नशा
नशा
नान नान टूरा मन
अब्बड नशा करत हें
गांजा दारू बिडी
गुटका मुंह म भरत हें। ।
कोनों खाथे माखुर कोनो
गुडाखुर करत हें
चोंगी चिलम बिड़ी
पिके बिमार परत हें।।
दउडे दउडे जाथें भठ्ठी
जसने बेरा ढरत हे
होत बिहनिया घलो
नशा के दरश करत हें। ।
अंगरेजी देशी मउहा के
पीये ले करेजा बरत हे
घर परवार दाई ददा के
चोला घलो जरत हे।।
छूट जाथे घर परवार
नशा ह नाश करत हे
नशा पानी के चक्कर मा
घर के बाई ल छरत हें। ।
बने नोहय नशा ह येमा
तन अउ मन ह घुरत हे
हिरा बरोबर काया हर
नशा बैरी म चुरत हे।।
छोडव ये नशा परेत ल
मार भगावव मन से जी
बिमार परे ल बाॅच जाहू
बचत होही धन के जी।।
रचनाकार -डी पी लहरे बाय पास रोड कवर्धा
मोबाइल 7898690867
व्याख्याता पंचायत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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