संगवारी

संगवारी

संगी संगवारी के गुरतुर हे गोठ
मया हे हिरदे म नई ये कोनो खोंट

मिलथे मुस्काथे त अंतस जुडाथे
दु भाखा मया के बोल गुठियाथे।।

दुरिहा म संगी के सुरता सताथे
घेरी बेरी मिले के आश जगाथे।।

दया मया के अब्बड हे मितानी
हॅस के जीथन हमर येही चिन्हारी।

खेले हन संग म माटी अउ धूर्रा
खाये हन संग म चना अउ मुर्रा।।

छुटय नही कभु हमर मया के गांठ
संगे संग पढे हवन परेम के पाठ।।

सुख-दुख म संगे जिंनगी पहाबो
मया के फूल दुनो मिल के चढाबो

परेम के दीया जुगजुग ले बरही
हवा गर्रा आही तबो बरते रईही।।

मन मोर मगन होगे संगी आज
अईसन संगी के हवे मोला नाज।

छूटय नही कभू संगी के साथ
चाहे दुरिहा राहय नी होवव उदास

रचनाकार डी पी लहरे कबीरधाम छत्तीसगढ़

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