ग़ज़ल संग्रह भाग (3)
ग़ज़ल(1)
बहर2122 1122 1122 22
गैर को भी कभी अपना मैं बनाकर देखूँ
प्यार देकर ही उन्हे दिल में बसाकर देखूँ
बेसहारों का सहारा ही बनूँ मैं हरदम
थाम लूँ हाथ सदा रिश्ता निभाकर देखूँ
मुफ़लिसों का हो भला सच्चा करूँ मैं वादा
सो रहे भूखे उसे रोटी खिलाकर देखूँ
काम होते हैं कहाँ मुझको पता चल जाए
काम करके मैं कभी फसलें उगाकर देखूँ
मौज डरता हूँ बहुत कैसे मैं जी पाऊँगा
हौसला अपने जिगर का मैं जमाकर देखूँ
ग़ज़ल(2)
बहर-1212 1122 1212 22
किया वफ़ा जो कभी प्यार से निभा देना
ख़ुदा समझ के उसे जिंदगी लुटा देना
अगर बिछे हैं कहीं राह में बहुत काँटे
उन्हें हटा के वहाँ फूल ही बिछा देना
कहीं भटक जो गये राह में उन्हें साथी
मुसाफ़िरों को सही रास्ता बता देना
जो तेरा साथ निभाये हँसी ख़ुशी देकर
कभी नहीं फिर उसे यार तुम दगा देना
मिले न मौज कभी ग़म यहाँ गरीबों को
झुकी हुई वो नज़र आज तुम हँसा देना
ग़ज़ल(3)
वज़्न-2122-2122-212
मुफ़लिसों को अब सताना छोड़ दो
अश्क़ उनके तुम बहाना छोड़ दो
है महल से कम नहीं ये झोफड़ी
आशियां उनका जलाना छोड़ दो
चाहते हो लूटना अपना वतन
ख़्वाब ऐसे तुम सजाना छोड़ दो
यूँ किसी को ज़ख्म देना तुम नहीं
दिल दुखाकर मुस्कुराना छोड दो
मौज हर इंसा यहाँ पर एक है
जात का मुद्दा उठाना छोड़ दो
ग़ज़ल(4)
वज़्न-212-212-212-
ईद मिलकर मनायें चलो
इक चराग़ा जलायें चलो
हिन्दू मुस्लिम सभी भाई हैं
नफ़रतों को मिटायें चलो
है मुबारक़ दुआ ईद की
अब मिठाई खिलायें चलो
जिंदगी चार दिन की यहाँ
ईद है मुस्कुरायें चलो
दरमियाँ फ़ासलें ना रहे
अब गले मिल दिखायें चलो
"मौज"ख़ुशियाँ मनाते रहें
ईद में गुनगुनायें चलो
ग़ज़ल(5)
बहर-2122 1212 22
वो सनम बेवफ़ा हमारी है
उसके बिन जिंदगी गुजारी है
मैं ख़ुदा मान कर उसे चाहा
आज भी जान से वो प्यारी है
चोट खाया बहुत मुहब्बत में
दिल पे चलती जफ़ा कटारी है
दास्तां क्या कहूँ जमाने को
इश्क़ में तो मजा ख़ुमारी है
क्यूँ वफ़ा में यहाँ जफ़ा मिलती
मौज उससे वफ़ा उधारी है
ग़ज़ल (6)
धुन-मिलती है जिंदगी में
बहर-221 2121 1221 212
तुमसा मिला न कोई हमारे जहान में
अपना बना रखा हूँ सदा दिल मकान में
माँ बाप का वो प्यार कहाँ से मिले तुम्हें
मिलता नहीं कभी भी किसी भी दुकान में
मुफलिस का हो मसीहा भलाई सदा करे
चलना उसी के दर कदम पाये निशान में
समझो जो जिंदगी तो बितानी है चार दिन
जीना नहीं कभी भी तुम इसको गुमान में
तुम मौज से हमेशा ख़ुशी बाँटते रहो
सबके लिए ही रखना मीठा जुबान में
ग़ज़ल(7)
बहर-212 212 212 212
बद्दुआ मत किसी की लिया कीजिये
हो सके तो सभी का भला कीजिये
माँ-पिता की दुआएँ अगर साथ हैं
जिंदगी फिर ख़ुशी से जिया कीजिये
दोस्ताना हमारा रहे उम्र भर
ये सलामत रहे बस दुआ कीजिये
बेसहारों का बन कर सहारा रहो
मत किसी का कभी भी बुरा कीजिये
धर्मों मज़हब की बेजा नुमाइश न हो
*मौज* दिल से ये बातें जुदा कीजिये
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
दोहा ग़ज़ल(8)
आज समय जो भी मिला,ले उसका आनंद
सुख-दुख आए जो कभी,समझो मीठे कंद
फूलों सी है जिंदगी,सुख-दुख दोनो गंध।
चिंता चिता समान है,करो सोचना बंद
करो गरीबों का भला,बनो सहारा आज
कर के नेकी काम जी,सबके बनो पसंद
रच डालो इतिहास जी,रखो कलम को हाथ
सत्य लिखो हर बार तुम,गीत ग़ज़ल या छंद
सच कहता है द्वारिका,बनो नहीं कमजोर
हो साहित की साधना,ज्ञान भरे मति मंद
ग़ज़ल(9)
बहर-2122 2122 2122 212
इश्क़ करता हूँ सनम कैसे बताऊँ आपको
यह बताओ चीरकर क्या दिल दिखाऊँ आपको
मेरी तो ख्वाहिश हमेशा से थी ए मेरे सनम
अपने दिल की धड़कनों में भी समाऊँ आपको
याद तेरी रात भर सोने नहीं देती मुझे
हाल ए दिल अपना कहो कैसे सुनाऊँ आपको
रोज ख़्वाबों में सताती हो मुझे तुम जालिमा
पास आ कर क्या कभी मैं भी सताऊँ आपको
गर कहीं जब दुश्मनों की फौज आये मौन तो
जान देकर दुश्मनों से मैं बचाऊँ आपको
ग़ज़ल(10)
बहर-122 122 122 122
नज़र से नज़र का मिलाना हुआ था
मुहब्बत का मौसम सुहाना हुआ था
रगो में नदी सी रवानी थीं ख़ुशियाँ
मुहब्बत का पैदा तराना हुआ था
वफ़ा कर रहा था वफ़ादार बनकर
मुहब्बत मुहब्बत निभाना हुआ था
सताया बहुत था जमाना मुझे तो
उसे तो ग़मों को बढ़ाना हुआ था
ख़ुशी माँगता मौज रब से हमेशा
इबादत कदा ही ठिकाना हुआ था
ग़ज़ल(11)
बहर-1222 1222 1222
सजा है झूठ का बाज़ार देखो तो
बढ़ा है रोज भ्रष्टाचार देखो तो
लगा कैसा जहां पे रोग का धब्बा
मचा है रोज हाहाकार देखो तो
यहाँ अपना पराया कौन पहचानो
कभी बदला हुआ व्यवहार देखो तो
गरीबों की कमाई में मजे करते
सही में कौन है हकदार देखो तो
बनो हरदम सहारा *मौज* तुम सबका
रहे कोई नहीं लाचार देखो तो
(12)-बेटियाँ..
बहर-212×4
बेटियों पर हमें भी सदा नाज़ है
फूल बनकर खिले बेटियाँ साज़ है
मान ऊँचा हुआ है पिता का यहाँ
घर की लक्ष्मी पुकारें नहीं लाज है
चेहरे पे ख़ुशी रोज देती रही
लाडली तो हमारी बनी ताज़ है
पेट में जी कभी भी नहीं मारना
नाम रौशन करेगी यही राज़ है
संग देती सदा सुख और" दुख में
बस खुशी बाँटती ओ यही काज है
राह चलती सदा हाथ को थामकर
बेटियों की जरूरत रही आज है
(13) मदहोश आँखें..
