गज़ल
गज़ल
अहमियत समझ मेरे ऐतबार का
घड़ी घड़ी न पूछ गम रोज़गार का
जिन्दगी में रह रह कर तन्हाई है
क्या मज़ा लें अब इंतज़ार का
कड़ी कड़ी में ये दिल तड़पता है
हाल बयाँ करूँ दिल ये बीमार का
वो क़हक़हे बहुत याद आते हैं
नज़र में दिखता सुरत यार का
हँसी चेहरा भुलाये नहीं भूलता
दिल में बसा है तिल रूख़शार का
दिल की लगी है और दिल्लगी है
जख़्म नहीं तीर नज़र क़टार का
जज़्बा ए दिल में गम है ख़ुशी है
अज़ब मज़ा है इश्क़ ए ख़ुमार का
आबाद है दिल-जिगर फ़ुरसत से
आग़ाह कर रहा है इश्क़ बहार का
शब्द रचना डी पी लहरे
सर्वाधिकार सुरक्षित है
Dplahre86@gmail.com
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