ग़ज़ल भाग 6
ग़ज़ल6 ग़ज़ल(1) वज़्न-221 2121 1221 212 हासिल जहां में कुछ नहीं अच्छा किए बगैर रुकना नहीं है ख़्वाब को पूरा किए बगैर वो तो पहुँच गया है सियासत में आजकल कैसे रहेगा देश से धोखा किए बगैर शर्मिंदगी नहीं हैं उन्हे कम लिबास में जो लड़कियाँ हैं घूमती पर्दा किए बगैर ख़ुदग़र्ज दिलरुबा मिली तो है ही लाज़मी जायेगी कैसे बेवफ़ा रुसवा किए बगैर अच्छी तो चल रही है दुआओं से ज़िन्दगी जीना है अपनी सोच को नीचा किए बगैर ऐ मौज यूँ सलाह सभी चाहने लगे हो जायें मालामाल वो धंधा किए बगैर द्वारिका प्रसाद लहरे"मौज" ग़ज़ल (2) वज़्न- 22 22 22 22 22 2 जब तुम पहली बार मिली थी बचपन में तब से तुम ही तुम हो मेरे जीवन में हमको अच्छा लगता है डूबे रहना अब तो इश्क मुहब्बत के पागलपन में देख नहीं पायेगा कोई तब हमको जब हम आँखें चार करेंगे मधुबन में रौशन है जीवन मेरा तुमसे ही तो चाँद उतर आया है दिल के आँगन ...