बहर-2122 2122 2122 212
ये तेरी मदहोश आँखें आज क्यूँ ग़मगीन है
पी रहा हूँ मैं इधर आँसू बड़ी नमकीन है
क्या हुआ है आज दिलबर पूँछता हूँ मैं तुझे
जो कभी आँसू बहाये भावना से दीन है
चाहता हूँ मैं खुदा से बस यही इक आसरा
मुस्कुराओ तुम सदा ही जिन्दगी रंगीन है
चाहतों में रूठ जाना बस मनाना है नहीं
रूठ जाना फिर सताना प्यार की तौहीन है
हो ख़ता ग़र माफ़ करना प्यार से कहता तुझे
प्यार पाने यार तेरा द्वारिका शौक़ीन है
*दोहा ग़ज़ल*(14)
उखड़े-उखड़े आजकल,क्यों मेरे मनमीत।
आओ दिल में छेड़ दूँ,मधुर-मधुर संगीत।।
आओ मेरे पास तुम,वो मेरे दिलदार।
प्रेम-भाव क्या चीज है,सिखलाऊँ मैं रीत।।
क्यों बैठी चुपचाप हो,कर लो दिल की बात।
मुस्काओ दिल खोलकर,छोड़ो यार अतीत।।
क्या अपनो से रूठना,जानूँ मेरी जान।
गले लगाकर प्यार से,दिल को मेरे जीत।।
मधुर मिलन की आश है,दे हाथो में हाथ।
मीठी-मीठी बात में,रैना जाये बीत।
यही द्वारिका चाहता,दे ख़ुशियाँ सौगात।
हरदम तेरा साथ हो,बना रहे ये प्रीत।।
ग़ज़ल(15)
बहर-212 212 212 212
ग़म मिलें गर उन्हें हम मिटाते चलें
दर्द अपना सभी हम छुपाते चलें
चार दिन ही जहां में रहेंगे सभी
जिंदगी में सदा मुस्कुराते चलें
प्रेम के बोल बोलें सभी के लिए
फूल दिल के चमन में खिलाते चलें
हाल उनका कभी पूँछ लें दोस्तो
मुफ़लिसों को गले से लगाते चलें
ये ग़ज़ल हर ज़ुबाँ का तरन्नुम बने
इस तरह मौज हम गुनगुनाते चलें
ग़ज़ल(16)
बहर-122 122 122 122
कभी दिल किसी का दुखाते नहीं हम
जहां मे किसी को रुलाते नहीं हम
यहाँ चोट मुझको मिली है सभी से
किसी को मग़र आज़माते नहीं हम
नहीं कोई साथी न हमदम हमारा
कभी ज़ख्म अपना दिखाते नहीं हम
यहाँ आशिकों में नहीं नाम अपना
मुहब्बत के ग़म को उठाते नहीं हम
शिकायत करें या खिलाफ़त करें जो
कभी दुश्मनी को निभाते नहीं हम
बड़ी ख़ूबसूरत मिली जिंदगी है
यहाँ मौज ख़ुशियाँ मिटाते नहीं हम
डी.पी.लहरे"मौज"
ग़ज़ल(17)
बहर-
212 212 212 212
प्यार का बाग मेरा उजड़ता रहा
टूटकर काँच जैसे बिरता रहा
चोट देना ज़माने की है इक अदा
जख़्म अपना छुपाकर निख़रता रहा
मुस्कुराना बना दर्दे दिल की दवा
ग़म भुलाकर सदा मैं सँवरता रहा
डर नहीं है कभी भी मुझे मौत का
दूर होने से अपनों के डरता रहा
मुफ़लिसों का सहारा बना मौज में
यूँ दुआओं की झोली को भरता रहा
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़💐🙏🏻
ग़ज़ल(18)
बहर-212 212 212 212
दूर जाकर न हमको सताया करो
पास आकर गले से लगाया करो
हो न घर में अँधेरा कभी दोस्तो
इक दिया दिन ढले ही जलाया करो
एक दाने को मोहताज रहते कई
भूख उनकी कभी तो मिटाया करो
बाप की ही कमाई उड़ाते हो क्यों
चार पैसे कभी तुम कमाया करो
क्या पता मौत का हो ठिकाना कहाँ
तुम हमेशा ही यूँ मुस्कुराया करो
*मौज* काँटो भरी जिंदगी है यहाँ
फूल दिल के चमन में खिलाया करो
ग़ज़ल(19)
बहर-1222 1222 1222
बशर होने का यूँ रिश्ता निभाते हैं
गरीबों को चलो रोटी खिलाते हैं
कभी कोई न करना वार पीछे से
सभी से दुश्मनी को हम मिटाते हैं
जहां में जिंदगी तो चार दिन की है
चलो ग़म को भुलाकर मुस्कुराते हैं
सदा माँ-बाप ओ अपने गुरू भगवन
बड़ों के पाँव में हम सर झुकाते हैं
ज़माना मौज कितना आज़माले अब
अदब से हम हुनर अपना दिखाते हैं
ग़ज़ल(20)
बहर-2122 1212 22
दरमियाँ फ़ासला मिटाना है
आज उनको गले लगाना है
भूख में मर रहे यहाँ कितने
रोटी हर शख़्स को खिलाना है
जो सफ़र में भटक गये कोई
राह सच्ची उन्हे दिखाना है
झूल जाते किसान फाँसी पर
उनको बदहाली से बचाना है
*मौज* है वक़्त का तकाज़ा यह
बोझ दुनिया का अब उठाना है
ग़ज़ल(21)
बहर-212 212 212 212
ढोंग करता रहा तो लगन व्यर्थ है
भाव दिल में न हों तो भजन व्यर्थ है
जी चुराता रहा है हर इक काम से
जो निठल्ला बना वो बदन व्यर्थ है
आज़माना हुआ गर वफ़ा में कभी
तो मुहब्बत का हर वो कथन व्यर्थ है
छोड़ कर जो अकेले कहीं चल बसे
याद में उनके पल-पल रुदन व्यर्थ है
कह दिया हो अग़र तो निभाना उसे
जो निभा भी न पाये वचन व्यर्थ है
मौज करना कमा के यूँ ईमान से
गैर के धन से करना जलन व्यर्थ है
ग़ज़ल(22)
बहर-221 2121 1221 212
दिल के सभी ग़मों को क़सम से भुला दिया
दरिया जो आँसुओं का था उसको सुखा दिया
देखा मुसाफिरों को जो भूखे गुज़र रहे
उनको बड़े ख़ुलूस से खाना खिला दिया
करने लगी है दोस्तो वो मेरी आरज़ू
इक बार उसको देख के क्या मुस्कुरा दिया
जो नौजवां बिगड़ के गलत रास्ते चले
सच्चाइयों पे चलने का रस्ता बता दिया
रोने लगा ग़रीब का बच्चा कभी अगर
तो *मौज* हमने उसको खिलौना दिला दिया
ग़ज़ल(23)
बहर_1212 1122 1212 22
वफ़ा से दिल में ख़ुशी का कलाम आया है
मिरे हबीब का प्यारा सलाम आया है
वतन के नाम पे कुर्बान हो गये कितने
अजीब मोड़ पे अब इंतकाम आया है
किसे बतायें यहाँ हाल क्या गरीबी का
बहुत गरीबी का बत्तर मुकाम आया है
पढ़ो तो ग़ौर से उस शख़्स का ज़रा चेहरा
गरीब को ही बनाने गुलाम आया है
ये कह रहे हैं यहाँ लोग एक दूजे से
करेंगे *मौज* सभी वो निज़ाम आया है
ग़ज़ल(24)
221 2122 221 2122
तक़दीर ने हमारी हमको दगा दिया है
ग़म के खज़ाने देके जीना सिखा दिया है
देखा यक़ीन करके अपने हबीब पर जब
उसने तो ग़ैर मुझको सबमें बता दिया है
माँ बाप की वो इज़्ज़त करते नहीं कभी जो
मैने नज़र से अपने उनको गिरा दिया है
झगड़े हज़ार करते ताने बहुत सुनाते
यूँ दुश्मनी को मैंने दिल से मिटा दिया है
है कौन जो डराये डरते नहीं कभी हम
हमने जरूरतों पे पर्वत हिला दिया है
मिलके रहें सभी अब आपस में भाई-भाई
ये "मौज"हमने ऐसा जज़्बा जगा दिया है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(25)
बहर-2122 2122 2122 212
प्यार वाली इस ग़ज़ल को गुनगुनाना आ गया
याद करके दिलरुबा को मुस्कुराना आ गया
दुश्मनों की जान लेकर जान अपनी वार दें
देश की खातिर हमें भी सर कटाना आ गया
हैं नशे में चूर मेरे देश के अब नौजवां
देखते ही देखते अब क्या ज़माना आ गया
बादशाही राजनेता माल खाते देश का
लूटना फ़ितरत में इनकी बस ख़जाना आ गया
चोट देकर क्या सता पायेगा कोई मौज अब
जख़्म अपने भी हमें दिल के छुपाना आ गया
ग़ज़ल(26)
बहर-2122 1212112(22)
प्यार पाने को बेकरार रहा
उम्र भर उसका इंतजार रहा
जो गलत रास्ते चले खुद ही
उनके नज़रों में गुनहगार रहा
मुस्कुरा कर वो मुझसे मिलते हैं
*सिर्फ़ उनसे ही मुझको प्यार रहा*
ख़ुद से बेगाना मैं रहा लेकिन
दोस्तों पर तो जां निसार रहा
माँ पिता के चरण नमन करने
शीष झुकता ही बार-बार रहा
लाख आई ख़िज़ाँ ज़माने में
मौज का दिल तो पुरबहार रहा
डी.पी.लहरे "मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(27)
122×4
नज़र से नज़र वो मिलाने लगे हैं
सनम अब मुहब्बत सिखाने लगे हैं
युवाओं को देखो नशे में हमेशा
पिता की कमाई उड़ाने लगे हैं
मुहब्बत की यादें जिग़र में सजाया
जिन्हे भूलने में ज़माने लगे हैं
रईसों ने हरदम रईसी दिखाकर
गरीबों को अक्सर सताने लगे हैं
किसानों का बद्तर यहाँ हाल देखो
गले में वो फंदा लगाने लगे हैं
किसे मैं कहूँ मौज अपना पराया
बहुत लोग अब आज़माने लगे हैं
ग़ज़ल(28)
बहर-1222 1222 1222 1222
जरा सी बात क्या करली हमें पागल बना डाला।
नज़र से वार कर कर के सनम घायल बना डाला।।
सुनाऊँ किस तरह क़िस्सा बताओ मैं ज़माने को
मुहब्बत ने नचा कर के मुझे पायल बना डाला
ग़म-ए-फ़ुर्कत के आलम में इधर क्या क्या नहीं गुज़रा
बहाकर अश्क आँखों ने मुझे बादल बना डाला
हसीनों की मुहब्बत का अजब अंदाज़ ये देखो
सजाकर नैन म़े अपने मुझे काजल बना डाला
लुटाती है मुहब्बत इस कदर वो मुस्कुरा कर के
मुहब्बत का मुझे अब *मौज* तो कायल बना डाला
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (29)
बहर-2122 2122 2122 212
तर्ज-आपकी नज़रों ने समझा
प्यार की काबिल...
