सुरता

मीठ मीठ तोर बोली,
मन मा मोर समाए।
दुरिहा जा के मयारू,
काबर मोला भूलाए।।

कजरेली ओ तोर नैना,
दिल मा बान चलाए।
झुलत रहिथे तोर चेहरा
दिरदे मा आगी लगाए।।

सुरता मा दिन रात जोही,
आँखी ला आँसु बोहाए।
काबर होगे निरमोही संगी
तोर सुरता मोला सताए।।

हाथ के चूरी कँगना तोर,
हमर मया के गीत गाए।
मीठ मा महुरा झन घोर,
तोर सुरता रही रही आए।।

अइसन मा नइ बाँचे जिंवरा
काबर बईहा मोला बनाए।
गाँव शहर मा खोजत रथँव
का मया के मोहनी खवाए।।

धधकत रहिथे छतिया मोर
तोला देखे बर आश लगाए।
कोन परदेस मा चल दे तँय
कोन बन मा जोही लुकाए।।

रचनाकार डी.पी.लहरे
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