बिसवास..
बिसवाँस
चल मुसकुराबो,
बनेच खिलखिलाबो।
जिंनगी के का हे बिसवास..
हँस के मजा उड़ाबो ।।
चार दिन के जिंनगी तहाँ ले
अँधियारी रात।
जिंनगी के का हे बिसवास..
चल मेछराबो,
बनेच फुदराबो।
जिंनगी के का हे बिसवास..
हँसत जिंनगी पहाबो
मिलजुर के रहिबो जम्मो
संगवारी साथ..
ये जिंनगी के का हे बिसवास..
चल गोठियाबो,
बनेच बतियाबो,
जिंनगी के का हे बिसवास...
हकन के खाबो।।
ठलहा नइ राहन काम बुता म
हमु बढ़ाबो हाथ।
ये जिंनगी के का हे बिसवास..
चल हँसाबो,
बनेच गुदगुदाबो।
जिंनगी के का हे बिसवास..
दुख पीरा बिसराबो।
स्वरचित-
डी पी लहरे
सर्वाधिकार सुरक्षित है
Dplahre87@gmail.com
Comments