जिंदगी में ग़म मिले उसको भुलाने की कहो
जख़्म गहरा हो कहीं दिल में छुपाने की कहो
आशिकी में रात-दिन अब चैन भी आता नहीं
क्या करें इस खेल में कुछ मुस्कुराने की कहो
बाद मुद्दत के हुआ है आज तुमसे सामना
दिल को अपनी प्यार से नजरें मिलाने की कहो
मुफ़लिसों में बाँट दो कुछ तो कमाई आप भी
फ़र्ज़ अब इंसानियत का कुछ निभाने की कहो
मज़हबों की बात करके वार करते लोग कुछ
मौज जो गद्दार है उसको मिटाने की कहो
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(30)
बहर-2122 2122 2122 212
इश्क़ की दुनिया ग़ज़ब है कुछ कहा जाता नहीं
आशिकी बिन इस जहां में क्यों जिया जाता नहीं
दुश्मनों ने जाल कैसे हैं बिछाये देश में
उनके चकनेचूर सपने क्यों किया जाता नहीं
नौजवानों में मची है क्यों नशे की होड़ है
उनको कैसे बिन नशे की अब रहा जाता नहीं
छोड़ देते हैं अकेले लोग कुछ माँ-बाप को
उनको अपने साथे कैसे रखा जाता नहीं
क्या ज़माना आ गया है देख लो अब "मौज" तुम
आमदानी लोग का अब क्यों बढ़ा जाता नहीं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (31)
बहर-221 1221 1221 122
दुश्मन न करे दोस्त ने...
देखो तो कहाँ आदमी इंसान बना है
ईमान सभी बेच के बेमान बना है
नेकी को यहाँ छोड़ के हथियार रखे जो
लोगों के गले काट के शैतान बना है
मज़हब की लड़ाई में फँसे लोग बहुत ही
इंसानियत को भूलके अंजान बना है
कब खून पसीना भी बहाया कभी उसने
जो मुफलिसों को लूटके धनवान बना है
सबकी भलाई के लिए लिखता है ग़ज़ल जो
शायर में यही *मौज* का तूफ़ान बना है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (32)
बहर-221 2121 1221 212
मिलती है....
नजरे मिलाके मुझको जो इक बार देखते
फिर आज़माके आप मेरा प्यार देखते
छाई बहार दिल में खिला इक गुलाब है
दिल की ज़मीन कैसी है गुलज़ार देखते
पलकों में मैं बिठाकर रखूँ आरज़ू यही
तुम पूछकर कसम से अब इज़हार देखते
आशिक़ हूँ जान वारूँ दरोगा नहीं हूँ मैं
होकर वफ़ा के नाम गिरफ्तार देखते
मर मर के जी रहा हूँ मुहब्बत की चाह में
कोई तो "मौज" जैसा ही दिलदार देखते
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(33)
बहर-2122-1122-1122-22
तर्ज-प्यार झूठा सहीं मिलने के बहाने आजा..
आशिकों में नहीं है मुझसा पुराना देखो
बन गया कैसा अजब मेरा फ़साना देखो
हर क़दम सोच समझ कर ही बढ़ाना होगा
प्यार के नाम से जलता है ज़माना देखो
दरबदर हाल में जीना आशिक़ी में मरना
आशिक़ों का कहाँ होता है ठिकाना देखो
दरमियाँ फासले बढ़ने से नहीं डरता मैं
मिल गया है मुझे चाहत का ख़ज़ाना देखो
जख़्म देकर यहाँ अपने ही जलाते हैं जां
"मौज"दस्तूर हरिक जग का निभाना देखो
ग़ज़ल(34)
बहर-2212 2212 2212 2212
तुमसे वफ़ा करता रहूँ तुम बेवफ़ा होना नहीं
है आरज़ू जान-ए-वफ़ा मुझसे जुदा होना नहीं
कितनी हसीं है जिंदगी जिसमे बसी हो दिलरुबा
तक़दीर से मेरी कभी तुम लापता होना नहीं
तालीम देने के लिए हरदम दिखाये रास्ता
हमसे बड़े ग़र डाँट दें उनसे खफ़ा होना नहीं
चमको सितारों सा जहां में रोशनी ख़ुद तुम बनो
जो आँधियों में ही बुझे वो तुम शमा होना नहीं
भरना ख़ुशी से झोली को तुम मौज में हर दम रहो
ख़ुशियों भरे संसार में तुम ग़मज़दा होना नहीं
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(35)
बहर-1222 1222 122
ग़रीबों को ख़ुदा से कम मिला है
हक़ीक़त में उन्हे तो ग़म मिला है
रईंसों को हो क्या अंदाज़ दुख का
उन्हें तो सुख यहाँ पैहम मिला है
किसानों का अज़ब है हाल देखो
उन्हे चारो तरफ ही तम मिला है
कभी उनके भी आँसू पोछ लेना
जिन्हे हर शख़्स ही बरहम मिला है
जवानों देश की खातिर लड़ो तुम
बड़ी मुश्किल से यह परचम मिला है
करो तुम "मौज"अपने जिंदगी में
मुहब्बत का हसीं मौसम मिला है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(36)
बहर-2122 2122 2122
प्यार का जादू सनम करने लगी है
आज आहें देख कर भरने लगी है
वार करती नैन से वो मुस्कुराकर
पास आने से मग़र डरने लगी है
इस नज़र को रोक भी पाता नहीं मैं
दिल की धड़कन तेज अब चलने लगी है
दरमियांँ जो फ़ासले थे मिट गये अब
आस दिल में प्यार की पलने लगी है
आशिकी में रात-दिन डूबा हुआ हूँ
प्यार तो अब जिंदगी लगने लगी है
आज हमसे प्यार का वादा हुआ है
मौज के दिल में शमा जलने लगी है
ग़ज़ल(37)
बहर-1222 1222 122
अकेले हैं चले आओ जहाँ हो
कभी बेचो नहीं ईमान प्यारे
सभी सच को बनाओ शान प्यारे
करो हर काम नेकी का जहां में
भलाई में लुटा दो जान प्यारे
जो भूखे हैं उन्हे खाना खिलाता
वही होता यहाँ धनवान प्यारे
गरीबों का मसीहा बन सके तो
रहम की भाव रख पहचान प्यारे
अगर बेटा कहाना वीर जैसे
रखो माँ बाप का तुम ध्यान प्यारे
इबादत मौज तुम कर लो ख़ुदा की
मिलेंगे हर ख़ुशी मुस्कान प्यारे
ग़ज़ल(38)
बहर2122 2122 212
दोस्ती के वो कभी क़ाबिल नहीं
शख़्स जो होता है ज़िंदा दिल नहीं
जो दग़ा देता हमें हर बात पर
उसके जैसा तो कोई ज़ाहिल नहीं
देख कर के मुस्कुराती है सनम
उसकी नज़रो सा कहीं क़ातिल नहीं
बस ख़ुशी में लोग आते हैं सभी
देख लो दुख में कोई शामिल नहीं
इस ज़माने में हमारा कौन है
अपनी कोई प्यार की महफ़िल नहीं
ख़ुश रहो हर हाल मेंअब मौज तुम
जिंदगी जीना यहाँ मुश्किल नहीं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा
ग़ज़ल (39)
बहर-221-2121-1221-212
आशिक़ मिज़ाज़ था सो फ़साना बना लिया
अफ़रोज़ इक वफ़ा को ठिकाना बना लिया
महबूब के लबों की हँसी देखता रहूँ
उसकी हँसी को साज तराना बना लिया
खुशरंग जिंदगी है खिली इक गुलाब सी
इस जिंदगी को आज सुहाना बना लिया
ख़ुशियों के साथ, भूल के ग़म मैं सदा रहूँ
बस प्यार को ख़ुशी का ख़जाना बना लिया
कहते बहुत हैं मौज ज़माना ख़राब है
इस बात को सभी ने बहाना बना लिया
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(40)
बहर-1212 1212 1212 1212
मुहब्बतों सा इस जहां में कोई है नशा नहीं
