राम शबरी
उल्लाला छंद
सीता जी के खोज मा,निकले
राहय राम जी।
मिलगे शबरी राह मा,पा गे शबरी नाम जी।।1
सादर चरण पखार के,शबरी शीश नवाय जी।
राम लखन ला पाइ के,जीवन सुफल बनाय जी।।2
शबरी नामक भीलनी,जूठा बेर खवाय जी।
राम मया के भाव ले,बने पेट भर खाय जी।।3
चीख चीख के राम ला,सबरी देवय बेर जी।
देख मया ला जान ले,हवय मया के ढ़ेर जी।।4
लखन देख मुसकात हे,जूठा बेर ल पाय जी।
हाथ उठा के फेंक दै,राम बेर ला खाय जी।।5
भाव भरे हे प्रेम के, बिगड़े बनाय काम जी।
काशी काबा राम हा,एही चारो धाम जी।।6
रचना डी.पी.लहरे
भोरमदेव साहित्यिक सृजन मंच कबीरधाम छत्तीसगढ़
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