़ज़ल-(१३)
बहर-1212 1122 1212 22/112
(१) मतला
कभी गली में हमारे नज़र नहीं आते
पता नहीं है वो क्या सोचकर नहीं आते
(२)
नसीब में है दिखे बस अकेले रहने का
वो बनने मेरा कभी हमसफ़र नहीं आते
(३)
चले गये जो हमें छोड़कर के तन्हा ही
वो शख़्स फिर तो कभी लौटकर नहीं आते
(४)
कभी आगे जो बढ़े लोग फिर गिराते हैं
गिरे हुए को उठाने मग़र नहीं आते
(५)
है आरज़ू कि यहाँ मौज प्यार से रहते
कभी जहाँ में गमो के भँवर नहीं आते
ग़ज़ल(१४)
बहर-122 122 122 12
यहाँ हाल मेरा बुरा हो गया
मुहब्बत का देखो नशा हो गया
मदद के लिए ही कहा दोस्त को
बहाना बना कर दफ़ा हो गया (२)
तलाशा बहुत मिल न पाया कभी
मग़र वो कहाँ ला पता हो गया (३)
निकलते हैं घर से कभी घूमने
सभी के कहाँ पूछना हो गया(४)
बहुत लोग चाहे गिराना मुझे
मग़र ख़ुद उठकर ख़ड़ा हो गया(५)
ख़ुशी माँगता हूँ सभी के लिए
मुकम्मल सभी कामना हो गया (६)
ग़ज़ल(१५)
बहर-221 2121 1221 212
महबूब के दगा ने दीवाना बना दिया।
देके वो अश्क़ आँखों को दरिया बना दिया
अव्वल रहा निभाने में हरदम मैं दोस्ती
वो मेरी दोस्ती को तमाशा बना दिया
सज़दा करूँ हमेशा ही माँ बाप हैं ख़ुदा
उनके ही हर दुआ ने नसीबा बना दिया
होता था आना जाना यहाँ सबके घर में भी
है कौन मेरे मुल्क़ में खेमा बना दिया
था मौज दिल ज़मी में हमारा भी इक मकां
चुपके से कौन तोड़ के मलबा बना दिया
ग़ज़ल(१६)
बहर-1222 1222 1222 1222
सनम तेरी मुहब्बत में कसम से डूबना होगा
तेरी ख़ुशबू जवाँ दिल में यकीनन घोलना होगा
मुहब्बत में किसी की जात कुछ देखी नहीं जाती
हरिक मज़हब की बंदिश को हमें ही तोड़ना होगा
बता दो आज दुनिया को सभी बंदे ख़ुदा के हैं
सलामत एकता हरदम रहे ये सोचना होगा
यहाँ चारो तरफ देखो दरिंदे घूमते हैं अब
गुनाहों को यहाँ मिलकर सभी को रोकना होगा
बचाएँ 'मौज' अब कैसे चमन बर्बाद होने से
कि इन हालात में हल कुछ हमीं को ढूँढ़ना होगा
डी.पी.लहरे "मौज":
ग़ज़ल(१७)
बहर-1222 1222 122
किसी से दिल लगाना चाहता था
वफ़ा में डूब जाना चाहता था
(२)
अँधेरी ज़िंदगी करने को रौशन
शमा दिल में जलाना चाहता था
(३)
वो आकर पूछ लेते हाल मेरा
उसे सब कुछ बताना चाहता था
(४)
मिला कोई नहीं दिलबर अभी तक
निग़ाहों में बसाना चाहता था
(५)
वतन में दुश्मनी का खेल देखा
अमन का मैं ज़माना चाहता था
(६)
यहाँ तो मौज लोगों ने रुलाया
ख़ुशी में मुस्कुराना चाहता था
डी.पी.लहरे"मौज"
छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(१८)
बहर-221 2121 1221 212
उस बेवफा की याद में हम तो फ़ना रहे
और उसपे ये सितम के वो मुझसे ख़फ़ा रहे
दीदार उनका हो है यही आरज़ू मेरी
जिस दिलरुबा की याद से बरसों जुदा रहे
उसकी हर एक बात पे मैंने किया यकीं
फिर किस लिए वो मुझको हैं अब आज़मा रहे
जब तक चलेगी साँस तुझे चाहूँगा सनम
मुझको ज़माने वाले हैं आशिक़ बता रहे
हँस कर सहूँगा तेरे सितम इश्क़ में सदा
इक दूजे का ये साथ हमेशा बना रहे
ग़ज़ल(१९)
बहर-1212 1122 1212 22
अभी भी दम है जिग़र में वो शान बाकी है
वो होसलों की परो में उड़ान बाकी है
मुझे तो रास नहीं आता रो के जीने में
हँसी की लब पे मेरे दास्तान बाकी है
उसे तो कह भी दिया तुमसे है मुहब्बत यूँ
मग़र सनम की अभी भी बयान बाकी है
तुझे हो फुर्सतें जब भी तो आज़मा लेना
मुझे पता है मिरा इम्तिहान बाकी है
जो तूने जख़्म दिये थे वो भर गये लेकिन
हर एक जख़्म का अब भी निशान बाकी है
करो वतन के लिए मौज काम अच्छा ही
रगो में अब भी तेरे वो उफ़ान बाकी है
ग़ज़ल(२०)
बहर-2122 1122 1122 22
दिल हमारा है बिना प्यार के यारा तन्हा
तेरी हसरत ही फ़क़त और सहारा तन्हा
रोज़ दीदार तो होता ही नहीं दिलबर का
चाँद से दूर है दिल का ये सितारा तन्हा
ज़ुस्तज़ू थी के मिले पास सनम आकर के
मुझको दुश्वार हुआ अब तो नज़ारा तन्हा
नाम लब पे ही सनम का मैं दबा बैठा हूँ
मेरी ख़ामोश निगाहों का इशारा तन्हा
मौज को ग़म ही मुहब्बत में मिला है अक्सर
फिर भी हर वक़्त को हँस कर ही गुज़ारा तन्हा
ग़ज़ल
बहर-2122 2122 2122 212
ए सनम इस ज़िंदगी में जब से तुम शामिल हुए
पूछते हैं लोग मुझसे किस तरह हासिल हुए
मेरी चाहत के लिए हैं इम्तिहाँ उसने बहुत
शुक्र है रब तेरा हम उस शोख के क़ाबिल हुए
अटखेलियाँ करती हैं मौजें आज साहिल से बहुत
मिल गया अमनों सुकूँ जबसे गले साहिल हुए
लग गई पाबंदियाँ उल्फ़त के यारो नाम पर
हम हदों को तोड़ कर तेरी तरफ़ माईल हुए
ज़ुस्तज़ू सब छोड़ दी है आपके मिलने के बाद
फ़ख़्र से अब मौज कहता साहिबे मंज़िल हुए
डी.पी.लहरे"मौज"
ग़ज़ल(२२)
बहर-1222 1222 122
ज़मी दिल में मुहब्बत का मकाँ था
मग़र देखा उठा उसमें धुआँ था
बहुत पूछा नहीं कुछ वो बताया
यकीनन दिल हमारा राज़दाँ था
मुसीबत में कभी हारा नहीं मैं
हकीकत में वही तो इम्तिहाँ था
यहाँ नफ़रत बगावत देख लो अब
कभी जो ख़ूबसूरत बाग़बाँ था
फ़लक में चाँद छुपता अब हया से
सितारे मौज पहले कहकशाँ था
ग़ज़ल(२३)
बहर-122 122 122 12
कभी मैं किसी को सताता नहीं
कभी ग़म के आँसू रुलाता नहीं
यहाँ लोग कुछ आज़माते मुझे
मग़र मैं उन्हे आज़माता नहीं
कहाँ छुप गया है जो इक दोस्त था
कभी चेहरा भी दिखाता नहीं
सदा बाँट लेता हूँ सबसे ख़ुशी
मग़र दर्दे ग़म को सुनाता नहीं
मुझे भूल कर के वो आबाद है
कसम से उसे भूल पाता नहीं
सभी से यहाँ मौज रिश्ता निभा
भले कोई तुमसे निभाता नहीं
ग़ज़ल(२४)
बहर-221 2121 1221 212
कब से तड़फ रहा हूँ तेरे इंतज़ार में
ऐ काश आके मिल ले तू मुझसे बहार में
मैने तो तुसमे की है मुहब्बत यक़ीन कर
आ ले चलूँ तुझे मैं किसी ख़ुश दयार में
इस ज़िंदगी को मैने तेरे नाम कर दिया
हम दोनो जुड़ चुके हैं दो दिल के तार में
तुम जो नहीं तो जान लो यें ज़िंदगी नहीं
जीता हूँ हर घड़ी मैं तेरे ऐतबार में