है रोग वो के जिसकी अब तलक बनी दवा नहीं
वो ग़म बढ़ा के चल दिये हैं आज मुझको छोड़कर
ये जिंदगी उजाड़ कर उन्हें सुकूँ मिला नहीं
उदास हो न ज़िन्दगी यूँ मुश्किलों से हारकर
वो जिंदगी भी क्या है जिसमें जोश है भरा नहीं
बिता रहा है जिंदगी *वो* मजहबों के नाम पर
वतन के वास्ते कभी वो आज तक लड़ा नहीं
बना रहे हैं सब महल ग़रीब को ही नोंचकर
अमीर का है तज़किरा गरीब का पता नहीं
तमाम ग़म उठा के आप मौज में हैं जी रहे
अदा जो आप में दिखी, किसी में वो अदा नहीं
डी.पी.लहरे"मौज
कवर्धा
चित्र पर ग़ज़ल(41)
बहर-2122 1212 22
जिंदगी की किताब तुम होते
प्यार का हर जवाब तुम होते
मैं महकता उन्हीं बहारों में
रोज खिलता गुलाब तुम होते
मैं नशा प्यार का चढ़ा लेता
वो नशीली शराब तुम होते
पूछते लोग जी रहे कैसे
हर ख़ुशी का हिसाब तुम होते
प्यार की रौशनी सदा मिलती
मौज का माहताब तुम होते
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा
ग़ज़ल (42)
बहर-2122-1212-22/112
जब भी महबूब है मिले मुझसे
दूर से देख, ये कहे मुझसे
क्या हुई थी खत़ा बताये बिन
रूठ कर दूर हो गये मुझसे
मैंने कुछ भी बुरा किया ही नहीं
फिर भी दुनिया ये क्यूँ जले मुझसे
माँगता हूँ ख़ुदा ख़ुशी सबकी
दिल किसी का नहीं दुखे मुझसे
*काम ही ऐसा मैं नहीं करता*
*शर्म से क्यों नज़र झुके मुझसे*
आदमी हूँ मैं कोई भूत नहीं
क्यूँ भला तू यहाँ डरे मुझसे
मौज डरता नहीं जमाने से
जिसमे दम है वो अब लड़े मुझसे
ग़ज़ल(43)
2122-2122-2122-212
सीपियाँ उम्मीद की दिल में बसा कर तुम चलो।
जो निराशा है उसे दिल से मिटा कर तुम चलो
चार दिन की जिंदगी हैं ढूँढ़ लो खु़शियाँ सदा।
छटपटाहट छोड़कर खुद को हँसा कर तुम चलो
प्रेम का सागर बनो मोती मिलेंगे आज ही।
आदमी से प्रेम सच्चा ही बढ़ा कर तुम चलो।।
याद बन जाये सदा कुछ हो निशानी आपकी।
साँच का वह रास्ता ऐसे बना कर तुम चलो।।
मुश्किलों में हारता वो जिंदगी से हारता।
हौसला अब मौज कंधो में उठा कर तुम चलो।।
डी.पी लहरे"मौज"
ग़जल(44)
बहर-2122 1122 1122 22
दर्द दिल की तो सनम तुम ही दवा हो जाना
डूब कर प्यार में हमदम तू फ़ना हो जाना
प्यार तेरा ये सनम मिलता रहे यूँ हरदम
माँगता हूँ मैं ख़ुदा से तू ख़ुदा हो जाना
जब सतायें तो ग़रीबों को यहाँ पर कोई
उम्र भर साथ तू देने को खड़ा हो जाना
झूठ के रास्ते में लोग चले हैं कैसे
तुम उन्हें देख वहाँ से ही दफ़ा हो जाना
लोग भूखे हैं यहाँ कितने उन्हे रोटी दो
तुम मसीहा ही गरीबों का सदा हो जाना
मौज माँगो यहाँ सबके लिए देखो खु़शियाँ
मन्नतें हों सभी पूरी वो दुआ हो जाना
ग़ज़ल (45)
बहर-212-212-212-212
पास आकर कभी मुस्कुराया करो
दूर जाकर न हमको सताया करो
ये ग़ज़ल जो तुम्हारे लिए है कही
यार तुम भी इसे गुनगुनाया करो
आप के प्यार में जी रहा हूँ यहाँ
जाम अपने लबों का पिलाया करो
मैं खड़ा हूँ वफ़ा की उसी राह पर
अब वफ़ा यार तुम भी निभाया करो
क्या करेगा ज़माना मुझे डर नहीं
तुम मुझे अब गले से लगाया करो
मौज कहना है तो तुम हकीकत कहो
बात दिल की कभी मत छुपाया करो
ग़ज़ल(46)
बहर-2122 1212 22
इश्क़ का रोगी हूँ दवा दे दो
मेरे महबूब का पता दे दो
मुफ़लिसी यूँ मिटे ज़माने में
माँगता हूँ ख़ुदा दुआ दे दो
चैन से जी सके यहाँ अपने
जिंदगी भर ख़ुशी मजा दे दो
तीरगी दूर ही चले जाये
दिन ढ़ले शाम की शमां दे दो
"मौज" अब देख प्यार का आलम
चाहने वालों को रजा दे दो
ग़ज़ल (47)
2122 12 12 22
चार दिन की मिली जवानी है
जिंदगी चार दिन बितानी है
कौन रहता सदा ज़माने में
मौत सच्ची यहाँ कहानी है
पूछकर हाल उन गरीबों का
पोछना आँख में जो पानी है
बात सुन लो सभी जवानो तुम
देश हित की कसम उठानी है
चोट देकर सनम रुलाना मुझे
तेरी आदत हुई पुरानी है
लाख ग़म मौज हैं मिले तुमको
फिर भी ये जिंदगी सुहानी है
ग़ज़ल(48)
बहर-2122-1212-22
आईना यूँ सवाल पूछे है
मेरे दिल का वो हाल पूछे है
जो शराफ़त कभी नहीं जानें
वो मेरा हाल चाल पूछे है
जो मुहब्बत नहीं निभा सकते
मेरे दिल का ख़याल पूछे है
जख़्म गहरा मुझे दिया उसने
छोड़ कर खुद मलाल पूछे है
जिंदगी ने तमाम ग़म देके
कितना निख़रा ज़माल पूछे है
मौज जाने कहाँ मुझे कोई
लोग दिल को विसाल पूछे है
ग़ज़ल(49)
बहर-2122-1122-1122-22
इश्क़ करने के लिए दिल से इज़ाज़त ली है
उम्र भर की ये ज़माने से शिक़ायत ली है
मेरे महबूब का यूँ मुझसे ज़ुदा हो जाना
छोड़ कर प्यार वफ़ा उसने तो ग़ुरबत ली है
हाल मेरा यहाँ कैसा है बताऊँ किसको
दर्द सबको यूँ दिखाने की निज़ामत ली है
लोग नफ़रत ही किया करते हैं इंसानों से
किसने मुफ़लिस की कभी यार ज़मानत ली है
मौज हर हाल में हमको है यहाँ पर हँसना
ख़ुशनसीबी में सदा जीने को राहत ली है
ग़ज़ल (50)
बहर-2122-1212-22/112
वो बवंडर कहाँ से उठता है
राजनेता मकां से उठता है
छोड़ जाता है याद वो अपनी
आदमी जो जहां से उठता है
जल रहा क्या किसी का दिल देखो
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
मंजिलें को सदा हसीं पाने
शख़्स वो तो जवां से उठता है
कोई चाहे अग़र गिराना तो
मौज ख़ुद कारवाँ से उठता है
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(51)
बहर-2122 1212 22 /112
वो बवंडर किला से उठता है
बस रईंसी ख़ता से उठता है
जब पुकारे कभी नहीं आये
तब भरोसा ख़ुदा से उठता है
काम बेटा अग़र गलत करता
हाथ तब तो पिता से उठता है
आग दिल में लगी बुझे कैसे
ये धुआँ दिल जला से उठता है
कोई चाहे कभी गिराना तो
मौज यूँ हौसला से उठता है
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(52)
बहर-122 122 122 122
ख़ुशी से हर इक जख़्म को सी लिया है
मेरे दर्द ए दिल की हँसी इक दवा है
वो महबूब सपने दिखाये बहुत थे
मुझे भूल कर वो बनी बेवफ़ा है
सताया हुआ हूँ ज़माने से हरदम
ग़मों का मेरे दिल में सिलसिला है
मुहब्बत में कैसे करूँ मैं भरोसा
मुझे जिंदगी में मिली जो दगा है
रहो मौज में हर फ़िक़र छोड़ कर तुम
तेरे बाजुओं में ज़माना टिका है
