बरवै छन्द

शीर्षक (गाँव)

सुग्घर लागत हावय,हमरो गाँव।
बर पीपर के ठंडा,पावन छाँव।।

नदिया नरवा बोहत,हावय धार।
हरियर हरियर दिखथे,खेती खार।।

कोयल कुहके कउँवा,करथे काँव।
सुत उठ सब धरती के,परथें पाँव।।

करथें सबो किसानी,पाथें धान।
मारय नइ जी कोनो,शेखी शान।।

महिनत के बदला मा,पाथें दाम।
जुरमिल जम्मो करथें,बढ़िया काम।।

संझा बेरा मनखे,सब सकलाय।
गुरतुर गुरतुर बोली,मन ला भाय।।

मिलके रहिथें भइया,सब परिवार।
आपस मा करथें जी,मया अपार।।

सब ले बड़ के हावय,गाँव हमार।
दया मया के हावय,जी भरमार।

कतका करँव ग भइया,मया बखान।
गाँव सरग जस लागय,सुख के खान।।

शब्द रचना
डी.पी.लहरे
बायपास रोड़ कवर्धा

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