दीवानगी का हाल समझ लो ऐ मौज तुम
मदहोश हो गया हूँ वफ़ा के ख़ुमार में
ग़ज़ल
बहर-221 2121 1221 212
कब से तड़प रहा हूँ तेरे इंतज़ार में
ऐ काश आ मिले तू अभी इस बहार में
मैने तो तुझ से की है मुहब्बत यक़ीन कर
आ ले चलूँ तुझे मैं किसी ख़ुश दयार में
इस ज़िंदगी को मैने तेरे नाम कर दिया
हम दोनों जुड़ चुके हैं मुहब्बत के तार में
तुम जो नहीं तो जान लो ये ज़िंदगी नहीं
जीता हूँ हर घड़ी मैं तेरे ऐतबार में
दीवानगी का हाल समझ लो ए मौज तुम
मदहोश हो गया हूँ वफ़ा के ख़ुमार में
ग़ज़ल(२५)
बहर-1222 1222 1222 122
तुम्हारी बेरूख़ी हमदम मुझे खलने लगी है
हुई है क्या खता की अब मुझे छलने लगी है
कभी सोचा नहीं था छोड़कर जाओगे हमको
तुम्हारी याद में अब शाम भी ढलने लगी है
गरीबों के नसीबों में नहीं मिलता है कम्बल
हवाएँ शर्द अब चारो तरफ चलने लगी है
मिले कितने भी ग़म फिर भी हमें है मुस्कुराना
ज़िगर में हर घड़ी अब तो ख़ुशी पलने लगी है
कहाँ है मौज वो दरिया मुहब्बत का बताओ
यहाँ पर ज़िंदगी तो आग सी जलने लगी है
ग़ज़ल(२६)
बहर-122 122 122 12
मुहब्बत का दिल में नशा रह गया
कहीं तार उससे जुड़ा रह गया
मिली ही नहीं वो अकेले कभी
सदा दिल में यूँ ज़लज़ला रह गया
ज़माने से मुझको उमीदें नहीं थी
फ़क़त इक तेरा आसरा रह गया
सँवरते बहुत देख कर हम जिसे
वो टूटा हुआ आइना रह गया
हमेशा खुशी से बढ़ाया क़दम
न देखा है पीछे कि क्या रह गया
कभी ग़म से हारा नहीं मौज है
ज़माना उसे देखता रह गया
ग़ज़ल(26)
बहर-2122 1212 22
हादसा ऐसा क्या हुआ साहिब
एक पल में ही सब जला साहिब
इस कदर ग़म हों जिसके दामन में
कैसे दे कोई मुस्कुरा साहिब
प्यार से सब यहाँ पे मिलते हैं
भाई चारा यूँ भी बढ़ा साहिब
मेरी जो काट पर ही रहते थे
मैंने उनसे भी ली निभा साहिब
नाम रहता उसी का दुनिया में
जो वतन पर हुआ फ़ना साहिब
ख़ूब आबाद हों यहाँ अपने
हो सभी का भला सदा साहिब
एक मुफ़लिस मदद के बदले में
दे गया मौज को दुआ साहिब
ग़ज़ल(27)
बहर-1222 1222 1222 122
मज़े में ज़िन्दगी मेरी जो फिर ढलने लगी है
अज़ीज़ों की नज़र में दुश्मनी पलने लगी है
मेरा भी जी नहीं लगता चले आओ न जानम
तुम्हारी बज़्म में मुझको कमी ख़लने लगी है
चिराग़ो को दिया है मौत का पैग़ाम उसने
दबे पाँवों से अब बाद- ए -सबा चलने लगी है
चली थी भूख बच्चों की मिटाने को वो घर से
मुसीबत भी नई अब ज़िस्म में पलने लगी है
कहाँ है आज वो दरिया मुहब्बत का बताओ
यहाँ पर ज़िंदगी तो आग सी जलने लगी है
कहा ये मौज ने तू मौज कर साहिल पे जाकर
लहर के साथ में अब हर ख़ुशी चलने लगी है
ग़ज़ल(28)
बहर-2222 2222 2222 222
तुम ही तुम हो दिलबर मेरे यादों के गुलदानों पर
हर ग़ज़लों पे नाम तुम्हारा ज़िक्र सभी अफ़सानों पर
महबूबा को अपने ख़ुश करने को हरकत करते हैं
दुनिया सारी हँसती क्यों है उन पागल दीवानों पर
पूछ परख़ होती थी दिल से आपस में सब मिलते थे
फूल भरोसे का खिलता था उल्फ़त के बागा़नों पर
जो ठाना वो सबकुछ पाकर ही मैं यूँ दम लेता हूँ
मैं हरदम क़ाबिज़ रहता हूँ अपने ही पैमानों पर
मौज चला हूँ उसको पाने यार कहाँ है बतलाओ
जंगल जंगल भटक रहा हूँ कब से मैं वीरानों पर
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल-(29)
बहर-212 212 212 212
इश्क़ का उनके ऐसा नशा हो गया।
ग़म मेरा बढ़ के ऐशो-मज़ा हो गया।
चल दिया वो अकेला मुझे छोड़कर
जाने क्यों आज इतना ख़फ़ा हो गया
बढ़ गई मार कुछ ऐसी मँहगाई की
दाम हर चीज़ का चौगुना हो गया
रोज़ी रोटी गरीबों को मिलती नहीं
पेट में भूख का ज़लज़ला हो गया
मौज कहता हमेशा यहाँ बातें सच
इसलिए झूठ से फ़ासला हो गया
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(30)
बहर-221 1221 1221 122
तुम जैसे ज़माने में तो दिलबर नहीं देखा
यूँ प्यार निभाने में भी कमतर नहीं देखा
वो गुंडों दरिंदों को सजा मिलती कहाँ है
उनको तो कभी जेल के अंदर नहीं देखा
मँहगाई की ही मार में जनता ही मरेंगे
ख़्वाबों में कभी सुख का भी मंज़र नहीं देखा
नाक़ाम वो इंसान खाता मुफ़्त का हरदम
करते उन्हे तो काम भी अक़्सर नहीं देखा
ए मौज तेरे झोपड़ी को ताज मान ले
यूँ स्वर्ग से सुंदर जहाँ में घर नहीं देखा
ग़ज़ल(31)
बहर-221 1221 1221 122
यूँ प्यार निभाने को मुलाक़ात करे है
दिलबर की निगाहों से हरिक बात करे है
आगोश में भर लेती है मुझको वो कसम से
वो जान मेरी ख़ुशियों की बरसात करे है
ज़िंदा हूँ यहाँ अपने ही दम पे मैं समझ लो
दिल में तो यहाँ अपने ही आघात करे है
जब भी मैं बढ़ाया हूँ क़दम सोच समझ कर
वो रोकने को राह ख़ुराफ़ात करे है
ए मौज तू है मौज में जीता ही रहेगा
आबाद ही रहने का तू हालात करे है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(32)
बहर-2122 1212 112(22)
यार जलवा तेरा कमाल रहा
अर्श से फ़र्श तक बवाल रहा
प्यार तेरा कभी न पाया मैं
ज़िदगी भर यही मलाल रहा
लाख तेवर दिखाये तूफ़ाँ ने
दोस्त बन कर मग़र वो ढाल रहा
ख़ूब रोया है आज वो शायद
भीगा भीगा सा उसका गाल रहा
मौज कहते हैं सब यही मुझसे
हौसला तेरा बेमिसाल रहा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(33)
बहर-2122 1212 22/112
जब कभी इम्तेहान हो मेरा
तो ख़ुदा पासबान हो मेरा
इल्तिजा है ख़ुदा से यह मेरी
कुछ जहां में निशान हो मेरा।
मेरी कोशिश यही हमेशा है
हर जगह सच बयान हो मेरा
मान सबको सदा मैं देता हूँ
हर कोई कद्रदान हो मेरा
मेरी इज़्ज़त का हो ख़याल उसे
दोस्त जो राज़दान हो मेरा
मौज ऐसा निज़ाम हो जाये
ख़ुश यहाँ हर किसान हो मेरा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(34)
बहर-221 2121 1221 212
आती हो जान बूझ के मेरे ही ख़्वाब में
फिर क्यूँ छुपाये रहती हो चेहरा नक़ाब में
हर लफ़्ज़ आपने जो मुहब्बत में हैं कहे