ग़ज़ल (53)
221 2121 1221 212
महबूब गुमशुदा है मिली कुछ ख़बर नहीं
देखा है हर गली में ही आया नज़र नहीं
यूँ दरबदर हुआ मैं मुहब्बत के नाम पर
मिलती सुकूनो-चैन की कोई डगर नहीं
अब तो धुआँ धुआँ सी है ये मेरी जिंदगी
रौशन रहूँ कहाँ से खिले वो क़मर नहीं
है कौन जो समझ ले मेरा दर्दे- दिल यहाँ
मैं अपने हर ग़मों से कभी बेख़बर नहीं
मतलब का "मौज" देखो ज़माना है आज कल
दिल से वफ़ा निभाये मिला वो बशर नहीं
ग़ज़ल(54)
बहर-2122 1122 1122 22
ज़ख़्म सारे मैं दिखाने में उलझ जाता हूँ
दर्द यूँ दिल के जताने में उलझ जाता हूँ
दरमियां तुमसे ही इज़हार ए मुहब्बत के मैं
आशियांँ दिल के बनाने में उलझ जाता हूँ
अजी गैरों से गिला करने कहाँ मैं जाता
अभी अपनों को मनाने में उलझ जाता हूँ
अब तलक साथ मेरा जिसने निभाया ही नहीं
साथ उसका मैं निभाने में उलझ जाता हूँ
कामयाबी से मेरी कोई अगर जलता है
मैं नज़र उससे चुराने में उलझ जाता हूँ
मौज कैसा है यहाँ किसका फसाना छोड़ो
ज़ीस्त अपनी ही बनाने में उलझ जाता हूँ
ग़ज़ल (55)
बहर-2122 1212 22
जब कहीं एतबार देखा है
प्यार भी बेशुमार देखा है
इस वबा के ही डर से रोते हुए
आदमी ज़ार -ज़ार देखा है👍🏻
इश्क़ में डूबकर दिवानों को
जान करते निसार देखा है
है बला रोग यह मुहब्बत भी
इसमें लुटता क़रार देखा है👍🏻
तेरी सूरत कभी नहीं देखी
बस तेरा इन्तिज़ार देखा है👍🏻
फ़िक्र जिसको नहीं सता पाये
मौज वो ख़ुशगवार देखा है👍🏻
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(56)
बहर-2122 2122 212
बच के रहना तुम बुरे हर काम से
रिश्ता रखता कौन है बदनाम से
जान लेवा है नशा इक रोग है
जान से जाते बहुत हैं जाम से
चोट देते लोग हैं हर बात पर
मैं मिटाता दर्द झंडू बाम से
जिंदगी कटती खुशी में आजकल
आशिकी में डूबकर आराम से
आ सनम अब प्यार का वादा निभा
मौज तो डरता नहीं अंजाम से
ग़ज़ल (57)
बहर-212 212 212 212
प्यार हरदम सनम का मेरे पास है
जन्नतों की ख़ुशी का वो अहसास है
दोस्ती के लिए जान को वार दें
बस उन्ही दोस्तों से हमें आस है
आदमी की तरह पेश आता नहीं
टूटता आदमी का जो विश्वास है
हम गुलामी किसी का करेंगे नहीं
हमको आता नहीं ये कभी रास है
दौर कैसा चला है वबा का यहाँ
ये टले बस यही मेरी अरदास है
हर गली में है चर्चा यहाँ मौज का
शायरों में यहाँ नाम जो खास है
ग़ज़ल(58)
बहर-2222 2222 2222 2
मिलता है पर बातें करना कम कर देता है
पल भर में यूँ मेरी आँखें नम कर देता है।
मैं जिनकी बातों में हर पल डूबा रहता हूँ
उनका लहज़ा ज़ख्मों पर मरहम कर देता है
रात कटेगी कैसे अब ये दिन में है उलझन
मन ये तन्हा दिल को भी बेदम कर देता है
मयख़ाने की राह मिली तो शुक्र मनाया मैंने
दिल के सारे ग़म को रम जो कम कर देता है
मौज सभी को माने अपना बाँटे दर्द सभी से
ग़म के शोलों को वो यूँ शबनम कर देता है
ग़ज़ल(59)
बहर-221 2121 122 212
दुख दर्द ही मेरा तो सहारा है इन दिनों
आँखों में मेरे आँसू का धारा है इन दिनों
बेहाल कर रही है वबा फैल कर यहाँ
बेमौत आदमी को ही मारा है इन दिनों
आदत है झूठ बोलना कितनों की अब यहाँ
सच्चाई का उन्ही से किनारा है इन दिनों
महबूब माँगता था ख़ुदा से मुझे मिला
दिल की जमीं में चाँद उतारा है इन दिनों
ढाला है मौज ख़ुद को यहाँ हमने इस तरह
हर हाल में ही हँस के गुजारा है इन दिनों
ग़ज़ल(60)
बहर-221-2121-1221-212
कुर्बान इस वतन पे मेरे कुल जहान है
ऊँचा रहे तिरंगा यही मेरी शान है
करता रहूँगा मैं तो मुहब्बत वतन से ही
मैं हिंद का हूँ वासी मेरी हिंद जान है
मुश्किल से हमने पाई है आज़ादी दोस्तो
इस देश के शहीदों पे हमको गुमान है
सरहद पे जाके मैं भी लडूँ आरज़ू यही
ज़ज़्बा है बाजुओं में अभी दिल जवान है
गुलशन है जन्नतों सा यहां मौज देख लो
सारे जहां से अच्छा तो हिंदोस्तान है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(61)
बहर-2122 1122 1122 22
फूल सा जूड़े में चाहो तो सजा लो मुझको
या सजावट का ही सामान बना लो मुझको।
उम्र भर साथ रहूँगा मैं तुम्हारा बनकर
अपनी साँसों में सनम तुम जो बसा लो मुझको।
इक ख़ुमारी सी मुहब्बत की हुई है तारी
बहके बहके हैं क़दम आके सँभालो मुझको।
आपके हुस्न का दीवाना बना बैठा हूँ
देखो पाग़ल न हो जाऊँ मैं बचा लो मुझको
इस ज़माने की नज़र कोई न लग जाये मुझे
मौज आँचल में कहीं अपने छुपा लो मुझको।
ग़ज़ल(62)
बहर-122 122 122 12
मिले राह में वो मचलते हुए
ख़ुशी से चले हम उछलते हुए
भरोसे मुक़द्दर के रहते हैं जो
उन्हें देखा है हाथ मलते हुए
रईंसों को देखा है अक्सर यहॉं
गरीबों को पल पल में छलते हुए
नहीं आंधियाँ भी बुझा वो सकीं
चराग़ां रहे दिल में जलते हुए
कभी मौज महफ़िल सजाई नहीं
मग़र शाम देखी है ढ़लते हुए
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(63)
बहर-122 122 122 122
मुहब्बत जो की है मुहब्बत निभा लें
दिये हम दिलों में वफा़ के जला लें
मिला जो कभी ग़म उसे हम मिटा लें
सभी दर्द दिल के चलो हम छुपा ल़े
यहाँ चार दिन की मिली जिंदगी है
चलो जिंदगी को ख़ुशी से बिता लें
ग़मों को किनारा करें आज उनके
कभी मुफ़लिसों को गले से लगा लें
किसी को कभी चोट देंगे नहीं हम
यहाँ सबको अपनी शराफ़त दिखा लें
लिखो मौज हरदम ग़ज़ल खास ऐसे
जिसे लोग पढ़ करा ज़रा गुनगुना लें
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(64)
बहर-2122-2122-2122-212
अपनी आज़ादी को हम कैसे भुला दें दोस्तो
उन शहीदों के लिए आँसू बहा दें दोस्तो
हम किसी से दुश्मनी करते नहीं हैं जान लें
दुश्मनी जो भी करे उसको मिटा दें दोस्तो
कोई हमको घूर कर देखे कभी तो सोच ले
देखने वालों की नज़रें हम झुका दें दोस्तो
दें सलामी इस वतन के नौजवानों को सदा
बाजुओं में उनके हम ज़ज़्बा जगा दें दोस्तो
मौज करते हैं मुहब्बत जान भी कुर्बान है
हम वतन के वास्ते दुनिया हिला दें दोस्तो
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (65)
