गज़ल

गज़ल

यूँ फ़ासले न बढ़ा जान~ए~वफा
जरा मुलाकात तो कर।।

मेरे अख़्तियार है तु जान~ए~मन
जरा अल्फ़ाज़ तो कर।।

अस्म नहीं हूँ सुनता हूँ दिल से
दिल तक ज़रा रियाद तो कर।।

बाग़बाग है दिल मेरा हमसफ़र
क़रीब आने की आगाज तो कर।।

ख़बात हद से जादा है हमऩशी
उन दिनों की ख़यालात तो कर।।

रूशवा हूँ तन्हा हूँ बिना तुम्हारे
ज़रा हाज़िर जवाब तो कर।।

इनायत होगी रहमों-करम पर
मोहब्बत मुझे बेहिसाब तो कर।।

न मार मेरी आरज़ू ऐ जाँपनाह
दो दिलों को जरा आबाद तो कर।।

शब्द रचना डी पी लहरे
सर्वाधिकार सुरक्षित है
अख़्तियार=पसंद
अस्म=बहरा
फरियाद =पुकार
बाग़बाग=अत्यधिक प्रसंन्न
आगाज़ =शुरूवात
ख़बात=दीवानगी
जाँपनाह=प्राणों की रक्षक

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