रक्खा दबा के है उसे दिल की किताब में
तुझमे तो कोई दाग़ नहीं नाज़नीं सनम
देखा है मैंने दाग़ तो उस माहताब में
जब भी मैं गुलसिताँ में गया सैर के लिए
ख़ुश्बू तुम्हारी ही मिली हर इक़ गुलाब में
जैसा नशा हुआ है मुहब्बत का आजकल
ए मौज कुछ नशा नहीं वैसा शराब में
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल-(35)
बहर-122 122 122 12
नज़र ये तुम्हारी कटारी लगे
करे वार दिल पे शिकारी लगे
*मिले रोज रोटी सभी को यहाँ*
*गरीबी की मत अब बिमारी लगे*
बहुत दाँव चलते मग़र हारते
ये दुनिया अज़ब ही जुआरी लगे
नचाता सदा इश्क़ सबको यहाँ
समझ इश्क़ जैसे मदारी लगे
*कभी कुछ किसी को नहीं दे सका*
*वही आदमी तो भिखारी लगे*
यहाँ मौज क्यों ढोंग करता रहा
दिखावे का अब तू पुजारी लगे
ग़ज़ल(36)
बहर-22 22 22 22 22 2
मिलने की मंजूरी भी हो सकती है
दिल की हसरत पूरी भी हो सकती है
कानाफूसी करती रहती है दुनिया
उनसे मेरी दूरी भी हो सकती है
दर्द छुपा डाला अपने दिल के अंदर
समझो कुछ मजबूरी भी हो सकती है
छोड़ गुमाँ करना अब गोरे रंगों पर
कुछ दिन में बेनूरी भी हो सकती है
मौज यहाँ जीना मरना किसके बस में
इक दिन मौत ज़रूरी भी हो सकती है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(37)
बहर-2122 1122 1122 22
दिल के आँगन में मुहब्बत के दिये जलते हैं
तेरी यादों से मेरे शामो सहर खिलते हैं
पास आकर भी कभी दिल में उतर कर देखो
कितनी बेताबी से हम माँ की क़सम मिलते हैं
चाँदनी रात में छत पर ही कभी आ जाते
चाह के जुगनू मेरे दिल में कई पलते हैं
मैं जो ईमान से करता हूँ कमाई सच्ची
लोग इस बात से क्यों जाने ख़ुदा जलते हैं
मौज मिल जाये अगर राह में ग़म की गठरी
छोड कर ग़म सदा हम मुस्कुरा के चलते हैं
ग़ज़ल(38)
बहर-221 1221 1221 122
मतला
क्यों रूठ के तू मुझसे वहाँ दूर खड़ी है
कह दे कि मुहब्बत नहीं बस दिल की लगी है
ख़्वाबों में तुम्हारी ही मुहब्बत को सजाया
नेमत है ख़ुदा की जो मुझे तू ही मिली है
हर एक की बातों पे मैं करता हूँ भरोसा
दिल मेरा सनम देख लो नादान अभी है
ठुकरायें जहाँ वाले मुझे चाहे ये जितना
गर साथ हैं माँ बाप तो क्या मुझको कमी है
कुछ लोग यहाँ सच को दबाते ही रहेंगे
ऐ मौज फरेबों की यहाँ बहती नदी है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(39)
बहर-2122 1212 22/112
दिल से दिल तक जुड़े वो तार नहीं
ज़िंदगी में किसी का प्यार नहीं
सब उठाते हैं मुझ पे उँगली क्यों
कौन दुनिया में दाग़दार नहीं
बेवज़ह रूठते अग़र अपने
मिलता फिर दिल को भी क़रार नहीं
जो नहीं रहता है नसीबा में
उसको पाने का इंतज़ार नहीं
उठ गया है भरोसा जिनपे तो
करना उनपे यूँ जाँ निसार नहीं
मौज हर ग़म भुला के जीता हूँ
तुमसा कोई भी ख़ुशगवार नहीं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल
बहर-(40)
1222 1222 1222 1222
इशारों ही इशारों में वो सारे काम लेते हैं
अदायें देख उनकी हम तो दिल को थाम लेते हैं
शरारत इस लिए करता हूँ वो दे दें सज़ा मुझको
मग़र अपने ही सर पर वे सभी इल्ज़ाम लेते हैं
पिलाये प्यार से साकी मेरे लब पे लगा कर के
तभी थोड़ी ही थोड़ी रम सहर औ'र शाम लेते हैं
मुहब्बत में सता करके कभी अपनों ने ठुकराया
बढ़े जब दर्द तो फौरन ही झंडू बाम लेते हैं
सुनायें मौज क्या तुमको कहानी इस ज़माने की
दगा देकर यहाँ अपने वफ़ा का दाम लेते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(41)
बहर-
1212 1122 1212 22
ज़माने भर की शिक़ायत को भूल बैठे हैं
वफ़ा की राह में नफ़रत को भूल बैठे हैं
मिली है जबसे नज़र आपसे मेरे दिलबर
ख़ुदा क़सम है कि जन्नत को भूल बैठे हैं।
तुम्हें ही मान लिया है ख़ुदा अक़ीदत से
ख़ुदा की रोज़ इबादत को भूल बैठे हैं
रखा छुपा के तुम्हे यार दिल के कोने में
मिले जो तुम तो मुसीबत को भूल बैठे हैं
मजा ही मौज करें मौज में रहें हरदम
जहाँ में सबसे बग़ावत को भूल बैठे हैं
ग़ज़ल(42)
वज़्न-221 2121 1221 212
दुनिया में मेरा ख़ूब तमाशा किया गया
मेरे ही दिल को लूट के सौदा किया गया
वे दूर जाके हमको तो बस भूल ही गये
जिन दोस्तों से साथ का वादा किया गया
सच बोलता हूँ फ़िर भी ये रहते ख़फा ख़फा,
महफ़िल में बार बार है रुसवा किया गया।
देते हैं लोग ताने यहाँ मज़हबी बहुत
हर वक्त मेरी जाति को छोटा किया गया
ऐ *मौज* क्या हुआ है ज़माने को आजकल
हर काम जैसे तैसे ही पूरा किया गया
ग़ज़ल(43)
बहर-2122 1212 22/112
जिसके दिल में वो सादगी ही नहीं
आदमी फिर तो आदमी ही नहीं
कोई भी दिलरुबा मिली ही नहीं
इश्क़ में दाल कुछ गली ही नहीं
इन अँधेरों से लड़ रहा हूँ मैं
ज़िंदगी में तो रौशनी ही नहीं
दर्द दिल का सभी मिटा जाये
वैसा मिलता भी आदमी ही नहीं
इक निवाले को वो तरसते हैं
घर में रोटी कभी बनी ही नहीं
जो बहाते पसीने खेतों मे
उन किसानों में अब ख़ुशी ही नहीं
मौज समझाया था बहुत उसको
बात मेरी मग़र सुनी ही नहीं
ग़ज़ल(44)
वज़्न-2122 2122 2122 212
कट रही है ज़िंदगी बस बोझ को ढोते हुए
क्या मेरी तक़दीर के रीते सभी पन्ने हुए
चोट देते हैं यहाँ अपने पराये जानकर
क्या करेंगे सह रहे हैं ज़ख़्म को सीते हुए
काम भी मिलता नहीं है बादशाही राज में
कुछ भला होता नहीं अब घर में ही बैठे हुए
रोटियाँ दो जून की मिलती हैं मुश्किल से यहाँ
मुफ़लिसी में और भी हर रोज़ ही घाटे हुए
गिरह
क्या सुनाऊँ मौज मैं अपनी किसी को दास्ताँ
ये गुज़िश्ता साल गुज़रा ख़ौफ़ में जीते हुए
ग़ज़ल(45)
वज़्न-2122 2122 2122 212
तेरे लहजे पे सनम ये दिल फ़िदा हो जायेगा
इश़्क है मुझसे कहो तो मन हरा हो जायेगा
बिन तुम्हारे कुछ नहीं भाता मुझे ऐ दिलरुबा
लगता है मुझ से ज़माना ही ख़फा हो जायेगा
मत उदासी की रिदा ओढो अभी से जानेमन
जब मिलेगी कामयाबी सब भला हो जायेगा
