धरती की पुकार..
धरती की पुकार ..
आज धरती ने पूछा आसमान से..
तु क्यों बरसता नहीं इत्मीनान से..
झूमों रे घटा छाओ रे बादल..
तरबतर हो धरा का आँचल..
हाल तो पूछो तरसते किसान से..
तु क्यो बरसता नहीं इत्मीनान से..
भर जाए खेतों में ठंड़ा ठंड़ा पानी..
पाँव तेरे छूने दे अब तो बरखा रानी..
कली,लता मुरझाए दिखे बेजान से..
तु क्यों बरसता नहीं इत्मीनान से..
तेरे बरसने से हर्षित जिन्दगानी..
जवाँ मौसम ठंड़ी फ़िजा की रवानी..
सौंधी महक उठे खेत खलिहान से..
तु क्यों बरसता नहीं इत्मीनान से..
जुल्म न कर अब छोड़ बेवफाई ..
हर बार तुमने ही तो प्यास बुझाई..
प्यास का दर्द अब पूछ रेगिस्तान से..
तु क्यों बरसता नहीं इत्मीनान से..
-शब्द रचना -
डी पी लहरे (कवर्धा)
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Dplahre87@gmail.com
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