बहर-1222 1222 122
मुहब्बत का ख़ज़ाना देखना है
वफ़ाओं का सहारा देखना है
जहां रौशन रहे हर हाल में ही
सभी घर में उजाला देखना है
कड़ी मेहनत से खुशियां होंगी हासिल
कमाई में इजाफ़ा देखना है
हमारी कामयाबी से जले जो
हाँ उसका खून जलता देखना है
ज़माने में मिलेंगे लोग लाखों
हमें सबका तमाशा देखना है
ख़ुशी से "मौज" काटो जिंदगी को
ग़मों का रास्ता क्या देखना है
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (66)
बहर-2122 1122 1122 22
तोड़ कर दिल को मेरा साथी अगर जायेगा
काँच के जैसे मेरा दिल ये बिखर जायेगा।
ज़ख़्म गर तुमसे मिले मुझको परायों की तर्ह
अश्क़ आँखों से हलक में ही उतर जायेगा।
दौर कैसा भी हो दुनिया में न परवाह करो
थोड़े ही वक्त में ये दौर सँवर जायेगा।
ग़म भले कितने मिलें रब पे भरोसा रख तू
वक़्त कैसा भी हो इक रोज़ सुधर जायेगा
उस घड़ी दीद को तरसेंगे सभी लोग मेरी
जिस घड़ी मौज ज़माने से गुजर जायेगा
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़जल(67)
बहर-221 2121 1221 212
महबूब यूँ कसम से बगावत में आ गये
बस इक ख़ता हुई वो अदालत में आ गये
यूँ प्यार से ही देखने में है गुनाह क्या
पर देखते ही उनको शिक़ायत में आ गये।
गुमराह कर के जनता को नेता बहुत बने
दौलत के दम पे कितने सियासत में आ गये
है मतलबी ज़हान ये मतलब के दोस्त हैं
सब तोड़कर भरोसा नज़ाकत में आ गये
करते थे मौज पहले शरारत नयी नयी
सब छोड़छाड़ के जी शराफ़त में आ गये
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(68)
बहर-221 2121 1221 212
काँटे वो मेरे दिल में चुभाता चला गया
फिर भी मैं अपने दिल को हँसाता चला गया
दिल खोल सबसे हाथ मिलाता चला गया
मैं दुश्मनी को दिल से मिटाता चला गया
आये न उसके चेहरे पे ग़म की कभी शिकन
यूँ ज़ख़्म अपने दिल के छुपाता चला गया
हो जाते हैं खफ़ा वो ज़रा सी ही बात पर
पहले ही बात करके मनाता चला गया
माने न मानें अपना मुझे कोई दोस्तो
हर शख़्स को मैं अपना बनाता चला गया
मुफ़लिस है मौज फिर भी है दिल का अमीर वो
यूँ रंग महफ़िलों में जमाता चला गया
ग़ज़ल(69)
बहर-221 1221 1221 122
दिल भी ये मेरा देख लो काबू में नहीं है
पाने को तेरा प्यार ये पहलू में नहीं है
कुछ है जो तेरी साँस में महकाये मेरा दिल
वो ख़ुशबू किसी ईत्र की खुशबू में नहीं है
फिर आज़मा के देख वफा़ मेरी मुहब्बत
दुनिया के किसी एक भी मजनूँ में नहीं है
उलझन में ज़माने की उलझता ही रहा हूँ
उलझन तो मेरे यार के गेसू में नहीं है
ए मौज सदा मिलते ज़माने में बहुत ग़म
उन ग़म का कभी डर तेरे आसूँ में नहीं है
ग़ज़ल(70)
बहर-1212 1122 1212 22
ज़मीन-ए-दिल में वफ़ाओं के गुल खिलाना है
मुहब्बतों का जहां शान से सजाना है
हो बादशाह या कोई फ़क़ीर जाना है
जहान सारा ये बस इक सरायखाना है
तमाम उम्र तजुर्बों से बस यही सीखा
बड़े अदब से वफ़ाएँ हमें निभाना है
दुआ बड़ों से सदा माँगता रहूँगा मैं
उन्हीं दुआओं से फिर रोज मुस्कुराना है
कभी किसी को अगर ग़म मिले कहीं साथी
उसे तो अपना समझ कर गले लगाना है
किसी के दिल को कभी *चोट मौज मत देना
लुटाना तुमको तो खुशियों का बस खज़ाना है
ग़ज़ल(71)
बहर-212 212 212 212
आप मुझसे अकेले मिला कीजिए
फिर मुहब्बत की बातें किया कीजिए
अब बढ़ायें कदम राह जैसी भी हो
मौत से भी कभी मत डरा कीजिए
मुफ़लिसों को सदा प्यार देते रहें
जिंदगी हो सलामत दुआ कीजिए
चोट दिल की छुपाने से क्या फायदा
ज़ख़्म नासूर मत हो दवा कीजिए
हौसला मौज अपना बनाये रहें
गिर गये जो कभी खुद उठा कीजिए
डी.पी.लहरे "मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(72)
बहर-2122 1122 1122 22
जिंदा रहने दो हमें अब न सताओ लोगो
रोज ही खून के आँसू न रुलाओ लोगो
फ़र्ज इंसान का दिल से भी निभाओ लोगो
मुफ़लिसों को कभी खाना तो खिलाओ लोगो
फ़ायदा दुश्मनी से होता नहीं है देखो
दोस्ती के लिए तो हाथ बढ़ाओ लोगो
हाल जैसे भी रहे मुस्कुरा के जीना है
आज सबके लिए ख़ुशियाँ ही लुटाओ लोगो
मौज दिल थाम ज़माने में कदम रख्खा है
हौसले इनके कोई भी न दबाओ लोगो
ग़ज़ल (73)
बहर-2122 1212 22/112
आज निकला जनाब से पानी
मिल गया फिर शराब से पानी
सबको जल्दी है जानने की ये
क्या मिला माहताब से पानी
डूबता हूँ वफ़ा मुहब्बत में
पी लिया है शबाब से पानी
दर्द सहने की है अदा अपनी
सूख चुका है कबाब से पानी
काम करते यहाँ गरीबों का
रोज बहते खिज़ाब से पानी
मौज मिलता कहाँ जमाने में
सबके मन के हिसाब से पानी
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(74)
बहर-2122 1212 22
प्यार सच्चा अगर मिला होता
चाहतो में सदा फ़ना होता
साँसों में प्यार को बसा लेते
फिर कभी भी नही दगा होता
मुस्कुराकर गले लगाने को
दिल मेरा रोज ही जवां होता
है मुहब्बत सनम जो कह देते
उसके जैसे न दूसरा होता
प्यार के नाम से सनम का मैं
दर्द सारे भी सह लिया होता
मौज जो इश़्क में फँसे होते
दर्द तुमको सदा मिला होता
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(75)
बहर-2122 2122 2122 212
खेलकर ज़ज़्बात से वो यह सज़ा देता रहा
मर्ज़ जो था ही नहीं उसकी दवा देता रहा
मुश्किलों में भी कभी मैंने क़दम रोके नहीं
हौसला ही था मुझे जो रास्ता देता रहा
गम किसी के बाँट लूँ मैं सोचता तो हूँ मगर
फिर हँसी से ही सभी ग़म को मिटा देता रहा
कौन है समझा मुझे किसको दिखाऊँ दर्द मैं
दोस्त माना था जिसे वो ही दग़ा देता रहा
मौज छोड़ो फ़िक्र अब बिंदास ही रहना तुम्हे
ये ज़माना तो बुरा ही बस सिला देता रहा
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(76)
बहर-2122 2122 2122 212
इस तरह कुछ आज उसकी बेबसी कहने लगी
भूल कर अपने मरासिम अजनबी कहने लगी
*तज़रिबा हमको नहीं तो था बता जाते किधर*
*सब्र है इक रास्ता हमसे खुशी कहने लगी*
*फूल की हसरत नहीं इक बाग मुझको चाहिए*
और किस्मत है कि इसको दिल्लगी कहने लगी
चोट देना जख़्म देना है ज़माने की अदा