दिल लगा बैठे थे हम तो उसकी सूरत देखकर
क्या पता था एक दिन वो बेवफ़ा हो जायेगा
साथ जीने मरने की खाई क़सम जिसने थी मौज
क्या पता था वो ही इक दिन लापता हो जायेगा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(46)
वज़्न-2122 2122 2122 212
साथ में माँ बाप हैं तो हर दुआ मौजूद है
इनकी नेमत से जिगर में हौसला मौजूद है
झूठ से बेशक़ सजालो आप चेहरे को मगर
सच को बस सच ही दिखाता आईना मौजूद है
दोस्ती के दम पे जीता हूँ यहाँ मैं शान से
मेरे दिल में दोस्तों का आसरा मौजूद है
दर्द हद से बढ़ गया तो क्या हुआ है दोस्तो
दर्दे दिल की मुस्कुराने में दवा मौजूद है
हाथ में लेना नहीं क़ानून को ऐ मौज तुम
देश में चारो तरफ़ ही क़ायदा मौजूद है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(47)
बहर-221 2121 1221 212
मेरे नसीब पल में ही पत्थर से हो गये
वो दूर मुझसे जाके सितमग़र से हो गये
औलाद साथ देती नहीं आजकल यहाँ
लगता है रौब में वे सिकंदर से हो गये
मुफ़लिस का हाल कितना अजब हो गया यहाँ
भरने को पेट के लिए हंटर से हो गये
अब दाम खाद बीज के बढ़ते ही जा रहे
कितने ही खेत देख लो बंजर से हो गये
ऐ *मौज* जो मिले थे बुज़ुर्गों से आसरे
गर्दिश में वक़्त की सभी खडहर से हो गये
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(48)
वज़्न-2122 1122 1122 22
हुस्न वालों पे भला लोग फिसलते क्यों हैं
उनको पाने को हमेशा ही मचलते क्यों हैं
कर के वादा जो मुहब्बत में जुदा हो जाते
ज़ख़्म देकर के हमें पल में बदलते क्यों हैं
इश्क़ का फूल खिलाया वफ़ा की राहों में,
लोग पैरों से उसे ऐसे मसलते क्यों हैं।
तोड़ दूँ मज़हबी बंधन को ज़माने भर के
जाति के नाम पे इंसां को कुचलते क्यों हैं
मौज ईमान से करता हूँ कमाई अपनी
बे-वज़ह लोग यहाँ मुझसे ही जलते क्यों हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल
वज़्न-2122 2122 2122 212
मुफ़लिसों का कौन होता है सहारा देखिए
खाने को हासिल नहीं है इक निवाला देखिए
अब बुजुर्गों की कभी सुनता नहीं कोई यहाँ
उनके ऊपर बे सबब ही तिलमिलाना देखिए
रंज-ओ-गम सबने है पाया और ज़माने में यहाँ
ग़म से सब की ज़िन्दगी में है तमाशा देखिए
मुश्किलों में साथ देने वाला अब कोई नहीं
करना पड़ता है अकेले ही गुजारा देखिए
जिनको अपना मानते हैं दिल दुखाते हैं वही
बे सबब उनका हमेशा आज़माना देखिए
मौज हरपल नौजवाँ रहते नशे में चूर हैं
रोज़ मयख़ाने में इनका आना जाना देखिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल-(50)
वज़्न-121 22 121 22
वफ़ा में हद से गुज़र गए हैं
इसीलिए हम सँवर गए हैं
करूँ भरोसा मैं कैसे उनपे
जो वादे करके मुक़र गए हैं
जो डर के जीते हैं इस जहाँ में
समझ लो अब तो वो मर गए हैं
नशे की लत में तबाह होते
वे आदमी सब बिख़र गए हैं
जो लूटते हैं मेरे वतन को
वो मेरे दिल से उतर गए हैं
ऐ मौज ढूँढ़ा बहुत ही उनको
पता नहीं वो किधर गए हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
आज की ताज़ा ग़ज़ल(51)
वज़्न-221 2121 1221 212
कर ले यक़ीन मैं तो तेरी धड़कनों में हूँ
ऐ जान अब समझ ले तेरी आशिकों में हूँ
क्यों गैर तुम समझ के मुझे चोट दे रहे
इस जख़्म से कराहता हूँ घायलों में हूँ
सहता हूँ रोज ताने यहाँ जात पात पर
यूँ मज़हबों की मार से मैं मुश्किलों में हूँ
बदनाम लोग करते हैं मुझको मैं क्या करूँ
फिर भी यहाँ सभी के मैं तो दोस्तों में हूँ
कुछ लोग ऐहसान फ़रामोश हो गये
ऐ मौज इसलिए तो बहुत मुश्किलों में हूँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(52)
वज़्न-221 1221 1221 122
तुम प्यार मुहब्बत को,जिला क्यों नहीं देते
जो बैर जिगर में है,हटा क्यों नहीं देते
है नाग बना बैठा,उठा करके यहाँ फ़न
उठ कर के उसे दूर,भगा क्यों नहीं देते
हर बात पे क्यों मज़हबी,लड़ते हो लड़ाई
यह बुग़्ज हरिक दिल से,मिटा क्यों नहीं देते
चारो ही तरफ बस हो,मुहब्बत ही मुहब्बत
यह पाठ सभी को ही,पढ़ा क्यों नहीं देते
मैं शान बढ़ाऊँगा,तिरंगे की सदा ही
यह बात ज़माने को,बता क्यों नहीं देते
कुर्बान वतन पे है, मेरी जान समझ लो
ऐ मौज यहाँ सबको,दिखा क्यों नहीं देते
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(53)
वज़्न-2122 2122 212
एक मेरे तुम ही रहबर आख़िरी
आया है ये दिल भी तुम पर आख़िरी
हौसलों से मुस्कुराकर जी रहा
ग़म का अब गुजरा बवंडर आख़िरी
चैन से सोना पड़ेगा एक दिन
इस ज़मीं पे है जो बिस्तर आख़िरी
नौकरी पाने को हरदम घूमते
कब तलक होगा ये चक्कर आख़िरी
बेचकर ऐ मौज बच्चों को पढ़ा
पास तेरे है जो जेवर आख़िरी
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(54)
वज़्न-2122 2122 2122 212
वो ख़फ़ा रहती है मुझसे ख़ुद झगड़कर आजकल
बन गई महबूब मेरी क्यों सितमग़र आजकल
राजशाही काम करके चमचे बनके रह गये
बस गरीबों को दिखाते रौब अफ़सर आजकल
हर तरफ़ देखो सियासत का बिछा यूँ जाल है
भाई भाई में ही होती ख़ूब टक्कर आजकल
मेहनतों के बदले वाज़िब दाम भी मिलता नहीं
हो गया दुश्मन किसानों का मुकद्दर आजकल
मौज अब तो नाम का है भाई चारा एकता
मज़हबों का ख़ूब चलता है बवंडर आजकल
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (55)
वज़्न2122 1122 1122 22
क़ातिलाना है सनम ख़ूब निगाहें तेरी
जान ले लेती है मदमस्त सदायें तेरी
रोज़ सीने से लगाकर मैं पढ़ा करता हूँ
यार ख़त में वो लिखी प्यार की बातें तेरी
कोई भी इत्र में ख़ूशबू ही नहीं ऐसी तो
मुझको महकाये सनम रोज ये साँसें तेरी
छोड़ कर प्यार मेरा दूर कभी मत जाना
माफ़ कर दूँगा मैं फ़िर सारी ख़तायें तेरी
कोशिशें करता हूँ नफ़रत को मिटाने की मौज
पर भला कौन यहाँ बात को मानें मेरी।
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल
