श्रृंगार- रूप घनाक्षरी

रूप नगर के रानी,मँय गँवईं के राजा।
धर के गँड़वा बाजा,ले जाहूँ घर मा मोरll

मया के दीया बार के,खड़े हवच दुवारी,
बनजा मोर सुवारी,रूप मोहनी हे तोरll

रूप के जादू मंतर,मार के रे निरमोही,
बनके मयारू जोही,तँय ले ले मोरो सोरll

रूप बसे हिरदे मा,आँखी मा चेहरा झूले,
मन मा फुलवा फूले,बँधागे मया के डोरll

रचनाकार
डी.पी.लहरे
बायपास रोड कवर्धा
दिनाँक 16-11-18

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