दाई ददा

दाई ददा

अंचरा म लुकाके दाई मोला गोरस पियाये
हाथ धर के ठूमूक ठूमूक रेगे ल सिखाये

तोर कोरा हे सरग बरोबर सुख के छईंहा पायेंव
नान्हे ले बडे करईया महतारी के गुन ल गायेंव।।

गुरतुर हे महतारी भाखा सुन के जिनगी चलायेंव
मया दुलार के सगरी पाके मैं ह लाल कहायेंव।।

दाई ददा के गोड के धूर्रा मात म मैं लगायेंव
दाई ददा मोर देवी देवता जनम इंखर ले पायेंव।।

दाई ददा के सेवा म मोर जिनगानी  अरपन हे
तिरथ धाम ले बढके दाई ददा के दरशन हे।।

जनम देवईया महतारी अउ पालन करईया ददा हे
सेवा कईया बेटा हे त सरग ले बढके मजा हे।।

रचनाकार डी पी लहरे

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