वज़्-2122 1122 1122 22
जान ले लें न मुहब्बत में दगाएं तेरी
क़ातिलाना है सनम ख़ूब अदाएं तेरी
हाल जैसा भी रहे माँ को खुशी देना तू
काम आएगीं सदा माँ की दुआएं तेरी
दोस्त इक बार गले से ही लगा ले मुझको
भूल जाऊँगा मैं फ़िर सारी ख़ताएं तेरी
क्यों सियासत में भला नाग बना बैठा है
आज जनता भी समझती है ज़फ़ाएं तेरी
मौज कुछ सोच समझ कर ही कभी बोला कर
हम कहाँ तक भला हर बात निभाएं तेरी।
ग़ज़ल (58)
जब भी* तेरा मुस्कुराना याद आता है मुझे।
नींद खुलते टूट जाना याद आता है मुझे।l
मैं अगर छोटी सी* ज़िद पे रूठ जाता था कभी।
माँ का*फिर मुझको मनाना याद आता है मुझे।l
ख़्वाब जो हमने बुने थे ज़िन्दगी के साथ में।
सच कहूँ गुज़रा ज़माना याद आता है मुझेll
अश्क़ आँखों से निकल पड़ते हैं* मेरे आज भीl
यार जब बिख़रा घराना याद आता है मुझे।l
द्वारिका इस ज़िन्दगी की बस यही है फ़लसफ़ा।
झुकके* बस रिश्ते निभाना याद आता है मुझे।l
ग़ज़ल(59)
वज़्न-221 1221 1221 122
हर वक़्त निगाहों से तू ऐसे न गिरा कर
कुछ नेक इरादों से कभी काम किया कर
मुफ़लिस को कभी प्यार से रोटी ही खिला दे
कुछ नेकियाँ कर ले तू ग़रीबों को हँसा कर
बर्बाद न करना कभी माँ बाप के पैसे
मेहनत से कमाते हैं उसे ख़ून बहा कर
अपने तो सदा अपने ही होते हैं जहाँ में
देखो तो ज़रा प्यार से रिश्ते को निभा कर
ऐ मौज न दुश्मन बने कोई भी किसी का
रहना है ज़माने से ये नफ़रत को मिटा कर
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(60)
वज़्न-212 212 212
तुभ भले आज़मा लो हमें
या रुला के हँसा लो हमें
नफ़रतों को भुलाकर सभी
आज दिल में बसा लो हमें
मौत से हम तो डरते नहीं
चाहे जितना डरा लो हमें
जान दे दूँ वतन के लिए
सरहदों पे बुला लो हमें
है अभी भी बहुत बचपना
गोद में माँ बिठा लो हमें
मौज ताने बहुत मारते
अब तो तुम भी सुना लो हमें
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(61)
वज़्न-2122 1212 22
दिल से उसके धुआँ उठा होगा
अपने ही पाप से जला होगा
कैसे कह दूँ नहीं मुहब्बत है
दिल किसी पर फ़िदा हुआ होगा
ज़िंदा हूँ तो कोई नहीं मिलते
मौत के बाद क़ाफ़िला होगा
वे गुनहगार थे यकीं है मुझे
इसलिए जेल में सड़ा होगा
मौज अब कौन है यहाँ देखो
जो वतन के लिए फ़ना होगा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(62)
वज़्न-2122 1122 1122 22
अपने माँ बाप जहाँ में तो ख़ुदा होते हैं
हम यहाँ रोज़ मगर उनसे ख़फ़ा होते हैं
रिश्ते नातो को निभाना तो निभाना दिल से
हक़ मुहब्बत से ही चलकर के अदा होते हैं
आँख भर आती है उस वक़्त वहाँ लोगों की
बाप के काँधे पे जब बेटे विदा होते हैं
दोस्त सारे ही मिले मुझको है क़िस्मत मेरी
कितनी मुश्किल हो मग़र साथ सदा होते हैं
मौज मिट जाना वतन पर तो कोई खेल नहीं
जिनको उल्फ़त है वतन से वो फ़ना होते हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(63)
वज़्न-122 122 122 122
मुसलसल चराग़ों को बाले हुए हैं
तभी इस जहाँ में उजाले हुए हैं
चलो देख लो अब किसानों की मेहनत
बहुत उनके पैरों में छाले हुए हैं
कभी भी भरोसा नहीं उनपे करना
जो अपने ही घर से निकाले हुए हैं
यहाँ कौन मज़हब की रोके लड़ाई
ये नेता तो मुद्दे उछाले हुए हैं
मिटेगी यक़ीनन दिलों से ये नफ़रत
यही मौज हम आस पाले हुए हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(64)
वज़्न-122 122 122 12
ख़ुदा सबको ख़ुशियाँ ही दिनरात दे
किसी को भी ग़म का न बरसात दे
दरिंदे यहाँ घूमते हैं बहुत
मग़र कौन उनको हवालात दे
भुलाएं यहाँ दुश्मनी को सभी
ख़ुदा सबको ऐसी तू औकात दे
वतन पे मैं कुर्बान जाँ कर सकूँ
ऐ मौला मुझे ऐसे ज़ज़्बात दे
कभी मज़हबी फिर लड़ाई न हो
यहाँ मौज सबको ही इक ज़ात दे
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(65)
वज़्न-2122 1122 1122 22/112
ज़ख़्म दे दे के सताता है ज़माना मुझको
रास आता नहीं मरहम ही लगाना मुझको
सच है कुछ लोग मिटाने पे तुले हैं लेकिन
इतना आसाँ भी नहीं यार मिटाना मुझको
ग़म मिलें या कि ख़ुशी कोई भी परवाह नहीं
ख़ूब आता है मेरे दिल को हँसाना मुझको
जब तलक ढा न दूँ मैं मज़हबी दीवारों को
मेरे मौला न तू दुनिया से उठाना मुझको
दिल ये धनवान दुआओं से हुआ है उनकी
रब ने माँ बाप सा बख्शा है ख़ज़ाना मुझको
नेक राहों पे चले "मौज" भी ख़्वाहिश रखता
ऐ ख़ुदा सारे गुनाहों से बचाना मुझको
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल-(66)
वज़्न-221 1221 1221 122
सब कुछ ही वतन के लिए कुर्बान किया है
लोगों को मेरे काम ने हैरान किया है
ताउम्र मिलेंगी तुम्हें कुदरत से सज़ाएं
मज़लूम को अगर तुमने परेशान किया है
मैं इश्क़ के दरिया में बहुत डूब गया हूँ
बस एक तुझे पाने का अरमान किया है
हर काम को करता हूँ मैं पूजा ही समझ कर
जैसे कि ख़ुदा ने यही फ़रमान किया है
ऐ मौज न सह सकता हूँ मैं ज़ुल्म सितम को
बस्ती में फ़कत मैंने ये ऐलान किया है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(67)
वज़्न 212 212 212 212
मुफ़लिसों को रुलाना नहीं चाहिए
उनके दिल को दुखाना नहीं चाहिए
हो सके तो निभाओ सदा दोस्ती
दुश्मनी को बढ़ाना नहीं चाहिए
ग़र ख़ता है बताया करो प्यार से
बेसबब आज़माना नहीं चाहिए
मारकर हक़ यहाँ मुफ़लिसों का कभी
महफ़िलों को सजाना नहीं चाहिए
गिर गये जो उसे तुम उठाया करो
गैर को भी गिराना नहीं चाहिए
अहमियत को समझ लो यहाँ मौज तुम
ख़ूब दोलत उड़ाना नहीं चाहिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(68)
वज़्न-2122 2122 2122 212
माँ पिता जैसे जहाँ में देवता कोई नहीं
क्यों मग़र इनको हमेशा पूजता कोई नहीं
दोस्ती के दम पे जीता हूँ यहाँ मैं शान से
मेरे दिल में दुश्मनी का रास्ता कोई नहीं
