कविता

चितवन

जी नहीं भरता बस देखता रहूँ
इन ऑखो को
कयामत है या करिश्मा कहूँ
ईन साॅसों को।।

नयन प्रेम के राग सुनाते काजल काली काली
नयन कयामत ढाते सुन ओ गोरी पलको वाली ।।

पलक न झपकूं बस देखता रहूँ जन्नत ये निराली
चाॅद चाॅदनी से खूबसूरत कहूँ
ये मलिका हुस्न वाली।।

चंचल उज्वल ऑख का पुतली दूर तलक घूम आती है
ये चितवन नूर अप्सरा खाब बहुत दिखती है।।

घने जुल्फों के साये में  दिन रात गुजारू
काले काजल से मैं तेरी नजर उतारूँ। ।

जंचती बहुत है माथे पे काजल वाली बिन्दिया
लाल मधुर दो लब है उसमे मीठी वाली बतियां। ।

हाय मतवारी गाल गुलाबी,है उसमे भी तिल
भा गया मेरे धडकन को लुट
गया मेरा दिल।।

रेशम सा लट है बिखरे  चेहरा
छुप छुप जाता
बडी मोहक ये सुरत भी दिल
खींच खींच जाता। ।

रचना-डी.पी.लहरे
कबीरधाम छत्तीसगढ़

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