बियोग श्रृंगार
परछी मा बइठे हँव,
सुरता लमाए तोर।
कब होही भेंट जोही
पता मिलय ना शोर।।
देख ले मन के पीरा,
आँखी ला आँसू बरसे।
तोला देखे बर मोहना,
हाय रे मोर नैना तरसे।।
नींद नइ आवय मोला,
सुध मोला आथे तोर।
आँखी ला मुंदथँव ता,
चेहरा झूल जाथे तोर।।
तोर बिना रे मयारू,
जग अँधियार लागे।
कब आबे धनी तँय,
मन मोर उजार लागे।।
करे हँव सिंगार मँय,
साथी तोर नाँव के।
कलपत हँव घेरी बेरी,
दे दे धुर्रा पाँव के।।
गुनत रहिथँव तोला,
सुरता मा डारे तँय।
जाके परदेसी होगे
मन ला मोर मारे तँय।।
अब तो आजा संगी,
चोला मोर घुरत हे।
तोर से मिले बर जोड़ी,
तन हा मोर चुरत हे।।
रचना -डी.पी.लहरे
सर्वाधिकार सुरक्षित है
dplahre87@gmail.com
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