मुफ़लिसों का कौन होता है सहारा आजकल
इनके बारे में कभी भी सोचता कोई नहीं
हैं कुचलना चाहते इंसानियत को जो यहाँ
ऐसे लोगों से मेरा अब राब्ता कोई नहीं
चाहे जितना आज़माकर देख लो मेरे सनम
"मौज" के जैसा तुम्हे तो चाहता कोई नहीं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(69)
वज़्न-212 1222 212 1222
अर्कान-फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन
बहर-हज़ज मुसम्मन अश्तर अश्तर
आज ही मुहब्बत का रास्ता निकाला है
जल रहा चराग़े दिल दूर तक उजाला है
मुफ़लिसों को देखो तो हाल है बुरा उनका
भूख से तड़पते हैं पेट में भी ज्वाला है
साथ कौन देता है आज कल ज़माने में
जिसको अपना समझे हैं वो ही दिल का काला है
अपनों को ये डसता है फ़न उठा उठा करके
दूध जो पिला करके नाग ऐसे पाला है
हर घड़ी ही देनी है माँ पिता को खुशियाँ ही
इनके ही दुआओं से होश को सँभाला है
मौज जाँ लुटा देंगे हम वतन की राहों में
हौसला है रग रग में जोश में उबाला है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(70)
वज़्न-221 2122 221 2122
तक़दीर
ऐ इश्क़ हर घड़ी है लगता मुझे नशा सा
लगता है हर तरफ़ ही सब कुछ लुटा लुटा सा
जो लोग घर जलाते अक़्सर गरीब का ही
रहता गुरूर उनपर हरदम चढ़ा चढ़ा सा
कोई मुझे बताए इस ज़ख़्म की दवाई
जो दर्द ज़िंदगी में आया है ज़लज़ला सा
मेरे ख़ुदा जहां से अब तीरगी मिटादे
हो सबके घर उजाला जलता रहे दिया सा
जो मौज माँ पिता की करता नहीं है ख़िदमत
अपनी नज़र में रहता हर पल गिरा गिरा सा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(71)
वज़्न-221 1221 1221 122
नफ़रत के यहाँ बीज जो तैयार करे है
चारो ही तरफ मज़हबी दीवार करे है
दिन रात बहाता है कृषक अपना पसीना
मेहनत से ही वो खेत को गुलज़ार करे है
हर वक़्त निगाहों से गिराते हैं इन्हे लोग
मुफ़लिस को यहाँ कौन है जो प्यार करे है
रख्खा हूँ उसे दिल में छुपाकर के हमेशा
फिर भी वो मुहब्बत मेरी इंकार करे है
क्यों मौज सदा अपनों में होती है लड़ाई
भाई ही यहाँ भाई से तकरार करे है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(72)
वज़्न-122 122 122 12
तुम्हारे सिवा अब किधर जाएँगे
दग़ा जो दिये हम तो मर जाएँगे
ज़रा पास आ के मिलाले नज़र
निगाहों से दिल में उतर जाएँगे
सनम साथ देने का वादा करो
मुहब्बत में हद से गुज़र जाएँगे
अग़र चल दिये दिल मेरा तोड़ कर
यहाँ रेत जैसे बिख़र जाएँगे
यहाँ मौज नेक़ी करेंगे अग़र
ख़ुदा की कसम हम सँवर जाएँगे
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(73)
वज़्न-1212 1122 1212 22
कसम ख़ुदा की न तेरे बिना जिया जाये
जो फ़ासला है सनम अब नहीं सहा जाये
यहाँ तो अपने मेरे दिल पे चोट देते हैं
लबों पे मेरे हँसी कोई तो खिला जाये
वो नफ़रतों के घने कुहरे को मिटा करके
हँसी ख़ुशी से सदा मिलके ही रहा जाये
अगर सताया किसी को तो आह पाओगे
उदास दिल तो किसी का नहीं किया जाये
भटक गया हूँ मैं दुनिया के भीड़ में जैसे
ऐ "मौज" घर का कोई रास्ता बता जाये
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
*ग़ज़ल* (74)
*वज़्न-221 1221 1221 122*
*नज़रों में मेरे वो बड़ा इंसान हुआ है*
*जो अपने वतन के लिए कुर्बान हुआ है*
*बढ़ती ही चली जा रही देखो यूँ गरीबी*
*हर ख़्वाब तरक्की का परेशान हुआ है*
*हर वक़्त यहाँ आदमी मतलब का मुसाफ़िर*
*इंसान कहाँ आज का इंसान हुआ है*
*ये जाति धरम जिसने बनाया है भरे वो*
*मज़हब की लड़ाई में जो नुकसान हुआ है
*ऐ दोस्त हमें नेकी ही करनी है जहां में*
*समझो तो ख़ुदा का यही फ़रमान हुआ है*
*हर वक़्त दिया उसको सहारा है ख़ुदा ने*
*जब जब भी यहाँ मौज का अपमान हुआ है*
*डी.पी.लहरे"मौज"*
*कवर्धा छत्तीसगढ़*
ग़ज़ल(76)
वज़्न
1222 1222 1222 1222
गले मिलकर भुला देंगे सभी तकरार होली में
गिरा देंगे वो मज़हब की सभी दीवार होली में
नहीं बरबाद करना है इसी से जान बचती है
बहायेंगे अधिक पानी नहीं इस बार होली में
अगर कोई रहे भूखा खुशी कैसे मनायेंगे
चलो मुफ़लिस को देंगे हम कोई उपहार होली में
लगाकर माथ में टीका ख़ुशी से मुस्कुराना है
भुला कर के गिले शिकवे करें हम प्यार होली में
छुपा कर मुँह को जाती है कहाँ तू आज ऐ जानम
उठा घूँघट तेरा कर लूँ ज़रा दीदार होली में
बचाना है हमें जंगल जलाना भी नहीं लकड़ी
कसम खाएँ चलो यह *मौज* भी इस बार होली में
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(77)
वज़्न-12122 12122
नशे की लत में वो चल रहा था
क़दम भी उसका फिसल रहा था
गुनाह अब तक किया था उसने
वो गिरगिटों सा बदल रहा था
कमाई करता हूँ मेहनतों से
हसद से यारो वो जल रहा था
हुई न बरसों से दीद तेरी
ये दिल इसी से मचल रहा था
वे लोग मुझको गिरा रहे थे
मगर मैं गिर कर सँभल रहा था
ऐ "मौज"ग़म में भी मुस्कुराकर
हँसी ख़ुशी से उछल रहा था
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(78)
वज़्न-22 22 22 22
जब भी दिल में ग़म दिखता है
मयखाना हर दम दिखता है
तेरे हाथों में ठर्रा भी
साक़ी मुझको रम दिखता है
कौन समझ पायेगा उसको
सूरत से आज़म दिखता है
सूखे खेत हों जिसके उसको
बारिश का मौसम दिखता है
इश्क़ अगर हो जाए जिनको
उनको बस हमदम दिखता है
आतंकी हाथों में देखो
अक़्सर एटम बम दिखता है
मँहगाई में मुफ़लिस के घर
रोज़ाना मातम दिखता है
"मौज"वतन की रखवाली का
तुझ में भी दमखम दिखता है
ग़ज़ल(79)
वज़्न-122 122 122 122
जिगर में बसी माँ सदा तू ही तू है
मेरी ज़िंदगी माँ तुम्ही से शुरू है
वतन का पुजारी हमेशा रहूँगा
मेरे इन रगों में पिता का लहू है
बहुत याद आती है बचपन की बातें
बसी दिल में अब तक वही गुफ़्तगू है
नहीं चाहिए अब ज़माने से कुछ भी
मुझे तो सनम बस तेरी आरज़ू है
बहुत कुछ है सीखा समय के मुताबिक
