बचपन

कभी संभल के चलते,
कभी गिर जाया करते थे।
कभी रोते हँसते रहते,
कभी गीत गाया करते थे।।

भागम-भाग नहीं था,
निश्चिंत जिया करते थे।
कोई चिंता फिकर नहीं थी,
हम खूब मजा करते थे।।

कभी मम्मी पापा मिलकर,
हमें डाँट दिया करते थे।
कभी उधम मचाते गिरते,
तो हाथ दिया करते थे।।

बचपन की नादानी में,
शैतानी किया करते थे।
दादी-दादा नानी-नाना,
सयानी किया करते थे।।

अठन्नी चवन्नी रुपिया,
हम माँग लिया करते थे
मुट्ठी में सिक्का हम तो,
जी बाँध लिया करते थे।।

मिल कर घर में रहते,
हर काम किया करते थे।
कभी गली मोहल्ले जाके,
परेशान किया करते थे।।

कभी सैर सपाटे करते,
रोज खेल लिया करते थे।
फिर घर में पड़ते चाँटें,
हम झेल लिया करते थे।।

कभी नदी तालाब में जाते,
हम मस्ती में खूब नहाते।
दोस्तों से कभी झगड़ा,
कभी प्यार दिया करते थे।।

क्या लिखूँ बचपन की बातें,
क्या क्या किया करते थे।
बचपन में भी हम तो,
जवानी में जिया करते थे।

बस याद रह गई बचपन,
अब याद किया करते है।
आ जाये फिर से बचपन,
फरियाद किया करते हैं।।

शब्द रचना
डी.पी.लहरे

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