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ग़ज़ल भाग 6

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ग़ज़ल6 ग़ज़ल(1) वज़्न-221 2121  1221  212 हासिल जहां में कुछ नहीं अच्छा किए बगैर रुकना  नहीं  है  ख़्वाब  को  पूरा किए  बगैर वो तो पहुँच गया है सियासत में आजकल कैसे  रहेगा  देश  से  धोखा  किए  बगैर शर्मिंदगी  नहीं  हैं  उन्हे  कम  लिबास  में जो  लड़कियाँ  हैं  घूमती  पर्दा किए  बगैर ख़ुदग़र्ज दिलरुबा मिली तो है ही लाज़मी जायेगी कैसे बेवफ़ा रुसवा किए बगैर अच्छी तो चल रही है दुआओं से ज़िन्दगी जीना है अपनी सोच को नीचा किए बगैर ऐ मौज यूँ सलाह सभी चाहने लगे हो जायें मालामाल वो धंधा किए बगैर द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज" ग़ज़ल (2) वज़्न- 22 22 22 22 22 2 जब तुम पहली बार मिली थी बचपन में तब  से तुम  ही तुम  हो मेरे जीवन में हमको अच्छा  लगता  है  डूबे  रहना अब तो इश्क मुहब्बत के पागलपन में देख नहीं पायेगा कोई तब हमको जब हम आँखें चार करेंगे मधुबन में रौशन  है  जीवन  मेरा  तुमसे ही तो चाँद उतर आया है दिल के आँगन ...

ग़ज़ल भाग-5

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ग़ज़ल(1) वज़्न- 212 212 212 2 आशियां मत किसी का जलाओ जुगनुओं  सा  मगर  जगमगाओ ऐ  ख़ुदा  इस  वबा  को भगाओ जान  सबकी  जहां  में  बचाओ फ़लसफ़ा  जिंदगी  का  यही है ग़म  मिले  या ख़ुशी  मुस्कुराओ आह  दिल  पे  तुम्हारे  लगेगी मुफ़लिसों को कभी मत सताओ तुम हँसो अब हमें भी हँसाकर हौसला इस तरह तुम बढ़ाओ मत करो दूर तुम अज़नबी सा पास  आकर  गले  से  लगाओ जां  लुटा दो  मगर  दोस्ती में बेवज़ह मत कभी आज़माओ मौज दिल से कही है ग़ज़ल जो है  गुज़ारिश  ज़रा  गुनगुनाओ ग़ज़ल(2) वज़्न- 122 122 122 12 न विष का जुबां पे असर रख के चल मुहब्बत का दिल में हुनर रख के चल सदा मुस्कुरा कर भुला ग़म सभी भरा हौसलों से जिगर रख के चल न अपनों को करना पराया कभी सभी की हमेशा ख़बर रख के चल कदम  डगमगाना  नहीं  हार  के यहाँ शेर जैसा जिगर रख के चल संवर  जायेगी  ज़िंदगानी  तेरी तू चरणों में बस माँ के सर रख के चल मिली ज़िंदगी चार  दिन ...