जरत हे दिन..
जरत हे दिन...
सूरूज ह आगी असन बरय,
अउ जरत हे दिन..।
तात हावा म देंह भुँजागे,
सुते म परे नहीं निंद..।।
तरबतर चूचवावत पछीना,
पुरवईया लुकागे..।
पियास के मारे परानी भटके,
मुँह घलो सुखागे..।।
रद्दा रेंगईया सुरताये बर,
खोजय रूख के छँईहा..।
खोजे म घलो मिलय नहीं,
कटागे कतको अमरईया..।।
घर ल निकले त भोंभरा जरय,
तिपे तिपे हावा चलय..।
गर्रा सँग सँग धुर्रा उड़य,
डारा पाना सँग फुलवा झरय..।।
असकटावत दिन बीते,
चटपटावत रात..।
मनमाड़े मँगसा चाबय,
कब आही बरसात..।।
तरिया नदियाँ जम्मो अँटागे,
अब कइसे बाँचहीं परानी..l
जीव अकबकागे गरमी के मारे,
सुन रे बादर, अब तो बरसा पानी..ll
लिखईया-डी पी लहरे
सर्वाधिकार सुरक्षित Dplahre86@gmail.com
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