चंदा सार छन्द गीत श्रृंगार
*सार छन्द गीत*
*श्रृंगार चंदा*
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये।
चटक मटक हे रेंगना जोही,कनिहा ला लचकाये।।1
उलहा पाना जइसन जोही,मन ला तँय डोलाये....
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये....
कोयल जइसन गुरतुर बोली,मन ला अब्बड़ भाये।
कारी नागिन चूंदी तोरे,कनिहा ले लहराये।।2
कनिहा करधन सोहत हावे,नैना बान चलाये....
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये....
माथा मा ओ टिकली सोहे, लाली होठ लगाये।
आँखी तोरे हिरनी जइसन,काजर बने अँजाये।।3
कोन गढ़े हे तोला रानी,अंतस ला भरमाये....
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये....
तोर गोड़ के पइरी गोरी,छम छम गीत सुनाये।
हाथ बाँह मा कँगना चूरी,खनखन ओ खनकाये ।।4
चमकत हावय कंचन काया,माया जाल फँसाये....
रूप गजब हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये....
तोर हँसी मा फूल झरे ओ,महर महर महमाये।
होठ तोर ओ मधुरस लागय,रस धारा बरसाये।।5
नाक कान के बाली नथनी,अब्बड़ ओ चमकये....
गजब रूप हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये....
हवय गुलाबी लुगरा तोरे,अँचरा तँय लहराये।
मुड़ ला उघरा करके रेंगे,नखरा ओ देखाये।।6
जादू मंतर मारे गोरी,काबर ओ तरसाये....
गजब रूप हे गोरी तोरे,चंदा घलो लजाये....
शब्द रचना
डी.पी.लहरे
बायपास रोड कवर्धा
दिनाँक-11-01-19
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