चौपई छन्द
चौपई छन्द
सुनव सखी रे मन के बात।
रोवत रहिथँव दिन अउ रात।
मिलही कब जोही के साथ।
नवाँतेंव मँय अपने माथ।।
कुलकत रहिथँव अपने आप।
मिटय नइ मोर मन के ताप।
बसे हवय आँखी मा प्यार।
जोही आवय घर संसार।।
सुन रे सखी बतावँव आज।
मोर धनी बर करथँव साज।
जाहूँ मँय सजना के द्वार।
पाहूँ मँय हा मया अपार।।
बिनती करथँव मँय कर जोर।
भरही झोली अब तो मोर।
जागत हावय मोरो भाग।
गाहूँ दया मया के राग।।
रचना डी.पी.लहरे
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