श्रृंगार रस

आ रे धनी मोर..
तोरेच खातिर करत हँव सिंगार।
आ रे जोही मोर..
तहीं मोर जीव के अधार ll

कजरा लगायेंव सुग्घर
माहुर मँय लगायेंव
कान म बाली होंठ म
लाली मँय सजायेंव,
मोर जोड़ीदार ...
तहीं मोर जीव के अधार...
आ तोरेच खातिर करत हँव सिंगार ll

गजरा लगायेंव मुड़ म,
बेनी मँय गँथायेंव।
पाँव म पैंरी हाथ,
म चूरी खनकायेंव।
मोर तारनहार...
तहीं मोर जीव के अधार ...
आ तोरेच खातिर करत हँव सिंगार ll

टिकली लगायेंव माथ म,
तन ल सजायेंव।
कनिहाँ म करधन ,गर म
हार चढ़ायेंव,
मोर मया दुलार...
सज धज के होगेंव तइयार...
तोरेच खातिर करत हँव सिंगार ll

तहीं मोर जीव के अधार ...
आ रे हिरा मोर..
तोरेच खातिर करे हँव सिंगार ll

शब्द संयोजन-डी पी लहरे
सर्वाधिकार सुरक्षित है
Dplahre87@gmail.com

Comments

Bahut hi sundar kavita guRudev
DP LAHRE"MAUJ" said…
बहुत-बहुत धन्यवाद दुष्यंत

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