अश्क़ आखों में छुपाकर आशिक़ी कहने लगी
*मौज खूश रहना हमेशा अपने ही अंदाज में*
*दर्द सारे रोज सहना बेबसी कहने लगी*
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(77)
बहर-1222 1222 122
कभी मेरा ये दिल रोता नहीं है
देता ख़ुद को कभी धोखा नहीं है
ज़माना भी सताये गर कभी तो
ग़मों का बोझ दिल ढ़ोता नहीं है
चले आते हैं ख़ुशियों में सभी तो
मग़र दुख में कोई आता नहीं है
करो हर काम नेकी का जहां में
ख़ुदा के पास क्या जाना नहीं है
खरीदोगे कहाँ से प्यार देखो
कभी बाज़ार में मिलता नहीं है
किसे मानूँ यहाँ अपना पराया
यहाँ साथी कोई सच्चा नहीं है
रखो तुम मौज दिल में हौसला अब
मुसिबत में कभी डरना नहीं है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (79)
बहर-121 22 121 22
नवाब खुद को बता रहा था
मग़र नज़र को झुका रहा था
नज़र नज़र से मिला रहा था
कोई मेरा दिल चुरा रहा था
गरीब का हाल पूछ लेते
वो दर्द दिल के सुना रहा था
नशे की लत में जवान देखा
कदम कदम लड़खड़ा रहा था
रईंस को क्या फिकर जहां का
यहाँ वो महफ़िल सजा रहा था
ज़रा तो देखो किसान कैसे
वो जख़्म दिल के दिखा रहा था
अभी ये घर उजड़ा मौज फिर से
मैं आशियाना सजा रहा था
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़ी
गीतिका(80)
2122 2122 2122 212
रात का अंतिम पहर है नींद भी आती नहीं
क्यों सुबह सबके लिए खुशियाँ कभी लाती नहीं
चैन से सोते हुए होंगे यहाँ धनवान तो
उन गरीबों की यहाँ तो भूख मिट पाती नहीं
जागकर मजदूर हरदम काम करते रात दिन
साथ सेहत से थकावट फिर कभी जाती नहीं
है अँधेरा लग रहा डर हाय रामा क्या करूँ
चाँदनी छत पर कभी भी रात में छाती नहीं
सो गया सारा जमाना नींद के आगोश में
जागता है मौज कैसे नींद भी आती नहीं
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (81)
बहर-1212 1122 1212 22
हमारे ज़ह्न में अक्सर सवाल आता है
न जाने क्यूँ हमें तेरा ख़याल आता है
यूँ कितने ज़ख़्म मिले दर्द भी मिले पैहम
वफ़ा निभाने में अब तो मलाल आता है
हमारी कौम को कुचला गया है सदियों तक
तभी तो ख़ून में मेरे उबाल आता है
करूँ जहाँ में सभी काम हर वो नेकी का
कदम कदम में मेरे यूँ उछाल आता है
हुनर सिखा ही दिया मौज मुस्कुराने का
इसे दिखाने को करतब कमाल आता है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(82)
बहर-2122 1212 22/112
*बात करना नहीं अदालत की*
*ये तो शागिर्द है सियासत की*
*क़त्ल करके ग़रीब लड़की का*
*चाह रखते हैं ये ज़मानत की*
*नेकियाँ ही कमा'ओं अच्छा है*
*छोड़ दो राह तुम बगाबत की*
*हाल पूछे नहीं मेरा कोई*
*क्या कहूँ दोस्तों की फ़ितरत की*
*मुझको उम्मीद ही नहीं रहती*
*अब किसी शख़्स से शराफ़त की*
*चार सू 'मौज' कहर है फैला*
*ये निशानी ही है क़यामत की*
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(83)
बहर-221-2122-221-2122
तुमसे वफ़ा करूँगा पर तुम दगा न देना
दिल से मेरी मुहब्बत को यूँ मिटा न देना
बर्बाद ही जहाँ को करता सदा नशा है
बेकार में इसी पर दौलत लुटा न देना
मुश्किल में भी बढ़ाया है हौसला तो हमने
जो साथ है निभाया उसको भुला न देना
हिम्मत रखो जिगर में तूफ़ान के मुक़ाबिल
दिल में जले दिये को पल में बुझा न देना
अब मौज सोचना क्या बिंदास जी ख़ुशी से
दुनिया की बात ले के तुम दिल जला न देना
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(84)
बहर-2222 2222 2222 222
प्यास बुझेगी कब इस दिल की ये भ्रम में मर जाते हैं
हम तो यूँ दिलबर के लब की शबनम में मर जाते हैं
बाढ़ कभी सूखा या फिर पड़ जाते हैं ओले जब तब
ख़्वाब किसानों के अक्सर हर मौसम में मर जाते हैं
जख़्म दिये दुनिया वालों ने हरदम दर्द दिये दिल को
ठोकर खाकर मुफ़लिस अपनों के ग़म में मर जाते हैं
महफ़िल में जो रंग जमाते ख़ूब लुटाते दौलत को
साक़ी ओ साग़र को ही पी कर रम में मर जाते हैं
*मौज* ज़माना कितने ग़म दे ख़ुश तुमको रहना होगा
ग़म देने वाले तो अक्सर दमख़म में मर जाते हैं
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा
ग़ज़ल(85)
बहर-2122 2122 2122 212
है वफ़ा तुमसे सनम अब तो ज़फ़ा मुमकिन नहीं
अब हमारे बीच में हो फासला मुमकिन नहीं
लोग अब करने लगे हैं नफ़रतों की पैरवी
अब मुहब्बत का कोई भी रास्ता मुमकिन नहीं
मुफ़लिसों की जान की लगती सदा ही बोलियाँ
जाल में जो फँस गए फिर छूटना मुमकिन नहीं
चूसता जो ख़ून है हरदम गरीबों का यहाँ
कौन दे सकता उन्हे कोई सजा मुमकिन नहीं
मौज देखो तो शराफ़त आज किसके पास है
शख़्स अच्छों से सदा हो सामना मुमकिन नहीं
ग़ज़ल(86)
बहर-2122-1212-22/112
मेरी आँखो में जो नमी है अभी
उलझनों में ये ज़िंदगी है अभी
दूर तक ढूँढ़ता रहा हूँ मैं
बदनसीबी से गुम ख़ुशी है अभी
आरज़ू जिसकी है मेरे दिल को
बस उसी चीज़ की कमी है अभी
मैं तो भर भर के जाम पीता हूँ
फिर भी लगता है तिश्नगी है अभी
लाख तूफां चले ज़माने में
क्यों बुझेगी जो रौशनी है अभी
राह पर जो चले बग़ावत की
उनके दिल में भी दुश्मनी है अभी
लोग बदनाम यूँ ही करते हैं
मेरे दिल में तो सादगी है अभी
"मौज" तुम किस लिए परेशां हो
ज़िन्दगी में ख़ुशी बची है अभी
डी.पी.लहरे"मौज"
बायपास रोड़ कवर्धा
ग़ज़ल(87)
बहर-2122 1122 1122 22
इश्क़ की आग में जितना तू जला ले मुझको
है गुज़ारिश कि मग़र दिल से लगा ले मुझको
दूर से बात ही बस करने से क्या होता है
पास आ और कभी पास बिठा ले मुझको
एक दो घूँट से बेताबियाँ बढ़ जाती हैं
मयकदे में कभी साक़ी तू बुला ले मुझको
दिल है नाज़ुक ये सितम तेरे सहेगा कैसे
अपनी गुस्ताख निगाहों से बचा ले मुझको
मौज कर पाया नहीं काम कभी नेकी का
ऐ खुदा आज ही दुनिया से उठा ले मुझको
ग़ज़ल(88)
बहर-1212 1122 1212 22/112
तुम्हारा दिल भी सनम बेक़रार है कि नहीं
बता दो अब तो वफ़ा बेशुमार है कि नहीं
मेरे हबीब कहो मुझसे प्यार है कि नहीं
झुकी नज़र में सनम इंतज़ार है कि नहीं