समय ही जहाँ में तो सबका गुरू है
करूँ मौज किसपे भरोसा जहां में
दग़ा ही दगा तो यहाँ चार-सू है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(80)
वज़्न-122 122 122 122
लहू से लिखा ख़त को इक बार पढ़ना
सनम यूँ मुहब्बत का इज़हार पढ़ना
अगर मिट गया मैं वतन के लिए तो
ख़बर भी छपेगी वो अख़बार पढ़ना
अग़र चाहते अच्छे इंसान बनना
लिखा वो दीवारों का सुविचार पढ़ना
अगर कोई ढाये जो जुल्मों सितम तो
मेरे देश का फिर वो अधिकार पढ़ना
कभी रोजी रोटी तो मिलती नहीं है
युवाओं को लगता है बेकार पढ़ना
बड़ी मेहनतों से लिखी है ग़ज़ल ये
कभी मौज मेरे ये अश्आर पढ़ना
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(81)
वज़्न-1212 1122 1212 22
गुरू है वक़्त सही रास्ता बताता है
सबक सिखाके यही हौसला बढ़ाता है
असर दुआओं का उन पर जरूर है होता
बड़ों के पाँव में अपना जो सर झुकाता है
जो अहमियत ही न जाने कभी भी मेहनत की
कमाई बाप की अक़्सर वही लुटाता है
हवस का दास बना फिरता है जो दुनिया में
वो खुद को हसरतों के जाल में फँसाता है
हमेशा दूर ही रहना है ऐसे इन्सां से
जो कल्ब-ए-"मौज" बहुत बेसबब दुखाता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(82)
वज़्न-212 212 212 212
शमअ़ उल्फ़त की ऐसी जला दीजिए
तीरग़ी इस जहां की मिटा दीजिए
हद से बढ़कर सनम आपसे प्यार है
फूल दिल के चमन में खिला दीजिए
मुश्किलों में तुम्हारी मदद जो करें
उनके कदमों में सर को झुका दीजिए
जो निभाते हैं रिश्ते सदा प्यार से
मत कभी आप उनको दग़ा दीजिए
मौज नफ़रत के शोले दहकने लगे
अब मुहब्बत से उनको बुझा दीजिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(83)
वज़्न-1212 1122 1212-22
हुनर सिखा जो दिया उसने मुस्कुराने का
ख़फ़ा ख़फ़ा है यूँ हमसे बशर ज़माने का
नशे की लत ने मिटा कर के रख दिया उसको
बड़ा ग़ुरूर था कल तक जिसे घराने का
जुए में हार गया बाप की कमाई को
लगाया दाँव है अब उसने आशियाने का
हरेक चीज़ मयस्सर ज़रूर होगी तुम्हें
हुनर भी सीख ले पहले यहाँ कमाने का
कभी वो सर न उठा पाया *मौज* के आगे
सबक ही ऐसा मिला उसको आज़माने का
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(84)
वज़्न 2122 2122 212
हर किसी से सच ही कह पाता हूँ मैं
बोलने से झूठ घबराता हूँ मैं
जो बताई थीं बुजुर्गों ने कभी
उनकी हर इक बात अपनाता हूँ मैं
हौसला हरदम मिला माँ बाप का
उनके ही दम पर तो इठलाता हूँ मैं
इश्क़ है दिल में मेरे लेकिन सनम
रूबरू कहने से घबराता हूँ मैं
दर्दे दिल की मानकर इसको दवा
बेसबब लब पे हँसी लाता हूँ मैं
मौज यूँ बरबाद करता है नशा
मत पिया कर जाम समझाता हूँ मैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(85)
वज़्न-2122 1212 22(112)
*आज हर महक़मे में गफ़लत है*
*घूसखोरी यहाँ की फ़ितरत है*
*देश दुनिया का हाल क्या देखें*
*आज कल घर में ही सियासत है*
*जिसकी नेकी यहाँ मिसाल बने*
*ऐसे इंसान की जरूरत है*
*बढ़ गई ख़ूब देखो मँहगाई*
*किस नशे में यहाँ हुक़ूमत है*
*झूठ पर सब यक़ीन करते हैं*
*सच कहो तो यहाँ बग़ावत है*
*आदमी आदमी नहीं वो तो*
*"मौज"जिसमें नहीं शराफ़त है*
ड़ी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल{86)
वज़्न-2122 1122 1122 22
मुस्कुरा कर ही नज़र सबसे मिलाते रहिए
हाल-ए-दिल अपना इसी तौर जताते रहिए
अपना घर आप चरागों से सजाते रहिए
उनको हर ख़ौफ़ोख़तर से भी बचाते रहिए
अब शहीदों की शहादत पे लिखें गीत ग़ज़ल
यूँ जवानों में सदा जोश जगाते रहिए
लोग समझें न कभी आपको दुश्मन अपना
दोस्ती सबसे हमेशा यूँ निभाते रहिए
भेद मज़हब का भुलाकर ऐ ज़माने वालो
फ़र्ज इंसान का हर वक़्त निभाते रहिए
ज़िंदगी चार दिनों की है समझ लो यारो
*मौज* हँस-हँस के यहाँ सबको हँसाते रहिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(87)
वज़्न-2122 1122 1122 22
चल गया दिल पे मेरे प्यार का जादू तेरे
हो गया दिल ये सनम आज से काबू तेरे
तेज़ चलने से हवाओं के उलझ जाते हैं
मैं सँवारूँगा महकते हुए गेसू तेरे
आँख भर आए तो मायूस नहीं होना तू
हौसला और बढ़ाएंगे ये आँसू तेरे
बोझ दुनिया का ज़रा खुद ही उठा कांधों पर
यार फौलाद से कमतर नहीं बाजू तेरे
कामयाबी के शिखर तक जो पहुँच पाया तो
मौज अपने हुए दुश्मन सभी हरसू तेरे
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(88)
वज़्न-122 122 122 122
छुपाते बहुत हो बताओ तो क्या है
नकाबों के पीछे दिखाओ तो क्या है
दिलों से ये नफ़रत मिटाओ तो क्या है
सभी से मुहब्बत निभाओ तो क्या है
कमाकर पसीना बहाओ तो क्या है
कभी खेत में हल चलाओ तो क्या है
कभी ग़म में भी मुस्कुराओ तो क्या है
जलन दर्दे दिल की छुपाओ तो क्या है
गरीबों के बच्चों पढ़ाओ तो क्या है
उन्हे एक अफ़सर बनाओ तो क्या है
मुझे मौज तुम आज़माओ तो क्या है
मुहब्बत में अहसां जताओ तो क्या है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(89)
वज़्न-12122 12122
नज़र में उसका खयाल ठहरा
मगर है क्यों फिर मलाल ठहरा
सता रहा था वो मुफ़लिसों को
मेरे रगों में उबाल ठहरा
रही हुकूमत वो किसके दम पे
जुबाँ पे है यह सवाल ठहरा
दग़ा हमेशा दिया मुझे क्यूँ
जो दोस्त भी बेमिसाल ठहरा
सभी के लब पर ग़जल है तेरी
ये मौज तेरा कमाल ठहरा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(90)
वज़्न-22 22 22 22 22 2
एक ख़ुदा के बंदे हैं सब प्यार करो
आपस में मत मज़हब की दीवार करो
मेहनत से अब धान उगा कर देखो तुम
हरियाली से खेतों को गुलज़ार करो
वीर सिपाही धूल चटा दे दुश्मन को
तुम उनके जज़्बों को बस अंगार करो
नफ़रत बो पर ख़ूब सियासत होती है
भाई-भाई ऐसे मत तक़रार करो
नाम यही जीवन का है चलते जाना
जीत मिले या हार मिले स्वीकार करो
