बर्षा...

बादर गरजय, पानी बरसय,
संगी मिले बर जीवरा तरसय।।

चमकत बिजली,जुड़ पुरवईया,
आगे किसानी के दिन रे भईया।।

हरियर हरियर डोली धनहा।
होके मतौना नाचे मन हा।।

झिमिर झामर चारो डहर,
गिरय ये पानी आठो पहर ।।

चिखला माते किचिर काचर,
टुरी संवरेंगी के कनिहा पातर ।।

धर के नाँगर बईला अउ तुतारी,
नँगरिहा संग रेंगय ओखर सुवारी।।

तरिया बाँधा,नरवा डबडबागे,
रूख-राई सब बन हरियागे ।।

बरसात के महिना बड़ निक लागे,
जम्मो परानी,धरती के भाग जागे।।

रचना-डी पी लहरे
Dplahre87@gmail.com

Comments

This comment has been removed by a blog administrator.
DP LAHRE"MAUJ" said…
Thank you very much dear dusyant.

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