बिरहा..


तोर बिना रे संगवारी,
मँय कइसे दिन ल पहाहूँ।
छोड़ के मोला झन तँय जाबे,
नइते सुरर सुरर मर जाहूँ।।

बिरहा म मन मोर मुरझाही,
मोर तन म घुना समा जाही।
उवत बुड़त तोर सुरता आही
मोर नैना ले आँसु बोहाही।।

तोर बिना रे संगवारी,
मोर दिल ल कइसे जुड़ाहूँ।
छोड़ के मोला झन तँय जाबे,
मँय जीते जीयत मर जाहूँ।।

राखहूँ तोला रानी बनाके,
हिरदे म तोला बसाहूँ।
सिरतोन मोला झन भुलाबे,
मँय तोर संग बिहाव रचाहूँ।।

तोर बिना रे मोर मयारू,
मँय जिनगी कइसे चलाहूँ।
छोड़ के मोला कभु झन जाबे,
नइते रो रो मँय मर जाहूँ।।

स्वरचित-
डी.पी.लहरे
सर्वाधिकार सुरक्षित है
Dplahre86@gmail.com

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