ग़ज़ल

ग़ज़ल
व़ज़्न-1222-1222-1222

व़तन पे हो फ़िदा बंदा नहीं मिलता
बहादुर अब कोई अच्छा नहीं मिलता

बहुत देखा वफ़ा करके ज़माने में
मुहब्बत में वफ़ा सच्चा नहीं मिलता

ज़माने में लगी है भीड़ अपनों की
मग़र माँ बाप सा रिश्ता नहीं मिलता

यहाँ कीमत मुहब्बत का समझ जाओ
दुकानों में कभी पक्का नहीं मिलता

गमों को जो मिटादे वो कभी दिलबर
जहां में द्वारिका अपना नहीं मिलता

डी.पी.लहरे
कवर्धा छत्तीसगढ़

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