दोहा सामाजिक समस्या
दोहा ..
शीर्षक--समाजिक समस्या..
(अँधविश्वास)
नइ होवय जी टोनही,नइ हे भूत परेत।
ये सब अँधविश्वास हे,मन ला राखव सेत।।1
झाड़ फूँक के नाँव मा,बइगा पैसा खाय।
ठग मन ठगथें पेट बर,लोगन ला भरमाय।।2
पढ़े लिखे मनखे घलो,बइगा तीर ठगाय।
कभू कुछू के रोग मा,डाक्टर तीर न जाय।।3
(दाईज)दहेज़
लेवव झन दाईज ला,मन ले देवव टार।
बेटी के सम्मान बर,हावय ये बेकार।।1
झन देहू दाईज गा,घर ला देथे टोर
छोड़व अइसन रीत ला,राखव रिश्ता जोर।।2
दूनों कुल के शान जी,बेटी हे अनमोल।
बेटी लक्ष्मी जान ले,पैसा मा झन तोल।।3
(जनसंख्या)
जादा लइका राख झन,होय जीव के काल।
लइका बढ़िया दू झने,हँसी खुशी ले पाल।।1
बढ़थे जब परिवार ता,होथे बड़ जंजाल।
बेटी-बेटा भेद मा,होथे बारा हाल।।2
नोनी-बाबू एक हे,देवव मया दुलार।
बेटी बेटा जान लौ,दूनों तारनहार।।3
(छुवा छूत)
मनखे मनखे एक हें,एक्के मनखे जात।
सदा रहय सदभाव जी,टारव फोकट बात।।1
जम्मो मनखे के लहू,जानौ होथे लाल।
छुवा छूत के राग मा,नहीं बजावौ गाल।।2
जात-धरम के फेर मा,बढ़गे अत्याचार।
भाई-भाई आज तो,धरे खड़े तलवार।।3
(नशा)
बगरत हावय गाँव मा,नशा-पान के आग।
बरगे घर-घर देख लौ,फूटत हावय भाग।।1
लइका घलो जवान मा,बाढ़त हावय रोग।
धन दौलत बरबाद हे,हावँय दुख ला भोग।।2
छोड़व भइया आज ले,नशा नाश के द्वार।
खुशी खुशी जिनगी रहे,साजव घर-परवार।।3
रचना
डी.पी.लहरे
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