ताटंक छंद गीत

ताटंक छन्द गीत..

याद तुम्हारी मन-उपवन में,
तितली-सी मँडराती है।
दूर चली जाती जब मुझसे,
ये धड़कन थम जाती है।।

साज बनाकर अपने दिल को,
प्रेम गीत मैं गाता हूँ।
डूब डूब कर प्रेम राग में,
निज अंतर हर्षाता हूँ।।

रातें कटती जाग-जागकर,
नींद नहीं अब आती है।
याद तुम्हारी मन-उपवन में,
तितली सी-मँडराती है।।(१)

आलिंगन को तड़प रहा हूँ,
आ जाते तुम बाहों में 
देख रहा हूँ नैन गड़ाये,
खड़ा खड़ा मैं राहों में।।

सुलझाती थी पहले उलझन,
अब दिल को उलझाती है।
याद तुम्हारी मन उपवन में,
तितली सी मँडराती है।।(२)

चैन नहीं है मेरे दिल को,
घुट घुट के मैं जीता हूँ।
बिना तुम्हारे मेरे दिलबर,
ग़म के आँसू पीता हूँ।।

विरह मुझे पागल कर देता,
याद बहुत तड़पाती है।
याद तुम्हारी मन-उपवन में,
तितली सी-मँडराती है।।(३)

डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा छत्तीसगढ़

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