न आज़माना कभी दोस्ती को तुम देखो
हमारी दोस्तों पर जां निसार है कि नहीं
कभी तो दिल में उतर देख हाल कैसा है
मेरी सूरत में हसीं वो निख़ार है कि नहीं
ग़रीब को ही सताते हैं लोग अक्सर कर
कभी तो पूछ उन्हे ख़ुशग़वार है कि नहीं
ज़मीन दिल में कभी मौज यूँ न पतझड़ हो
ज़रा सा देख तो लो पुरबहार है कि नहीं
ग़ज़ल(90)
बहर-122 122 122 122
हँसाकर रुलाना नई बात क्या है
सताये ज़माना नई बात क्या है
कभी दूर जाती कभी पास आती
करे वो बहाना नई बात क्या है
मुहब्ब्त की राहों में जब भी चलें हम
क़दम लड़खड़ाना नई बात क्या है
ग़रीबों को अक्सर डराते रहे सब
डरे को डराना नई बात क्या है
भरोसा के लायक कहाँ आदमी अब
उठाकर गिराना नई बात क्या है
करोगे कहाँ मौज उनसे शिक़ायत
यहाँ आज़माना नई बात क्या है
डी.पी.लहरे"मौज"
ग़ज़ल (91)
बहर-122 122 122 122
वचन दूर रहकर निभाने पड़े हैं
जुदाई में दिन यूँ बिताने पडे़ हैं
सबक ज़िंदगी का पढ़ाने को बच्चे
कई बार हमको रुलाने पड़े हैं
करूँ क्या भरोसा यहाँ कौन अपना
अभी लोग कुछ आज़माने पड़े हैं
बिना मेहनतों की मलाई जो खाते
सबक हमको उनको सिखाने पड़े हैं
अजी हाल मेरा किसे मैं सुनाऊँ
यहाँ दर्दे- दिल भी छुपाने पड़े हैं
ख़ुशी बाँटने को भी ऐ मौज देखो
कदम भी हमीं को बढ़ाने पड़े हैं
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
कवर्धा
ग़ज़ल(92)
बहर-2122 1122 1122 22
भूल जाना नहीं हमदम तू वफ़ा का रिश्ता
याद रखना है हमें अपनी अना का रिश्ता
जान कुर्बान रफ़ीकों पे मैं कर सकता हूँ
दोस्ती में नहीं होता है दग़ा का रिश्ता
जिंदगी वार दूँ माँ बाप के ही कदमों में
अपने माँ बाप से रखता हूँ ख़ुदा का रिश्ता
जिंदगी में न अँधेरा हो किसी के देखो
रौशनी दें उन्हें रखना है दिया का रिश्ता
मौज बीमार नहीं दिल तो तेरा होता है
है तबस्सुम से तेरे कोई दवा का रिश्ता
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(93)
बहर-2122 2122 2122 212
दोस्त दुश्मन आज मिलकर एक जैसे हो गये
जैसे दरिया और सागर एक जैसे हो गये
पास होकर भी तरसते प्यार पाने के लिए
प्यार के अब ढ़ाई अक्षर एक जैसे हो गये
सब मिला फिर भी खु़दा से माँगता क्यों आदमी
क्या फ़कीरा क्या सिकंदर एक जैसे हो गये
बेगुनाहों को सजा मिलती यहाँ पर देख लो
अब तो सबके ही मुकद्दर एक जैसे हो गये
मौज देखो तो कभी डरता नहीं है मौत से
ज़लज़ला या हो बवंडर एक जैसे हो गये
द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल (94)
बहर-22 22 22 22 22 2
प्यार किया तो खुलकर यार निभाना है
याद मगर रखना दुश्मन ये ज़माना है
दिल से सारी नफ़रत आज मिटाना है
बैर भुलाकर सबको गले लगाना है
जाकर मयख़ाने में जो घर भूल गया
समझो उसको दौलत ख़ूब उड़ाना है
बीच सड़क पर छेड़े भोली लड़की को
और समझता खुद को कायर मर्दाना है
मौज बड़ों की लेना आशीष सदा ही
एक यही तो बस रब का नज़राना है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(95)
बहर-1222 1222 1222 1222
वतन के नाम पे मुझको ये गद्दारी नहीं आती
कभी ईमान क्यों बदलूँ के मक्कारी नहीं आती
बिगड़ते हैं यहाँ बच्चे नशे की ज़द में ही आकर
उड़ाते हैं कमाई क्यों समझदारी नहीं आती
सियासत में मचाते हैं बवंड़र आजकल चमचे
वतन के वास्ते दिल में वफ़ादारी नहीं आती
यहाँ अंजान बैठे थे कसम से कुछ नहीं मालुम
कोई आग़ाह कर देते तो बीमारी नहीं आती
यहाँ मतलब की दुनिया है यकीं फिर मौज कैसे हो
मग़र मुश्किल में कोई भी अय्यारी नहीं आती
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़
ग़ज़ल(96)
बहर-2122 1122 1122 22
दूर रहकर भी कभी दिल से पुकारा होता
हमने हर तौर दिया तुमको सहारा होता
क्यों जलाते यहाँ हर शाम चराग़ों को हम
या ख़ुदा चाँद जमीं पर जो उतारा होता
शामे-फ़ुरकत न अकेला ही तड़पता जानम
तूने इक बार किया मुझको इशारा होता
ग़म किसी को कभी मिलता नही तो अच्छा था
ख़ूबसूरत ख़ुशी का रोज नज़ारा होता
मौज हाथों की लकीरों को दिखाओगे क्या
अपनी तक़दीर को मेहनत से सँवारा होता
ग़ज़ल(97)
बहर-2122 2122 2122 212
हर जगह वहशी दरिंदा आजकल मौजूद है
देख लो अपने वतन में ख़ूब छल मौजूद है
सब सियासत में लगे हैं न्याय करना छोड़ कर
देश में चारो तरफ़ तो बस ख़लल मौजूद है
अब गुनहगारों को देखो तो सजा मिलती नहीं
बच निकलता है सदा दौलत के बल मौजूद है
बस सुलगता ज़ख़्म दिल के दर्द यूँ बढ़ता रहा
मैं हँसू कैसे यहाँ ग़मग़ीन पल मौजूद है
जब जियादा ग़म सताए तो ये करना काम तुम
मौज़ ग़ज़लें गुनगुनाना ये पहल मौजूद है ।
ग़ज़ल(98)
बहर-2122 2122 212
रोज कैसे रंग बदला आदमी
देख नज़रो से है गिरता आदमी
खो रहा पल पल यहाँ ईमान है
हो गया है आज पगला आदमी
चाहता है सल्तनत हो हाथ में
देखता है रोज सपना आदमी
क़त्ल करता लूटकर इज़्ज़त यहाँ
बन गया देखो दरिंदा आदमी
ऐसे लोगों से सदा बचके रहो
जानवर से भी जो ख़तरा आदमी
अंधा कहता है सदा कानून को
ख़ुद नहीं कुछ देख पाता आदमी
ग़ज़ल(99)
बहर-2122 2122 212
हर जगह देखो दरिंदा आजकल
कौन बेटी का फरिश्ता आजकल
देख लो हरदम सियासत में यहाँ
बोलता है ख़ूब चमचा आजकल
जो दिलासा दे रहा हर बात पर
उठ चुका उनसे भरोसा आजकल
है नहीं महफ़ूज अब तो बेटियाँ
कौन है इनका सहारा आजकल
आदमी का खो गया ईमान है
मौज बदला है ज़माना आजकल
ग़ज़ल(100)
बहर-1212 1122 1212 22/112
तुम्हारा दिल भी सनम बेक़रार है कि नहीं
बता दो अब तो वफ़ा बेशुमार है कि नहीं
मेरे हबीब कहो मुझसे प्यार है कि नही
झुकी नज़र में सनम इंतज़ार है कि नहीं
न आज़माना कभी दोस्ती को अब ऐसे
हमारी दोस्तों पर जां निसार है कि नहीं
कभी तो दिल में उतर देख हाल कैसा है
मेरी सूरत में हसीं वो निख़ार है कि नहीं
ग़रीब को ही सताते हैं लोग अक्सर ही
कभी तो पूछ उन्हे ख़ुशग़वार है कि नहीं
ज़मीन दिल में कभी मौज हो न पतझड़ ही
ज़रा सा देख लो तो पुरबहार है कि नहीं
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