राखी

रक्छा करहूँ बहिनी तोर,
हवय मया अउ दुलार।
राखी के मँय बचन निभाहूँ,
राखी हे मया के चिन्हार।।

मगन होय बहिनी आये,
अपन भइया के दुवार।
पइसा रुपिया मांगे नहीं
बस मांगे भइया के पियार।।

सुख बरोबर सावन के पुन्नी,
आगे राखी के तिहार।
भाई बहिनी के मीठ मया,
सदा भरे राहय संस्कार।।

मया के थारी सजाये बहिनी,
हमर मया हवय अपार।
मोर हाथ म पहिराये राखी,
मया डोरी मा बांधे संसार।।

रचनाकार डी.पी.लहरे
कवर्धा छत्तीसगढ़

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