श्रृंगार रस

वियोग श्रृंगार

बहुत दिन काटे तुम्हारे इंतज़ार में
खो गये थे कहाँ दुनियाँ के बाजार में।।

तडपते थे सच यादों की बुखार में
बेसुध था मैं तेरी खबर ढूंढता अखबार में ।।

तन्हा करके न काटो अपने दिल के कटार में
गम की बादल न बरसाना मेरे ऐतबार में। ।

रूत आये रूत जाये तेरे तलबगार में
तुझे गुनगुनाता हूँ दिल की गिटार में। ।

गमगीन हो चला साहिब तेरे प्यार में
रोजा रखें क्या मोहब्बत के त्योहार में। ।

दिल लुटा राहत नहीं हमसा नहीं हजार में
तुम ही हो शान-ओ-शौक मेरे गुलज़ार में। ।

नजर आती है एक तिल तुम्हारे रूख़शार में
न छोड़ना हमें मोहब्बत के मझधार में। ।

आशिक हूँ रूशवाई न दे खुशियों के भंडार में
वफा की राजकुमारी मैं खडा तेरे दरबार में। ।

रचनाकार--डी पी लहरे

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