अभिलाषा
शीर्षक-अभिलाषा
मेरे मन की है अभिलाषा,
दीन दुखियों का मान करूँ।
दुनिया चाहे कहे तमासा,
सब का मैं सम्मान करूँ।।
जीवन में ना आए निराशा,
गुरु का मैं गुणगान करूँ।
मन में सदा जगा के आशा,
मात पिता का बखान करूँ।।
पलट जाए जीवन का पाशा,
कभी ना मैं अभिमान करूँ।
आए ना मन में हताशा,
किसी को ना परेशान करूँ।।
मेरे मन की है अभिलाषा,
जीवन भर सत काम करूँ।
खुशी का सबको दूँ दिलासा,
दुनिया में गुरु का नाम करूँ।।
रचनाकार
द्वारिका प्रसाद लहरे
कबीरधाम छत्तीसगढ़
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