ग़ज़ल
ग़ज़ल
212 212 212 2
जख़्म में ताज़गी हो गई है
दर्द से आशिक़ी हो गई है
साँस चलती है उसके ही दम से
*वो मेरी ज़िंदगी हो गई है*
वाह कहने लगे लोग पढ़कर
क्या हसीं शायरी हो गई है
मेरे अरमानों की इक चिता से
हर तरफ़ रोशनी हो गई है
ग़म ख़ुशी *मौज*हम किससे बाँटें
सूनी हर इक गली हो गई है
डी.पी.लहरे"मौज"
कवर्धा
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