ग़ज़ल संग्रह भाग(4)
ग़ज़ल (१) बहर- 22 22 22 22 22 2 प्यार किया तो खुलकर यार निभाना है याद मगर रखना दुश्मन ये ज़माना है दिल से सारी नफ़रत आज मिटाना है बैर भुलाकर सबको गले लगाना है जाकर मयख़ाने में जो घर भूल गया समझो उसको दौलत ख़ूब उड़ाना है बीच सड़क पर छेड़े भोली लड़की को और समझता खुद को वो मर्दाना है मौज बड़ों की लेना तुम आशीष सदा एक यही तो बस रब का नज़राना है ग़ज़ल(२) बहर -221 2121 1221 212 हम उनको देख जैसे ही उनके निकट गए वो मुस्कुरा के शान से हमसे लिपट गए समझा था दोस्त जिनको ख़ुशी ग़म में साथ दें मुश्किल में साथ देने से वो पीछे हट गए बेनूर हैं नयन भी सजाऊँ मैं अश्क क्या? इस वास्ते ख़ुशी से हमीं ख़ुद सिमट गए खु़द को समझ रहे थे मसीहा ग़रीब का पैसों की बात आई तो पल में पलट गए इस मौज को मिटाये ज़माने में दम नहीं इसको मिटाने वाले तो ख़ुद ही निपट गए गज़ल(३) बहर-221 2121 1221 212 उन दोस्तों पे हमको अभी तो गुमाँ हुआ पाकर ही दोस्ती को ये दिल बागबाँ हुआ निकले कभी सफ़र में अकेले ही दम भरे बढ़ते कदम हमारे वही कारवाँ हुआ कैसे जला दी जाती है अरमान की चिता अब इस वतन में देख लो कैसा धुआँ हुआ क...