याद ज़माने वाले करते जाएँगे
*मौज* यहाँ सबसे अच्छा व्यवहार करो
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(91)
वज़्न-1222 1222 1222 1222
हमेशा मुस्कुराने से कोई भी ग़म नहीं होता
बड़ा इससे ज़माने में कोई मरहम नहीं होता
कहाँ मज़बूत हैं देखो यहाँ मज़हब की दीवारें
गिराने के लिए क्या बाज़ुओं में दम नहीं होता
वतन मेरी मुहब्बत है वतन ईमान मेरा है
वतन के वास्ते दिल में ये जज़्बा कम नहीं होता
अधिक सूखा जला देता अधिक बारिश बहा देती
किसानों के लिए अच्छा कभी मौसम नहीं होता
मेरे नज़दीक़ आ जाओ सनम दूरी बढ़ाओ मत
तुम्हारे बिन सनम ये ख़ुशनुमा आलम नहीं होता
यहाँ पे *मौज* रोने का दिखावा रोज़ होता है
मगर आँसू बहाने से भी कुछ हमदम नहीं होता
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(92)
वज़्न-221 2121 1221 212
भारत का संविधान बनाया है भीम ने
अधिकार भी सभी को दिलाया है भीम ने
हर मज़हबी जुनून मिटाया है भीम ने
बस एकता का पाठ पढ़ाया है भीम ने
कहते हैं लोग इनको मसीहा गरीब का
हक़ के लिए भी लड़ना सिखाया है भीम ने
गिरने क़सम से देंगे न भारत की शान को
जिसको सदा ही ऊँचा उठाया है भीम ने
ऐ मौज संविधान से चलता है ये वतन
दुनिया को राज़ यह भी बताया है भीम ने
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(93)
वज़्न-212 212 212 212
सावधानी रखें ज़िदगी के लिए
फिर सलामत रहें हर घड़ी के लिए
ये वबा के असर से डरें मत कभी
आप घर में रहें हर ख़ुशी के लिए
मास्क मुँह में लगाकर रखें फ़ासला
लाज़मी है ये हर आदमी के लिए
रोज काढा पियें गर्म पानी पियें
है जरूरी यही तिश्नगी के लिए
हौसला ही बढ़ा यूँ सदा मौज तू
मुस्कुराहट दवा दे सभी के लिए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(94)
वज़्न-1222 1222 1222 1222
मुहब्बत में मेरे जानम चलो हद से गुज़र जाएँ
वफ़ा दिल से निभा के हम ज़माने में सँवर जाएँ
मिटाके नफ़रतों को अब गिरा दीवार मज़हब की
चलो हम साथ मिलके यूँ मुहब्बत की डगर जाएँ
निभाते हैं किये वादे यकीं कर लो ज़रा यारो
नहीं इंसान ऐसे हम जो वादे से मुकर जाएँ
नशे की लत में अक़्सर ही बहुत बर्बाद होते हैं
सही तालीम देने से यहाँ बच्चे सुधर जाएँ
जो डरता है वो मरता है जहां में आदमी अक़्सर
मगर क्या मौज ऐसे ही डराने से जो डर जाएँ
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(95)
वज़्न-2122-1212-22/112
इश्क़ में ये हुनर नहीं देखा
मुस्कुराता बशर नहीं देखा
मत सियासत की पूछिये हमसे
हाल ऐसा लचर नहीं देखा
वोट लेकर गया है वो जबसे
उसको फिर दरबदर नहीं देखा
पत्थरों पे यकीं हुआ है हमें
कोई उन पर असर नहीं देखा
उन लबों पर हँसी ही देखी है
दर्द दिल का मग़र नहीं देखा
तोड़कर दिल वो मुस्कुराता है
बेवफ़ा इस कदर नहीं देखा
फ़िक्र करता नहीं ज़माने की
मौज सा बेख़बर नहीं देखा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(96)
वज़्न-2122 1212 22/112
होठों पे तिश्नगी ज़रूरी है
ग़म में यूँ मयक़शी जरूरी है
जिस्म को सादगी में रखते हैं
दिल में भी सादगी ज़रूरी है
बचके रहना वबा सितम ढाता
सावधानी अभी ज़रूरी है
साथ दिल से निभा सके हरदम
इस तरह दोस्ती जरूरी है
तीरगी पास मत कभी आये
घर में कुछ रौशनी जरूरी है
मौज दिल की जलन मिटाने को
एक दो शायरी जरूरी है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(97)
वज़्न-1222 1222 1222 1222
खुदा दिल से गुज़ारिश है मेरा दिलदार आ जाये
मेरी तक़दीर के हिस्से सनम का प्यार आ जाये
चलो मिलकर निभायेंगे सभी रिश्ते ज़माने के
हमारे प्यार से उनको ख़ुशी कुछ यार आ जाये
सही तालीम देने की जरूरत है युवाओं को
कि जिससे सोच में उनकी सही व्यवहार आ जाये
सभी से आज तक मायूसियाँ ही मिलती आई हैं
भला करने को जनता का कोई सरकार आ जाये
मिटा दूँ मुल्क़ से गद्दार सारे और दुश्मन भी
कभी ऐ *मौज* हाथों में मेरे तलवार आ जाये
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(98)
वज़्न-22 -22 -22 -22 -22 -2
जिसको मैने अपना हमदम समझा था
दूर रहो अब मुझसे उसका कहना था
लोग यहाँ कहते हैं मुझको पत्थर दिल
अब भी दरिया दिल पहले भी दरिया था
मज़हब की बातों में अक़्सर उलझा कर
वो नफ़रत के बीज हमेशा बोता था
भीगी भीगी एक हसीना घर आई
वो देखा सावन का मस्त महीना था
सबको आज समझ दारी ने बाँटा है
नादानी का आलम कितना अच्छा था
डूब गया हूँ अब मैं उसकी यादों में
पहले अक्सर तन्हा तन्हा रहता था
मौज बनाया यूँ सबको बस अपना ही
पैगामे उल्फ़त जग में फैलाना था
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
*ग़ज़ल*(99)
वज़्न-2122 2122 2122 212
*कैद में हर आदमी की ज़िंदगी है आजकल*
*शादमानी कुछ नहीं बस बेबसी है आजकल*
*ज़ह्र किसने घोल दी है इन फ़ज़ाओं में बता*
*मुश्किलों में देखो हर सू आदमी है आजकल*
*बुझ गये दीपक सभी रौशन हुये थे जो कभी*
*और नज़र जाती जहाँ तक तीरगी है आजकल*
*तेरी रहमत का सहारा है सभी को ऐ खुदा*
*अस्पतालों में दवाओं की कमी है आजकल*
*तीरगी का खौफ़ इतना बढ़ गया है मौज क्यों*
*जिस्म से साया भी लगता अज़नबी है आजकल*
ग़ज़ल(100)
वज़्न 221 2121 1221 212
माँ बाप की दुआ से सँवरने लगा हूँ मैं
यानी कि हर्फ़ हर्फ़ निखरने लगा हूँ मैं
सरहद पे उन शहीद जवानों को देखकर
आँखों में देख अश्क़ ये भरने लगा हूँ मैं
बदहाल ज़िंदगी है किसानों की आज क्यों
सरकार से सवाल ये करने लगा हूँ मैं
नज़रें मिला के देखती मुझको कभी कभी
महबूब की अदा पे जो मरने लगा हूँ मैं
तुझमे वफ़ा नहीं थी मगर मौज देख लो
पा के तेरी जफ़ा ही सँवरने लगा हूँ मैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
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